भाषिक अशुद्धियाँ जो चल रही हैं

डॉ. कलानाथ शास्त्री


भाषाशास्त्रियों की यह मान्यता सुविदित है कि विश्व की प्रायः सभी भाषाएँ एक दूसरी से शब्द और अभिव्यक्तियाँ ग्रहण करती हैं। उनमें छुआछूत नहीं मानी जाती। उन गृहीत शब्दों और अभिव्यक्तियों को वे अपना जामा पहना कर अपनी जमात में शामिल कर लेती हों सो बात अलग है। भाषिकी का यह सिद्धान्त इन दिनों मीडिया (प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों) में इतना फल-फूल रहा है कि अंग्रेजी-हिन्दी के इस मिश्रण को कभी हिंग्रेजी का नाम दिया जाता है कभी खिचडी का। खिचडी शब्द हमें इसलिए उचित नहीं लगता कि उसमें तो अधिक-से-अधिक दो या तीन खाद्यान्न होते हैं (दाल और चावल) किन्तु पिछले कुछ अर्से से लोकप्रिय हो रही बम्बइया बोली पाँच छह तक भाषाओं की रंगत बयाँ करती है। मीडिया में अब फिल्में भी शुमार होने लगी हैं। दबंग नाम से अनेक फिल्में बनी हैं। ऐसी फिल्मों में ऐसे गाने सुन कर हमें दाँतों तले उँगली दबानी पडती है जिनमें पाँच छह भाषाओं और बोलियों की चाटपकौडी उफनती सुनाई देती है। ‘बोल बच्चन’ का एक गाना सुनिए ‘‘चलाओ न नैनों के बाण रे। जान ले लो न जान रे। कहीं निकल न जाए हमरी बॉडी से प्राण रे।’’ इसमें प्राण को और बाण को यदि संस्कृत मान लिया जाए तो निकल न अपभ्रंश का, नैन ब्रजभाषा का, जान उर्दू का, बॉडी अंग्रेजी का, हमरी अवधी या भोजपुरी का शब्द है, शेष हिन्दी के हैं। कहिए कैसी रही कॉकटेल ?
यह है एक शीर्षस्थ नमूना इन दिनों की हिन्दी का, जो केवल हिंग्रेजी या खिचडी नहीं है, जबर्दस्त मिश्रण है। ऐसी हालत में भाषा की शुद्धि का, मानकीकरण का या उत्कृष्ट भाषा के मापदंड का विचार करना कितना पिछडापन लगेगा यह आप समझ ही गए होगें फिर भी ऐसी अपेक्षाएँ कहीं तो बनी ही रहेगीं कि यदि सही या मानक भाषा की किसी प्रकार की कसौटी बनाई जाए जो चाहे पत्रकारिता; यदि विश्वविद्यालय बना रहे हों, हिन्दी, भाषाशास्त्र या संचार माध्यमों की पाठ्यचर्या बनाने वाले या प्रशिक्षण देने वाले विशेषज्ञ बना रहे हों, उनके द्वारा उस पर मोहर लगवाई जा सके।
इस प्रकार की कसौटी पर विचार कर पिछले दिनों मानकीकरण के ऐसे सिद्धान्त भारत सरकार के संबंधित आयोगों ने बनाए थे, जिनमें बताया गया था
कि बोलचाल में चाहे ऐसी खिचडी चल जाए, अधिकृत इबारतों में, न्याय या प्रशासन के आदेशों में, पुस्तकों में और स्तरीय समाचार पत्रों में भी व्याकरण या वर्तनी के साथ बलात्कार या दुष्कर्म नहीं किया जाएगा। आप को याद आ ही गया होगा कि पिछले दिनों इस प्रकार के बीभत्स कार्य के लिए अत्यन्त भद्र अभिव्यक्ति हिन्दी ने ‘‘दुष्कर्म’’ शब्द के रूप में देश को दी है। अस्तु।
यदि आप संस्कृतनिष्ठ शब्द लिख रहे हैं तो उसे संस्कृत के व्याकरण और वर्तनी के सिद्धान्तों के अनुरूप लिखें यह आवश्यक है। उससे दुष्कर्म न हो, जो कभी कभी हो जाता है। अदालतों में प्रार्थनापत्र पेश करने वाला व्यक्ति होता है प्रार्थी, यदि वह महिला हुई तो संस्कृत व्याकरण के अनुसार प्रार्थिनी होगी किन्तु हिन्दीभाषी राज्यों में वकील लोग इसमें उर्दू का व्याकरण लगाकर उसे ‘‘प्रार्थिया’’ लिखने लगे हैं। बहुवचन बनाने हेतु तो अपनी भाषा का व्याकरण लगाना मान्य है जैसे मजहब का बहुवचन ‘‘मजाहिब’’ न लिखकर आप मजहबों लिख सकते हैं किन्तु अन्य व्याकरण कार्य तो अपनी भाषा के ही होगें, स्त्रीलिंग दूसरी भाषा के व्याकरण से क्यों
बनाया जाए ?
नामों में अंग्रेजीः- हम इस तथ्य से तो वर्षों से शर्मिन्दा हैं ही कि भारत अंग्रेजों की सदियों की गुलामी से अपने नाम लेखक में आधा अंग्रेज बन गया है। व्यक्तियों के नामों में इनीशल्स याने आद्याक्षर अंग्रेजी के अर्थात् रोमन लिपि के लिखे जाते हैं और सरनेम भारत के। पी. सी. जैन, के.एस. गुप्ता, आर के. शर्मा, डी.सी. वर्मा। जैन, गुप्ता, शर्मा, वर्मा भारत के ही हैं, के. एस. रोमन लिपि की वर्णमाला से आयातित हैं। ऐसा आयात विश्व में क्या किसी भी अन्य देश ने किया है ? आधा नाम हिन्दुस्तानी, आधा अंग्रेजी। कुछ अंचलों ने इस अधकचरी गुलामी की हेयता समझकर अपने आद्याक्षर लिखने में ही गौरव समझा है। महाराष्ट्र के महानुभाव र.श. केलकर, ग. त्र्यां देशपांडे आदि ही लिखते हैं-आर.एस. केलकर या जी.टी. देशपांडे
नहीं लिखते। स्वतंत्र हो जाने के बाद गुलामी के इस लबादे को उतार फेंकने की अपीलें हमने बहुत की किन्तु नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनाई नहीं पडी। यह खिचडी चल ही रही है।
यदि आप अंग्रेजी में लिख रहे हों तब तो फिर भी ऐसी खिचडी किसी भाँति मान्य हो सकती है किन्तु हिन्दी में लिखते समय किसी अन्य देश से आयातित अलफाबेट के वर्ग लिखना कितना अटपटा हो सकता है? यह हमारे गुलाम हृदयों को कभी नहीं कचोटता। जिस भाषा में आप लिख रहे हैं उसमें आद्याक्षर लिखें तो फिर भी समझ में आती है। आपको शायद ज्ञात न हो कि राजस्थान के गौरव, उर्दू के जाने माने शायर शीन. काफ. निजाम का नाम शिव कृष्ण कल्ला है। अंग्रेजी के अक्षर उधार लेकर वे अपने आपको एस. के. कल्ला लिख सकते थे किन्तु इसकी बजाये कविता लिखने की भाषा वाले आद्याक्षर चुनना उन्होंने उचित समझा।
बोलचाल में खिचडीः- हम स्पष्ट कर ही चुके हैं कि भारत सरकार के स्पष्टीकरण के आलोक में भाषिक खिचडी बोलचाल में चाहे मान्य हो जाए, लिखित और मुद्रित अभिलेखों में नहीं आनी चाहिए। बोलचाल की खिचडी का एक यह नमूना तो आप आए दिन दूरदर्शन आदि के साक्षात्कारों में सुनते ही होगें कि फिल्म स्टार आदि वरिष्ठ व्यक्ति अपनी बात कहते हुए दो वाक्यों के बीच में ‘एंड’ और ‘बट’ अवश्य बोलते हैं। सारी बात तो हिन्दी में कही जाती है किन्तु दो वाक्यों को जोडने में ‘एंड’ तथा ‘बट’ अवश्य आ जाते हैं। कभी तो ऐसा लगता है कि जानबूझकर ‘और’, ‘किन्तु’, ‘परन्तु’, ‘लेकिन’ इनका पूरा बहिष्कार कर दिया गया है। केवल ‘एंड’ और ‘बट’ रह गए हैं। रह जाएँ, किन्तु यदि बोलचाल की तरह लिखने में भी ऐसा होने लगे, तो आपको कैसा लगेगा, आप स्वयं ही सोच सकते हैं। यह गनीमत है कि यह नौबत अब तक नहीं आई।
अशुद्ध शब्दः- यह तो बात हुई आम नागरिक के द्वारा प्रयुक्त और आम नागरिक द्वारा सुने जाने वाली हिन्दी की किन्तु परिनिष्ठित व्यक्तियों द्वारा भी बहुधा अपना डेढ सयानापन दिखाने हेतु ऐसे शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं जो मूलतः अशुद्ध होते हैं। एक दो उदाहरण ही पर्याप्त होगें। बहुधा हम यह फिकरा सुनते हैं- ‘‘इसकी व्यवस्था विधिवत रूप से कर दी गई है।’’ यह अभिव्यक्ति संस्कृत से अनभिज्ञता के कारण उतर आती है। स्पष्ट है कि ‘विधिवत’ का अर्थ ही होता है ‘‘कानूनी रूप से’’ या वैधिक रूप से। या तो ‘‘विधिवत’’ कहें या ‘‘वैधरूप से’’। विविधत रूप से कहना तो पुनरुक्ति हो गई। पर यह फिकरा बहुधा देखा जाता है।
गलत शब्दः- ऐसा ही एक अंग्रेजी शब्द है ‘रिपेमेंट’। इसके लिए ‘पुनर्भुगतान’ शब्द चल रहा है जिसका अर्थ होता है दुबारा भुगतान याने डबल पेमेंट किन्तु ‘रि’ के लिए पुनः शब्द कई जगह आता देखकर भाई लोगों ने समझा कि पुनर्भुगतान शब्द ही इसका अनुवाद होगा। गहराई से देखा जाए तो ‘रि’ दो अर्थों में आता है-‘पुनः’ के अर्थ में भी आता है जैसे रिअपीयर (पुनः प्रकट होना, पुनः उपस्थित होना) या रिएग्जामिनेशन अर्थात् पुनः परीक्षा, किन्तु ‘रि’ ‘वापस’ के अर्थ में भी आता है जैसे ‘रिवाइन्ड’ ‘रिटर्न’ आदि। ऐसे में ‘प्रति’ उपसर्ग से उसका अनुवाद दिया जाता है (प्रत्यावर्तन आदि। किन्तु ‘रिपेमेंट’ का अर्थ तो ऋण या अग्रिम का चुकारा करना होता है। यहाँ पुनः या दोबारा का कोई प्रसंग नहीं है। मैं बहुधा विनोद में कहा करता हूँ कि अंग्रेजी में उधार लेने या देने के अर्थ में तो अनेक धातुएँ हैं- लेंड, बॉरो, लोन किन्तु चुकाने के लिए अलग से कोई धातु या शब्द नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं है कि अंग्रेजी वाले उधार लेकर चुकाते नहीं हैं, यह तो भाषा की फितरत है। हिन्दी और संस्कृत में चुकाने के लिए अनेक शब्द हैं- ऋण शोधन, चुकारा, प्रतिदान, परिशोधन आदि। रिपेमेंट का वही अर्थ है फिर इसके लिए पुनर्भुगतान जैसा भ्रामक शब्द क्यों चल निकला? यह
आज तक समझ में नहीं आया। हमें आश्चर्य तब हुआ जब बैंकिंग शब्दावली देखने से ज्ञात हुआ कि उसमें रिपेमेंट के लिए कहीं भी पुनर्भुगतान शब्द नहीं दिया हुआ-वहाँ इसका अधिकृत पर्याय है ‘चुकारा’। पर न जाने क्यों, अबकी पुनर्भुगतान शब्द खूब चल रहा है।
चलन में गलत शब्द के चल निकलने के अनेक दिलचस्प कारण होते हैं। एक शब्द विधि एवं न्याय के क्षेत्र में खूब चल रहा है-‘‘इस पर न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित रखा है।’’ निर्णय सुरक्षित कैसे रखा जाता है? यह हमें ज्ञात नहीं हो पाया। क्या जज साहेब निर्णय लिखकर उसे तिजोरी में बन्द कर देते हैं या फाईल में रख लेते हैं ? पूछने पर ज्ञात हुआ कि यह फिकरा ‘टू रिजर्व द जजमेंट’ के लिए आता है। रिजर्व याने सुरक्षित। इससे यह भ्रान्ति स्वाभाविक है कि निर्णय हो गया है पर छिपा लिया गया है कि उसमें रिजर्व के लिए सुरक्षित शब्द कहीं भी नहीं है, वहाँ इसका तात्पर्य निर्णय को आगे दिए जाने हेतु स्थगित रखना (अर्थात् मुल्तवी रखना) दिया गया है। सुरक्षित रखने का यह चमत्कार कहाँ से आ गया, हमें अब तक ज्ञात नहीं हुआ।
अनिवासीः- इसी प्रकार ‘नोन रेजीडेंट’ के लिए बिल्कुल उलटा अर्थ देने वाला शब्द न जाने कब चल गया ‘अप्रवासी’। प्रवासी का अर्थ है देश के बाहर रहने वाला और अप्रवासी का अर्थ है जो देश के बाहर कभी न जाए। पर वह देश के बाहर रहने वालों के लिए ही याने अनिवासियों अर्थात् प्रवासियों के लिए ही प्रायः सब जगह आने लगा है जबकि किसी भी शब्दकोश में यह नहीं दिया है। ऐसा क्यों हुआ इसका कारण बडा दिलचस्प है।
अंग्रेजी में, प्रवास करके अन्यत्र बसे हुए विदेशियों के लिए तीन शब्द प्रमुखतः आते हैं-माइग्रेंट, इमिग्रेंट और एमिग्रेंट। नॉन-रेजिडेंट तो वे होते ही हैं जो अपने देश के अतिरिक्त किसी अन्य देश में जा बसे हों। इनके लिए एन.आर.आई. पूरी तरह जानी-पहचानी हो गई है। माइग्रेट वे हैं जो प्रवासी हैं, अन्य देश में रह रहे हैं। इनके दो भेद
हैं। जो प्रवासी अन्य देशों से आकर हमारे देश में रह रहे हैं वे हुए इम्मिगेट अर्थात् बाहर से आकर यहाँ रह रहे। जो प्रवासी हमारे देश से जाकर किसी अन्य देश में रह रहे हैं वे हमारे लिए ‘‘एमिग्रेंट’’ हैं। ये दो भेद हैं आकर रहने वाले प्रवासियों और जाकर रहने वाले प्रवासियों के। इनके लिए हिन्दी में भी पर्याय वांछित थे। ये पर्याय दिए संस्कृत ने। आकर रहने वाले (इम्मिग्रेंट) कहे गए ‘‘आप्रवासी’’ और जाकर अन्यत्र बसे हुए (एमिग्रेंट) कहे गए उत्प्रवासी। इन तीन शब्दों की बारीकी न समझने वालों ने प्रवासी, आप्रवासी और उत्प्रवासी का सूक्ष्म भेद भूलकर तीनों की खिचडी बनाते हुए शब्द गढ लिया ‘अप्रवासी’ जिसका अर्थ न इधर का रहा न उधर का। यह अप्रवासी प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी चल रहा है और विपरीत अर्थ देने वाले इस शब्द पर हम दाँतों तले अँगुली दबाने के सिवा और कुछ नहीं कर पा रहे।
आरोपीः- ऐसा ही एक शब्द मीडिया में खूब चल रहा है। पुलिस किसी अपराधी को पकडती है तो कहा जाता है- ‘‘इतने आरोपी पकडे गए।’’ यह आरोपी किसके लिए आया है? यह हम नहीं समझ पाए क्योंकि आरोपी का अर्थ होता है आरोप लगाने वाला जैसे आरोही (चढने वाला) शासी या अधिशासी (शासन करने वाला)। जिस पर शासन होता है वह तो शासित कहा जाता है अतः या तो उसे ‘आरोपित’ कहें, जिस पर आरोप लगे हैं या वह शब्द लिखें जो इस अंगेजी शब्द का सही पर्याय है। अंग्रेजी शब्द है ‘एक्यूज्ड’। हमने सभी शब्दकोशों में देखा,कहीं भी इसका पर्याय ‘आरोपी’ नहीं मिला। विधिशब्दावली में इसका पर्याय है ‘अभियुक्त’। फिर यह आरोपी कहाँ से आ गया और कैसे धडल्ले से चल निकला यह समझ में नहीं आया। हमने अनेक मंचों से इस असंगति पर ध्यान आकर्षित किया। यह अवश्य हुआ कि जयपुर की एक सुप्रचारित दैनिक पत्रिका इसके लिए ‘आरोपित’ शब्द लिखने लगी औरों पर कुछ असर हुआ या नहीं, यह ज्ञात नहीं।
ये कुछ नमूने हैं, उन बेसिर पैर वाले शब्दों के जो धडल्ले से चल निकलते हैं और जिनका इलाज मुश्किल होता है। नये सिरे से किसी भाषा के व्यापक प्रसार के
समय पर ऐसा होना असंभव नहीं है पर उन पर विमर्श होते रहना भी वांछनीय है।
सी/८, पृथ्वीराज रोड, सी-स्कीम, जयपुर (राज.)