अमृत लाल वेगड के साथ छोटी-सी मुलाकात

सुनीता देवी


सुनीता देवी : ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ में अपने लेखकीय वक्तव्य में आपने बताया कि ५० वर्ष बाद आपने यह यात्रा की। तो क्या इससे पहले आफ मन में यह विचार नहीं आया?
अमृतलाल वेगड : हर इंसान के जीवन में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था अपनी बारी-बारी से आती है। मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। २५ वर्ष तक की अवस्था मेरी वृद्धावस्था थी। उस समय मैंने पढाने के अलावा अन्य कोई काम नहीं किया और ५० वर्ष बाद मेरी युवा अवस्था शुरु होती है। नर्मदा के किनारे-किनारे १९७७ से १९८८ के दौरान १८०० किलोमीटर की पहली यात्रा की, जिसका यात्रावृत्तांत मैंने अपनी ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ में लिखा। ९ वर्ष बीत जाने पर मैंने पुनः १९९६ से १९९९ के दौरान उत्तर तट की बची परिक्रमा ८०० किलोमीटर पूरी की। जिसका वर्णन मैंने ‘अमृतस्य नर्मदा’ में किया। नर्मदा के दोनों तटों को मिलाकर इस तरह मैंने २६२४ किलोमीटर की यात्रा की।
सुनीता देवी : लिखने के साथ-साथ चित्रांकन के काम को कैसे देखते हैं?
अमृतलाल वेगड : माँ नर्मदा ने मुझे लेखक भी बना दिया और चित्रकार मैं मूलतः था ही। शांति निकेतन से मैंने चित्रकला की पढाई की। मैं आचार्य नंदलाल बसु का विद्यार्थी रहा तथा लम्बे समय तक चित्रकला का अध्यापक भी रहा। मुंबई के जहाँगीर आर्ट गैलरी, कलकत्ता, दिल्ली, भोपाल, इंदौर और जबलपुर में कई स्थानों पर मेरी एकल चित्र प्रदर्शनियाँ लगीं। मेरे बारे में एक खूबसूरत किंवदंती प्रचलित है कि जब लोग मुझे चित्रकार मानने से इनकार कर देते हैं तो मैं लिखने लगता हूँ और जब लेखक मानने से इनकार कर देते है तो मैं चित्र बनाने बैठ जाता हूँ। चित्रकला के लिए मुझे मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग ने ‘शिखर सम्मान’ से सम्मानित भी किया।
सुनीता देवी : ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ में अलंकारों का प्रयोग जैसे- रूपक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, अतिशयोक्ति आदि का प्रयोग आपने बडे ही रोचक ढंग से किया। इसके विषय में आप क्या कहेगें?
अमृतलाल वेगड : मुझे तो अलंकारों का ज्ञान भी नहीं है। कहाँ कौनसे अलंकार का प्रयोग होता है? मैं तो बस लिखता गया। अलंकार तो बिन बुलाए मेरे पास आ गए। तुम लोग इन सबको पढते-लिखते रहते हो तो पहचान लिया कि कौनसा अलंकार कहाँ आया है। एक बार मैं और मेरा विद्यार्थी एक गाँव में गए। वहाँ दो गोस्वामी भाई मिले। हमने उनके घर में शरण ली। पच्चीस साल बाद फिर उसी गाँव में गए। लेकिन इस बार हम दो नहीं आठ लोग थे। गाँव में धर्मशाला भी बन चुकी थी। मैं बोला हम तो गोस्वामी भााईयों के घर ही जायेगें। मालूम हुआ वो तो अब नहीं रहे। घर में केवल बहू थी। उसने हमें सम्मान से वहाँ रहने व सामान लाने के लिए कहा, बहू के आग्रह पर हम वहीं रहे। उसने हम आठों लोगों को खाना खिलाया। यह है हृदय का सौंदर्य। सच कहूँ तो गाँव के उन सीधे-साधे लोगों के पास संस्कृति है और हमारे पास सभ्यता, उनमें और हममें यही अन्तर है।
सुनीता देवी : ३० साल आपने नर्मदा की पैदल यात्रा में बिताए। क्या कहेगें इसको लेकर?
अमृतलाल वेगड : प्रथम यात्रा १९७७ में और अन्तिम २००९ में हुई। इन ३३ वर्षों क दौरान लगभग ४००० कि.मी. से अधिक चला। कोई साथ मिला तो ठीक ना मिला तो ठीक। सच कहूँ तो मैंने यह यात्रा चित्र बनाने के लिए की थी। लेकिन इसके सौन्दर्य ने मुझे इस कदर प्रभावित किया कि आगे चलकर यही मेरी पहचान बन गई। मैंने नर्मदा की पैदल यात्रा करते-करते जो कुछ महसूस किया वहीं मैंने लिख डाला। महिलाओं की ऊर्जा पर मैं विस्मित हूँ। निर्जन क्षेत्रों में लम्बी-लम्बी दूरियाँ तय करने के बाद भी वे खाना बनाने के कार्य में जुट गईं और सबको खिलाकर बाद में खाया। यह बात मैं उस समय जान पाया की औरतें अपने अनुमान से अधिक कर
सकती हैं।
सुनीता देवी : रमेशचन्द्र शाह ने कहा कि मेरा बस चले तो मैं इसे (सौन्दर्य की नदी नर्मदा) स्कूल के पाठ्यक्रम में लगा दूँ। आप क्या कहेगें?
अमृतलाल वेगड : हाँ, ‘नर्मदा की बात’ में वे ऐसा कहते हैं। यह सौन्दर्य का ही नहीं, संस्कृति का उत्तम पाठ है। मैं भी उनकी इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ। इस पुस्तक को पाठ्यक्रम में जोडकर छात्रों को एक सांस्कृतिक पाठ पढाया जा सकता है। नदियाँ हमारी संस्कृति की जनक हैं। मनुष्य और नदी इन दोनों की जुगलबंदी ने सभ्यता को जन्म दिया लेकिन नगरीय सभ्यता का आकर्षण सभ्यता व संस्कृति दोनों को नष्ट कर रहा है। नर्मदा एक संस्कृति है। अब इस संस्कृति को बचाना एक चुनौती है।
सुनीता देवी : परिक्रमा के लिये आपने नर्मदा को ही क्यों चुना?
अमृतलाल वेगड : नर्मदा मुझे दो कारणों से विशिष्ट लगती है। एक तो यह अत्यन्त सुन्दर नदी है। गंगा भी सुन्दर है, लेकिन हरिद्वार तक। इसके बाद तो वह नहर की तरह बहती है जबकि नर्मदा पहाडों में से, जंगलों में से, घाटियों में से, एक से एक सुन्दर प्रपातों का निर्माण करती है। अगर कभी भारत की नदियों की सौन्दर्य प्रतियोगिता होगी, तो सर्वोत्तम पुरस्कार नर्मदा को ही मिलेगा। नर्मदा की दूसरी विशेषता यह है कि संसार में एकमात्र नर्मदा की ही परिक्रमा होती है, अन्य किसी नदी की नहीं। सैकडों वर्षों से हजारों परकम्मावासी नर्मदा की ही परिक्रमा करते आ रहे हैं।
सुनीता देवी : नर्मदा तट के बदलते भूगोल और वहाँ के गाँवों के अस्तित्व के विषय में आप का क्या दृष्टिकोण है?
अमृतलाल वेगड : मैं 50 वर्ष की अवस्था में पहली बार नर्मदा परिक्रमा पर गया। उसके बाद ३३ वर्षों
से घूम ही रहा हूँ और जब तक जीवित हूँ, घूमता ही रहूँगा। लेकिन तबमें और आज में बडा भारी परिवर्तन आ गया है। बाँध बन जाने के बाद की यात्रा के संदर्भ में कहते हैं कि अब नर्मदा का सौन्दर्य आधा रह गया है। लेकिन मैं बाँध का विरोधी नहीं हूँ, क्योंकि आबादी के विस्फोट को संभालने के लिए यह जरूरी है लेकिन नदियों को बचा पाना संभव नहीं लगता। इसका कारण यह है कि बढती आबादी व शहरी प्रकोप को रोकने हेतु सरकार गंभीर प्रयास नहीं कर रही है। आज वहाँ की
ग्रामीण संस्कृति में बहुत बदलाव आ रहा है। वह विलुप्ति के कगार पर है। भौगोलिक परिदृश्य बदल चुका है। परिवर्तन तो आज यात्रा में भी आ गया है। लोग पहले जितना पैदल कहाँ चलते है? मुझे यहाँ एक पार्सल की तरह प्लेन में लाया गया। अब क्या मैं कुछ लिख पाऊँगा? क्या लिखूँगा इस यात्रा के बारे में क्योंकि यात्रा के लिए जन सम्फ जरूरी है। बाजार, सडक, नदियों से जुडने वाले लोग ही एक सफल यात्रावृत्तांत लिख सकते हैं।
टी. आर. ३७, केम्पस, राजस्थान विश्वविद्यालय
जयपुर-३०२००४ (राज.) मो. ९८२८७१६९३८
मधुमती का वैश्विक हिन्दी विशेषांक
रचनाकारों से विशेष अनुरोध
राजस्थान साहित्य अकादमी की साहित्य मासिकी मधुमती का एक अंक वैश्विक हिन्दी के प्रचार-प्रसार, संभावनाओं-चुनौतियों तथा संकल्पबद्धता पर केंद्रित करके प्रकाशित किया जाना प्रस्तावित है। संयुक्त विशेषांक के रूप में प्रकाशित होने वाले उक्त अंक हेतु लेखक बंधुओं से मौलिक, चिंतनपरक, स्तरीय एवं गंभीर आलेख भिजवाने का साग्रह अनुरोध है।
आलेख डाक द्वारा या ई-मेल द्वारा प्रेषित किये जा सकेंगे। फरवरी, २०१८ के अंत तक सामग्री प्राप्त हो सकेगी तो हमें अंक संपादन-प्रकाशन में सुविधा रहेगी।
-सम्पादक