स्वामी विवेकानंद के भाषा तथा कला चिंतन पर विचार करते हुए...

इन्दुशेखर तत्पुरुष


आधुनिक विश्व में भारतीय परम्परा और तत्वज्ञान से सारे विश्व को परिचित कराने और प्रभावित करने में सर्वाधिक योगदान स्वामी विवेकानंद का है। अपने प्रकाण्ड ज्ञान, प्रखर तर्कशक्ति, निष्कलंक चरित्र, अटूट आत्मविश्वास और अथक परिश्रम से उन्होंने ऐसा चमत्कार कर दिखाया जो पिछली अनेक सदियों में नहीं हो सका। उन्होंने भारतीय जन मानस में जड जमाए बैठे पश्चिमोच्चता के गुब्बारे की हवा निकाल कर भारतीयों की हीनग्रंथि को छिन्न-भिन्न कर दिया और थके-हारे -शिथिल-कलात्ं-दुर्बल भारत को साहस के साथ खडे होकर अपनी अमूल्य विरासत पर गर्व करना सिखाया। शिकागो धर्म सम्मेलन में संसार भर से आए धर्मधुरीणों के सामने भारतीय विचार और धर्म दृष्टि की उज्ज्वल पताका फहराने के समाचारों ने हर भारतीय का सीना गर्व से चौडा कर दिया। शिकागो धर्म सभा और उसके बाद अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि अनेक देशों में उनके व्याख्यानों की जो धूम मची उसने पश्चिमी विद्वानों पत्रकारों, धर्म गुरुओं के दिमाग में भारतीय मनीषा के बारे में जमी काईर् को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय लोगों का भी इस युवा सन्ंयासी पर ध्यान तब गया जब शिकागो धर्म सभा में उनके मंत्रमुग्ध कर देने वाले भाषणों की गूंज और श्रोताओं की तालियों की गडगडाहट यहां तक पहुंची। अमेरिका से वह अपार कीर्ति और अकल्पनीय सम्मान साथ में लेकर भारत भूमि पर लौटा । भारतीयों के मानस पटल पर गहराई तक चिपकी हुई पश्चिमपरस्ती को देख कर कभी-कभी लगता है कि इस संन्यासी ने यदि विदेशें में अपनी विद्वत्ता का झंडा नहीं गाडा होता तो भारत में भी शायद ही यह इतना पूजनीय और महत्वपूर्ण समझा जाता।
अब आगे हाल यह हुआ कि हमारी कर्महीन प्रवृत्ति ने विवेकानंद को प्रायः हर विद्यालय, महाविद्यालय, पुस्तकालय, वाचनालय, सभा-समिति कक्ष, कार्यालय, सेवा केन्द्र, समारोह, मंच आदि के लिए वन्दनीय पुरूष बनाकर दीवारों, अलमारियों अथवा मेजों पर आदराजंलि हेतु छोड दिया। उनके दिखाए मार्ग और उपदेशों से पर्याप्त सुविधाजनक दूरी बनाए रखी। भारतीय बुद्धिजीवियों में विवेकानंद को लेकर एक और भी दुराग्रह देखा गया। धर्म के नाम मात्र से चिढने और भगवा वेश को देख कर भडक उठने वाले आधुनिक विचारक इस हिन्दू सन्ंयासी को देखते परखते भी तो भला कैसे
इन स्थितियों की परिणिति इस रूप में हुई कि आम भारतीय ने विवेकानंद को एक महान् आत्मा, महान् विचारक, महान् संन्यासी, महान् कर्मयोगी, महान् भारतोद्धारक...... और न जाने कितने विशेषणों से अंलकृत कर नमस्कारान्ते पत्रम् पुष्पम् इति कहकर
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छुट्टी पा ली तो वहीं दूसरी ओर विचारशील बुद्धिजीवियों ने उनको लेकर उतना अकादमिक विचार-विमर्श नहीं किया जितना अपेक्षित था, और यदि किया भी तो उनके धार्मिक-आध्यात्मिक पक्षों पर ही दृष्टिपात किया। उनके चिंतन-अध्ययन के अनेक महत्वपूर्ण पक्ष जैसे भारतीय सामाजिक संरचना, इतिहास-बोध, राजनैतिक दृष्टि जातिवर्ण व्यवस्था, धर्म और मोक्ष का स्वरूप, शिक्षण, स्वतंत्रता, प्राच्य और प्रतीच्य जीवन दृष्टि, सभ्यता विमर्श, स्त्रीविमर्श, साहित्य बोध, कला दृष्ट आदि उनके भगवा परिधान की ओट में ही दुबके रह गए । कहीं भगवा के प्रति उमडती भावुकता के समुद्र में बहते हुए इन दुलर्भ रत्नों के अलक्षित रह जाने के कारण और कहीं भगवा मात्र के दर्शन से भडक उठने की संर्कीण मनोवृत्त के कारण।
विवेकानंद के विचारों के इन दुलर्भ रत्नों की एक बानगी है उनकी कला दृष्टि और उनके भाषापरक विचार जो उनके व्याख्यानों , पत्रों और वार्त्तालाप में यत्र-तत्र बिखरे पडे हैं। धर्म, अध्यात्म और वेदान्त का यह प्रकाण्ड पंडित कैसी सूक्ष्म कलादृष्टि रखता है, यह जानकर विस्मय होता है। इस दृष्टि से सन् १९०१ में बेलूर मठ में कलकत्ता जुबली आर्ट अकादमी के संस्थापक और अध्यापक रणदाप्रसाद दासगुप्त से हुई उनकी लम्बी बातचीत एक उल्लेखनीय प्रसंग है। यह बातचित कला के प्रति विवेकानंद की गहरी पर्यवेक्षण और आलोचना दृष्ट का परिचय देती है।
कला में भावों की अभिव्यक्ति एक महत्वपूर्ण घटक है। हमारे दैनन्दिन व्यवहार में शिल्प के माध्यम से भावों को प्रकट करने की बात कहते हुए विवेकानन्द कहते हैं कि - मनुष्य जिस चीज का निर्माण करता है, उससे किसी एक मनोभाव को व्यक्त करने का नाम ही शिल्प है। जिसमें भाव की अभिव्यक्ति नहीं, उसमें रंग-बिरंगी चकाचौंध रहने पर भी उसे वास्तव में शिल्प नहीं कहा जा सकता। लोटा, कटोरे, प्याली आदि नित्य व्यवहार की चीजें भी उसी प्रकार कोई विशेष भाव व्यक्त करते हुए तैयार करनी चाहिए।
आगे वे पेरिस की एक प्रदर्शनी पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं -पेरिस प्रदर्शनी में पत्थर की बनी हुई एक विचित्र मूर्ति देखी थी। मूर्ति के परिचय के रूप में उसके नीचे ये शब्द लिखे हुए थे -’प्रकृति का अनावरण करती हुई कला‘ अर्थात् शिल्पी किस प्रकार प्रकृति के घूँघट को अपने हाथ से हटाकर भीतर के रूप -सौन्दर्य को देखता है। मूर्ति का निर्माण इस प्रकार किया है मानो प्रकृति देवी के रूप का चित्र अभी स्पष्ट चित्रित नहीं हुआ , पर जितना हुआ है, उतने के ही सौन्दर्य को देखकर मानो शिल्पी मुग्ध हो गया है। जिस शिल्पी ने इस भाव को व्यक्त करने की चेष्टा की है, उसकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जाता।
हमारे ऐदि्रक संवेदनों को प्रभावित करने वालों साधनों-उपकरणों के द्वारा कला पर पडने वाले प्रभावों को भी विवेकानन्द एक कला मर्मज्ञ की तरह अपनी दृष्टि से
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ओझल नहीं होने देते । फोटोग्राफी के व्यापक रूप से जन जीवन का हिस्सा बनने की स्थिति में चित्र शैली पर पडने वाले प्रभाव को रेखांकित करते हुए टिप्पणी करते है कि : पूर्व काल के शिल्पकार अपने अपने मस्तिष्क से नये नये भाव निकालने तथा उन्ही भावों को चित्रों के द्वारा व्यक्त करने का प्रयत्न किया करते थे। आजकल फोटो जैसे चित्र होने के कारण मस्तिष्क के प्रयोग की शक्ति और प्रयत्न लुप्त होते जा रहे हैं, परन्तु प्रत्येक जाति की एक एक विशेषता है। आचरण में, व्यवहार में, आहार में, विहार में, चित्र में, शिल्प में उस विशेष भाव का विकास देखा जाता है।
इन सामान्य टिप्पणियों के बाद स्वामी विवेकानन्द पश्चिमी और भारतीय कला दृष्ट के अन्तर को बताते हुए इसकी तह में जाते हैं और यह प्रतिपादित करते है कि जीवन दृष्टि किस तरह कला दृष्टि को निर्धारित करती है, और किस तरह भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में कला का रूप विकसित होते हैं : जो जातियां बहुत ही जडवादी तथा इहकाल को ही सब कुछ मानती हैं, वे प्रकृति के नाम-रूप को ही अपना परम उधेश्य मान लेती हैं और शिल्प में भी उसी के अनुसार भाव को प्रकट करने की चेष्टा करती हैं ; परन्तु जो जाति प्रकृति के परे किसी भाव की प्राप्ति को ही जीवन का परम उधेश्य मानती हैं, वही उसी भाव को प्रकृतिगत शक्ति की सहायता से शिल्प में प्रकट करने की चेष्टा करती है। प्रथमोक्त जातियों की कला का प्रकृतिगत सांसारिक भावों तथा पदार्थसमूह का चित्रण ही मूलाधार है और उपरोक्त जातियों की कला के विकास का मूल कारण है, प्रकृति के अतीत किसी भाव को व्यक्त करना । इस प्रकार दो भिन्न भिन्न उ६श्यों के आधार पर कला के विकास में अग्रसर होने पर भी, दोनों का परिणाम प्रायः एक ही हुआ है। दोनों ने ही अपने अपने भावानुसार कला में उन्नति की है। उन सब देशों का एक एक चित्र देखकर आपको वास्तविक प्राकृतिक दृश्य का भ्रम होगा। इसी प्रकार इस देश में भी प्राचीन काल में स्थापत्य-विद्या का जिस समय बहुत विकास हुआ था, उस समय की एक एक मूर्ति देखने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह आपको इस जड प्राकृतिक राज्य से उठाकर एक नवीन भावलोक में ले जायगी।
स्पष्ट है कि विवेकानन्द पश्चिमी कला दृष्टि को जडवादी होने के कारण वस्तु का हुबहू चित्र बनाकर वस्तु का भ्रम रच देने की है, वहीं भारतीय दृष्टि प्रकृति से परे किसी अन्य अलौकिक सत्ता में विश्वास करने वाली होने के कारण चित्रों में दृश्य से भिन्न एक नए भाव लोक की रचना को स्वीकार करती हैं । प्रसंगतः यहां सुविख्यात भारतीय कला चिंतक आनंद कुमार स्वामी का स्मरण होता है। जहा वे भारतीय कला दृष्टि का विवेचन करते हुए सुसदृश्य होने को कला का दोष मानते है। उनके अनुसार कला का कमल इतना कमल जैसा बन जाए की भौंरे को कमल होने जाने का भ्रम हो जाए तो वह कला की श्रेष्ठता नहीं वरन् कला का दोष है। चित्रकार द्वारा कमल बनाते समय इतना सदृश्य रखना ही पर्याप्त है कि वह कमल का चित्र लगे गुलाब का नहीं।
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आनंद कुमार स्वामी का यह कला विवेचन स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में इस प्रकार प्रकट हुआ है - यूनानी कला का रहस्य है प्रकृति के सूक्ष्मतम ब्योरों तक का अनुकरण करना, पर भारतीय कला का रहस्य है आदर्श की अभिव्यक्ति करना। यूनानी चित्रकार की समस्त शक्ति कदाचित् मांस के एक टुकडे को चित्रित करने में ही व्यय हो जाती हैं, और वह उसमें उतना सफल होता हैं कि यदि कुत्ता उसे देख ले तो उसे सचमुच का मांस समझ कर खाने दौड आए। किन्तु इस प्रकार कुकृति के अनुकरण में क्या गौरव है घ् कुत्ते के सामने यथार्थ मांस का एक टुकडा ही क्यों न डाल दिया जाए घ् दूसरी ओर आदर्श को -अतीन्दि्रय अवस्था को -अभिव्यक्त करने की भारतीय प्रवृत्ति भद्दे और कुरूप बिम्बों के चित्रण में विकृत हो गई है। वास्तविक कला की उपमा लिली से दी जा सकती है जो कि पृथ्वी से उत्पन्न होती है, उसी से अपना खाद्य पदार्थ क्रहण करती है, उसके संस्पर्श में रहती है, किन्तु फिर भी उससे ऊपर ही उठी रहती है। । इसी प्रकार कला का अधःपतन हो जाता है। पर साथ ही कला का प्रकृति से ऊँचा उठा रहना भी आवश्यक है।
इस वार्त्तालाप - प्र्रसंग में स्वामी जी काली मां के समकालीन चित्रों को देख कर टिप्पणी करते हैं कि - माँ काली का चित्र ही ले लीजिए। इसमें एक साथ ही कल्याणकारी तथा भयावह भावों का समावेश है, पर प्रचलित चित्रों में इन दोनों भावों का यर्थाथ विकास को भी नहीं देखा जाता। इतना ही नहीं, इन दोनों भावों में से किसी एक को भी चित्रित करने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहा है।
इसके बाद रणदा बाबू को विस्मित करते हुए विवेकानंद काली की भीषण मूर्ति का भाव व्यक्त करने वाली अंग्रेजी में रचित अपनी कविता ष्ज्ञंसप रू जीम डवजीमतष् का पाठ करते हैं। कविता सून कर रणदाबाबू स्तभ रह जाते है और भयमिश्रित आर्श्चय दृष्टि से स्वामी ज के मुख को ताकने लगते हैं। स्वामी के यह पूछंने पर की क्या आप उस भाव को किसी चित्र में व्यक्त कर सकते हैं ? रणदाबाबू कहते हैं कि मै कोशिश करूंगा परन्तु इस भावना की कल्पना से मेरा सिर चकराने लगता है। स्वामी जी रणदाबाबू को रामकृष्ण मिशन के लोगों में चित्रित सर्प कमल दल जलाशय और उसमें बीच तैरते हंस का भावार्थ समझाते हैं तो कला शिक्षक रणदा बाबू नतमस्तक हो कर कहत उठते हैं - यदि मैं आपसे कुछ समय शिल्पकला सीख सकता तो मेरी वास्तव में कुछ उन्नति हो जाती ।
देश-विदेश के हर स्थान की कला विशेषताओं की समझ रखने वाले स्वामी विवेकानन्द की स्थापत्य कला पर की गई यह टिप्पणी प्रदर्शित करती है कि राजस्थान की कला विशेषता को भी उन्होंने सूक्ष्मदृष्टि से अकालन किया था : लोग कहते हैं, कलकत्ता महलों का नगर है, परन्तु यहां के मकान ऐसे लगते हैं, जैसे एक सन्दूक के ऊपर दूसरा रखा गया हो। इनसे कोई कल्पना नहीं जागती। राजपूताना में अभी भी -
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बहुत कुछ मिल सकता है, जो शुद्व हिन्दू स्थापत्य है। यदि एक धर्मशाला को देखो, तो लगेगा कि वह खुली बांहों से तुम्हें अपने शरण में लेने के लिए पुकार रही है और कह रही है कि मरे निर्विशेष आतिथ्य का अंश ग्रहण करो। किसी मन्दिर को देखो, तो उसमें और उसके आसपास दैवी वातावरण निश्चय ही मिलेगा। किसी देहाती कुटी को भी देखो, तो उसके विविध हिस्सों का विशेष अर्थ तुम्हारी समझ में आ सकेगा, और उसके स्वामी के आदर्श और प्रमुख स्वभाव -गुणों का साक्ष्य उस पूरी बनवट से मिलेगा। इटली को छोडकर मैनें कहीं भी ऐसा अभिव्यंजक स्थापत्य नह देखा।
इस तरह स्वामी विवेकानन्द नाट्य विधा पर एक रोचक टिप्पणी करते हुए उसे कलाओं में कठिनतम बताते हैं क्योंकि यह एक साथ दो एंन्दि्रक संवेदनों को प्रभावित करती है। वे लिखते हैं - कला में ध्यान प्रधान वस्तु पर केन्दि्रत होना चाहिए। नाटक सब कलाओं में कठिनतम है। उसमें दो चीजों को सन्तुष्ट करना पडता है-पहले, कान; दूसरे आँखें। दृश्य का चित्रण करने में, यदि एक ही चीज का अंकन हो जाय, तो काफी है; परन्तु अनेक विषयों का चित्राकन करके भी केन्द्रीय रस अक्षुण्ण रख पाना बहुत कठिन है। दूसरी मुश्किल चीज है मंच-व्यवस्था ; यानी विविध वस्तुओं को इस तरह विन्यस्त करना कि केन्द्रीय रस अक्षुण्ण बना रहे।
चित्र कला स्थापत्य नाटक के बाद हम आते हैं विवेकानंद के साहित्य विवेक और भाषापरक दृष्टि पर । यह विवेकानंद की गहरी दृष्टि और भाषा वैज्ञानिक सोच का ही परिचायक है कि वे बांग्ला भाषा को संस्कृत की अपेक्षा पालि भाषा के निकट ले जाने का प्रस्ताव करते हैं। किन्तु समृद्धि की दृष्टि से संस्कृत निर्भरता को भी पर्याप्त महत्व देते हैं : बंगला भाषा का आदर्श संस्कृत न होकर पाली भाषा होना चाहिए, क्योंकि पाली बंगला से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। पर बंगला में पारिभाषिक शब्दों को बनाने अथवा उनका अनुवाद करने में संस्कृत शब्दों का व्यवहार उचित है। नये शब्दों को गढने का भी प्रयत्न होना चाहिए। इसके लिए यदि संस्कृत के कोष से पारिभाषिक शब्दों का संग्रह किया जाय, तो उससे बंगला भाषा के निर्माण में बडी सहायता मिलेगी।
वस्तुतः विवेकानंद भाषा प्रयोग के मुद्दे पर शास्त्रीयता की अपेक्षा लोकानुकूलता के पक्षधर हैं और यही उनका लोकधर्मी स्वरूप है कि स्वयं शास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित और ज्ञान के चलते फिरते शब्द कोष होने के बावजूद वे लोक प्रचलित भाषा के समर्थक हैं - पाण्डित्य अवश्य उतम है, परन्तु क्या पाण्डित्य का प्रदर्शन जटिल, अप्राकृतिक तथा कल्पित भाषा को छोड और किसी भाषा में नहीं हो सकता ? बोलचाल की भाषा में क्या कलात्मक निपुणता नहीं प्रदर्शित की जा सकती ? स्वाभाविक भाषा को छोडकर एक अस्वाभाविक भाषा को तैयार करने से क्या लाभ ? घर में जिस भाषा में हम बातचीत करते हैं, उसी में मन ही मन समस्त पाण्डित्य की
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गवेषणा भी करते हैं ;तो फिर लिखने के समय ही हम जटिल भाषा का प्रयोग क्यों करने लगते हैं ? जिस भाषा में तुम अपने मन में दर्शन या विज्ञान के बारे में सोचते हो, आपस में कथा-वार्त्ता करते हो, उसी भाषा में क्या दर्शन या विज्ञान नहीं लिखा जा सकता ! यदि कहो, नहीं,तो फिर उस भाषा में तुम अपने मन में अथवा कुछ व्यक्तियों के साथ उन सब तत्वों पर विचार -परामर्श किस प्रकार करते हो ? स्वाभाविक तौर पर जिस भाषा में हम अपने मन के विचारों को प्रकट करते हैं, जिस भाषा में हम अपना क्रोध, दुख एवं प्रेम इत्यादि प्रदर्शित करते हैं, उससे अधिक उपयुक्त भाषा और कौनसी हो सकती है ! अतः हमें उसी भाव को , उसी शैली को बनाये रखना होगा। उस भाषा में जितनी शक्ति है, थोडे से शब्दों में उसमें जिस प्रकार अनेक विचार प्रकट हो सकते हैं तथा उसे जैसे चाहो, घुमाया -फिराया जा सकता है। वैसे गुण किसी कृत्रिम भाषा में कदापि नहीं आ सकते। भाषा को ऐसी बनाना होगा-मानो शुद्व इस्पात, ऐसे जैसा चाहो मरोड लो,पर फिर से जैसे का तैसा; कहो तो एक चोट में ही पत्थर काट दे, लेकिन दांत न टूटें। हमारी भाषा संस्कृत के समान बडे बडे निरर्थक शब्दों का प्रयोग करते करते तथा उसके आडम्बर की- और केवल उसके इसी एक पहलू की-नकल करते करते अस्वाभाविक होती जा रही है। भाषा ही तो जाति की उन्नति का प्रधान लक्षण एवं उपाय है । भाषा विचारों की वाहक है। भाव ही प्रधान है, भाषा गौण है। हीरे और माती से सुसज्जित घोडे पर एक बन्दर को बैठाना क्या शोभा देता है ? संस्कृत की ओर देखो। ब्राह्मणों की संस्कृत देखो। ब्र्राह्मणों की संस्कृत देखो, शबरस्वामी का मीमांसा -भाष्य देखो, पंतजलि का महाभाष्य देखो।-इसीसे तुमह समझ सकोगे कि मनुष्य जब जीवित रहता है, तब उसकी भाषा भी जीवनप्रद होती है, और जब वह मृत्यु की ओर अग्रसर होता है, तब उसकी भाषा भी प्राणहीन होती जाती है। मृत्यु जितनी समीप आती है नूतन विचार-शक्ति का जितना क्षय होता है, उतनी ही, दो-एक सडे भावों को फूलों के ढेर तथा चन्दनों से लादकर सुन्दर बनाने की चेष्टा की जाती है। बाप रे बाप, कैसी धूप है ! दस पृष्ठ लम्बे लम्बे विशेषणों के बाद फिर कहीं आता है- राजा आसीत ! कैसे विकट विशेषणों की भरमार है ! कैसा अदभुत् बहादुर समास ! कैसा सुन्दर श्लेष ! -यह भी किसी भाषा में भाषा है ? ये तो सब मृत भाषा के लक्षण हैं। ज्यों ही देश की अवनति आरम्भ हुई कि ये सब चिन्ह उदित हो गये, और ये केवल भाषा में नहीं वरन् समस्त शिल्प -कलाओं म भी प्रकट हो गये। मकान बनाया गया-उसमें न कुछ ढंग था, न रूप-रंग; केवल खम्भों को कुरेद कुरेदकर नष्ट कर दिया गया। और गहना क्या पहनाया, सारे शरीर को छेद छेदकर एक अच्छी खासी ब्रह्मराक्षसी बना डाली, और इधर देखो, तो गहनों में नक्काशी बेल-बूटों की भरमार का पूछना ही क्या ! गाना हो रहा है या रोना या झगडा -गाने में भाव क्या है, उदेश्य क्या है - यह तो साक्षात वीणापाणि भी शायद न समझ सकें ; और फिर उस गाने में आलापों की भरमार का तो पूछना ही क्या ! ओफ ! और वे चिल्लाते भी कैसे हैं-मानो कोई शरीर से अंतडियं खींच ले रहा हो ! फिर उसके -
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ऊपर मुसलमान उस्तादों की नकल करने का - उन्हीं के समान दाँत पर दाँत चढाकर नाक से आवाज निकालने का - भूत भी समाया हुआ है ! आजकल इन सब बातों को सुधारने के उपक्रम दीख पड रहे हैं। अब लोग धीरे-धीरे समझेंगे कि वह भाषा, वह शिल्प तथा वह संगीत, जो भावहीन है, प्राणहीन है, किसी भी काम का नहीं। अब लोग समझेगे कि जातीय जीवन में ज्यों -ज्यों स्फूर्ति आती जायेगी, त्यों-त्यों भाषा, शिल्प, संगीत इत्यादि आप ही आप भावमय एवं प्राणपूर्ण होते जायेंगे; प्रचलित दो शब्दों से जितनी भावराशि प्रकट होगी वह दो हजार छंटे हुए विशेषणों में भी न मिलेगी ।
स्वामी विवेकानंद के इस भाषा विषयक चिन्तन के उपरान्त अंत में उनकी एक टिप्पणी नेत्रोन्मीलक है जो उन्होंने तत्कालीन बंग्ला लेखकों पर की थी। लेखन में वाक्य संरचना की बारीकियों को ध्यान में रखते हुए विवेकानंद जी मानते हैं कि क्रियापदों का अत्यधिक प्रयोग लेखन को कमजोर बनाता है। क्योंकि इससे भाव ठहर-से जाते ह - आजकल के लेखक जब लिखने बैठते हैं, तब कि्रयापद का बहुत प्रयोग करते हैं। इससे भाषा में शक्ति नहीं आती। विशेषण द्वारा कि्रयापदों का भाव प्रकट करने से भाषा में ओज अधिक बढता है। आगे तुम इस प्रकार लिखने की चेष्टा करो तो उद्बोधन‘ में ऐसी ही भाषा में लेख लिखने का प्रयत्न करना। भाषा में कि्रयापद प्रयोग करने का क्या तात्पर्य है जानते हो ? इस प्रकार भावों को विराम मिलता है। इसलिए अधिक कि्रया-पदों का प्रयोग करना जल्दी जल्दी श्वास लेने के समान दुर्बलता का चिन्ह् मात्र है।