पाठकीय प्रतिभाव



मधुमती का, अक्तूबर, २०१७, अंक मिला है। अभी तक मधुमती अगस्त, सित., अक्तू. अंक में प्रकाशित आप के सम्पादकीय अध्ययन परक एवम् संग्रहणीय हैं। अच्छा लगा आपने अकादमी कार्यालय में (लगता है) विगत कई माह की रचनाएँ खंगाली है।
प्रस्तुत अंक में, संकलित, प्रकाशित अन्य रचनाएँ भी श्रेष्ठ हैं।
सम्भवतः १९८५ में मधुमती का कथा विशेषांक प्रकाशित हुआ था, उसमें कथा तो एक भी सम्भावित नहीं थी। लेख वर्तमान कथा साहित्य राजस्थान के कथासाहित्य के संदर्भ में थे, सभी लेख, कथा साहित्य में ‘जनवादी-अभिव्यक्ति’ और ‘कहानीकारों’ के संदर्भ में थे।
मुझे ‘जनवाद’ या किसी भी ‘वाद’ से अरुचि हो; ऐसा नहीं है, पर साहित्य यदि मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित हो तो प्रभावी और स्मरणीय होता है, ऐसा मुझे लगता है। ?
राम जैसवाल, अजमेर
‘मधुमती’ में निखार, संवार, सुधार, प्रशंसनीय, वन्दनीय, अनुकरणीय है। सम्पादकीय में आफ विचार गहराई लिए हुए होते हैं। विज्ञान एवं प्रबंधन भी साहित्य का ही अंग हैं। इन पर आलेख प्रकाशित करने से पत्रिका की गुणवत्ता में वृद्धि होगी। ?
दिलीप भाटिया, रावतभाटा
मधुमती का दीनदयाल उपाध्याय अंक मिला। वस्तुतः अंक बडे परिश्रम से प्रकाशित हुआ। उपाध्याय जी के विचार प्रसंग पर यह अभिनव प्रयास है, हमें ऐसे प्रयासों को उत्साहवर्धन भाव से लेना चाहिए, भले ही विचारधारा का प्रवाह कोई भी हो। हर विचारधारा मनुष्य को अपने अुनरूप तैयार करती रहती है-वहाँ पक्ष विपक्ष दोनों भी हो सकते हैं। ?
चंद्रभानु भारद्वाज, जयपुर
‘मधुमती’ के सितम्बर-१७ अंक को आपने विशेषांक के रूप में छापा है। यह प्रासंगिक भी है और प्रशसंनीय भी है।
इस विशेषांक के बाबत अपनी प्रतिक्रियाए पद्य में व्यक्त कर रहा हूँ। इसमें भाषागत त्रुटियाँ हो सकती हैं किन्तु आप भाव को ही प्राथमिकता देगें, ऐसी विनती हैः
मधुमती के विशेषांक में छा रहे दीनदयाल,
संपादक जी की सोच का सारा है यह कमाल।
दीनदयाल शताब्दी वर्ष में, सामायिक हैं सब लेख,
एक से बढकर एक हैं सभी लेख आलेख।
चिंतन, कार्यक्षेत्र और दर्शन की पंडितजी की हर बात,
सभी प्रबुद्ध लेखकों ने दी है हमें सौगात। ?
श्यामसुन्दर नन्दवाना, उदयपुर