चौदह नए काव्य संग्रह

सम्पादकीय डेस्क


ममता जोशी
यादों का उपवन
जीवन के विविध रंगों तथा अनुभवों को उनके समसामयिक संदर्भो में रखकर उजागर करने का प्रयास कवयित्री अपनी ८३ काव्य रचनाओं के माध्यम से करने का प्रयास करती है, जिनमे गीत भी हैं तो कुछ छन्द मुक्त कविताएँ भी हैं।
बकौल कवयित्री- ‘यह काव्य संग्रह किसी विषय स्थूल लक्ष्य की सीमाओं में बँधा न होकर मेरी वैचारिक भावभूमि का संसार है। इन रचनाओं में स्मृतियाँ रह-रह कर उजागर होती है जिनमें परिवेश के तमाम उतार-चढाव तथा खट्टे-मीठे अनुभवों से पाठक का साक्षात्कार संभव होता है। कविताओं की भाषा दुरूह न होकर सहज-सरल तथा बोधगम्य है, जो इनकी खासियत कही जा सकती है।’’ ?
रमेश प्रसून
आ टँगा आकाश खिडकी पर
प्रस्तुत संग्रह में ४१ कविताएँ हैं जिनमें समकालीन विविध विषयों पर कवि ने रचनात्मक दृष्टि से अपनी बात की है। इनमें सामाजिक परिवेश, प्राकृतिक सुषमा, व्यक्तिशः तथा समष्टिगत अन्तर्सम्बधों को रेखांकित करने का सार्थक प्रयास किया है। कविमन की प्रामाणिक संवेदना एवं विषयों की व्यापकता के साथ पाठक मन को प्रभावित करने का प्रयास इन कविताओं को पठनीय बनाता है। ?
मीनू गेरा
तलाश जन्दगी की
नारी-जीवन तथा परिवेश, नारी के अस्तित्व से जुडे सवालों-समस्याओं तथा चुनौतियों को स्वर देने वाली कुल मिलाकर छोटी-बडी ७८ कविताओं वाले इस संग्रह में कवयित्री अपनी अनुभूतियों तथा अनुभवों को निमित्त बनाकर समाज में नारी की विविध भूमिकाओं पर मुखर होती है। नारी मन की
कोमलता, ममताभाव, साहस एवं दायित्वपूर्ण सहभागिता को संतुलित ढंग से उजागर करने की दृष्टि से ये कविताएँ उल्लेखनीय है। ?
लक्ष्मण रामानुज लडी वाला
लक्ष्मण की कुंडलियाँ
प्रस्तुत संग्रह में समाविष्ट छंदों में सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय तथा अन्यविषयों से सम्बंधित समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। कतिपय रचनाओं में नैतिक मूल्यों पर आधारित सात्त्विक तथा आशावादी जीवन के बिम्ब तथा प्रतीक भी मिलते हैं। अत्यंत सरल भाषा में लिखी होने के कारण ये कुंडलियाँ आम पाठक को याद रह जाती हैं तो ये इनकी अतिरिक्त विशेषता ही है। वर्तमान समय में कुछ ही लोग कुंडलियाँ लिख रहे हैं। ऐसे में इस संग्रह को महत्त्व बढ जाता है। व्यंग्य, कटाक्ष तथा उपालंभ का प्रयोग इनमें असरकारी तरीके से किया गया है। ?
राजेश हजारी
मुस्कान की आहट
कुल मिलाकर ६१ रचनाओं वाली इस पुस्तक में गीत, गजल तथा छांदस कविताएँ सम्मिलित हैं। समाज, संस्कृति, राजनीति, प्राकृतिक परिवेश तथा मानवीय रिश्तों इत्यादि में आने वाले लगातार परिवर्तनों को रेखांकित करनेका प्रयास इन में विद्यमान है, तो साथ ही साथ कवि के लम्बे व्यावसायिक सफर की स्मृतियाँ भी इनमें मौजूद हैं। हिन्दी-उर्दू मिश्रित तथा बोलचाल की भाषा का उपयोग करते हुए कवि अपना मंतव्य व्यक्त करता है। जीवन के श्रृंगारिक पक्ष को भी यहाँ नजरअंदाज नहीं किया गया है, यह अच्छी बात है। ?
हरप्रीत सिंह
जुस्तजू
प्रेम-तत्व को केन्द्र में रखकर लिखी गई कुल ७५ गजलों के इस संग्रह में अन्य विषयों का काव्यात्मक निर्वहन भी किया गया है। यहाँ प्रेम को लेकर कहा गया
है- ‘उलफत की अब मुझसे वो करते नहीं बातें/कहते हैं मुझसे अब हम समझदार हो गये’ इन गजलों की भाषा जहाँ एक ओर सुगम और सरल हैं तो दूसरी ओर विषय का कार्यान्वयन भी ध्यान आकृष्ट करता है। कवि की साफगोई और ईमानदार अभिव्यक्ति आश्वस्ति अवश्य
कराती है। ?
श्याम शर्मा ‘विशिष्ठ’
आदमी बने रहने की चाह
उक्त संग्रह में प्रकृति, सामाजिक परिवेश, मूल्यबोध तथा व्यक्तिनिष्ठ संदर्भों को रेखांकित करती कविताएँ शामिल हैं। इनमें समकालीन जीवन की विसंगतियों तथा मानवीय दिशाबोध के साथ जीवन में श्रम की महत्ता तथा गरिमा को भी प्रकट किया गया है। साथ ही साथ कवि अनेक जरूरी सवाल भी उठाता है जो हमें सोचने पर विवश कर
सकते हैं। ?
चंदा बरखानियाँ
मन मल्हार
कविताओं/गीतों तथा गजलों जैसी रचनाओं वाली इस पुस्तक में कवयित्री ने विविध विषयों पर अपनी प्रतिक्रियाओं तथा संवेदनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है। यद्यपि इनमें जगह-जगह कहन की व्यग्रता झलकती है, लेकिन फिर भी इनमें रचनात्मक अनुभूतियों का विस्तार अवश्य नजर आता है। कविताओं की भाषा सहज-सरल तथा विषय वस्तु समकालीन संदर्भों पर
आद्धृत है। ?
डॉ. राकेश ‘चक्र’
धार अपनी खुद बनाना
इस संग्रह की कविताओं में आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा शहरीकरण से जुडे मुद्दों को विषय बनाया गया है। पीढियों के अंतराल तथा नारी-समस्याओं से जुडे विषय भी इन में अभिव्यक्त होते हैं। इनमें छंद मुक्त,
छंदयुक्त तथा प्रकृति को आधार बनाकर कवि ने अनेक गीत रचे हैं जो मन को भाते हैं। ?
भगवान देव ‘चेतन्य’
अर्थ भूलते शब्द
भारतीय संस्कृति की विशेषताओं, राष्ट्रीय चेतना, मानवीय सरोकारों तथा मनुष्य के प्रकृति से सम्बन्धों को मुखरित करने वाली प्रस्तुत संग्रह की कविताओं में कवि की आत्मीय संलगता पाठक को प्रभावित करती है। वर्तमान राजनैतिक परिवेश; मूल्यों के संकट तथा सामाजिक विषमता के प्रतिविरोध के स्वर भी इनमें महसूस किये जा सकते हैं। इनमें कवि ने समाज के विभिन्न आयामों का संस्पर्श करते हुए काव्यकौशल का परिचय दिया है। ?
शशि सक्सैना
सखी
‘सखी’ संग्रह में मौजूद कविताओं में जीवन के स्नेहशील अनुभवों का चित्रण तो हैं ही, साथ ही साथ इनमें परिवार की विविध अनुभूतियों के अतिरिक्त समाज में नारी के स्थान तथा महत्ता का प्रतिपदान करने का प्रयास भी नजर आता है। जीवन में अपनत्व तथा सामूहिक चेतना की अनिवार्यता पर भी ये कविताएँ जोर देती हैं। व्यक्ति और समष्टि के पारस्परिक सम्बन्धों पर भी कवयित्री का ध्यान जाता है जो उल्लेखनीय लगता है।
नगेन्द्र कुमार मेहता
सोरठा सौरभ
इस संग्रह में संकलित सोरठों में मनुष्य के भौतिक विकास की निस्सारता, भीतरी मन की व्यग्रता तथा समाज एवं व्यक्ति के अन्तर्सम्बंधों की वास्तविकता पर प्रकाश डाला गया है। उपयोगितावाद तथा साधन सम्पन्नता के घटाटोप में मनुष्य का अपना असली चेहरा तथा जीवन-मंतव्य संभवतया ओझल होता जा रहा है जो कवि की मूलचिंता है और यही चिंता इन रचनाओं को असरकारी बनाने में सहायक नजर आती है। जीवन में नवचेतना तथा
सामूहिक सहकार भावना ही हमारे सामने एक मात्र उद्देश्य होना चाहिये, यह बात यहाँ अवश्य उजागर होती है।
सावित्री जगदीश
स्वर्णिम संदेश
किशोरोपयोगी, चरित्र निर्माण पर केंन्द्रित जो कविताएँ यहाँ शामिल हैं उनमें सहजता, सरलता के साथ बच्चों को जीवन के प्रति सजग नजरिये से लेने की बात पर जोर दिया गया है। साथ ही साथ इनमें प्रकृति से हमारे सम्बंधों की अनिवार्यता भी व्यक्त होती है। ?
व्यग्र पांडे
कौन कहता है
जिस समय तथा परिवेश में हम जी रहे हैं, उससे जुडे सवालों तथा समस्याओं को अपनी संवेदनाओं से जोडकर अभिव्यक्त करने का उपक्रम प्रस्तुत पुस्तक में विद्यमान कविताओं तथा दोहों के माध्यम से किया गया है। लोकलय तथा प्रवाहमयता को इन कविताओं में आसानी से लक्षित किया जा सकता है।