बज गई घंटी / सिमटते दायरे

तेज सिंह ‘तरुण’


बज गई घण्टी
संग्रह का शीर्षक ‘बज गई घण्टी’ सहज ही प्रत्येक बालक को आकर्षित करता है। संग्रह की अन्य कविताओं के शीर्षक भी सरल और मन-भावक हैं, यथा-प्यारी माँ, बिल्ली, कागज की नाव, फलों का राजा आम, बरखा आई, पापा की याद, बन्दर, आई होली और बज गई घंटी को पढना प्रारम्भ करने के बाद पूरा पढे बिना नहीं रहा जा सकता है। संग्रह की प्रथम कविता को ही लें, शीर्षक से तो लगता है कि कविता में भारत माँ की बात होगी पर प्रथम पंक्ति से ही बालक अंत तक पढने को बाध्य हो जाता है। बात ही कुछ ऐसी है। भारत माँ का वर्णन नहीं बल्कि माँ-बेटे में संवाद है और वह भी रोचक वार्तालाप शैली में, अमूल्य सीखों के साथ।
इस काव्य संग्रह की शीर्षक कविता बज गई घंटी, को ही लें तो कविता बालक को विद्यालय से सम्बद्ध करती है और संचेतना का संचार भी होता है। कविता में पुनिया को बीमार राही के मन का कवि जो कहता है, प्रशंसनीय है- ‘मेहनत कर बनना होगा, तुमको अच्छा डाक्टर, लाड करेंगे, हम सब तेरा, प्यार करेगें मास्टर।’’ सच तो यह है कि इन पंक्तियों में कवि ने पूरे संग्रह की कविताओं के भावों को अत्यन्त ही सरल शब्दों में बाल मन का निचोड प्रस्तुत कर दिया है।
प्रत्येक कविता के माध्यम से कवि ने कोई न कोई एक सीख अवश्य दी है और वह भी उन्हीं की बोल चाल में। बालक प्रथम पृष्ठ से अन्तिम पृष्ठ तक अपनी पहुँच करेंगे तब तक उन्हें कितनी सीखें मिल चुकी हगी, इसका अनुमान न उन्हें होता है और न ही किसी और को। संग्रह की प्रथम कविता ‘भारत माँ की शान’ में कवि ने सीख स्वरूप कहा है कि ‘बस्ते को बोझ न समझो, यह तो भाग्य तुम्हारा, पाटी, पुस्तक पेन बिना तो सूना जीवन सारा।’
बज गई घंटी काव्य संग्रह आने वाले कल का शुभ संकेत है और राही अपने जन्म स्थान सोजत का विख्यात मेंहदी की तरह ही बाल साहित्य में नये-नये रंग भरेंगे। मेरा मानना है कि बच्चे तो क्या बडे भी जब इस संग्रह को हाथ में लेंगे तो प्रारम्भ से अंत तक पढे बिना नहीं रहेगें। ?
सिमटते दायरे
लेखक ने अपनी नवीन कृति ‘सिमटते दायरे’ के माध्यम से आज की तीव्र गति से प्रसारित एक बुराई की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। कृति में उल्लेखित रविव्रकंचन का परिवार ही इस आधुनिक बीमारी से ग्रसित नहीं है बल्कि वे सब जो आज की पाश्चात्य-चकाचौंध में विवेक शून्य हो अंधी दौड लगा रहे हैं, कहीं न कहीं प्रभावित अवश्य हो रही हैं।
लेखक इस नाटक-पुस्तिका के माध्यम से यही बात कहना चाहता है और निदान बतलाना भी। कहने को नाटक विधा में लेखक की यह पहली कृति है पर दृश्यों की क्रमबद्धता व संवादों में सजीवता व सटीकता से लगता है कि पुस्तक को लिखने से पूर्व पूरा चिंतन-मनन किया है। नाटक के दृश्यों का छोटा होना आधुनिक तकनीकी की ओर बढता कदम है जो भविष्य के लेखन की माँग है।
एक बार रवि के परिवार से जुडे प्रो. अनुराग घर आते हैं और बढी हुई दाडी व उसके उतरे चेहरे को देखकर पूछते हैं कि तुमने अपना यह क्या हाल बना रखा है? बीमार तो नहीं? तब रवि (शांत भाव से) कहता है बीमार ही समझ लो सर, मानसिक बीमार हूँ। इस पर प्रो. अनुराग जिज्ञासावश पूछते हैं- क्यों क्या हुआ? तो रवि संयतभाव से कहता है- ‘कंचन की दिनचर्या ने घर-गृहस्थी बिगाड रखी है, मेरी छोडो सर सविता का भी जरा-सा ध्यान नहीं है उसे, मैं सविता को हॉस्टल भेज रहा हूँ। यही नहीं, अपनी व्यथा-कथा का बखान करते हुए यह भी कह देता हूँ- क्या करूँ? घर में औरत का कितना महत्त्व होता है, आप जानते हैं। सविता और मेरे प्रति जिम्मेदारी तो समझनी चाहिए न उसे।’
लेखक इस नाटक-पुस्तिका के माध्यम से यही कहना चाहते थे कि पुरुष हो या महिला, सबके अपने दायरे होते हैं जो आज अर्थ की चकाचौंध में सिमटते जा रहे हैं और घर-परिवार टूट रहे हैं। यह एक सत्य है। आज
के समय में रवि व कंचन जैसे अनके घर हैं, जहाँ समय की अंधी दौड में सविता जैसे असंख्य बच्चे माताओं की उपेक्षा के शिकार बने हुए हैं। माहौल दिन प्रति दिन बिगडता ही जा रहा है। ‘सिमटते दायरे’ के माध्यम से लेखक अपने मन की उन सभी काली आशंकाओं को कंचन के माध्यम से उडेलने में पूर्ण सफल रहा है। यही नहीं, लेखक ने आने वाले धुंधले कल की ओर स्पष्ट संकेत दिया है।
अतः यह पुस्तक इस विधा की आने वाली पुस्तकों के लिए कई दृष्टियों से पे*रक होगी । ?
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