खामोशी

श्री कृष्ण शर्मा


खामोशी
डॉ. पद्मजा शर्मा कहती हैं ‘मेरी कविता उन क्षणों में जीती है, साँस लेती है, धडकती हैं जिन क्षणों को मैंने जीया है। छोटे छोटे अनेक खूबसूरत चाहत भरे पल यहाँ कविता के रूप में व्यक्त हुए हैं।’
डॉ. पद्मजा का काव्य कर्म इस जीवन के लिए सदी के पार, हारुँगी तो नहीं, मैं बोलूँगी, पहाड, नदी, फूल और प्रेम, खामोशी, जन्दगी को मैंने थामा बहुत जैसे प्रखर संग्रहों में पुष्पित पल्लवित और फलित हुआ है। उनका कथन ‘‘खमोशी भी एक शब्द है
अगर समझो, सुनो उसकी गूँज तो
बहुत कुछ कहती
पीडा दर्द आक्रोश, विवशता और घुटन
सबको सहती चुप रहती’’
सच है शब्दों की अपनी सीमाएँ है, कैसे साधा जाए सुर को, शब्दों ने सारे अर्थ खो दिए अमावस्या की निशा की तरह मौन प्रवाहित अप्रतिहत और पिछली रात का ठहराव सा, शब्द व्यथा-कथा को कहाँ कह पाते। ‘खामोशी’ कवयित्री का पीछा नहीं छोडती, वे कहती हैं
मेरी खामोशी में दुःख, मेरी उदासी में दुःख
मेरी हँसी में दुःख, मेरे आसूँओं में दुःख
मेरी नींद में दुःख, मेरे सपनों में दुःख
कल्पना में हकीकत से भी ज्यादा दुःख
मेरी हर सुबह हर शाम में दुःख
मिलन में दुःख, विरह में दुःख।
खामोशी की कविताएँ उसकी अस्मिता, चेतना तथा योगक्षेम की कविताएँ है। हर काल में स्त्री प्रताडित होती रही, अनाचार, अत्याचार, कदाचार का शिकार होती रही। वे सब कुछ खमोशी के साथ सहती रहीं और आज भी आधी आबादी की हालत में कोई विशेष अन्तर नहीं आया है। वस्तुतः वह चेतना का एक जाग्रत अंश है, ईश्वर से भी उसका उतना ही
संवाद है जितना पुरुष का। उसकी खमोशी मौन स्वर का नाद-निनाद-अनहद नाद है जो मृत्यु का प्रतिवाद है। उसकी खामोशी सी निष्पाप, निष्कलंक, निस्पन्द है।
‘‘हम क्यों नहीं मर गए?’’ में कवयित्री कहती हैं
‘‘बेमौसम बरसात से फसल नष्ट हो गयी
कई किसान सदमे से मर गए
दस आदमी लू से मर गए
बीस के सर पर छत नहीं थी न
न थे तन पर कपडे
ठिठुर कर मर गए।’’
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु तो अवश्यंभावी है पर अस्वाभाविक कारणों से होने वाली मृत्यु निःसन्देह चिंता का विषय है।
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में सब कुछ बिकाऊ हो जाता है, यहाँ तक कि रिश्ते-नाते भी। और तो और पति-पत्नी के रिश्ते की बिकाऊ हो जाते हैं- ‘लिव इन रिलेशन’ जैसे रिश्ते भी अब फैशन में हैं। इसलिए अपनापन, आत्मीयता कहाँ मिलेगी- वह तो आकाश कुसुम जैसी
ही है।
कवयित्री कहती हैंः ‘‘समय है बलवान पर मैं इससे लडना चाहती हूँ। इस समय से मैं अपना विरोध दर्ज कराती हूँ। यह जैसा है वैसा मुझे स्वीकार नहीं। मैं समय को बदलना चाहती हूँ।’’
‘‘बताना चाहती हूँ’’ में कवयित्री की उडान बहुत ऊँची है। वह प्रेमी को यह बताना चाहती है कि मैं तुम्हें चाहती हूँ। वह इसके लिए वृक्ष की तरह बढना चाहती है; बेल की तरह ऊपर और ऊपर बढना चाहती है, मोर की तरह नाचना चाहती है, कोयल की तरह गाना चाहती है, बाँसुरी की तरह बजना चाहती है, वट वृक्ष की तरह फैलना चाहती है, छुई मुई की तरह सिमटना चाहती है, मन्दिर में दीये की तरह जलना चाहती है, कली की तरह खिलना चाहती है, नदी की तरह सागर में मिलना चाहती है, और अन्ततः वह ‘तुम्हारें’- प्रेमी के साथ जीना चाहती
है।’ कवियत्री इस बात से दुःखी है कि भारतीय लडके शादी के बाद पत्नी से मालिक सा व्यवहार करते हैं, दोस्त का सा नहीं।
कवयित्री कहती हैं ‘‘लोग कहते हैं, मैं बुरे वक्त में अच्छा लिखती हूँ अच्छे वक्त में बुरा लिखती हूँ। लोग ठीक ही कहते हैं, बुरे वक्त में ही अच्छा और प्रभावोत्पादक सृजन किया जाता रहा है, किसी भी चर्चित साहित्यकार रचनाकार की जीवनी पढ लो।
इस छन्दहीन, लयहीन, रसहीन प्रभावित कविताओं के युग में इतनी सम्यक मधुर, भाव प्रवण तथा मन को ‘झंकृत’ करने वाली कविताएँ पाठक को अभिभूत तो अवश्य ही करती हैं।
डॉ. पद्मजा शर्मा की स्त्री अस्मिता और चेतना से जूझती, उससे रक्षा करतीं प्रेरक कविताएँ, मौलिक सोच का प्रमाण है। विश्वास है कि काव्य जगत् में खामोशी का दिल खोलकर स्वागत होगा। ?
गीतांजलि, २६ मंगल मार्ग, बापू नगर, जयपुर ३०२०१५