तूणीर के तीर

डॉ. देवेन्द्र ‘इन्द्रेश’


तूणीर के तीर
आलोच्य व्यंग्य कृति ‘तूणीर के तीर’ में लगभग २३ गंभीर एवं तीक्ष्ण व्यंग्य तीर हैं। इस व्यंग्य संग्रह के लेखक भरत चन्द्र शर्मा हैं, जिनके पास विदू*पताओं को देखने की सूक्ष्म व्यंग्य दृष्टि है, तथा विद्रूपताओं से जनमानस को सावचेत करने की प्रभावी व्यंग्यात्मक भाषा भी।
व्यंग्यकार के तूणीर में जितने भी व्यंग्य तीर हैं, उनकी विषय वस्तु में कोई विशेष नवीनता तो नहीं है, वैसे भी लगभग सभी व्यंग्यकारों के विषय एक जैसे ही होते हैं। विसंगतियाँ लगभग एक जैसी ही होती हैं, लेकिन फिर भी एक ही विषय पर लिखे व्यंग्य कुछ के अत्यधिक प्रभावी एवं मारक होते है। प्रभावी व्यंग्यात्मक भाषा के साथ व्यंग्य का शिल्प भी यदि प्रभावी है तो व्यंग्य भी निश्चित मारक बन पडेगा।
व्यंग्यकार के तूणीर में व्यंग्य की विषयवस्तु के तीर तो सामान्य ही हैं लेकिन कुछ व्यंग्य तीरों की भाषा इतनी प्रभावी है कि वे अपनी विशिष्ट छाप छोडते हैं- जैसे- ‘लोकतंत्र की लुगदी,’ ‘पादुका पुराण, ‘भ्रष्टाचार’ तुम्हारी जय जय कार, ‘लोकतंत्र की हत्या’ आदि विशेष उल्लेखनीय कहे जा
सकते हैं।
हास्य से व्यंग्यकार को परहेज नहीं है। स्मित हास्य का प्रयोग लेखक ने अपने व्यंग्यों में किया भी है। जगह-जगह सटीक पंच भी दिए हैं। लेकिन फिर भी लेखक ने यह अवश्य ध्यान रखा है कि हास्य की इतनी अधिक मात्रा ना हो जाए जो व्यंग्य की गंभीरता को ही समाप्त कर दे। यदि लेखक व्यंग्य के शैल्पिक विधान पर गंभीरता से और मनन करें, तो व्यंग्य का शिल्प और अधिक प्रभावी हो सकता है।
कुल मिलाकर तूणीर के ये व्यंग्य तीर सार्थक, मारक, गंभीर, सोद्देश्य एवं पठनीय हैं तथा व्यंग्य के खास पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने में समर्थ हैं। पुस्तक का आवरण पृष्ठ सुन्दर एवं आकर्षक है। ?
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