दरकते रिश्ते / रसवाला

डॉ. नीरज दइया


दरकते रिश्ते
डॉ. विद्या पालीवाल का पहला कहानी संग्रह ‘दरकते रिश्ते’ कई कारणों से महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है। इन कहानियों का यथार्थ अस्सी बरस बूढी आँखें उजागर कर रही हैं, अस्तु दरकते रिश्तों का सच आधिकारिक रूप से प्रगट होने की संभावनाएँ लिए है। वे जीवन की स्थितियों से कहानियों को पहचानने में सक्षम हैं। संग्रह की कहानियों के विषय में लेखिका ने कोई दावा नहीं किया है, उन्होंने ‘आत्मकथ्य’ में लिखा है- ‘आज मन-पथिक जीवन के चौराहे पर खडा दिग्भ्रमित है... प्रश्नों का अंबार है... अपेक्षा है सांस्कृतिक जीवन संतुलन की। इन्हीं प्रश्नों में गुम्फित यत्र-तत्र बिखरे, मुडे-तुडे, भूले-बिसरे कथा सूत्रों को भाषा की रूप विधा में प्रस्तुत करने का प्रयास भर किया है...।’
संग्रह की प्रथम कहानी ‘उठ चले अवधूत’ में लेखिका ने वृद्धावस्था के उस अंतिम छोर को छूने का प्रयास किया है जिसमें केवल और केवल भक्ति और भगवान का आलंबन होता है। नरेटर के रूप में कहानी में जीया की जीवन-यात्रा को सहेजना उनके उदात्त चरित्र को व्यंजित करती है किंतु कहानी की पांखें संस्मरण और रेखाचित्र विधाओं तक फैली प्रतीत होती है।
कुछ कहानियों में कहानी कम, शब्द-चित्र और संस्मरण की झलक अधिक नजर आती है। चरित्रों की मार्मिकता और लेखिका के सकारात्मक दृष्टिकोण के चलते कहानियों में जीवन मूल्यों और आदर्शों की बातें अनुभव और विचार के रूप में प्रस्तुत हुई है। आकार में ये कहानियां छोटी-छोटी हैं और जहाँ कहानी का विस्तार देखने को मिलता है, वहां भी केंद्रीय संवेदना उसके विशेष अंश तक सीमित रहती है। ‘साँप-सीढी’ जैसी कहानी में बस एक खेल के प्रसंग से अपने अंतर्मन में झाँकने और थोडे से संवादों के बल पर कहानी की रचना करना लेखिका की सफलता है।
डॉ. राजेन्द्र मोहन भटनागर ने कहानी संग्रह की भूमिका में लिखा है- ‘ये कहानियाँ आज के वास्तविक जीवन की ऐसी सच्चाई है जो मानव-मन को कचोट रही है। बदलते परिवेश में, भाग-दौड भरे जीवन को परोस कर
मानव-समाज में जहाँ-जहाँ अंधेरा, विषाद और कंटकों को बोया है उस सबका अन्तर्विश्षण ये कहानियां सशक्त रूप से कर रही हैं। निःसंदेह कहानीकार ने प्रायः प्रत्येक कहानी में, जहाँ उसे अवसर मिला है, बहुत कुशलता से उसके अंतर्मन की अनकही पीडा को सामने लाने में तनिक भी संकोच नहीं किया है।’
‘भाभा’ कहानी अन्य कहानियों की तुलना में अपेक्षाकृत आकार में बडी है किंतु कहानी के अंतिम दृश्य में भाभा द्वारा बडे संकोच से अपनी कमर में दबाये हुए टमाटर रंग के ब्लाउज पीस को निकाल कर उस पर ग्यारह रुपये तिलक लगाकर देते हुए यह कहना-बेटा! या साधारण सीख है पर याद राखजो, भूल जो मति... म्हारा नानीजी रो पूरो ध्यान राख जो। पढते हुए राजस्थानी के प्रख्यात कहानीकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली की कहानी ‘कांचळी’ का स्मरण कराती है।
इन कहानियों से गुजरते हुए हम हमारे बदलते समय और आधुनिकता के चलते दरकते संबंधों का सच गहराई से देख-परख सकते हैं। यहाँ संबंधों के बीच खोती जा रही संवेदनशीलता के अनेक दृश्य हैं तो कोमल बाल मन से उद्धाटित हृदयस्पर्शी यादगार संवाद भी।?
रसवाला
निशात आलम ‘दखल’ के कहानी संग्रह ‘रसवाला’ में दस कहानियाँ और एक लघुकथा संकलित है। पुस्तक में ‘दो शब्द’ के अंतर्गत कहानीकार निशात आलम ‘दखल’ लिखते हैं- ‘‘मेरे जीवन में कहानी का उदय मात्र एक वर्ष की अवधि में हुआ। चार कहानियाँ लिख कर छोड दीं। जिसमें से दो प्रकाशित हुई जिन्हें लेकर प्रशंसा के कई मोबाइल आए एसएमएस आए, तब मैंने अनुभव किया कि जो लिखा गया है वह सफल रहा।’’
इस संग्रह में इसी नाम से एक कहानी भी संकलित है। पाठकों और मित्रों के विचार निःसंदेह किसी भी लेखक
के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं किंतु उससे भी महत्त्वपूर्ण होता है जिस विधा में सृजन किया जाए उस विधा को जानना।
निशात आलम ‘दखल’ की इन कहानियों में तकनीकी खामियों के रहते भी जो बात बेहद प्रभावित करती है वह इन कहानियों की पठनीयता। ‘वचन’ कहानी ठाकुर-ठकुरानी के दौर की एक मर्मस्पर्शी ऐतिहासिक कथा जैसी प्रतीत होती है, जहाँ वचन को धर्म के रूप में सकफ द्वारा निभाना प्रभावित करता है। कहानी ‘मेरा कन्हैया’ की आधार भूमि कहानीकार ‘दखल’ की देखी-भोगी प्रतीत होती है। लगता है कि उन्होंने जैसे अपने अपने जीवन के किसी घटना-प्रसंग को ही सिलसिलेवार प्रस्तुत कर दिया है। ‘मणिधर नागिन’ कहानी हमें दूसरे लोक में ले जाती है। यह कहानी रोमांच और रहस्य से भरी हुई है। ‘स्वार्थ’ कहानी को एक परिपूर्ण लघुकथा कहा जा सकता है। कहानी संग्रह का शीर्षक ‘रसवाला’ असल में कहानी ‘कवि रसवाला’ से प्रेरित है, जो कहानी कम कवि रसवाला का साक्षात्कार अधिक प्रतीत होती है।
कहानीकार के पास कहने को बहुत कुछ है और वह बहुत कुछ कहता है किंतु संग्रह की कहानियों में डायरी, संस्मरण और आत्मकथा के अंश कहानी में परिवर्तित नहीं हुए हैं। जैसे ‘पवित्रता’ कहानी की पंक्तियाँ देखें- ‘१९७५ में मेरा व्यापार जोधपुर से हटकर झुंझुनूं एवं हिसार की तरफ हो गया।’ (पृष्ठ-१६); ‘सन् १९७७ की बात होगी मैं घूमता हुआ चिडावा की सडक पर जा रहा था’ (पृष्ठ-१७); ‘उसने कहा- पूरे ३५ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, मैं एक दिन भी तुमको नहीं भूली, तुम भूल गए।’ (पृष्ठ-२०); ‘रात्रि के ११ बज चुके थे। मैंने कहा-सो जाओ। मैं अपने मंत्रों के उच्चारण में लग गया। रात्रि के ३ बजे सोया। लगभग सुबह के ५ बजे होंगे, कुछ-कुछ अंधेरा था। ऐसा लगा मेरे पैर कोई छू रहा है। (पृष्ठ-२१)। कहानी ‘धर्म पुत्रियाँ’ में भी ऐसा ही एक प्रसंग है जिसमें आधुनिकता के साथ बदलती मानसिकता के साथ नायक
की आदर्श छवि प्रस्तुत की गई है। कहानी ‘पानी-पतासा’ भी प्रेम केंद्रित कहानी है जिसमें ट्रीटमेंट के स्तर पर अंत में किसी फिल्म की भाँति नायक नायिका का मरणोपरांत नई दुनिया में मिलन दिखाया गया है।
संग्रह की भूमिका में साहित्यकार शिवचरण सेन ‘शिवा’ ने इस प्रथम कहानी पर कहानीकार का उत्साहवर्द्धन करते हुए भाषा-पक्ष के विषय में संकेत किया है। उम्मीद है कि आगामी संग्रह में समकालीन कहानी और स्वांतः-सुखाय लेखन की जुगलबंदी बेहतर होगी। ?
सी-१०७, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी-३३४००३, बीकानेर (राज.)