जन्दगी को मैंने थामा बहुत / कहाँ ढूँढे रे बन्दे

डॉ. नवीन नन्दवाना


जिन्दगी को मैंने थामा बहुत
‘जिन्दगी को मैंने थामा बहुत’ की रचनाकार कवयित्री डॉ. पद्मजा शर्मा अनुभूत करती हुई ‘अपनी बात’ के माध्यम से कविता की इसी संवेदना की पडताल करती हुई लिखती हैं कि- ‘कविता विचार नहीं होती / पर बिना विचार होती है क्या कविता / कविता भाव नहीं होती / पर भावहीन होती है क्या कविता / बहुत कुछ होता है कविता में / जो नहीं होता / वह भी होने वाला होता है कविता में।’’ (पृष्ट-७)
डॉ. पद्मजा शर्मा का यह संग्रह छियावने कविताओं के सहारे जीवन से जुडी विविध संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने का सार्थक प्रयास करता है। यहाँ ‘तारों भरी रात’ है तो ‘ढाबे वाला श्याम’ भी है, ‘कथाकार हसन जमाल का स्मरण है’, तो ‘औरत जानती है’, ‘प्रश्न’, ‘जल दैत्य’, ‘आग’ और ‘बदलाव’ के सहारे जीवन के विविध पक्षों को समझने का प्रयास है।
‘जिन्दगी’ कविता हमें हमारे जीवन के आज के यथार्थ से रू-ब-रू करवाती है। कवयित्री लिखती है कि- ‘‘जिन्दगी बडी मछली है / खुशी के पल हैं छोटी-छोटी मछलियाँ / जिंदगी चुपचाप इन्हें कब निगल जाती है / पता ही नहीं चलता।’ (प्ष्ठ-१५)। कविता पढकर लगता है कि यह आज के जीवन का कटु सत्य है और जब तक इंसान इस यथार्थ को समझ पाता है, वह उन खुशियों को खो चुका होता है। कवयित्री खरी-खरी बात कहना चाहती है और इसी क्रम में वह स्पष्ट करना चाहती है कि जब तक कोई लडकी इस दुनियाँ में डर-डरकर जीती है, तब तक यह दुनियाँ खूबसूरत नहीं हो सकती।
‘मेहतरानियाँ’ कविता के माध्यम से कवयित्री ने सूरज से लोहा लेती उन स्त्रियों की गाथा को कहने का प्रयास किया है जो जीवन के संघर्ष झेलते हुए भी धरा को स्वच्छ रखने के लिए कृतसंकल्प है। कवयित्री इन्हीं सूक्ष्म संवेदनाओं के सहारे इंसान बने रहना चाहती है। वह लिखती हैं कि- ‘‘मैं टूटा हर एक सपना जोड के रहूँगी/.... तय कर लिया है अपने इस जीवन में/ इंसान हूँ और इंसान बनी रहूँगी।’’ (पृष्ठ-२४)
संग्रह की कई कविताएँ इस मूल संवेदना को संजोती हैं। ‘डर’ कविता में वे लिखती हैं कि ‘बेटी को आज डरावने सपने आते हैं।’ किंतु वह बेटियों को उन स्वपजो से मुकाबला करने व कठिन स्थितियों पर विजय पाने के लिए तैयार करते हुए कहती हैं कि- ‘‘अब समय आ गया है / कि डराने वाले सपनों को देखना बंद करना होगा / हम डरती हैं तभी डराते हैं डर / हमें ऐसे भेडियों के लिए थामने होंगे हथियार / सपनों में भी।’’ (पृ. ३४)
‘पुरुष’ कविता में भी वह अपनी स्त्री चेतना व समाज के नजरिये को बयाँ करती है। वह लिखती हैं कि- ‘‘एक स्त्री अगर कलाकार है / सामान्यतः लोग उसके कलाकार रूप से पहले / उसके स्त्री रूप को देखते हैं /जबकि पुरुष के साथ ऐसा नहीं है / पुरुष पहले कलाकार / और फिर पुरुष है।’’ (पृ. ३७)। वह ‘चाल’ कविता के माध्यम से साफ कह देना चाहती है कि मैंने अर्थात् स्त्री ने किसी को रोका भी नहीं तो वह अब किसी के रोकने से भी नहीं रुकेगी। ‘प्रश्न*’ कविता के माध्यम से कवयित्री स्त्री के हृदय में बसे उस प्रश्न को वाणी देती है जिसके द्वारा वह पूछना चाहती है कि पुरुष भी कभी स्त्री के लिए कुछ करेगा या सिर्फ वही करती रहेगी। इसी तरह संग्रह की ‘पर’, ‘जीऊँ’, ‘आग’, ‘बदलाव’, ‘वो लडकी’ और ‘आफ पास’ आदि कविताएँ इसी चेतना को वाणी प्रदान करती है।
संग्रह की कविताएँ ‘सुरक्षा’, ‘इंसान’, ‘सबल’, ‘भूख’, ‘मनुष्य’, ‘कब तक’, ‘जाँच अभी जारी है’, मुक्ति’, ‘अगर पिता होते’ आदि में संवेदनाओं के तार झंकृत होते हैं जिनकी ध्वनियाँ पाठकों के अन्तर्मन को महसूस होती हैं। कवयित्री को लगता है कि ‘आओ ढूँढें उलझते जा रहे सूत्र को/कोई तो सिरा होगा/पथरीली जमीन से फूट रही कोंपल/किसी आँख से आँसू गिरा होगा।’ ये कविताएँ स्त्री जीवन के साथ-साथ रिश्तों की महक, आसपास के घटित जीवन, पर्यावरण व रचनाकार के रचनाकर्म को एक साथ समेटे संवेदनाओं का एक व्यापक कोलाज बनाती हैं। ?
कहाँ ढूँढे रे बन्दे
डॉ. विनोद सोमानी ‘हंस’ का काव्य संग्रह ‘कहाँ ढूँढे रे बन्दे’ आस्था-विश्वास और अध्यात्म के भावों को जगाता है। संग्रह की ४० कविताएँ कर्म व भावों को सुंदर अभिव्यक्ति देती हैं। संग्रह के प्रारंभ से ही कवि ईश्वर के स्वरूप पर चिंतन करता है। तुलसी के विचार ‘जाकी रही भावना जैसी’ से जुडता हुआ प्रतीत होता है। कवि का मत है कि- ‘‘भगवान का रूप कैसा है/कहाँ रहते हैं-कौन हैं/कौन बता पाया है आज तक/हर भक्त के अपने अनुभव/अपनी भावना/वैसी ही मूरत/जाकी रही भावना जैसी/प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’’ (पृष्ठ ०७)
कवि स्पष्ट कहता है कि ऐसा कोई भाव नहीं जो ईश्वर को बाँध सके और कोई लेखनी भी नहीं जो उसका यथातथ्य सम्यक वर्णन कर सके। साधना व समर्पण की बात करते हुए कवि कहता है कि प्रेम में कर्मकांड सब गौण हो जाते हैं। ‘शंका’ कविता में कवि स्पष्ट कहना चाहता है कि- ‘‘कर्म तो करना है/निर्लिप्त, निष्काम/प्रेम के साथ लक्ष्य साधो/पा जाओगे उसका धाम/समय बहुत थोडा है। तर्क और शंका/एक मात्र रोडा है।’’
(पृष्ठ १५)।
इस प्रकार कवि स्पष्ट करना चाहता है कि ईश्वर व भक्ति का मार्ग पूर्ण समर्पण चाहता है। उसमें तर्क व शंका का कोई स्थान नहीं है। ‘ज्ञान’ कविता के बहाने रचनाकार उद्धव व कृष्ण के प्रसंगों को याद करते हुए ‘ज्ञानयोग’ का स्मरण किया है। ‘लालच’ कविता के माध्यम से यह बताया कि जीवन के सारे संबंध स्वार्थों की नींव पर टिके हैं अतः स्वार्थों का त्याग करते हुए मनुष्य को ईश्वर से नाता जोडना चाहिए। इसी प्रकार संग्रह की ‘अविनाशी’, ‘मान-सम्मान’, ‘तर्क’, ‘सत्य’, ‘परदा’ और ‘परिपूर्ण’ कविताएँ भी दिशाबोध में महती भूमिका निभाती है। कवि को इस बात की चिंता है कि- ‘‘मानव खोज लेता है मंगल को/पहुँच जाता है समुद्र तल पर/जरूरत न होने पर भी/पहचानता नहीं ‘स्वयं’ को’’(पृष्ठ ३७)। कवि दर्शाता
है कि ईश्वर की प्राप्ति सद्गुरु की कृपा से सत्संग के सहारे ही संभव है। कवि ‘चाह’, ‘चरित्र’, ‘चमत्कार’, ‘राह’, ‘विश्वास’, ‘भक्त वत्सल’ और ‘इच्छा’ कविताओं के माध्यम से भी जीवन का सुपथ दिखलाता है। प्रभु पथ की बात करते हुए कवि कहता है कि- ‘‘प्रभु प्राप्ति का मार्ग बडा कठिन हैं/हर बढते कदम पर परीक्षाएँ होती हैं/अनेक तर्क, शंकायें, भटकाव/और उतार-चढाव हमें परखते हैं/पर, उनकी कृपा/श्रृद्धा और विश्वास/से जो धैर्यपूर्वक डटता है/उसके लिए कठिनतम मार्ग भी/मस्ती से कटता है।’’ (पृष्ठ ५८)। कवि ‘एकाग्रता’ से ‘भीतर की यात्रा’ करने की बात कहता है। ‘‘बंधुवर,/जीवन में कोई भी सफलता/बिना एकाग्रता अप्राप्य है/एकाग्रता एवं लगन के सहारे/अर्जुन ने मछली की आँख को बेंधा/नट-नटनी चलते हैं झूलती रस्सी पर/पनिहारिन नहीं छलकाती घडे का पानी/विद्यार्थी पाता है उच्चतम सफलता/कर्मचारी पहुँचता है चोटी के पद पर/नेता बनाता है मंत्री/अभिनेता बनता है अभिनय सम्राट/यह विश्व है/बडा विराट।’’ (पृष्ठ ६१)
कविता शुष्कता के स्थान पर सरसता के संचार की यात्रा है। कवि अपनी संवेदनाओं को इसी के माध्यम से जन संवेदनाएँ बनता है। वह चारों ओर छा रहे अंधकार में प्रकाश का पथ सुझाता है। जब ऐसे यांत्रिक दौर से हमारा समाज गुजर रहा हो, जबकि संवेदनाएँ शून्य हो रही हों, सब लोग अर्थ की अंधी दौड में लग रहे हों, अनजान राहों पर बढ रहे हों, ऐसे में कविता मानवपन को जगाने का कार्य करती है। इस प्रकार इस संग्रह की कविताएँ गुरु की महिमा का बखान करते हुए ईश्वर पथ पर बढने का संदेश देती हैं। कवि भरोसा दिलाता है कि वह ईश्वर की मूल तत्त्व है। सत्य पथ पर बढते हुए सद््गुरु की कृपा से उस ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। ?
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