हृदय-तरंगिनी

डॉ. प्रहलाद दुबे


हृदय-तरंगिनी
समीक्ष्य कृति कवि द्वारकालाल ‘गुप्त’ की साहित्य साधना का भक्ति रस अवतार है। पुस्तक में कृष्ण एवं राधा की भक्ति को समर्पित ८१ रचनाएँ संकलित हैं। प्रत्येक रचना भक्तिरस में पगी और राधाकृष्ण को संबोधित है। काव्य का विषय कृष्ण की बाल लीला और बृजधाम की वंदना है
सखी री वृन्दावन बृजधाम
इसकी रज में लोट-लोट कर,
बडे हुए घनश्याम। (बृजधाम)
बृज की होली सुप्रसिद्ध है जिसने कवि ‘‘गुप्त’’ जी के कवि हृदय को स्पर्श किया है। ‘‘बृज की होली’’ और ‘‘होली वृन्दावन की’’ शीर्षक से रचित दो गीतों को बानगी के रूप में रखा जा सकता है।
प्रकृति प्रेम और ऋतु वर्णन भी कवि के वर्ण्य विषय रहे हैं परन्तु कवि बृज की वर्तमान स्थिति; जिसमें हरितिमा की कमी, पर्यावरण की उपेक्षा, जलवायु, परिवर्तन और आत्मानुशासन के क्षरण से उपजे दुःख और करुणा को प्रकट करने से अपने को रोक नहीं पाते-
‘‘खडी फसल पर गिर गये ओले
ढूँढ रहा फिर भी मंगल
समझा नहीं इशारा उनका
काट रहा अब भी जंगल’’ (आज का समय)
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कवि द्वारकालाल ‘‘गुप्त’’ द्वारा रचित पुस्तक पढकर लगता है कि कवि भक्ति की रसधार म बहते हुए भी भक्ति रस का पान करके भी अपना होश कायम रखे हुए है और अपने कवि-कर्म के कर्तव्यों को विस्मृत नहीं करता। पुस्कत की अन्तिम कविता में कवि भक्त मन की प्रतीक्षा को शब्द देते हैं-
वो आए तो बैरागी मन मंदिर-सा सज जाए
कब से बैठा मन बैरागी प्रभु की आस लगाए।?
७४८, दादाबाडी विस्तार, कोटा-३२४००९ (राज.)