सामाजिक न्याय : अम्बेडकर विचार और आधुनिक संदर्भ

रत्नकुमार सांभरिया


सामाजिक न्याय : अम्बेडकर विचार...
डॉ. सुधांशु शेखर द्वारा लिखित समीक्षा कृति सामाजिक न्याय : अम्बेडकर-विचार और आधुनिक संदभ* भूमिका से लकर डॉ. अम्बेडकर जीवन चक्र तक कुल ३५ अध्यायों में विभक्त है। प्रत्येक अध्याय न केवल विचार और नवाचार है बल्कि गांभीर्य भी है। डॉ. शेखर भूमिका में न्याय को सर्वव्यापी स्वरूप प्रदान करते हुए लिखते हैं कि व्यक्ति एवं समाज जिन आदर्शों एवं मूल्यों का विवेचन करता है उसमें न्याय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। न्याय के बिना कोई समाज-व्यवस्था न तो प्रगति कर सकती है और न ही टिक सकती है।
पुस्तक में आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षणिक चारों न्यायों की पैरवी की गई है। डॉ. सुधांशु का कहना है कि डॉ. अम्बेडकर ने भी सामाजिक राजनैतिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्वतंत्रता को जरूरी बताते हुए राज्य समाजवाद की वकालत की है और उन्होंने स्पष्ट किया है कि न्याय सामान्यतः स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व का ही दूसरा नाम है। ‘आरक्षण’ नामक अध्याय में लेखक दलित और आदिवासियों की दयनीय स्थिति के मद्देन*ार आरक्षण व्यवस्था को न्यायोचित ठहराते हैं।
डॉ. शेखर ने माक्र्सवाद गांधीवाद और अम्बेडकरवाद का तुलनात्मक अध्ययन बडी बुद्धिमानी से निष्पक्षतापूर्ण किया है। इसके साथ ही उन्होंने बौद्धवाद और मानववाद के बीच करुणा, त्याग और इंसानियत का जो भाव पक्ष है उसको आज के संदर्भ में बडे सलीके से उकेरा है। मानवाधिकार अध्याय में विवेचन किया गया है कि डॉ. अम्बेडकर के दर्शन में न केवल दलितों, अपितु सभी शोषित, पीडित एवं वंचित समूहों यथा-आदिवासियों, घुमन्तू जातियों, श्रमिकों, महिलाओं, बच्चों आदि के कल्याण की भावना भी निहित है। कहना होगा कि अस्पृश्यता और जात-पात की दुर्भावना मानवाधिकारों का हनन करती है। डॉ. अम्बेडकर इन कुरीतियों का उन्मूलन कर प्रत्येक नागरिक को उनके जन्म प्रदत्त अधिकार दिलाने को कटिबद्ध हैं। अंतिम अध्याय ‘‘डॉ. अम्बेडकर : जीवन चक्र’’ में बाबा साहब डॉ. भीम राव
अम्बेडकर की संपूर्ण जीवन यात्राा का सन् और तिथिवार ब्यौरा दिया गया है। इससे उनका जीवनवत्त एक बारगी पढा जा सकता है।
यह कृति डॉ. अम्बेडकर के व्यक्तित्व और जीवन दर्शन पर लिखी एक महत्त्वपूर्ण किताब है। यह न केवल अम्बेडकरवाद के अध्येताओं के लिये ही बल्कि बुद्ध, गांधी, माक्र्स और मानववाद के शोधार्थियों और सुधी पाठकों के लिये भी पेरणादायी साबित होगी। ?
कितने-कितने घर
भानु भारवि मूलतः कवि हैं। समीक्ष्य ‘कितने-कितने घर’ उनका प्रथम कहानी संग्रह है। इसमें १९ कहानियाँ संगृहीत हैं जो सामाजिक परिवेश के विभिन्न पहलुओं से रू-ब-रू कराती अपने मुकाम तक पहुँचती हैं। यहाँ गाँव-गलियारे भी हैं, भाईचारा-सद्भाव भी है। शोषण के विरूद्ध गूँज भी है और जातिभेद के प्रति टीस भी है। सामाजिक सरोकार मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं की अनुभूतियाँ भी यहाँ विद्यमान हैं।
संग्रह की पहली काहानी ‘बल्लूदादा’ लेखक की बालपन की स्मृतियों का दस्तावेज कही जा सकती है। कहानी का नायक ‘बल्लू दादा’ बचपन में खेले गये खलों में पक्ष-विपक्ष की दोनों टीमों के भिड जाने पर इन बाल सुलभ झगडों का निपटारा निष्पक्ष भाव से करता है। निष्पक्षता का उसका यह भाव जवानी तक आकर परवान चढ जाता है। वह चालबाज जमीदारों की कुचालों के विरूद्ध साग सब्जी बेचने वाले सीमांत किसानों के पक्ष में खडा
होता है।
अबोध प्यार की पींगे भी कोई कम नहीं होती। प्यार जाति, धर्म, समुदाय, खानों में नहीं, अंतस में अंकुरित होने वाला मोती होता है। ‘‘साजिदा की चप्पलें’’ में यह बात फूट कर सामने आती है। नीम के पेड के नीचे अपनी बैठकी पर बैठकर जूते चप्पलों की मरम्मत करने वाले रामेसर मोची के अबोध बेटे मंगल और उसके निकट ही
लाख की दुकान चलाने वाली लखेरन की अबोध बेटी साजिदा के बाल सुलभ पे*म की कहानी है यह। यहाँ काम या पाप भाव नहीं, निर्पेक्ष नैसर्गिकता का बोध है।
अकाल के दौरान काल कवलित हो रहे गाँव के पशुओं और उनके पालकों की अश्रुगथी कहानी है ‘विछोह’। हरनाथ, जो गाँव में साफ-सफाई का कार्य करने के साथ-साथ मृत पशुओं को ढोने और उनकी खाल उधेडने का काम भी करता है, वह एक दिन मर्माहत हो कर गाँव छोड कर चला जाता है। कहानी कौंधता एक प्रश्न खडा करती है। ‘फिरंगी मेम’ रिक्क्षा चालक गोरेलाल पर केन्द्रित है। जयपुर भमण पर आये विदेशी पर्यटकों को जयपुर के ऐतिहासिक स्थल दिखाना रिक्क्षा, ऑटोरिक्क्षा और टैक्सी चालकों को मुख्य धंधा है। रिक्क्षा पर घुमाते या पर्यटन स्थलों को दिखाते वक्त गोरेलाल के मजबूत हाथों और उसकी गठीली देह का स्पर्श चोटिल हो गई गोरी मेम जोला को हो जाता है। जोला कामासक्त हो जाती है और उसे होटल में ले जाकर उसका देह शोषण करती है।
‘‘लौटते हुए’’, ‘‘सोच’’, ‘‘वात्सल्य’’, ‘‘माता जी की कृपा’’, ‘‘कितने-कितने घर’’ कहानियाँ अन्तर्द्वन्द्व की कहानियाँ कही जा सकती हैं। ‘‘खबर की खिचडी’’, ‘‘बर्फवाला’’, ‘‘उत्तरापेक्षी’’, ‘‘नये साल का संकल्प’’ कहानियों में सामाजिक सरोकारों का प्रतिपादन हुआ है।
अंत में यही कहना समीचीन जान पडता है कि श्री भानु भारवि को समकालीन कथा सृजन को डूबकर पढना होगा तभी उनकी कहानियों में कथ्य की बुनावट और शिल्प सौष्ठव परिलक्षित हो पाएगा। ?
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