कही-अनकही / नहीं असंभव कुछ

पद्र्मजा शर्मा


कही अनकही
<br/>कही अनकही’ उपन्यास का ताना-बाना गीता के इस संदेश ‘कर्म किये जा फल की इच्छा मत कर.....।’ पर बुना गया लगता है। कहानी यह संदेश देती लगती है- जो लोग जीवन के प्रारम्भ में जितने कष्ट उठाते हैं आखिर में उतना ही सुखमय जीवन जीते हैं। शर्त यह हैं कि वे सही रास्ते पर चलते रहें। व्यक्ति को समाज के बनाए नियम कायदों का पालन करते हुए अपने परिवार, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन बराबर करते रहना चाहिए। चाहे रीता को लें, चाहे सुगम को ल इनका प्रारंभिक जीवन जिस तरह परेशानियों में बीता अंत उतना ही सुखद हुआ। कुछ और खास बातें जो कथा कहती है, वे इस तरह हैं- अपने गुनाहों, अपराधों की सजा इंसान को एक न एक दिन जरूर मिलती है। रंजना कैंसर के कारण असमय दुनियाँ छोड जाती है। क्योंकि उसने रीतेश जी के साथ नाजायज संबंध बनाए थे। अपने पति को धोखा दिया था। वह अति महत्त्वकांक्षी हो गई थी जिस कारण उसे यह भी भान नहीं रहा कि वह जिस रास्ते पर चल रही है वह सही है या गलत। स्थितियों के बदलते ही इंसान का नजरिया बदल जाता है। जिस तरह बुराई ज्यादा दिन छिपती नहीं वैसे ही अच्छाई भी ज्यादा दिन पर्दे में नहीं रहती है। रीता के अच्छे व्यवहार से प्रभावित होकर उसका बेटा आगम जो उससे परिस्थितियोंवश दूर जा रहा था, करीब आने लगा। अन्य वे लोग जो उसके विधवा होने को लेकर फि*ाूल बातें बना रहे थे, वे भी शांत हो गए या करा दिए गए। सुगम की माँ अपनी रूढिवादी सोच के कारण विधवा रीता का विवाह सुगम से नहीं होने देती वही उनके विवाह के बाद रीता का पूरा ध्यान रखती है।
<br/><br/>यह उपन्यास स्त्री के प्रति समाज के उस नजरिए को भी दिखाता है कि लडकी विधवा है तो अपशकुनी है। काली है, सुंदर नहीं है तो विवाह में अडचने आती हैं। लेखिका ने इस ओर इशारा भी किया है कि अपने रंग रूप को लेकर ज्यादा नुक्ताचीनी होती है तब लडकी कुंठित हो जाती है और कई बार उसका आक्रोश और गुस्सा उसे उस रास्ते पर ले जाता है जो अंधेरों को
<br/><br/>जाता है।
<br/><br/>उपन्यास यह भी कहता है कि पति-पत्नी के रिश्ते में विश्वास की डोर सदा बनी रहनी चाहिए। यह टूटी नहीं कि सारा परिवार और जीवन मोती की माला की तरह बिखर जाता है। लेखिका कहना यह भी चाहती हैं कि परिश्रम और अपनी योग्यता से जो आदमी आगे बढता है उसकी उपलब्धियाँ टिकी रहती हैं मगर जो किसी और के कंधे पर चढकर ऊपर उठता है वह शीघ्र ही धराशायी भी हो जाता है।
<br/><br/>अनैतिकता की सीढियाँ कितनी भी ऊँची जाएँ जल्दी ही वे नीचे भी आती ही दिखती हैं। लेकिन नैतिकता के साथ बढते कदमों की गति भले ही धीमी हो पर उन्हें मंजिल अवश्य मिलती है।
<br/><br/>लेखिका यह भी कहती है कि वे पुरानी मान्यताएँ जिनका अब कोई उपयोग नहीं है, त्याग देनी चाहिए। वे मनुष्य के विकास में बाधक बनती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार चंद्रकांता कहती हैं कि ‘‘प्रसंग चाहे दाम्पत्य सम्बन्धों में आई दारारें भरने की कोशिशें हों या परिजनों का अनाथालय से बच्चा गोद लेने के विरोध के बावजूद, बेटी गोद लेने का निर्णय हो। बदलते समय-संदर्भों में अर्थहीन हुई जर्जर मान्यताओं के प्रतिपक्ष में लिखा गया नीलिमा का यह उपन्यास सार्थक जीवन के लिए रूढ मान्यताओं में बदलाव को प्रश्रय देता है।’’
<br/><br/>भाषा का एक गुण रवानगी होता है। वह है तो रचना लुभाएगी। ‘कही अनकही’ में कथ्य में भलें नयापन नहीं है फिर भी पूरी किताब बिना ऊबे पढ गई। कहीं भी यह नहीं लग रहा था कि यह कहानी काल्पनिक है। लग रहा था जैसे पात्र हमारे आस-पास के जाने-पहचाने हैं, जिनके विषय में और ज्यादा लिखा जाता तो वे साक्षात् हमारे सामने आ खडे होते।
<br/><br/>११२ पृष्ठों में फैले उपन्यास ‘कही अनकही’ में लेखिका नीलिमा टिक्कू ने बहुत कुछ कह दिया है। यह किताब एक सामान्य भारतीय परिवार की खुली किताब है जिसे कोई भी बाँच सकता है। कुल मिलाकर सरल भाषा
<br/><br/>में समाज की उस स्थिति का खाका खींचा है जिसका सामना हम रोज करते हैं। उपन्यास का कथ्य यह है कि व्यक्ति सही रास्ते पर चलते हुए, नैतिक मूल्यों को सहजते हुए, खुले दिल और दिमाग के साथ स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। ?
<br/><br/>नहीं असंभव कुछ
<br/><br/>‘नहीं असंभव कुछ’ (नवछंद मुक्त त्रिपदी) में बृजेन्द्र कौशिक ने त्रिपदियाँ रची हैं। तीन पदों के इस नवछन्द की प्रथम पंक्ति छः मात्राओं की है तथा दूसरी तीसरी पंक्तियाँ दस-दस मात्राओं की हैं। पूरे संकलन में अनपवाद रूप से, यही मात्रात्मक अनुशासन उल्लेखनीय एवं दर्शनीय है।
<br/><br/>एक-एक त्रिपदी दस-दस पंक्तियों की क्षमता लिए हुए अनेक भाव और विचारों से लबरेज है। ये त्रिपदियाँ हर क्षेत्र में अपना दखल रखती हैं। त्रिपदियाँ, चतुष्पदियाँ , तुकांत, अतुकांत, छंदबद्ध, छंदमुक्त, गीत, गजल हो, नाम अलग-अलग हैं कुल मिलाकर सब का काम एक ही है- उसकी तरफ से बोलना जो अपनी बात बोल नहीं सकता। कवि ने पुस्तक को विषयानुरूप छः सर्गों में विभक्त
<br/><br/>किया है- सृजन, आत्मोन्नयन, अध्यात्म, समाज, आचरण
<br/><br/>और सियासत।
<br/><br/>संघर्षों में तपा आदमी सोने सा निखरता है। बच्चों से घर फुलवारी जैसे लगते हैं। सब मंडी में बिकते पर कलम सावधान रहती है। जिनको खुद पर भरोसा होता है संघर्षों का सामना वे ही लोग कर पाते हैं। इसी तरह की बहुत सी बातें इस खंड में बिखरी हैं। कुछ त्रिपदियाँ जो ऐसे विचारों की वाहक हैं, देखें-
<br/><br/>सृजन सदा
<br/><br/>संस्कारित करता
<br/><br/>है जन मानस को
<br/><br/>‘आत्मोन्नयन’ खंड में व्यक्ति के मानसिक विकास की बात है। तनने से
<br/><br/>झुकने का जीवन
<br/><br/>अधिक सरल होता।
<br/><br/>‘आध्यात्म’ खंड में लेखक ने कहना चाहा है कि तृष्णाएँ सभी दुःखों की जड होती है। दुनियाँ से पहले खुद की पहचान जरूरी होती है।
<br/><br/>दुःख में भी सुख की अभिलाषा
<br/><br/>जीवन कहलाती
<br/><br/>‘समाज’ खंड में सामाजिक मूल्य, नैतिक मूल्य, सुख, दुःख, प्रेम, पर हित, मानवता, सुंदरता, मन, खुशबू, प्यार और विश्वास की जीवन और समाज में महत्ता स्थापित करते हुए कवि कहता है- लालच बुरा होता है।
<br/><br/>कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बृजेन्द्र कौशिक द्वारा रचित ‘नहीं असंभव कुछ’ पढकर लगता है जैसे सब कुछ संभव है। सकारात्मक सोच वाली इन त्रिपदियों में हम अपने समय के समाज का चेहरा देख सकते हैं। ?
<br/><br/>१५ बी, पंचवटी कॉलोनी, सेनापति भवन के पास, जोधपुर-३४२०११ (राज.), मो. ९४१४७२१६१९