सहरा के फूल / देह जुलाहा

बलवीर सिंह करुण


सहरा के फूल
‘ए.एफ.नजर’ नाम पढकर प्रथम तो मन में उलझन सी होती है कि यह भी कोई नाम हुआ। शेक्सपीयर भले ही कह गये हो कि नाम में क्या रखा है लेकिन बहुत कुछ नाम में ही रखा रहता है, हमारी संस्कृति में तो। परन्तु इस समय तो हमें अशोक फुलवारिया के गjल संग्रह पर बात करनी है। इन ७६ गजलों के कथ्य और शिल्प से गुजरते हुए मन को बार-बार प्रथम वर्षा की फुहारों और उनके कारण जुते हुए खेत की माटी से उठने वाली मादक मोहक सुगन्ध का सा आनन्द मिलता है। कवि गाँव में जन्मा है इसलिए उसके मन और सोच में गाँव बसा है जिस पर शहर हावी होना चाहकर भी नहीं हो पता-
गाँव बचाकर रक्खा मैंने शहर की बेहिस आँखों में
अम्मा, अब्बू, पनघट, आँगन हरदम मेरे साथ चले।
बुजोगो का अदब रखती है गाँवों में नजर अब भी
बडों के सामने झुक जाते हैं छोटों के सर अब भी।
दिलों में चाह होती है कभी खंजर नहीं होते
हमारे गाँव में ये बदनुमा मंजर नहीं होते।
इन गजलों में रचनाकार के जीवन के अनुभव परिवार, समाज, देश, परिवेश सब कुछ अभिव्यक्त हुआ है। उसका सात्त्विक स्वाभिमान भी अनेक गजलों के माध्यम से प्रकट हुआ है-
वो जमाने भर की खुशियाँ देने को तैयार थे
पर मुझी से आदतन झोली न फैलाई गई।
माँ-बाप ने इज्जत के लिये सर भी कटाये
बेटे हैं कि दस्तार तलक बेच रहे हैं।
लेना हो तो ले-ले कोई बस एक हँसी में
हम साँसों की रफ्तार तलक बेच रहे हैं।
हर साहित्यकार अपने समय को जीता है, भोगता है, अभिव्यक्त करता है। इतिहास इसी क्रम से कदम दर कदम आगे बढता है। अशोक
नजर भी अपने समय की नब्ज की रफ्तार और फलसफे समझते हैं-
आँखों में आकाश को भरकर जब आँगन से विदा हुई
सूरज का जा कान मरोडा तारों में मुसकाई बिटिया।
मैंने इस एक झूठ को उससे जाने कितनी बार कहा
तेरी चूडी के जैसी है दुनियाँ की गोलाई बिटिया।
इन गजलों को पढते हुए हर पाठक को लगेगा कि हमारे मन को पढकर ही रची गई हैं ये और स्वयं ऐसा ही कुछ सोचता है गजलकार भी-
हमको सुनने का सलीका ही नहीं है वरना
उसकी कुदरत का हर इक जर्रा गजल कहता है। ?
देह जुलाहा
श्रीमती सुशीला शिवराण के दोहा संग्रह ‘देह जुलाहा हो गई’ में संग्रहित अपने ३९६ दोहों को कवयित्री ने भक्ति, गुरु शिक्षा, स्वदेश, दर्शन, पेम-संयोग, प्रेम-वियोग तथा उत्सव इन दस शीषकों में वर्गीकृत किया है। इन दोहों का नाभि-नाल कहाँ किससे जुडा है इसकी जानकारी इस दोहे में उपलब्ध है-
ढाई आखर में पढा, जबसे तुझे कबीर।
देह जुलाहा हो गई, मनवा हुआ फकीर।।
साहित्य अपने समय का समीक्षक भी होता है और मार्गदर्शक भी। निर्जीव दर्पण केवल आपकी प्रतिछवि जस की तस आपको लौटा सकता है। आफबनाव श्रृंगार के सुझाव देना उसके वश की बात नहीं है। यह काम साहित्य बखूबी करता आया है। अपने सामने दूर तक देखने और उन दृश्यों को अंकित करने की क्षमता सी.सी. टी.वी. कैमरे में होती है। वही काम साहित्य भी करता है। इस संग्रह के अनेक दोहे इसके साक्षी है-
खाकी वर्दी को मिले, अदबी जब अंदाज।
दिल तो करता शायरी, ड्यूटी कडक मिजाज।।
उजडा पनघट गाँव का, उजडे सरवर-घाट।
मॉल उठाये सर खडे, कहाँ गये वो हाट।।
माता-पिता के साथ फेसबुकी सन्तानों के सलूक व सम्बन्धों को लेकर रचे-बसे दो शानदार दोहे भी देखें-
आँचल के सब सुख बँधे, गठजोडे के छोर।
माँ पहुँची वृद्धाश्रम, बीवी ही सिरमौर।।
इन दोहों में दुलार-फटकार, अपनाव-छिटकाव, रोष-आक्रोश, निन्दा-स्तुति सब कुछ मिलता है क्योंकि कवयित्री ने अपनी सोच का दायरा बहुत बडा बनाकर रखा है। उनका उद्देश्य सकारात्मक है। सिर्फ हंगामा खडा करना उसका मकसद नहीं है बल्कि दुष्यन्त के मत और पथ की अनुगामिनी बनकर वे वर्तमान समाज की सूरत बदलने की दिशा में जाती हुई प्रतीत होती हैं। कन्याओं को कोख में ही मार देने की प्रथाओं और घटनाओं को पढ-सुनकर उसका मन आहत होकर कुछ यो कह उठा-
बेटी है तो सृष्टि है, भूल न तू नादान।
जब-जब उजडी कोख तब, रोया है भगवान।।
सोचा था आकाश में ऊँची भरे उडान।
झपट लिया फिर बाज ने, चिडिया लहूलुहान।।
कवियित्री के दोहों में सकारात्मकता के स्वर मिलते हैं, आशा और विश्वास की चमक मिलती है, संघर्ष और तदुपरान्त परिवर्तन का सन्देश मिलता है और अन्त मे ंभी वाजपेयी जी के कथन के साथ ही अपनी बात को समाप्त करने से अच्छी कोई राह हमें न*ार नहीं आती। कुल मिलाकर ‘देह जुलाहा हो गई’ दोहा संग्रह में कवियित्री ने जिस प्रकार वर्तमान समय की धडकनों को दोहों में पिरोया; है, गहरे सामाजिक मानवीय सरोकारों को अभिव्यक्ति दी है, एक नये समाज, नई दुनियाँ का स्वप* जगाया है, यह दोहा-संग्रह अपनी पहचान और प्रतिष्ठा बनायेगा तथा दोहा विधा को समृद्ध करेगा, ऐसी अपेक्षा है ।
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