प्रेम तपस्या

पी.के.दशोरा


सदगुरु, सद्विचार एवं सत्संगति जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक हैं। इनके अभाव में मनुष्य मनुष्यता को भूलकर पाशविकता की तरफ अग्रसर हो सकता है। यदि परिस्थितियाँ अथवा कुसंगति के कारण कोई व्यक्ति जीवन में नकारात्मक विचारों का समावेश करता है तो भी सद्गुरु एवं सत्संग उसके जीवन में शनैः शनैः सकारात्मक परिवर्तन लाकर दिव्यता की ओर अग्रसर कर सकते हैं।
डॉ. सुरेश द्वारा लिखित ‘‘प्रेम तपस्या’’ एक ऐसा उपन्यास है जो कृष्ण, जया, बाबूजी और गुरु महाराज इन चार पात्रों के माध्यम से जीवन में प्रेम का महत्त्व तथा व्यापक दृष्टि से प्रेम को परिभाषित करता हुआ मनुष्य जीवन को सार्थकता की दिशा बतलाता है। वस्तुतः इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने ऐसे कथानक की रचना की है जो शारीरिक आकर्षण से प्रारम्भ होकर सात्विक एवं आत्मिक पे*म को परिभाषित कर सके।
एक सामान्य परिवार, सुखी परिवार में जन्मा बालक कृष्णा परिस्थितियों वश अलग होकर कुसंगति में फँस जाता है तथा सभी तरह के गलत काम करने की दिशा में चलते हुए उसका सामना एक किशोरी जया से होता है। यहीं से उपन्यास का मूल तत्त्व प्रेम प्रकट होना शुरू होता है। विभिन्न परिस्थितियों में कृष्णा का बाबूजी एवं गुरु महाराज के सम्फ में आना, जया जो उसके प्रति प्रारम्भ में तिरस्कार का भाव लेकर चल रही थी, उसके मन में अपनी जगह बनाना और जया का कृष्णा की जीवन संगिनी बनना। गुरु महाराज के संकेतों पर बाबूजी के माध्यम से शनैः शनैः व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक सोच को विकसित करते हुए मनुष्य जीवन की सार्थकता जो कि मतपंथ सम्प्रदाय से उठकर रूहानी पे*म, जिसे हकीकी पे*म भी कहा जाता है उसके सार को छूने की प्रेरणा लेना। जीवन में सद्विचारोंके साथ जीते हुए समाज में सत्कर्मों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का संकल्प लेना। यह डॉ. सुरेश की कलम से संभव हो पाया है। इसमें बाबूजी द्वारा हर प्रसंग को सात्त्विक भाव से विभिन्न महापुरुषों एवं गं*ंथों के माध्यम से कृष्णा एवं कृष्णा के जीवन में परिवर्तन लाते हुए कृष्णा एवं जया को जीवन की
दिशा देने में पे*रणा देने का जो प्रयत्न हुआ, वह न केवल उपन्यास के पात्रों अपतिु पाठकों के लिए भी वैचारिक स्तर पर तथा जीवन जीने के स्तर पर प्रभाव छोडने में सक्षम है।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक स्तरीय है। विचार की दृष्टि से भी मनुष्य जीवन की व्यापकता की ओर पुस्तक से जो संकेत मिलते हैं, वे समाज के लिए बडे उपयोगी हैं। लेखक ने अपने जीवन के स्वाध्याय का निचोड जिस खूबी से इस रचना में किया है वह प्रशंसनीय है।
बीच-बीच में लम्बे-लम्बे काव्यात्मक उद्धरण कभी-कभी पढने की गति में बाधा उत्पन्न करते हैं। किन्तु एक धैर्यवान पाठक के लिए सोचने की पर्याप्त सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं। कुल मिलाकर डॉ. सुरेश को उनके उपन्यास ‘‘पे*म तपस्या’’ के लिए बधाई। यह उपन्यास युवा पीढी को उचित वैचारिक खुराक देने में सफल होगा, ऐसी अपेक्षा है। पुस्तक का आवरण सुंदर है तथा मुद्रण संतोषप्रद है। ?
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