न्याय हो तो ऐसा....(बाल-कथा )

नयन कुमार राठी


एक राज्य था रणपुर। जहाँ के राजा रणजीतसिंह बहुत न्यायप्रिय थे। राज्य की जनता उनके गुण गाते नहीं थकती। एक दिन दरबार में मंत्री के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे। तभी दरबान एक व्यक्ति को लाया। राणजीत सिंह को नमन करके बोला- राजा साहब! यह व्यक्ति बिना आज्ञा के दरबार में आ रहा था। मैंने रोकना चाहा तो तेज आवाज में बोला-तू तो क्या...मुझे राजा साहब भी नहीं रोक सकते हैं। उन्हें मारने आया हूँ। राणजीत सिंह ने व्यक्ति को अपने पास बुलाया और पूछा-क्यों दरबान जो कह रहा है, सच है? व्यक्ति हँसकर बोला-हाँ सच है और ये भी सच है कि आप थोडी देर के मेहमान हैं। अपने भगवान को याद कर लीजिए। रणजीत सिंह ने दरबान को जाने का इशारा किया। व्यक्ति को बैठने को कहा। वह बैठा। उन्होंने उससे पूछा-मुझे क्यों मारना चाहते हो? व्यक्ति ने सारी बात बतलाई और बोला-ऐसे राज्य और राजा से क्या फायदा...? जिनके कारण राज्य में, मैं और मेरे जैसे कई लोगों के परिवार को पेटभर भोजन नहीं मिले। आपको मारकर यहाँ का राजा बनूँगा और राज्य की जनता को सुखी रखूँगा। मन में रणजीतसिंह बोले-यह व्यक्ति सीधा-सच्चा और सरल स्वभाव वाला है। जरूर किसी के बहकावे में आकर बिना सोचे-विचारे मुझे मारने आ गया। उन्होंने अपने कर्मचारी को बुलवाया। उसके कान में कुछ कहा। थोडे समय बाद वह पकवानों से भरी थाली लाया और व्यक्ति के सामने रख दी।
रणजीतसिंह हँसकर बोले-पहले भोजन कर लो, फिर बात करेंगे। व्यक्ति तेज आवाज में बोला-भोजन के बहाने मुझे बहलाना चाहते हो। मीठी बातों के जाल में मैं नहीं फसूँगा। मंत्री के समझाने पर वह भोजन करने के बाद जाने लगा। रणजीतसिंह बोले-अरे कहाँ जा रहे हो? तुम तो मुझे मारने आए थे। मैं तैयार हूँ। व्यक्ति उदास-सा बोला- राजा साहब! मुझे माफ कर दीजिए। ये भूख भी खूब है। व्यक्ति से जाने क्या-क्या करवा लेती है। बहुत दिन से भोजन नहीं मिला। बाजार में एक व्यक्ति ने मेरी हालत देखकर कहा- अरे क्यों नहीं राजा को मार देते। उनके मरने के बाद तुम राजा और राज्य भी तुम्हारा... कोई कमी नहीं है और बिना आगा-पीछा सोचे मैं आपको मारने चला आया। हँसकर रणजीत सिंह बोले-तुम्हारी सच्चाई-सरलता और सीधेपन
ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मेरे दरबार में तुम जैसे व्यक्तियों की बहुत जरूरत है। आज से और अभी से तुम काम करो। वह व्यक्ति रणजीतसिंह के पैर पकडकर बोला-राजा साहब! सचमुच आप न्यायप्रिय हैं। कहाँ तो मैं आपको मारने आया था। इसके बजाय राजा के दरबार में काम देकर पुरस्कार दे दिया। हँसते हुए वे बोले-तुमने सुना होगा कि भगवान भी सच का साथ देते हैं और यही हुआ है। उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई। मंत्री ने ताली बजाई और बोला-न्याय हो तो ऐसा... रणजीतसिंह
मुस्करा दिए । ?
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