गतांक से निरन्तर....

डॉ. राजेन्द्र कुमार सिंघवी


हिन्दी कविता और कवि सम्मेलन दोनों का पारस्परिक अन्तःसंबंध अतीत में प्रगाढ रहा है। समय के साथ कवि सम्मेलनों में कविता कम और फूहड हास्य अधिक हो गया है। इस पर पुनीत बिसारिया की टिप्पणी है- ‘‘एक समय था, जब निराला, पन्त, दिनकर, बच्चन जैसे कवि कवि-सम्मेलनों की शान हुआ करते थे। साहित्यिकता से ओत-प्रोत इनकी कविताएँ सुनकर लोग भाव विभोर हो जाया करते थे। इसके बाद प्रयोगवाद और अकविता का दौर आया और गीतिकाव्य पर इसकी सर्वाधिक मार पडी, परिणाम स्वरूप कविता से गेयता की छुट्टी हो गई। उस दौर में गीतकारों ने गीतों को बचाने के लिए नवगीत लिखने शुरु किए, जो मंच और साहित्य जगत दोनों स्थलों पर सराहे गए, लेकिन अतुकांत कविता ने फिर भी उस समय तक मंच के कवि सम्मेलनों का काफी नुकसान कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि मंच पर तथाकथित कविता पढने वाले कवियों ने कविता से पहले ढेर सारे चुटकुले और किस्से या फिर फूहड हास्य पैदा करने हेतु साथी कवियों पर फब्तियाँ कसने, सहयोगी कवियित्रयों पर अशोभनीय टिप्पणियाँ करने को मंच पर कविता पढने में सफलता की गारण्टी मान लिया।
रचनाकार के कृतित्व पर उसका व्यक्तित्व अवश्य झलकता है। उसे सत्व गुण संपन्न होना आवश्यक भी माना गया है। यदि रचनाकार निर्मल है, तब ही उसकी रचना प्रवाहकारी होगी। डॉ. विजेन्द्र का अभिमत है- ‘‘रचनाकार को एक नेक इन्सान होना पहली शर्त है। अगर हम अपने जीवन में गिरते हैं तो उसका असर लेखन पर पडता है, लेकिन हम उसे अनुभव नहीं कर पाते। समाज एक लेखक को तभी आदर देगा, जब उसे यकीन हो कि लेखक जो कह रहा है, उसे अपने जीवन में भी चरितार्थ कर पा रहा है। समाज लेखक से अपेक्षा करता है कि वह उसे एक अनुकरणीय इन्सान की तरह देख सके। लेखक को यह भ्रम न हो कि समाज उसे देख-समझ नहीं रहा है। मेरा लम्बा अनुभव है। हम चाहे जहाँ हों, समाज हमें देखता परखता है। हम रचना से जितना छल करेंगे, वह हमसे उतनी ही दूर होती जायेगी। रचना हर साँस का लेखा-जोखा अपने पास रखती है। इसीलिए हमारे महर्षि साहित्य को साधना कहते रहे हैं।’’
रामकथा भारतीय परम्परा की चिंतन धारा में अपना अमूल्य स्थान रखती है। वाल्मीकि से लेकर आधुनिक रचनाकारों ने किसी न किसी रूप में रामकथा से प्रभावित हुए हैं। इसी क्रम में डॉ. राजेश श्रीवास्तव रामकथा को एक संहिता के रूप में स्वीकार करते हुए लिखते हैं- ‘‘रामकथा एक संहिता है। संभवतः आप मेरे इस तर्क से सहमत नहीं होना चाहेंगे। लेकिन मैं मानना चाहता हूँ। प्रमाण इतिहास की आवश्यकता है, साहित्य संवेदनाओं को संजोता है और मिथक हमारे संस्कारों को पल्लवित करते हैं, किन्तु संहिताएँ इन सबसे आगे बढकर हमारी उस मनःस्थिति का चित्रण है, जिसे हम अपने समय, आवश्यकता और विश्वास के अनुरूप गढना चाहते हैं। उन कथाओं में नए इतिहास रचने, उन मिथकों को नए भाव देने और उस साहित्य को युग की आकांक्षाओं के अनुकूल बनाने में संहिताओं की ही भूमिका होती है। संहिताकार को मानव जाति के सर्वोत्तम स्वरूप के अनुसार इतिहास के उन बिन्दुओं को निष्काषित करने का भी अधिकार होता है, जिसे आज का मानव मन नहीं स्वीकारता। धर्म की बदलती स्थितियों के कारण आस्था, विश्वास और मान्यताओं का संरक्षण करते हुए संहिताएँ अपनी गति और दिशा में समयमान रहती है। यह लोक जीवन और मनुष्य की केन्द्रीय शक्ति होती है।’’
भारतीय भाषाओां का समृद्ध इतिहास रहा है। विपुल साहित्य भारतीय वाङ्मय की समृद्धि है। यह साहित्य देवनागरी सहित अनेक लिपियों में उपलब्ध है। डॉ. शिबन कृष्ण रैना कश्मीरी भाषा का परिचय देते हुए स्पष्ट करते हैं- ‘‘आज से लगभग ६०० वर्ष पूर्व कश्मीरी भाषा शारदा लिपि में लिखी जाती थी। १४वीं शताब्दी के आसपास जब फारसी कश्मीर की राजभाषा बनी, तो कश्मीरी के लिए फारसी लिपि का प्रयोग बढने लगा। वर्तमान में इसी लिपि का तनिक परिवर्तन। परिवर्धन के साथ प्रयोग होता है और इसे पर्शियो- ऐरेविक ‘नसतालिक’ लिपि के नाम से जाना जाता है। इस लिपि को राजकीय मान्यता भी
प्राप्त है। कश्मीरी के अधिकांश धार्मिक तथा कर्मकांड संबंधी बहुमूल्य ग्रंथ/शास्त्र शारदा में ही लिखे गए हैं। शारदा लिपि लिखने का तरीका देशी थाजो मूल ब्राह्मी से विकसित हुआ था। वैसे शारदा ब्राह्मी का ही कश्मीरी-संस्करण है। इस लिपि का प्रयोग कश्मीरी पंडित (पुरोहित वर्ग) द्वारा जन्म पत्री लिखने के लिए भी किया जाता रहा है। साथ ही, कश्मीरी भाषा के लिए शारदा के अलावा देवनागरी लिपि, रोमन आदि लिपियों का प्रयोग भी होता रहा है।.... कश्मीरी को देवनागरी में लिपिबद्ध करने का श्रेय सर्वप्रथम श्रीकंठ तोषखानी जी को जाता है। इसके बाद श्री जियालाल कौल जलाली तथा श्री पृथ्वीनाथ पुष्प ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किये। देवनागरी की यह विलक्षण विशेषता है कि वह किसी भी भाषा को सफलतापूर्वक लिपिबद्ध करने में सक्षम है।’’
परिचित लेखिका ममता कालिया को वर्ष २०१७ का प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ देने की घोषणा हुई। उपन्यास ‘दुक्खम-सुक्खम’ के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। प्रो. कैलाश कौशल ने उपन्यास की संवेदना को रेखांकित करते हुए लिखा- ‘‘दुक्खम-सुक्खम’’ जीवन के जटिल यथार्थ में गुँथा एक बहुअर्थी पद है। रेल का खेल खेलते बच्चों की लय में दादी जोडती है ‘कटी जिन्दगानी कभी दुक्खम कभी सुक्खम। यह खेल हो सकता है, किन्तु इस खेल की त्रासदी, विडंबना और विसंगति तो वही जान पाते हैं जो इसमें शामिल हैं। परम्पराओं रूढियों में जकडे मध्यवर्गीय परिवार की दादी का अनुभव है- ‘इसी गृहस्थी में बामशक्कत, कैद, डंडाबेडी, तन्हाई जाने कौन कौनसी सजा काट ली। एक तरह से यह उपन्यास शखला की बाहरी-भीतरी कडियों में जकडी स्त्रियों के नवजागरण का गतिशील चित्र और उनकी मुक्ति का मानचित्र है।’’
‘जीवन की भारतीय दृष्टि’ विषय पर भोपाल में आयोजित संगोष्ठी के प्रमुख वक्तव्य ई-लोक पर प्रसारित हुए हैं। जे.नन्द कुमार ने कहा कि विश्व में भारतीय जीवन दृष्टि है, जहाँ स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं माना गया है।
यहाँ स्त्री पुरुष की रचना एवं कल्पना एक साथ एक ही तत्त्व से मानी जाती है। हमारे यहाँ शक्ति के बिना शिव का महत्त्व नहीं। विश्व शांति के लिए भारतीय दर्शन को जानना महत्त्वपूर्ण है।’ पद्मश्री डॉ. नरेन्द्र कोहली ने कहा- ‘‘हमारे इतिहास में दो शब्द आते हैं- ऋषि एवं राक्षस। जो लोगों को बाँटने का काम करते हैं, वह राक्षस हैं। जबकि जो लोगों को जोडते हैं, उन्हें ऋषि कहते हैं। ऋषि अपनी संस्कृति व राष्ट्र की रक्षा करता है। ऋषि का अर्थ है- बुद्धिजीवी। बुद्धिजीवी वह है, जो जानता है, इसलिए मानता है और जिसे नहीं जानता, उसे जानने का प्रयास करता है। दूसरी ओर राक्षस वह है, जो जानता नहीं, इसलिए मानता नहीं और जानना भी नहीं चाहता। जो लोग अपने सामर्थ्य का उपयोग लोगों का शोषण करने के लिए करते हैं, वह राक्षस हैं। आतंकवादियों ने सीरिया में महिलाओं के साथ जो व्यवहार किया, वैसा तो राक्षस भी नहीं कर पाएँगे।’’ प्रो. सुनील कुमार ने गीता को विज्ञान के साथ जोडते हुए कहा- ‘‘भारतीय योग, पूजा पद्धति के साथ भारतीय विज्ञान गीता में उपस्थित है, जो सही मायने में भारतीय जीवन दृष्टि का एक रूप है।’’
‘मुक्तिबोध’ पर वैचारिक बहस हिन्दी आलोचना का महत्त्वपूर्ण अध्याय दशकों से चल रहा है। मधुमती के नवम्बर अंक का संपादकीय मुक्तिबोध पर केन्द्रित था। इसी संदर्भ में डॉ. सुरेन्द्र डी. सोनी ने टिप्पणी की है- ‘‘मुक्तिबोध के जन्म का शताब्दी वर्ष है। उनको नए नजरिए से देखना असली-नकली सभी प्रगतिशील मित्रों का धर्म था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे शायद मुक्तिबोध को पूरा दुह चुके। उनके हिसाब तो साहित्य का अंत ही हो चुका है। यह अंत स्वीकार कर लेना उन्हें न इधर का छोडता है, न उधर का। इस परिस्थिति में डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ ने मधुमती के संपादकीय लेख में कुछ मुक्तिबोधीय मिथकों को तोड दिया है- वह भी सलीके से...!??
एफ-६-७, रजत विहार, निम्बाहेडा, ३१२६०१ (राज.)
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