मैं हूँ तो

सरताज नारायण माथुर


बचपन : मैं हूँ बचपन। मुझे जिस दिशा में मोड देते हैं, मैं उस ही दिशा में बढता रहता हूँ। मेरा अपना कोई सोच नहीं है क्योंकि मुझमें अधिक तर्क-वितर्क करने की क्षमता नहीं है। (शिक्षा प्रवेश करती है) तुम कौन हो ?
शिक्षा : मैं हूँ शिक्षा।
बचपन : तुम यहाँ क्या कर रही हो ?
शिक्षा : मैं सब दिशाओं में घूमती रहती हूँ। तुम्हारे जैसे हर बचपन की उँगली थाम उसे तर्क-वितर्क की समझ दे, अच्छा-बुरा, सही-गलत समझने योग्य बनाती हूँ।
बचपन : ऐसा तुम करती हो ? शिक्षा : मैं तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ, फिर तुम्हारे समझ में सब आ जायेगा। आओ उधर चलें। यह है, बालिकापुर। गाँव के स्कूल के बच्चे बाहर पहल-दूज खेल रहे हैं। उधर देखो कुछ गोला बनाकर बैठे रुमाल झपट्टा खेल रहे हैं। लडकियाँ रस्सी कूद रही हैं। कुछ गुट्टे खेल रही हैं। एक औरत पानी का मटका बगल में दबाए पानी भरने चली जा रही है।
(स्कूल की घंटी बजती है।)
सब बच्चे : स्कूल चलो। स्कूल चलो।
सब बच्चे : नमस्ते मास्टर साहब।
मास्टर : नमस्ते बच्चों। मैंने तुमको कल जो कविताएँ याद करने को दी थीं वो तुमने याद की ?
सब बच्चे : हाँ। मासाब।
मास्टर : सुनाओ। आओ तुम आओ रामू।
रामू : जी मासाब।
लहरो से डरकर नौका पार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
मास्टर :शाबाश। अब इससे आगे तुम सुनाओ।
दूसरा बच्चा : नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है।
चढती दिवारों पर सौ बार फिसलती है।।
मन का विश्वास हृदय में साहस भरता है।
चढकर गिरना, गिरकर चढना ना अखरता है।
मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।
मास्टर : शाबाश। अब तुम आओ बडी।
बडी : (बडी आती है) मासाब। मुझे कविता याद नहीं है।
मास्टर : यह तो अच्छी बात नहीं। क्यों याद नहीं की ?
बडी : मासाब मेरे पास कविता की किताब
नहीं है।
मास्टर : ओह। रामू तुम एक दिन के लिए अपनी कविता की किताब बडी को दे दो।
रामू : जी मासाब।
मास्टर : देखो बडी तुम पढाई में बहुत होशियार हो, मैं इस लिए आज तुम्हें कुछ नहीं कह रहा लेकिन यदि कल तुमने कविता नहीं सुनाई तो....।
बडी : नहीं मासाब कल जरूर सुनाऊँगी।
(घंटा बजता है)
सब बच्चे : पीरियड खत्म।
(शोर मचाते हुए बच्चे जाते है)
शिक्षा : यह है बडी के बापू। सुन्दर लाल।
बचपन : यह तो बहुत चिन्तित लग रहे हैं।
शिक्षा : हाँ। इनके यहाँ दूसरा बच्चा आने
वाला है।
बचपन : ओह। लेकिन यह तो इन्हें महिनों से मालूम होगा-फिर आज ही इतनी परेशानी क्यों?
शिक्षा : इन्हें चिन्ता इस बात की है कि कहीं दूसरी भी लडकी ना हो जाए। कई दिनों से घूम-घूम कर यह जानने का प्रयत्न कर रहे थे कि होने वाला बच्चा लडका है या लडकी। परन्तु कठोर कानून होने के कारण पता नहीं चल सका।
(सुन्दरलाल का घर। बडी बोल-बोल
कर कविता याद कर रही है। इस पार प्रिय तुम हो मधु है, उस पार न जाने
क्या होगा)
माँ : आ गए आप। बडे थके थके और परेशान लग रहे हैं। आप बैठिए मैं पानी लाती हूँ। यह लीजिए पानी पी लीजिए।
सुन्दरलाल : (बडी को देखकर) यह क्या शोर मचा रक्खा है ?
बडी : कविता याद कर रही हूँ बापू।
सुन्दरलाल : चुप कर।
बडी : कल स्कूल में सुनानी है नहीं तो
सजा मिलेगी।
सुन्दरलाल : जबान चलाती है। ला इधर दे किताब (फेंकता है)।
माँ : अरे उसकी किताब क्यों फेंक दी। पढाई ही तो कर रही है।
सुन्दरलाल : तूने ही बिगाड रक्खा है इस लडकी को। घर में एक मिनट शान्ति नहीं है। जाता हूँ।
बडी : माँ। (माँ से लिपट कर रोती है)
माँ : रो मत बेटी यह तो ऐसे ही है। मैं हूँ तो।
(अन्तराल सूचक संगीत)
(बारिश और बिजली कडकने की ध्वनि। सुन्दर लाल का घर)
बडी : माँ आज तो बहुत जोर की बारिश हो रही है। मुझे तो डर लग रहा है।
माँ : डरने की क्या बात है बेटी। आ मुझसे लिपट कर सो जा। सुन पहले वो कम्बल ले आ। छोटी को अच्छे से ओढा कर सुला दे। इसे ठण्ड ना लग जाये।
सुन्दर लाल : लगता है सब सो गए। इसी समय का तो मुझे इन्तजार था। चुफ से छोटी को उठाकर ले जाता हूँ।
(बिजली कडकती है)
माँ : अरे बच्ची को कहाँ ले जा रहे हो ?
सुन्दरलाल : इस मुसीबत की जड को नाले में फेंक, हमेशा के लिए छुटकारा पाने जा रहा हूँ।
माँ : अरे ऐसे कैसे नाले में फैंक दोगे। नौ महिने पेट में पाला है मैंने।
सुन्दरलाल : तो बेटा पालती।
माँ : तो क्या वो मेरे बस की बात थी।
सुन्दरलाल : मैं एक मामूली मास्टर। इन दो मुसीबतों का बोझ मैं नहीं उठा सकता।
माँ : अब भगवान की यही मर्जी है, तो उठाना तो पडेगा ही ना।
सुन्दरलाल : भगवान की नहीं तेरी मर्जी है, नही तो मैं, इसे अभी नाले में फेंक छुटकारा पा लूँगा।
माँ : ना। मैं ऐसा ना होने दूँगी।
सुन्दरलाल : नहीं कैसे होने देगी ?
माँ : देखो मैं अभी शोर मचा सारे मौहल्ले को इकट्ठा कर लूँगी। फिर क्या होगा तुम जानते हो।
सुन्दरलाल : तो फिर ठीक है। तू ही पालना इनको। मैं तो ट्रांसफर करवा कर कहीं दूर चला जाऊँगा। अब तुम जियो या मरो, मेरी
बला से।
>माँ : अजी सुनो तो-अजी सुनो तो।
बडी : अब क्या होगा माँ ? बता ना, अब
क्या होगा?
मां : रो मत बेटी-कुछ नहीं होगा। जिसने चोंच दी है, वही चुग्गा भी देगा। मैं हूँ तो। तेरी माँ अभी जिन्दा है बेटी। (दोनों बेटियों को छाती से चिपका लेती है)
अन्तराल सूचक संगीत)
बचपन : अरे यह तो बहुत बुरा हुआ।
शिक्षा : हाँ किन्तु वो साहसी माँ घबराई नहीं। अलग-अलग तरह के काम कर बच्चों को बडा करती रही। इस प्रकार १० वर्ष
बीत गए। (मकान बनाने के काम
की ध्वनियाँ)
मां : बडी।
मां : बेटी कट्टे में आधी परात सीमेंट ला तो।
बडी : अभी लाई माँ।
मां : छोटी।
छोटी : हाँ माँ।
मां : एक परात बजरी ले आ बेटा।
छोटी : लाई माँ। अब तो बहुत थक गए।
मां : ले ये एक परात माल मिस्त्री जी को दे आ और उनसे पूछना अब और माल
चाहिये क्या ?
छोटी : माँ मिस्त्री जी ने कहा आज का काम खतम। चल माँ घर चल बहुत भूख
लगी है।
माँ : तुम यही ठहरो बेटी मैं ठेकेदार से मजदूरी लेकर आती हूँ।
ठेकेदार : आज तुम फिर काम पर देर से आई।
माँ : हम तो टाइम से ही आ गए थे।
ठेकेदार : बहस मत करो, लो। (उसके हाथ में पैसा पकडा देता है।)
माँ : (गिनकर) यह तो कम है।
ठेकेदार : तुम्हारी इतनी ही मजदूरी होती है।
मां : और बच्चों की?
ठेकेदार : बच्चों को काम पर रखना मना है।
मां : पर ये तो काम कर रहे थे।
ठेकेदार : अपनी मर्जी से। मैंने नहीं कहा था। अब जाओ। बहस मत करो।
(अन्तराल सूचक संगीत)
माँ:बडी! बेटी यह मशीन की सूई में धागा डाल दे। मुझे ठीक से दिख नहीं रहा है।
बेटी : अच्छा माँ।
माँ : और इन कमीजों के बटन टाँग दे।
बडी : अच्छा माँ।
माँ : अरे छोटी।
छोटी : हाँ माँ। (आती है)
माँ : हेड मास्टरनी जी के पास घर पर चली जाओ। कहना हमने यह दस ड्रेस तैयार कर दी है। दस शाम तक कर देंगे।
छोटी : अच्छा माँ।
(अन्तराल सूचक संगीत)
छोटी : मैडम जी! मैडम जी!
(प्रवेश कर)
हेडमास्टरनी : अरे छोटी। ड्रेस ले आई।
छोटी : जी मैडम जी। माँ ने कहा है दस अभी बना दी है, बाकी बाद में दे जाऊँगी।
हेडमास्टरनी : ठीक है। ठहर पैसे ले जा। यह ले।
छोटी : जी मैडम जी।
हेडमास्टरनी : छोटी तेरा रिजल्ट तो बहुत अच्छा आया है। अब आगे क्या करने का सोच
रही है?
छोटी : मेडिकल करना चाहती हूँ।
हेडमास्टरनी : ठीक है। मैं भी यही करने को कहती।
छोटी : लेकिन आप तो हमारे परिवार की स्थिति जानती हैं।
हेडमास्टरनी : बेटी वैसे अगर किसी सहायता की आवश्यकता हो तो मुझे बताना।
छोटी : धन्यवाद मैडमजी। वैसे भी माँ से कुछ भी कहो तो कहती है तुम चिन्ता क्यूँ करती हो मैं हूँ तो।
हेडमास्टरनी : बडी हिम्मतवाली है तुम्हारी माँ।
छोटी : हाँ मैडमजी। अच्छा नमस्ते।
हेडमास्टरनी : नमस्ते।
(अन्तराल सूचक संगीत)
(छोटी और बडी अलग-अलग बैठी पढ रही है)
बडी : छोटी तू अभी और पढेगी?
छोटी : हाँ दीदी।
बडी : माँ मुझे नींद आ रही है। मैं सोने जा
रही हूँ।
(भीतर से)
मां : ठीक है बेटी। वैसे भी रात बहुत हो
गई है।
(माँ का प्रवेश)
माँ : अरे छोटी तू अभी तक सोई नहीं। रात बहुत हो गई बेटा अब सो जा।
छोटी : माँ मुझे अभी कुछ और जरूरी पढाई करनी है। तुम सो जाओ। मैं सो जाऊँगी।
(संगीत)
बचपन : शिक्षा तुम ठीक कह रही हो, साहस और श्रम से सम्मानपूर्वक जीवन को जिया जा सकता है।
शिक्षा : जिया तो जा सकता है किन्तु यह इतना सहज नहीं है। अपने ही नहीं जीने देते।
(संगीत)
छोटी : (आवाज देकर) और कितनी देर है माँ।
मां : (भीतर से) अभी लाई बेटी।
बडी : थोडा सबर रख छोटी।
छोटी : आज इतनी ज्यादा मेहनत की है कि थकान और भूख के मारे बुरा हाल हो रहा है।
बडी : मानती हूँ। पर मां भी तो हमसे ज्यादा थकी हुई है। हम तो थोडी सी मदद कर, आकर बैठ गए पर वो तो अभी भी लगी ही हुई है।
छोटी : ओह। वास्तव में जीवन सहज नहीं-लो माँ आ गई।
माँ : आओ सब साथ बैठकर खाते हैं। ले छोटी मेरे हाथ से गस्सा।
(पीछे से ध्वनि आती है चील....चील....चील...)
छोटी-बडी : माँ चीले.....
छोटी : हमारे मुँह का ग्रास छीनना चाहती हैं।
माँ : चिन्ता ना कर बेटी मैं हूँ तो-ऐसे कैसे छीनने दूँगी। बडी मेहनत से कमायी है। ये डंडे उठाओ और भगाओ इनको। (हटो-भागो-ऐसे नहीं छीनने देंगे कि ध्वनियाँ निरन्तर आ रही है चील..चील..चील... चील...चील... ध्वनियाँ समाप्त होती हैं)
<br/><br/>माँ : आ जाओ बेटा। बिना संघर्ष किए ये दुष्ट हमारे हिस्से की रोटी भी नहीं खाने देते।
शिक्षा : समय का चक्र चलता रहा। दोनों बालिकाओं ने अब बचपन से निकल यौवन की दहलीज पर कदम रक्खा।
बचपन : सुन्दर तो दोनों थी हीं।
शिक्षा : यह सुन्दरता ही अब उनके लिए शाप बन गई। समाज के दरिन्दों ने उन्हें घेरना
शुरू किया।
(ध्वनि प्रवाह)
माँ : बेटी बाहर का दरवाजा अच्छे से बन्द करके आजा। बडी नींद आ रही है।
बडी : आ गई माँ।
मां : आओ सोते हैं।
(घडी की टिकटिक। फिर भेडियाऽऽऽ भेडियाऽऽऽ, भेडियाऽऽऽ की ध्वनि लगातार आती है।)
>छोटी : माँ भेडिये फिर आ गए।
मां : डरो मत बेटा-मेरा हँसिया ला तो। आओ कुत्तों एक-एक को काट डाँलूगी।
(भेडिया, भेडिया, भेडिया की गति बढती है साथ ही माँ की यह ले, आ इधर आ। तू भी आ। धीरे-धीरे ध्वनियाँ समाप्त होती हैं)
(शान्ति सूचक संगीत)
मां : आाओ सो जाओ बेटा। मैं हूँ तो।
(संगीत)
शिक्षा : वो साहसी माँ किसी भी स्थिति में नहीं घबराई। उनकी हिम्मत और बहादुरी से
मुकाबला करती रही। इस प्रकार २४ वर्ष व्यतीत हो गए और फिर एक दिन।
(ध्वनि प्रवाह कॉलेज का शोर)
छात्र : प्रिंसिपल साहब आ गए। प्रिंसिपल साहब आ गए।
प्रिंसिपल : स्टूडेन्ट्स, इस समय मैंने आप सबको यहाँ एक खुशखबरी देने के लिए बुलाया है। खुशखबरी यह है कि हमारे कॉलेज की एक छात्रा ने फाइनल परीक्षा में हाईऐस्ट मार्क स्कोर कर पुराने सारे रिकॉर्ड्स को तोडा है।
वो छात्रा है डॉक्टर छोटी। बधाई हो
डॉक्टर छोटी।
छोटी : थैंक यू सर।
>सब छात्र : बधाई हो डॉ. छोटी। बधाई हो। बधाई हो।
छोटी : थैंक यू, थैंक यू।
(ध्वनि प्रवाह। मरीजों का शोर। डाक्टरनी आ गई की ध्वनि)
छोटी : यह बुखार आपको कब से आ रहा है ?
मरीज : एक हफ्ते से।
छोटी : यह दवा आप अन्दर से ले लीजिए और आज कुछ हल्का ही खाइयेगा।
सिस्टर : दूसरा मरीज।
छोटी : क्या हुआ आपको ?
मरीज : पाँव में यहाँ चोट लग गई है।
छोटी : दिखाइये। हाँ। सिस्टर इनकी ड्रेसिंग कर दीजिए। जाइये।
छोटी : क्या हुआ ?
मरीज : रात से पेट में बहुत दर्द है।
छोटी : यह दवा मैंने लिख दी है। ले लीजिये।
सिस्टर : अब डिस्पेन्सरी का समय समाप्त हो गया। बाकी लोग शाम को आयें। कोई सीरियस मरीज तो नहीं है।
(ध्वनि प्रवाह)
शिक्षा : कुछ वर्ष और बीत गए। डॉ. छोटी और पढाई और तरक्की करती गई। माँ ने एक सुयोग्य वर देख बडी का विवाह कर दिया।
(शहनाई बजती है)
छोटी : माँ दीदी के जाने से घर-खाली हो गया।
माँ : हाँ बेटी। मैं तो अब बिल्कुल ही खाली हो गई हूँ। तू भी हॉस्पिटल चली जाती है। बस सारा दिन मैं और नौकरानी रह जाते हैं।
छोटी : इसकी तो तुम्हें आदत डालनी होगी माँ, अब कुछ दिनों बाद मैं भी चली जाऊँगी।
माँ : अरे अब तू कहाँ जायेगी।
छोटी : क्यों क्या मैं ब्याह नहीं करूँगी ?
मां : अरे हाँ। यह तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा।
छोटी : देख माँ। दीदी का ब्याह हो गया। घर भी मैंने सारा ठीक करवा दो हिस्से कर दिए है। एक में किरायेदार और दूसरे में तुम। विपिन के घर वाले भी अब शादी का दबाव डाल रहे हैं।
मां : जैसा तू ठीक समझे।
छोटी : माँ विपिन तो चाहते हैं कि हमारे विवाह के बाद तुम भी हमारे साथ ही रहो। किन्तु मैंने ही मना कर दिया। मैं जानती हूँ तुम्हारी जैसी स्वाभिमानी माँ यह कभी नहीं चाहेगी। इसलिए मैंने तुम्हारा सब इन्तजाम कर दिया है। अच्छा मां मैं हाथ-मुँह धो आऊँ ।
मां : (अपने आप से) अब तू भी चली जायेगी। छोटी। तो मैं....
सुन्दरलाल : (प्रवेश कर) क्या मैं अन्दर आ जाऊँ ?
(माँ पलट कर देखती है फिर आश्चर्य से)
मां : अरे कौन? आप। आज इतने सालों बाद याद आई हमारी या यह देखने आए हो कि हम जिन्दा हैं या मर गए ?
सुन्दरलाल : ऐसा नही है बडी की माँ।
मां : फिर कैसा है ?
सुन्दरलाल : मेरी बात तो सुनो।
मां : अब कहने सुनने को रह ही क्या गया है। मैंने तो इतने बरस करवा चौथ का व्रत कर करके एक विधवा की तरह काट लिए। लेकिन वो बच्ची, जिसे तुम मार रहे थे और जिसने तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखी, तुम्हें इस घर में कभी स्वीकार नहीं करेगी। इससे पहले कि वो आए और तुम्हें बेइज्जत कर निकाले चले जाओ यहाँ से।
सुन्दरलाल : लेकिन ?
मां : मैं तुम्हारे हाथ जोडती हूँ जाओ। चले जाओ यहां से। चले जाओ।
सुन्दरलाल : जाता हूँ।
(सुन्दरलाल उदास रूँआसा धीरे-धीरे जाने के लिए मुडता है)
छोटी : बापू
सुन्दरलाल : बेटी।
(सुन्दरलाल घूमकर अपनी बेटी को
देखता है। छोटी भाग कर बाप के गले लग जाती है। दोनों रो रहे हैं।
(ध्वनि प्रवाह)
शिक्षा : इस तरह उस बहादुर मां ने जो खुद
भी कभी बेटी थी। अपने साहस, समझदारी और मेहनत से सारी स्थिति को
सँवार दिया।
बचपन : यह तो बहुत अच्छी कहानी सुनाई तुमने। यह सीख सब को ग्रहण करनी चाहिए। चलो। चलें। ?
(हल्की ध्वनि-इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना)
४/१, जवाहर नगर, जयपुर मो. ८२३३१००७४७