गगन मंडल में औंधा कुँआ ( यात्रा वृत्तान्त)

डॉ. राजेश कुमार व्यास


साहित्य अकादमी से दूरभाष पर नूंत आती हैं, ‘अकादेमी ने इस बार उत्तरपूर्वी एवं उत्तर लेखक सम्मेलन का दो दिवसीय आयोजन गोरखपुर में किया है। इसमें आपको कविता पाठ करना है। आप स्वीकृति भेजिए ताकि बाकी सभी व्यवस्थाएँ की जा सके।’ अंधा क्या चाहे? दो आँखें। जयपुर से दिल्ली और फिर दिल्ली से लखनऊ तक की हवाई यात्रा के बाद गोरखपुर के लिए ट्रेन या फिर बस ही साधन है। ट्रेन में पहले से आरक्षण करवा लिया था सो दिक्कत नहीं हुई।
आयोजन स्थल पर असम, मणीपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल से आए लेखकों संग बतियाया तो शीन काफ निजाम साहब और गोविन्द मिश्र से यात्राओं और उनके लिखे पर निरंतर संवाद भी होता रहा। उन्होंने कुछ समय पहले तिस्ता यात्रा की चर्चा छेडी तो गंगटोक से की देहरादून और नेपाल बॉर्डर तक की यात्रा जेहन में फिर से ताजा हो गई। बुद्ध महापरिनिर्वाण स्थल कुशीनगर जाने की चाह थी पर राह नहीं मिल रही थी। वहीं गोरखपुर विश्वविद्यालय में छायाकार मित्र फिरोज से टैक्सी कराने को कहा तो उसने मेरी बात हवा में उडा दी। कहा, ‘क्यों टैक्सी में पैसे बर्बाद करते हैं। बस पकडिये, आराम से पहुँचा देगी।’ माना नहीं और टैक्सी कर लेता हूँ।
ड्राईवर दूसरे दिन सुबह होटल से लेने का कहता है पर आता ही नहीं। पता चलता है, उसे कोई और दूर की तगडी सवारी मिल गई सो वहाँ चला गया। दूसरी टैक्सी कराने को कहता है तो डपटकर मना कर देता हूँ। सार्वजनिक परिवहन की बस पकडता हूँ। फिरोज बहुत याद आता है, कुशीनगर बस से ही जो जा रहा हूँ। हिचकोले खाती बस गोरखपुर शहर को तेजी से छोडती मिलिट्री ऐरिया में वार मेमोरियल क्षेत्र से आगे पहुँच गई है। औचक खिडकी से बाहर देखता हूँ, सघन पेडों का झुरमुट। जहाँ तक निगाह जाए, पेड ही पेड। सिकुडी सडक पर उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस और दोनों और इसी तरह पेडों का झुरमुट।
गोरखपुर से जब चला था तब इस तरह के दृश्य की मन में कल्पना नहीं थी। एक के साथ एक आसमान छूने की होड में खडे पेड। कुछ देर तक बस पेडों के उस सघन जंगल के बीच से ही गुजरती रही पर यह कुछ
समय का ही सुकून था। थोडे अंतराल में यह दृश्य लोप हो गया। खिडकी से खेत और घास-फूस के छप्पर की बनी दुकानें नजर आने लगीं।...बंजर जमीन और कुछ-कुछ दर में कुछ पक्का निमार्ण कार्य भी चल रहा है। बिल्डरों के विज्ञापन। एक जगह बोर्ड लगा है, ‘प्लॉट बिकाऊ है।’ पेड यहाँ पूरी तरह से नदारद। यह हरितिमा को रौंद कॉक्रीट के जंगल का आगाज है। पहले देखे पेडों का झुरमुट शायद इसलिए बच गया कि वह वन क्षेत्र था। वन क्षेत्र का आवासीय रूपान्तरण नहीं हो सकता पर खेतों का आवास परिवर्तन कौन रोके? सही है, आबादी बढ गयी है-रहने को जमीन कम पड रही है परन्तु इससे भी बडा सच यह है कि हरियाली लीलने फायदे का निवेश जमीनों में ही दिखाया जा रहा है। पैसो की माया जमीनों की काया नोंचने में लगी है। कृषि भूमि इसी तेजी से आवासीय में रूपान्तरित होती जा रही है। देखता हूँ, खेत हैं परन्तु रूखे-सूखे। आवासीय प्रयोजन से बिकने को तैयार। मन बुझ जाता है।
सुबह गोरखपुर में ओलावृष्टि की आपदा से फसलों की खराबी के समाचार ही अखबारों में पढे थे परन्तु खेतों की जमीन पर ‘प्लॉट बिकाऊ ’ की आपदा तो इससे भी भारी है। प्रकृति से भारी कोप तो मनुष्य का है। उसे तो अपनी पैसा उगाती बाँसुरी की पडी है, बांस से उसे क्या! बाँस नहीं रहे तो न रहे, अभी तो बाँसुरी बज ही रही है। यह बाँसुरी नहीं बजेगी तो कुछ और बजा लेंगे। सोचते-सोचते घबराहट बढ जाती है। कबूतर की तरह आँखे मूँद विचार के उगे इस संकट पर बस झटका खाती है तो आँखे खोल सडक की ओर देखता हूँ। चौडी फोरलेन की सडक। हम हाईवे पर हैं। यह मार्ग बिहार होते हुए दूर आसाम की ओर जाता है। उत्तर से उत्तरपूर्व की ओर।
देखता हूँ, बस की अपनी अलग दुनिया है। मेरे सामने की सीट पर कोई सालेक भर का बच्चा अपनी माँ की गोद में खडा खिडकी के पार झाँक रहा है। तेजी से भागते पेडों, साथ चलती कारों, ट्रकों को कभी आगे तो
कभी पीछे छूटते देख वह अचरज से किलकिला रहा है। उसके उडते बाल, कौतुक भरी मासूम निगाहें और माँ की गोद में पूर्ण सुरक्षा का संतुष्ट भाव आनंदित करने वाला है। कुछ देर उसको खिडकी से पार भागते दृश्यों का आनंद लेते देख खुद भी आनन्दित होता हूँ। औचक बस रुकती है। लपककर एक लडका चढ जाता है। पीछे-पीछे एक लडकी भी है। दोनों विद्यार्थी लग रहे हैं। सोचता हूँ, कॉलेज से शायद घर लौट रहे हैं। धीरे हुई बस फिर से भागने लगी। मन में विचार आया, टैक्सी करता तो सफर यूँ आबाद होता? मन यूं रंजित होता?
बस में निगाह दौडता हूँ। कोई ऊँघ रहा है, कोई मोबाईल से गीत सुन रहा है तो कोई दीन-दुनिया से दूर अपने सहयात्री से बात में मशगूल है। सफर की यह अलग ही दुनिया है। चेहरे जाने-पहचाने से लगते हैं पर सबके सब अनजाने। खिडकी के पार निगाह जाती है, चौंकता हूँ। दाहिने ओर खेत पर बौने पेडों का समूह। शाखाओं में फैले हुए पर बैठे हुए। ऊँचाई नदारद। तना रहित हरे पेड। ऐसे जैसे परस्पर बतिया रहे हों। प्रकृति की अदृश्य कृतियाँ! ऐसे पेड पहले कहाँ देखे? देखता हूँ, यहाँ ऐसे ही पेड हैं। दूर खेतों में अंतराल अंतराल में पेडों ने मिल अपने समूह जैसे बना रखे हैं-बतियाने के लिए। बस रुक गई है।
‘लो कुशीनगर आ गया। आपको यहीं उतरना हैं। कहते हुए बस कंडक्टर मेरी ओर मुडता है। मैं ठीक उसके पीछे की सीट पर बैठा हूँ। अपना बैग संभालते हुए उतरकर सडक के दाहिने ओर उस पार कुशीनगर की ओर जाती सडक की ओर हो लेता हूँ।
कुशीनगर नहीं, बुद्धकाल का कुशीनारा। महापरिनिर्वाण स्थल पर पहुँच जैसे म बुद्ध के काल में प्रवेश कर गया। शांत लेटे हैं बुद्ध। उनकी लेटी मुद्रा पर स्वर्णाभूषण सरीखा वस्त्र ओढा रखा है। कहते हैं, महापरिनिर्वाण के बाद मल्ल की स्त्री मल्लिका ने अपने महालता-प्रसाधन को उनके शरीर पर ओढा दिया था। यहाँ
पीतल की बुद्ध प्रतिमा में भी उस परम्परा का जैसे निरंतर निर्वहन किया जा रहा है।
देखता हूँ, कुछ बौद्ध भिक्षु शांत लेटी बुद्ध प्रतिमा के पास बैठे हैं। उनके चेहरों पर ओज है, पर बुद्ध के नहीं होने का शोक भाव भी है। कुछ देर उनसे संवाद होता है। बौद्ध धर्म के चार महातीर्थों में कुशीनगर प्रमुख है। बुद्ध का महापरिनिर्वाण बैशाख पूर्णिमा को प्रातः हुआ। मल्लों ने सप्ताह भर उनके शरीर की पूजा की। इसके बाद सप्ताह भर चिता जलती रही। इसके बाद संस्थागार में धातुओं को रखकर उनकी पूजा की गई। इक्कीस दिन बाद ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को धातुओं का बँटवरा हुआ। सम्राट अशोक बाद में जब कुशीनगर आए और उन्हें पता चला कि यहीं भगवान का महापरिनिर्वाण स्थल है तों वह बेहोश हो गए। एक लाख मुद्रा देकर बाद में उन्हने यहाँ यह चैत्य बनवाया।
बुद्ध की शांत लेटी प्रतिमा स्थल के बाहर वह स्तूप ही मेरी आँखों के सामने हैं। चीन, जापान, जावा, सुमात्रा, बर्मा, तिब्बत, नेपाल, अरब, आदि देशों से भिक्षु-भिक्षुणी ही नहीं श्रृद्धालु भी यहाँ निरन्तर आते है। देखता हूँ, महापरिनिर्वाण स्थल पर आने वालों का ताँता लगा हुआ है। ऐसे भी हैं जो पर्यटन की चाह से यहां आए हैं पर बहुत से श्रद्धालु और भिक्षु-भिक्षुणी हैं। शाल वृक्षों से घिरे चैत्य स्थल के पास अभी भी बहुत सारे टीले सरीखे खुदाई अवशेष हैं। पुरानी ईंटें गवाही दे रही हैं, बुद्ध के काल की। एक बडा सा घंटा भी है, लिपि में कुछ लिखा हुआ है पर समझ नहीं आता। यहाँ इस स्थल पर बुद्ध का कहन, उनका बुद्धत्व ही मन में कौंध रहा है।
निर्वाण! माने बुझना। दीप या आग का जलते-जलते बुझ जाना। अंधकार। प्रकाश से अंधेरे का वरण। पर बुद्ध ने निर्वाण उस अवस्था को कहा है, जहाँ तृष्णा क्षीण हो गई। बुद्ध तो जीतेजी तृष्णा से परे थे।...बुद्ध के उपदेशों से प्रेरित हो कभी हर कोई भिक्षु बनने लगा था। दरिद्रता-दासता से मुक्ति दिलाने की चाह जरूर बुद्ध को
थी, पर आग्रह नहीं। यह वह समय था जब कर्ज देने वाले ऋणी बोद्ध भिक्षु बनने लगे। महाजनों ने बुद्ध से इसकी शिकायत की। विरोध को देखते बुद्ध ने तभी घोषणा की, ‘ऋणी को प्रवज्या नही देनी चाहिए।’
ऐसे ही दासों के लिए भिक्षु बनने का मार्ग खुलता दिखा तो स्वामी नाराज हो गये। बुद्ध ने कहा ‘दासों को प्रवज्या नहीं देनी चाहिए।’ सच! बुद्ध का अर्थ ही है परिवर्तन को स्वीकारते आगे बढना। जगत, मनुष्य, समाज को उन्होंने क्षण क्षण परिवर्तित घोषित किया। बुद्ध ने जो किया उसे अनुभव में पहले जिया। बुद्ध ऐसे ही नहीं बनते।
बुद्ध माने जाग्रत। चैतन्य। ओशो का लिखा याद आता है, ‘बुद्ध की मूर्तियाँ कुंजियाँ हैं। तुम्हारे भीतर कई ताले खुल जाएगें। गौर से देखते-देखते तुम्हारे भीतर कोई चाबी लग जाएगी, कोई द्वार अचानक खुल जाएगा।’ सच है, यह बुद्ध का ही स्वरूप, उनको मन में अनुभूत करने की चेतना है कि उजास में बहुत कुछ सूझता है। औचक मथने लगता है मन।
कुशीनगर में अज्ञेय की भी याद आती है। यहीं पुरातत्व शिविर में ही तो वह पैदा हुए थे। मुझे लगता है, यह इस धरा की ही विशेषता है कि यहाँ आत्म की खोज में लीन होता है मन। अज्ञेय का तमाम लिखा आत्म की खोज सरीखा ही तो है। याद आता है बरसों पहले अज्ञेय पर बने वृत्तचित्र का वह दृश्य जिसमें सूर्य उग रहा है। उसकी प्रथम किरण महापरिनिर्वाण स्थल पर पडती है और फिर वह महापरिनिर्वाण स्थल के सामने खडे अज्ञेय को आलोकित करती सदा के लिए जैसे हम में बस जाती है। मन में आता है, सच में यह स्थल अलौकिक है।
कहीं पढा हुआ याद आता है, चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ईसवी सन् ६४३ में कुशीनगर पहुंचा था। कुशीनगर के अपने यात्रा-वृत्त में वह लिखता है, ‘प्राचीन ईंटों की दीवारें, जिनकी केवल नींव बाकी रह गई हैं।...नगर में निवासी बहुत थोडे हैं। मुहल्ले उजाड और खंडहर हो गए
हैं। नगर के द्वार के पूर्वोततर वाले कोने में एक स्तूप अशोक राजा का बनवाया हुआ है। उस पार, शाल वृक्ष है। ईंटों से बना हुआ एक विहार है। इसके भीतर सोते हुए पुरुष के समान उत्तर दिशा में सिर करके भगवान लेटे हैं।’ इतिहास के वातायन से पता चलता है, तेरहवीं सदी में कुशीनगर राख कर दिया गया था धन और सोने-चाँदी की मूर्तियाँ लूट ली गई थी और वहाँ रहने वाले भिक्खु भी तलवार के घाट उतार दिए गए थे। सन् १८६१ ईसवी में जनरल ए. कनिंघम ऐतिहासिक स्थानों की खोज करते हुए यहाँ आए थे। उन्हीं से बुद्ध और कुशीनगर के नाते से दुनिया फिर से इस स्थान से जुडी।
लौटते हुए फिर से एक बार महापरिनिर्वाण स्थल पर शांत लेटे बुद्ध का दर्शन कर आता हूँ। वहाँ शांति को गुनते मन में विचार आता है, यह वापसी नहीं है। आत्म की खोज है। यहाँ आया तभी तो बुद्ध के जरिए अपने आपको जानने की राह पा सका। नमन भगवान बुद्ध! नमन।
आज का गोरखपुर राप्ती और रोहिणी नदियों का जहाँ संगम होता है, वहीं बसा है। तय यही किया है कि कविता पाठ के अपने सत्र के बाद चुपचाप निकल जाऊँगा गोरखनाथ मंदिर। पर निकलते-निकलते बहुत देर हो गई। गोरखनाथ या फिर गोरक्षनाथ! सिद्ध योगी, औघड। अवधूत।...और भी बहुत सारी संज्ञाएँ उनकी हैं। यही सब सोच रहा हूँ कि मन में खयाल आया, बेतहाशा भीड मंदिर में है फिर भी और स्थानों की जल्दबाजी नहीं है। मंदिर नहीं मंदिरों का समूह। लोग आ-जा रहे हैं परन्तु लगता है, शांति यहाँ के परिवेश का हिस्सा है। इसीलिए भीड की गहमागहमी, रेलमपेल की अनुभूति यहाँ नहीं होती।
मुख्य मंदिर में प्रवेश करता हूँ...कोई ताम-झाम नहीं। गोरखनाथजी की ओजमयी मूर्ति। चमत्कृत करने वाला तेज! वहीं बैठ जाता हूँ। बहुत से विचारों में उलझा रहने वाला थका मन जैसे यहाँ विश्राम करना चाहता है। औचक अनुभूत होता हैं...ओजमय मूर्ति के दर्शन मात्र से
मन की सारी थकान कहीं दूर चली गई है। हल्का...बहुत हल्का हो गया है तन...और मन भी। साक्षात् शिव ही तो हैं भगवान गोरखनाथ।...मंदिर में बैठे गौर करता हूँ, दीवारों पर गोरखवाणी लिखी हैः ‘गगन मंडल में औंधा कुआँ, जहाँ अमृत का वासा।’ वाणियाँ और भी है, ‘पवन ही जोग, पवन ही भोग, पवन इ हरै छतीसौ रोग या पवन जाणे भव, सो आपे करता, आपै देव।’
नाथ योगी गोरखनाथ ने भारत भर में भ्रमण किया। ग्रंथ दर ग्रंथ लिखे। सबदी, पद, महादेव गोरखगुष्टि, शिष्ट पुराण, चौबीस सिध, जाति भोरांवली, निरंजन पुराण और भी बहुत सारे ग्रंथों की रचना उन्होंने की। अंग क्रिया योग अर्थात् तप और स्वाध्याय के साथ तन और मन को बस में करने की सीख किसी ने दी तो वह गोरखनाथजी ने ही दी। चौरासी सिद्धों में प्रमुख हैं गोरखनाथ। अपने लिखे में एक स्थान पर वह कहते हैं, सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि माने समाधि से भी मुक्ति। शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना। इसीलिए तो गोरखनाथ प्रणीत हठयोग कुदरत के नियमों से भी व्यक्ति को मुक्त करता उजास से भरने वाला है।
कहते हैं, मध्यकाल में गोरखपुर गोरक्षनाथजी के नाम पर ही बसा। नेपाल में भी एक नगर गोरखा नाम से जाना जाता है। मंदिर में मिला एक गोरखे से जानकारी मिलती है, अदृश्य गोरखनाथ सबसे पहले वहीं दिखे थे। गोरखनाथजी को अपना गुरु मानते हैं, गोरखा।...मंदिर में बैठे गुरु गोरखनाथजी से जुडी पढी-सुनी और भी बातें मन याद कर रहा है। बहुश्रुत ‘जाग गोरखनाथजी अपने गुरू मच्छेन्द्र नाथजी को सांसारिक बंधनों में फँसे देख मुक्त कराने त्रिया राज्य पहुँचते हैं।
‘अलख निरंजन’, ‘जय बाबा गोरखनाथ’...समूह स्वर सुनकर चौंकता हूँ। देखता हूँ, नाथ संप्रदाय के बहुत सारे साधु गोरखनाथ प्रतिमा को सिर नवा रहे हैं। घडी देखता हूँ, मुझे प्रतिमा के सामने बैठे घंटे भर से अधिक हो
गया था।...उठ कर मंदिर के बाहर आता हूँ। मंदिर परिसर में और भी बहुत सारे मंदिर बने हुए है।
मुख्य मंदिर के पास फिर से पहुँच सामने ही बने बडे कुण्डनुमा सरोवर समीप बैठ जाता हूँ। सरोवर के पानी में पैर डाल देता हूँ...मेरी ही तरह देशभर से भाँत-भाँत के आए लोग यहां बैठे है। घने पेड, शीतल मंद बहती पवन और अंतराल अंतराल में बजती घंटियों का नाद यहाँ अद्भुत् सुकून दे रहा है। कुछ देर वहीं रुक फिर पास स्थित राम-सीता, भगवान शिव और देवी दुर्गा के मंदिर जाता हूँ।
गोरखनाथजी की धूनी में अनवरत जलती जोत और पास में ही उनके शिष्यों के बने मंदिरों से नाथ परम्परा के बारे में पता चलता है। परिसर में विचरते ही एक मंदिर में भीमकाय लेटी प्रतिमा को देख वहीं रुक जाता हूँ। पता चलता है, भीमकाय नहीं, स्वयं भीम ही मंदिर में लेटे हैं।
मूँछ वाले गठीले शरीर वाले भीम। मंदिर के बाहर लगा बोर्ड बताता है, महाभारत काल में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का निमंत्रण देने उनके छोटे भाई भीम स्वयं यहां गोरखनाथजी के पास आए थे। गोरखनाथजी चूंकि उस समय समाधिस्थ थे, भीम को उनका इन्तजार करना पडा। कई दिन भीम ने तब यहाँ विश्राम किया। उनकी विशाल लेटी प्रतिमा उनके विश्राम की निशानी है।...
गोरखनाथजी से जुडी कथाएँ और भी यहाँ आने वाले तीर्थ यात्रियों से, साधु-संतों से सुनता हूँ। मन करता है, वहीं रुका रहूँ पर सांसारिक कार्यों में बँधा यह मन कैसे यह करे! लौट पडता हूँ। तेज भागते वाहनों, रेलम-पेल की सडक पर हूँ, मुडकर फिर से देखता हूँ... गुरु गोरखनाथजी के मंदिर की अलौकिक आभा को। नमन करता हूँ, उस पवित्र शांति को जिसे कुछ समय पहले तक अनुभूत किया था, मन कह रहा है, ‘जाग मन, अब तो गोरख हो आया।’ ?
३/३९, गाँधीनगर, न्याय पथ, जयपुर-३०२०१५ (राज.)
मो. ९४६१५००२०४