वे कुओं के घाट (शब्द चित्र )

रामानंद राठी


‘‘अंतरिक्ष में उत्पन्न होने वाले जल, नदी में बहाकर या कुएँ में खोदकर निकाले गए जल और समुद्र की ओर जाते हुए जल-यह सब हमारी रक्षा करें।...’’
‘‘जल प्रार्थनाओं को सुनता है। जल इन्द्र को संतुष्ट करता है। हे स्तोताओ! इन्द्र के आने के लिए अश्वों को योजित करो।...’’
वैदिक देवताओं की स्तुति में कहे गए ऋग्वेद के इन सूक्तों को गूँती गाँव की इस अनपढ स्त्री ने अपने दाहिनी ओर एक स्वस्तिक का चिन्ह तथा बायीं दिशा में एक छाबडी का रेखांकन बनाकर लालवाला नामक जलकूप के जसोदा घाट पर अभिव्यक्त किया। तिल और चावल की मिलीजुली ढेरियाँ भी उसने कृषि-कार्य में कुओं की महिमा को प्रकट करने के लिए लालवाला की पाल पर बनाई।
रोली की सुर्ख आभा में चमकते इन मांगलिक प्रतीकों के आगे अब ज्यों ही इस युवा प्रसूतिका ने दोनों हाथ जोडकर धोक लगाई, रंग-बिरंगे परिधानों में सजे महिलाओं के समूह ने कुआँ-पूजन के पारंपरिक गीतों से वातावरण को गूँजा दिया। नवजात शिशु की धन-धान्यपूर्ण भावी *ांदगी का इस गाँव में यह प्रथम सार्वजनिक अभिनंदन है।
एक कुआँ वास्तव में मानव-जीवन की नदी-निर्मुक्त सभ्यता का केंद्र तथा रोजमर्रा की जल-आपूर्ति का सामुदायिक स्रोत है। कुएँ का आशीर्वाद पाकर गूँती गाँव की यह प्रसूतिका यूँ आज अपने घर-परिवार के माँगलिक कार्यों में शरीक होने के लिए पुनः परिशुद्ध हुई।
कृषि-व्यवस्था पर आधारित गाँव-देहात का असली स्वरूप वस्तुतः कुएँ के जल में ही प्रतिबिंबित होता है। बढई, लुहार, चर्मकार आदि गाँव के कारदारों को पहले प्रति कुआँ प्रति वर्ष एक या दो मन अनाज नियमित देने की परिपाटी थी। कुएँ को अर्थ-विस्तार के साथ पौराणिक आख्यानों में कुंभ भी कहा गया है। राठ जनपद के गाँवों में कुएँ को इसीलिए भूजल के अधीश्वर की नाईं पूजा जाता है। इस अंचल की माँएँ कुएँ के माहात्म्य को अपने बच्चों के भावी जीवन के साथ एक दिशा-सूचक की तरह जोड देती हैं। कुआँ पूजने जाती स्त्रियों के विह्वल कंठों से निकले एक जलवा-गीत का
भावार्थ है-‘‘जिस तरह इस कुएँ का जल मेरे रक्त और दूध म मिलकर आज तुम्हारा पोषण कर रहा है, तुम बडे होकर धरती माता और जीव-सृष्टि का इसी तरह पोषण करना...।’’
स्यामीवाला, लालवाला, बागवाला, डोलवाला, अजमेरियावाला, बैलवाला, देशवाला, हाट्याला, ईसबखाँवाला, भाईखाँवाला, काथवाला...यह तमामतर नाम गूँती के उन कुओं के हैं जो आजादी से पूर्व इस गाँव में मौजूद थे और यहाँ के जन-जीवन तथा कृषि-व्यवस्था के आधार कहे जाते थे। कुओं की इस फर्द में गाँव के सीताराम मंदिर की उस कुईं का जिक्र शामिल नहीं है जिसे बाबा चितरदास ने इस गाँव की दागबेल कायम होने से पूर्व यहाँ खुदवाया था। पलेवा पत्थर की एक विशालकाय चट्टान को काटकर खोदा गया यह कुआँ घेर में कुछ संकरा होने की वजह से गाँव की बोल-चाल में कूडी या कुईं कहलाता है-सीताराम मंदिर की कुईं। पत्थर की एक ऐसी ही सख्त पसली को काटकर पठान समद खाँ ने भी एक कुईं बहुत पहले हिंदुओं के श्मशान घाट के निकट खुदवाई थी, जो आज समद कुईं के नाम से पहचानी जाती है। गाँव के डेढलीक मोहल्ले में उस जमाने की मशहूर ईदगाह तथा कई अन्य छोटी मस्जिदों के करीब वजू की कुइयाँ रहा करती थीं, जो अब भूमिगत जल के सूख जाने से गुमनाम खंडहर बनकर रह गई है।
‘‘इस भुरभुरी माटोड के नीचे मीठे पानी की सुरसती बह रही है। तुम इसी माटोड पर अपना कुआँ खुदवाओ’’, सूँघा बूझागर ने जब खेत के ऊगूणी पृष्ठ की एक टेकरी को भली-भाँति सूँघकर दोनों हाथों से थपथपाया तो ढाइसेरिया का दिल एकाएक बल्लियों उछलने लगा। खेत के आरपार बहते चाँदी के धोरे की उस कल्पना ने ढाइसेरिया की आँखों में भविष्य का एक उज्ज्वल चित्र खींच दिया था। पंडित जी के पतरे से एक बार इस बूझावण की थली-ताईद करवा ले तो फिर न्योरतों के सिद्ध मुहूर्त में चव्वा काटने का काम जल्द शुरू हो सकता है।
पडोस के पटियाली गाँव में एक बार किसी खेतिहर ने पंडित जी की बिना रजामंदी के चव्वा काट दिया था। बाद में कोठी के फर्मों को जमाते समय इस अवज्ञा का खामियाजा एक निर्दोष कारीगर को अपनी जान देकर भुगतना पडा। फर्मों का यह आकस्मिक झोक तो कहते हैं एक बहाना भर था, पंडित जी ने पहले ही पतरे में देखकर बता दिया था कि यह निरकरदा कूप एक आदमी का भख माँग रहा है। इसे मत खोदना। लेकिन सींच के लालच में फँसा वह संट्ठ आसामी अपनी बुद्धि दे बैठा। कुआँ तो ठप्प हुआ ही, गाँव-बिरादरी के बीच उस संट्ठ की थू-थू भी खूब हुई थी।
ढाइसेरिया ने गुड-पताशा बाँटने की इस शुभकारक घडी में उस अमंगल घटना को बेबात याद करने लिए अपने कान पकडे और सूँघा बूझागर को एक पंसेरी अनाज व एक रुपया नकद देकर खेत से विदा किया।
कुओं के जल से सिंचित गूँती गाँव की चौगरदा सींव कभी अलवर रियासत के कस्टमियों-कारिंदों से बहेद संत्रस्त रहा करती थी। काथवाला के डहर की बगल में एक बैलगाडी के रास्ते को लाँघकर अलवर रियासत की चौकी पडती थी और इस चौकी से थोडा आगे निकलते ही पटियाला राज्य की सीमा प्रारंभ हो जाती थी। न्यामतपुर-मोरूँड की ओर जाने वाले इस कच्चे सेर से यदि कोई गूँतीवासी अपना पशु भी पटियाला की सीमा में लेकर जाता था तो उसे भी शुल्क की पर्ची कटवानी पडती थी। यह नयी-नयी पटियाली आड यूँ तो कभी नारनौल के नवाबी हल्के की पक्की लकीर हुआ करती थी लेकिन १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में नारनौल की पराजय के बाद यह इलाका पटियाला के महाराजा महेन्द्रसिंह को मिल गया था। महेन्द्र सिंह की पटियाला इन्फैंट्री ने इस युद्ध में फिरंगी सेना के कमांडर कर्नल गेरार्ड का साथ दिया था, लिहाजा गूँती के खेत अब नारनौल की बजाय सीधे पटियाला राज्य से जा लगे थे। यह सीमा-विवाद कुछ वर्षों बाद इतना उग्र एवं जटिल हो उठा था कि वर्ष १८७४-७५
में लैफ्टीनेंट मैसी, सहायक आयुक्त, पंजाब को इस मामले में हस्तक्षेप करना पडा था। अलवर तथा पटियाला रियासतों की हदों को बाद में इसी अंग्रेज अधिकारी ने अंतिम रूप से पुनर्परिभाषित किया।
काथवाला का पानी अलबत्ता पटियाला के पैगखोरों की मुफ्त सेवा के लिए अब भी विवादित सीमा-चौकी के उस पार बेरोक-टोक ले जाया जाता रहा। जिगर और तिल्ली संबंधी रोगों की चिकित्सा के लिए इस कुएँ का पानी एक अचूक औषधि था। कुएँ की कच्ची दीवारों में कुछ पेड-पौधे उगे हुए थे जिनकी लंबी-लंबी जडें पानी तक पहुँचती थी। कहा जाता है कि इन जडों का मिलाजुला कस ही काथवाला के चमत्कारिक औषधीय गुणों की वजह था।
झुँडों, झाड-झंखाड एवं हरी-भरी घास के गलीचों से पैबस्त गूँती की सींव का दक्षिणी हिस्सा सोता के प्रवाह-क्षेत्र से बँधा हुआ था। सोता के ढावों के आसपास कुओं की गहराई उस समय पाँच-छह फीट से अधिक नहीं होती थी। सोता के डहर में गाय-भैंस चराने का लंबा तजुर्बा रखने वाले छियासी वर्षीय भगतजी मीणा बताते हैं-‘‘प्यास लगने पर हम सभी ग्वालिए हाथों से एक-डेढ फुट ऊँडा ढाबडा खोद लेते थे और यह ढाब थोडी ही देर में पानी से भर जाता था। निथर कर साफ हो जाने पर हम लोग इस पानी से अपनी प्यास बुझा लेते थे।’’
भूजल के भूमि-सतह से इतना करीब होते हुए भी गूँती की खेती-बाडी को कभी दलदल के अभिशाप अथवा क्षार संबंधी समस्या का सामना नहीं करना पडा। सोता के निकटवर्ती कुओं पर तो इन दिनों रँहट अथवा ढेंकली की सहायता से ही सिचाई होती थी। बारिश के चार महीनों में सोता का पाट कभी उजलते-उमगते किनारों तक फैल जाता और कभी पतली-सी धार के रूप में बहने लगता। गर्मियों के दिनों में सूखे पाट से होकर जयपुर राज्य में जाने के लिए बजरी और बालू रेत से भरा हुआ एक कच्चा रास्ता खुल जाता था। पहियों पर आवागमन के इस एकमात्र
रास्ते पर १८५९ ई. में अलवर रियासत की ओर से किए गए सुरक्षा के कडे इंतजामात गूँती गाँव के इतिहास में एक अलग ही महत्त्व रखते हैं।
कुँवर श्योदानसिंह की वर्ष १८५७ में अलवर के शासक के रूप में ताजपोशी तथा दिल्ली के दीवान एवं स्थानीय राजपूत सरदारों के बीच महीनों तक चली टकराहट के बाद अंततः नवंबर १८५८ में ब्रिटिश सरकार ने कैप्टन इम्पे को इस रियासत का राजनयिक दूत बनाकर भेजा। इस अधिकारी के समय में जारी हुई प्रमुख मार्गों की सूची तथा इन मार्गों की सुरक्षा हेतु तैनात किए गए कर्मचारियों की अधिकृत संख्या बताती है कि गूँती (अलवर) तथा कोटपूतली (जयपुर) के बीच पहियों पर आवागमन का एक कच्चा रास्ता सोता के सूखे पाट से होकर चिह्नित किया गया था, जिसकी चौकसी हेतु गूँती की चौकी पर अलवर का एक जमादार तथा सात चौकीदार नियुक्त रहा करते थे। इसी तरह पटियाला के रास्ते पर भी एक चौकी थी जहाँ ठीक जयपुर के प्रवेश-द्वार की भाँति आठ कर्मचारियों का अमला दिन-रात नजर रखता था। सुरक्षा एवं शुल्क वसूली के काम में लगे जमादार का वेतन सात रुपए मासिक तथा चौकीदारों को चार-चार रुपए प्रतिमाह मिलते थे। इम्पे का यह पद वर्ष १८६३ के अंत में खत्म कर दिया गया था।
कैप्टन इम्पे के वापस जाते ही नले-नाखलों से भरी गूँती गाँव की इस दक्षिणवर्ती सीमा पर पुराने झगडे-टंटों का बंद पिटारा एक बार फिर खुल गया। दावों-प्रतिदावों के अंतहीन बवंडर से पार पाने के लिए अलवर एवं जयपुर रियासतों के बीच एक सर्वमान्य सीमारेखा का निर्धारण अंततः वर्ष १८६९ से लेकर १८७२ तक कैप्टन अब्बोट द्वारा किया गया, जो गवर्नर जनरल का सहायक दूत था। अब्बोट ने यहाँ पक्के सीमा-स्तंभ भी स्थापित किए। सीमा-निर्धारण की इस जटिल समस्या को सुलझाने में गूँती के जलकूपों ने न्यायपंचों की सफल भूमिका का निर्वहन किया था। कुओं के स्वामित्व से संबंधित जमीनी
सूचनाओं ने सीमा-स्तंभों की निष्पक्ष पायेबंदी में प्रकाश-स्तंभों का कार्य किया।
जयपुर और पटियाला राज्य के उपरांत यदि किसी तीसरी शक्ति की आँख गूँती की सींव और यहाँ के जलस्रोतों पर टिकी रहती थी तो वह था अलवर रियासत के बडगूजर ठाकुरों का तसींग गाँव। चार घोडों की जागीर का यह गाँव (एक घोडे का अभिप्राय २०० एकड काश्त की भूमि है) अपने मौजूदा इख्तियार में गूँती खास को मिला लेने की हरचंद कोशिश करता रहता था। तसींग से लगभग पाँच किलोमीटर दूर, पूरब में स्थित गूँती गाँव में इन दिनों बहुसंख्यक अफगानी पठान तथा हिन्दू धर्मावलंबी सातों कौमें निवास करती थी।
गूँती के पहाडी शिखर से तसींग के पुराने महल और किला आज भी अरावली के नीले उजास में झिलमिलाते एक सपने की तरह नजर आते हैं। गूँती के पहाड पर स्थित एक गोलाकार अट्टा बुर्ज तथा पानी के पक्के टाँके का निर्माण भी तसींग के साथ तनातनी के उसी दौर में किया गया था ताकि किसी भी आपात स्थिति में यहाँ के निवासी बाहरी आक्रमणकारियों से अपनी रक्षा कर सकें। कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि बुर्ज और टाँका इस गाँव के सीमावर्ती महत्त्व को देखते हुए पहले से ही यहाँ पर मौजूद थे और तसींग के साथ मची उस खींचतान में इनका केवल जीर्णोद्धार ही हो पाया था।
रियासती सीमाओं की अस्थिरता और कस्टम के झगडों-टंटो से शताब्दियों तक प्रभावित रहे गूँती के इलाके को प्रकृति ने अपने खजाने से अनेक उपहार भी दिए हैं...नले-नाखलों से अलंकृत सोता के ऊसर का अपार सौंदर्य और खेतों-क्यारों की सरहदों में बहता हुआ कुओं का स्वच्छ जल! वृष्टिवेग से भरा हुआ पहाडी टाँका भी गूँती की सीमाओं में फैले जलस्रोतों का एक चैतन्य गुरुशिखर है-देवाधिपति इन्द्र को संतुष्ट करने वाला अंतरिक्ष का संगृहीत जल।
बीते वक्तों में नए कुएँ का मुहूर्त गाँव में एक त्यौहार जैसा उछाह लेकर आता था। पानी का चव्वा
लगते ही सवामणी का आयोजन शुरू हो जाता। देवता पधरा दिए जाते और दाल-चावल-बूरा-शक्कर की बोरियाँ बैलगाडी में लादकर कुएँ पर लाई जातीं। वहीं पर रसोई पकती और पूरे गाँव का जीमण होता। लोगों की जिह्वा पर घुला बूरा-शक्कर का वह मिठास कुएँ के जल को भी वैसा ही मीठा और मंगलमय बना देता था। रात्रि में भजन-कीर्तन होते। सीमेंट की पक्की कोठी गालने अथवा पत्थरों से कुएँ की गोल चिनाई करने वाले कारीगर-पेशगार उस पानी की पोख में थकते ही न थे। कुएँ का ढाणा लकडी के फ्रेम से भी बन सकता था और चूने-पत्थर की चिनाई का पक्का ढाणा व खेल-कोठा भी।
ढाणे का सही ब्यौंत बिठाना कोई आसान काम न था। कुशल गुणियागिरी और मिस्तर की विशेषज्ञता के साथ-साथ कारीगर को इस क्षेत्र का लंबा अनुभव होना जरूरी था। चाक की धुरी को साधने के लिए एक ही दुसंखी कोहड खडी की जायेगी अथवा ढाणे के आरपार आडी पाट डाली जायेगी, यह धणी की आसंग पर निर्भर करता था।
कोहड कम खर्चीली पडती थी किंतु कोहड की बगल से चडस खींचने का काम बारिए के लिए अपेक्षाकृत कठिन और जोखिमपूर्ण होता था। ढाणे में खडा बारिया कुएँ के मुँह से बाहर आयी चडस के माँडल पर हाथ डालकर ज्योंही ऊँचे स्वर में ‘झोला’ पुकारता था, लाव पर झोला देकर कीलिया उसी क्षण पर कुंदे से कीली खींच लेता और लाव को बैलों की चाल से मुक्त कर देता। झोला के साथ ढाणे की सतह से कोई बिलाँदभर ऊपर आई चाडस को एक नपे-तुले जरकाव के साथ ढाणे में खींचकर बारिया अब पानी को वहँ रिता देता था। झोला देते क्षण लाव की रगड से बचने के लिए कुछ कीलिए कमर के पीछे मोटे चमडे की एक खेवटी भी लटकाए रखते थे।
ढाणे में कोहड के पसवाडें पर झुके बारिए और गूण में झोला देते कीलिए के बीच जरा-सा भी तालमेल
गडबडाने पर कोई गंभीर दुर्घटना घट सकती थी। गूँती का मंगूडा अहीर एकबार कीलिए की गलती से कुएँ में जा गिरा था। मंगू ने झुककर ‘झोला’ पुकारने के साथ चडस पर हाथ डाला ही था कि कीलिए ने गलती से बिना झोला दिए कुंदे से कीली खींच ली। लाव-चडस के भारी झोक के साथ मंगूडा तत्काल कुएँ में जा गिरा था। शुक्र है बाबा चितरदास का, कुआँ घेर का बली था और कम ऊँडा था। बारिए को कोई बडी चोट नहीं आयी अन्यथा ऐसे में मोट्यार की जान भी जा सकती है।
पाट के बारे लेना अपेक्षाकृत आसान है। पाट ढाणे में आमने-सामने की दीवारों पर क्षैतिज टिकी रहती है। बारिया पाट के नीचे झुककर चडस को सीधे अपनी आरे खींच सकता है। कुएँ में पासी गई खाली चडस और लाव को, करीब-करीब कुएँ की जल-सतह के टिकाव पर, तेजी से घूमते चाक की लंपर थामकर तत्काल रोका जा सकता है। रेलगाडी के भागते पहियों को जैसे चैन खींचकर एकाएक ब्रेक लगाए जाते हैं।
लालवाला कुआँ गूँती में सर्वाधिक चौडे घेर का एक अटूट जलस्रोत माना गया है, जहाँ कई शताब्दियों से समूचे गाँव की प्रसूतिकाएँ जलवा धोकती रही हैं। चार लावों की सींच का चौलावा कुआँ। पक्की कोठी। चारों ओर चूने की लिपाई के पक्के ढाणें। गूणों के फेर में भागती हुई बैलों की चार लिलवाँसा जोटें। ढाणे, पाँवडी, खेल और धोरों की निवाण में बहता हुआ अपार जलघृत। एक दिन के ढाई-तीन हजार चडस पानी कोई कम नहीं होता, लेकिन इतना पानी प्रतिदिन उलीचने के बाद भी लालवाला का जलस्तर टूटता नहीं था।
गूँती में दो ही कुएँ चौलावे रहे हैं। एक लालवाला और दूसरा देशवाला। लालवाला इनमें से प्राचीन कुआँ है-स्वामी लालदास का खुदवाया हुआ। पीपल, नीम और इमली के घने वृक्षों से घिरे इस कुएँ पर गाँव की स्त्रियाँ जब देखो घर-परिवार के कपडे धोने-खंगालने में ही लगी रहती थी। दोवडे और दोवटी जैसे भारी-भरकम कपडों
को धोने के लिए किसके पास रखा था साबुन-सोडा उन दिनों। बैलों के चीड (पेशाब) में दोवडे को रातभर भिगोकर रख दिया जाता था। सुबह कुएँ के बहते जल में इसे खंगाल लिया जाता। धुलाई ऐसी स्वच्छ कि दोवडे में मिट्टी का एक कण तक नहीं टिक पाता था।
शहरों की हवा खाकर आए कुछ नौजवान बाद में जब डिटर्जेंट पाउडर और साबुन लेकर कुएँ के घाट पर कपडे धोने के लिए पहुँचने लगे तो गाँव में एक सामूहिक निर्णय के मध्यनजर खेती-बाडी के पानी में साबुन-सोडा घोलने की मनाही कर दी गई। साबुन का पानी कहीं धाँगले और फल-तरकारियों की गुणवत्ता को नष्ट नहीं कर दे। समूचे बहरोड परगना में अपने निराले स्वाद और स्वच्छताके लिए प्रसिद्ध रहा है गूँती गाँव का पानी। कफ, वात और पित्त-तीनों दोषों में सर्वगुणकारी। परदेश में आया गूँती का आदमी सबसे पहले अपने कुओं के पेयजल को ही याद करता है। जीभ की भौतिक तृष्णा का नहीं आत्मा की अतल तृप्ति का विषय है गूँती का नीर।
एक आबाद जलकूप की गूण का घेर जन्म के जलवा संस्कार से लेकर मृत्यु की आखिरी विदाई तक फैला हुआ एक संपूर्ण जीवन-चक्र है। लालवाला की पाल पर अंकित स्वस्तिक और छाबडी की प्रथम सर्जना से लेकर समद हुईं पर संपन्न अंत्येष्टि-स्नान के आखिरी विसर्जन तक।
गाँव के हर कुएँ की अपनी अलग जीवन-गाथा है। अपने-अपने राग-विराग, सुख-दुःखभरी अपनी दास्तानें और अपना समुद्र।
स्यामीवाला को आदि संत बाबा चितरदास ने खुदवाया था। पीपल के दो वृक्ष भी उन्होंने वहाँ लगवाए। बाद में एक भव्य चबूतरे और शिवालय का निर्माण वहाँ गाँव के सेठों द्वारा करवाया गया। स्यामीवाला का भूजल-स्तर कभी बहुत गहरा नहीं रहा-अधिक से अधिक पच्चीस फीट। पहले लाव-चडस से पानी खींचा जाता था फिर रहट लग गया। गाँव के बच्चे रहट की बाल्टियों के सहारे
कुएँ में उतर जाते और गर्मियों की भरी दुपहरियाँ पानी की ठंडक में मेंढकों की भाँति छिपकर बिताते। वृंदावन से आए दो बुजुर्ग कंठीधारी अपराह्न वेला में जब तक कृष्ण-कथा कहने के लिए शिवालय पर पहुँचते, यह मेंढक इससे पहले ही कुएँ से गुपचुप बाहर निकल आते थे। महात्माओं की वाणी में रासलीला की वह मिठास थी कि कुएँ की जगत पर इनके धोती-लंगोट छाँटने के लिए धर्मपरायण स्त्रियों में होड लग जाती थी। सेठों के यहाँ से रोजाना महात्माओं के भोग हेतु मिष्ठान्न के थाल आते। एक दिन महात्माओं ने मिष्ठान्न की गंध से ललचाए गाँव के एक घाघ को थोडा-सा हलवा पकडाया-’’भय्ये! जरा-सा खाकर देख तो कैसा बना है?’’ घाघ कई दिनों से इसी जुगत में था। ग्रास को मुँह में लेकर तत्काल महात्माओं की थाली में वापस फेंक दिया-‘‘ओऽऽ होऽऽ महाराज! मकोडा...जीभ को काट खाया!’’
मिष्ठान्न के दोनों थाल उन दोनों महात्माओं के लिए अपभ्रष्ट, अखाद्य हो गए। अखाद्य जूठन जिस लाल जिह्वा का उगला हुआ था, अंततः उसी को खाने के लिए दे दिया गया। अदृश्य मकोडों की कृपा से हमारे उस घाघ ने उस दिन उन दोनों थालों का पूर्ण तृप्तिकारक भोग लगाया। बाद में स्यामीवाला के ताजा जल से तीन बार इन थालों को धोकर राख व बालू मिट्टी के शुद्ध मिश्रण से माँजा गया और महात्माओं के लिए दुबारा पक्की रसोई बनकर आयी।
बैलवाला गाँव का एक ऐसा निरकरदा, निर्भागी अंधकूप माना जाता रहा है, जिसे पानी का चव्वा तक नसीब नहीं हुआ। कुएँ की मिट्टी को छाँटते-छाँटते जैसे ही कंकरों की खेप सामने आयी, खोदागर पठान समझ गए-अब पानी का स्रोत आया ही समझो। बाकी का माटोड कल खोदेंगे और कल ही पानी का पहला छींटा करीमजी पीर को चढायेंगे। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि बँटवारे की भग्गी में पठान उसी साँझ अपना गाँव छोडकर चले गए। छह दिन तक खोदा गया बैलवाला बस उतना ही
खुदा हुआ रह गया-पानी के चव्वे से दो हाथ दूर। बाद के वर्षों में जब यह कुआँ बारिश के पानी से भरने लगा तो गणगौर के पुतलों का विसर्जन गाँव की महिलाएँ इसी कुएँ में करने लगी।
शिरीष का एक पेड शुरू से ही बैलवाला के किनारे खडा है। निर्जन कुएँ में धकेली गई उन गणगौरों का साज-श्ाृंगार, अपनी हरी-भरी शाखों का पुष्प-पराग, ग्रीष्म की उन वीरान दुपहरियों में यह वृक्ष चुफ-चुफ बैलवाला की झोली में गिराता रहता है।
होलिका-दहन का डाँडा गूँती गाँव के लोग पहले स्यामीवाला में ले जाकर सिराते थे। भक्त प्रहलाद का यह अनश्वर प्रतीक, अब कुछ वर्षों से बैलवाला में सिरा दिया जाता है। अधर्म की आग से उबरे भक्त प्रहलाद और विरह की आग में जलती हुई गणगौरों के उपेक्षित पुतले, शिरीष के फूलों का एक साझा अभिनंदन बैलवाला में पाते हैं। लोगों का कहना है, बैलवाला एक हतभाग्य और निरकरदा कूप है। भरी ग्रीष्म में फूलों का ऐसा श्री-श्रृंगार...कोई बसंत किसी ने ऐसा भी देखा होगा कभी!
बागवाला जलकूप के चौतरफ लहलहाते उन हरे-भरे बागों का अब चाहे नामोनिशान मिट गया हो, लेकिन उस कुएँ का यह जिंदा मिथक आज भी हमारे दिलों को उसी ऐतिहासिक हरे-भरे उल्लास से भर देता है। गाँव में दो बाग प्रसिद्ध थे-एक अब्बू का बाग और दूसरा मजीद का बाग। मजीद का बाग गाँव की दो ढाणियों के बीच एक विस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ था। पंछियों का आकाश गूँजा देने वाला कलरव, मेरे बचपन के दिनों में मजीद की उस बागोबहार को, हमारी प्राथमिक पाठशाला की कक्षाओं तक खींच लाता था। यह सभी बाग पठानों के लगाए हुए थे। जब वे अपना वतन छोडकर चले गए तो उनके लगाए बाग भी मुरझा गए। बागवाला का यह नामजाद कुआँ अब अपने नाम के संदर्भ से कटकर एक सूखी काया का श्रीहीन स्मारक हो गया है।
कितना रगत और जहर भरा होगा साँपों के इस गिजबिज सर्पकुंड में, लेकिन एक बार भी गूँती के किसी रहवासी ने इसकी फुफकार को अपने कानों से नहीं सुना। गिजबिज कुआँ कोठावाला...सर्पों के जहर को सदियों से पीता-पचाता हुआ साक्षात् नीलकंठ! कोई दो सौ बरस पहले बणजारों का एक काफिला गूँती गाँव में आकर रुका था। संग-साथ चलती बालद की तात्कालिक जरूरत, तेज गर्मी में लकलकाती गायों की प्यास को बुझाने के लिए बणजारों ने यह कुआँ खोदा और एक खेल-कोठा भी इसकी बगल में बनवाया। जितने दिन बालद गाँव में रुकी रही, खेल-कोठों में उसके भाग्य का पानी उजलता रहा। बणजारों के चले जाने के कुछ अर्सा बाद यह खेल-कोठा भी धसककर कुएँ के पेट में जा गिरा। पानी की पालर रुक गई और यह कुआँ सूख गया। इस कुएँ का उपयोग अब साँपों और ग्योहरों की सुरक्षित कब्रगाह के रूप में किया जाने लगा। ‘‘कोई पालतू जानवर इस मरे हुए साँप को खा न जाये, इसे जल्दी से लेजाकर कुएँ में डाल दो।’’ गाँव के हर गली-मुहल्ले से लाठी और सेल की नसैनियों पर चढे हुए ग्योहरे और साँप इसी अंधकूप में लाए जाते। कुएँ के पेंदे में डाले गए जहरीले जानवरों का यह ढेर अंततः एक विशैली तीव्र गंध से भर उठा। हवा में घुले जहर की जाँच के बाद गाँव के आम रास्ते पर स्थित कोठावाला को इन दिनों मिट्टी से पाटने की कवायद चल रही है। नाग-पंचमी पर सर्पों की आत्माओं के तर्पण हेतु एक सामूहिक यज्ञ का आयोजन भी गाँव में होगा।
...और यह है गूँती का हाट्याला पनघट! बीच चौराहे की हलचल और हाट-बाजार के ऊँचे चबूतरों से घिरा गाँव का एक व्यस्ततम जलकूप। हाट्याला सिंचाई का कुआँ नहीं है। यह घरेलू उपयोग का कुआँ है। पणिहारी और पनघट के नाजुक रिश्तों का बीच बाजार में खडा प्राचीनतम गवाह।
घूँघट-गाती में लिपटी गाँव की पणिहारियाँ हाट्याला को दिनभर गुलजार बनाए रखती हैं। घूँघट के ताने-बाने
की ओट में अपने भीतर की लाज को छिपाना...सचमुच ही यह बहुत कठिन कार्य है। अमीर खुसरो की इस दर्दभरी सदा को तो हम सबने सुना ही है ः
बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी।
खुसरो निजाम के बल-बल जाइए
लाज राखे मेरे घूँघट पट की।।
यूँ भी हाट्याला के चौतरफ फैली यह दुनिया दो-दूने चार की कारोबारी दुनिया है। तराजू के काँटे पर टिकी इस दुनिया की व्यावसायिक दृष्टि घाटों की आध्यात्मिक गहराई और जीवन की सरसता पर कम ही जा पाती है।
‘‘कुओं के जितने घेर, बातों के उतने फेर!’’ सदियों पुरानी यह कहावत आज भी उसी ताजगी और अनुरंजन के साथ गूँती गाँव में सुनी जा सकती है। डोर-डोलची का खिंचा हुआ ताजा जल और ढाणे की सिल्लियों का साफ-सुथरा बिछौना कभी यहाँ थके-हारे मुसाफिरों की रात-झपकी का आसरा हुआ करता था। बोरवैल की नई तकनीक आयी तो कुओं की कोख में अब सूखा पाताल ही बचा रह गया। पेडों के हरे चुन्नट झुलसने लगे और बातों के वाचाल चकवा-चकवी देखते-देखते यहाँ से उड गए। उल्लास से भरा घाटों का वह ऐतिहासिक कल-कल अब प्यास से पीडित ग्रामीणजनों का एक सामूहिक विलाप बनकर रह गया है-‘‘अंतरिक्ष में उत्पन्न होने वाले जल, नदी में बहाकर या कुएँ में खोदकर निकाले गए जल और समुद्र की ओर जाते हुए जल-यह सब हमारी
रक्षा करें।...’’ ?
मु.पो. गूँती, वाया-बहरोड, अलवर (राज.)