रिमझिम(कन्नड कहानी)

मूल एवं अनुवाद : अदीब अख्तर


मुसलाधार बारिश हो रही थी। सडक वीरान थी। एक जवान पूरी
<br/>तरह भीग जाने के बावजूद भी आहिस्ता-आहिस्ता कदम रखते हुए आगे बढ रहा था।
<br/>मुकेश की दर्द भरी आवाज उस का पीछा कर रही थी।
<br/>‘मुझे मेरे हाल पे छोड दो। मुझे तुम से कुछ भी नहीं चाहिए।
<br/>उसी समय एक कार जवान के पास आकर रुकती है।
<br/>‘ये रास्ता किधर जाता है?’ कार का ड्राइवर पूछता है।
<br/>‘कल तक ये रास्ता मेरी मेहबूबा के घर जाता था मगर आज ये किधर जाता है मुझे इसका पता नहीं’ जवान जवाब देता है।
<br/>‘वे तो खुद भडका हुआ है दूसरों को क्या रास्ता बताएगा’
<br/>कार के अंदर से कोई और कहता है
<br/>कार आगे बढ जाती है
<br/>(यह दृश्य है एक फिल्म का)
<br/>अपनी ही एक फिल्म का सीन अचानक ही उसे याद आ गया। इस समय वह मेजेस्टिक से मैसूर सर्कल की तरफ जा रहा था। हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। वह पूरी तरह भीग गया था। मगर इसके बाव*ाूद भी वह कहीं रुके बिना आगे बढ रहा था। चूँकि उसकी ये ख्वाहिश होती थी कि वह फिल्म के हीरो की तरह दिखाई दे। इसलिए वह हर दिन शेव करने का आदी था। मगर अब इधर कुछ दिनों से शेव ना करने के कारण दाढी बढ गई थी। सर पर अलग उसने अँगोछा बाँध लिया था, जिस की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं सकता था कि वह फिल्म निर्देशक सच्चिदानंद है। उसके करीबी दोस्त भी अब उसे इस हुलिए में पहचान नहीं सकते थे। किसी जमाने में उस की ये इच्छा होती थी कि हर कोई उसे पहचाने मगर अब वह यह चाह रहा था कि न कोई उसे पहचाने न ही कोई उससे बात करे।
<br/>फिल्म नगर को आए उसे लगभग सोलह बरस हो गए थे। आरम्भ में उसने कुछ निर्देशकों के साथ उनका उपनिर्देशक बनकर काम किया था। काफी अनुभव प्राप्त के बाद वह खुद निर्देशक बन गया था।
<br/>उसके निर्देशन में कई सारी फिल्में बनी थीं। उसकी छह फिल्मों में फिल्म के हीरो के बारिश में भीगने के सीन थे। बचपन ही से उसे बारिश से लगावा था। किसी जमाने में वह अपने गाँव से खाली हाथ बेंगलूर आया था तो उस समय बारिश का मौसम था। खुद उसने भी छह फिल्मों का निर्माण किया था। पानी की तरह पैसे बहाए थे। जितने बहाए थे उससे दस गुना बटोरे थे। मगर अब वह खाली हाथ हो गया था।
<br/>अब वह बेबसी के आलम में मुसलसल होता हुआ बूँदा बाँदी की परवाह किए बिना आगे बढता जा
<br/>रहा था।
<br/>उसके निर्माण में बनी फिल्म ‘रिमझिम’ बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई थी।
<br/>फिल्म नगरी में आकर जो कुछ उसने कमाया था उससे ‘रिमझिम’ का निर्माण किया था। पैसों की जरूरत पडने पर उसने घर भी बेच दिया था। फिल्म फेल हो जाने से वह बिलकुल कंगाल हो गया था। फिल्म बनाते समय उसने कई लोगों से उधार भी लिया था। जब तक उसके पास पैसे थे उसके इर्दगिर्द लोग होते थे। अब वह खाली हाथ हो गया था तो लोग दूर हो गए थे। दो साल पहले उसकी पत्नी हेमा उसके साथ झगडा करके अलग हो गई थी। दो साल हो गए थे उसे अपनी इकलौती बेटी को देखे। हेमा जब उसे ले गई थी उस समय लडकी की उमर दो साल की थी।
<br/>सच्चिदानंद फिलहाल बेंगलूर से लगभग पंद्रह किलोमीटर पर केंगेरी में एक छोटे से किराए के मकान में रहता था। घर पर एक बिस्तर और दो चार कपडों के अलावा कुछ भी न था। जिन्होंने उसे उधार दिया था उन को उसके घर का पता था। वे लोग किसी भी समय घर आकर उसे तंग कर सकते थे। इसलिए वह सुबह-सवेरे घर छोड कर दिन भर इधर-उधर पार्कों में गुजारने के बाद शाम ढले घर लौटता था।
<br/>दो दिन पहले ही उसने अपना मोबाईल बेच दिया था। सिर्फ तीन सौ रुपये में।अपनी पसंददीदा लक्की नम्बरों की ‘सिम’ को उसने अच्छी तरह चबाकर मोरी में थूँक दिया था। ‘सिम’ को खो देने का दुःख भी उसे था। अब जबकि जिंदगी ही दाँव पर लगी हुई हो, तो ‘सिम’ क्या हैसियत रखती है। वह अपने आपको दिलासा देने की कोशिश करता था।
<br/>जिंदगी को सभी दृष्टिकोण से देखने के बाद उसने खुदकुशी कर लेना ही ठीक समझा था। इसके अलावा कोई चारा भी न था। मरने से पहले वह अपनी इकलौती बेटी विस्मिता का सिर्फ एक बार बोसा लेना चाहता था। मगर उसे इस बात का पूरा विश्वास था कि हेमा उसे घर के पास भी फटकने नहीं देगी।
<br/>हेमा बनाशंकरी में रहती थी। इसी समय यूँ ही भीगते हुए वहाँ जाने का ख्याल अचानक ही उसे आया। मगर उसने ये सोचकर उस इरादे को टाल दिया कि विस्मिता आराम कर रही होगी। इतनी रात गए वहाँ जाना ठीक नहीं रहेगा।
<br/>‘रिमझिम’ फिल्म के सफल होने का उसे पूरा विश्वास था। उससे जो भी पैसे मिलेंगे उससे सब से पहले विस्मिता के लिए एक साइट लेने का इरादा किया था। छह साल पहले उसके निर्देशन में बनी ‘विश’ इतनी सफल हुई थी कि उस निर्माता ने दोनों हाथों से पैसे लूटे थे।
<br/>जहाँ उस की कला से दूसरों ने लाभ उठाया था। वहाँ उसकी कला उसके कोई काम नहीं आई थी। अब वो बिलकुल फुटपाथ का हो कर रह गया था और उसे मर जाने के बारे में सोचना पडा था।
<br/>मरने से पहले विस्मिता से आखिरी बार मिलना मुमकिन तो नहीं था अलबत्ता बात कर सकता था। इतना सोच कर वो एक दुकान के बाहर टंगे हुए फोन-बॉक्स के पास पहुँच कर एक रुपये का एक सिक्का डाल कर हेमा के मोबाइल का नम्बर घुमाया।
<br/>उसे इस बात का पूरा विश्वास था कि अगर उसने अपने मोबाइल फोन से हेमा को फोन किया तो यकीनन हेमा उस के नम्बर को देखते ही मोबाइल ऑफ कर देगी मगर दूसरा नम्बर होने के कारण उधर से हेमा ने पूछा
<br/>था ‘कौन ?’
<br/>‘हेमा मैं बात कर रहा हूँ, विस्मिता से आखिरी बार बात करना चाहता हूँ’
<br/>उस की आवाज को पहचानते ही हेमा ने मोबाइल ऑफ कर दिया।
<br/>सच्चिदानंद की आँखो से आँसू बहने लगे। आगे बढते हुए उसने सोचा जिंदगी के आखिरी लम्हों में किसी दोस्त से बात करनी चाहिए। मगर उसने इस ख्याल को भी दिल से निकाल दिया।
<br/>वह आहिस्ता आहिस्ता मैसूर सर्कल पहुँचा तो वहाँ स्टाप पर कई सारे मजदूर खडे हुए थे। जो मैसूर की तरफ जाने वाली टेम्पो और ट्रकों को हाथ दिखा कर रोक रहे थे। वह उन मजदूरों की टोली में जा मिला। कई सारे ट्रक रुके बिना चल दिए।
<br/>आखिर एक ट्रक रुका तो क्लीनर जो ट्रक के पीछे सवार था पूछा था ‘कहाँ जाना है ?’
<br/>‘केंटेगी’ कइयों ने चिल्लाया था।
<br/>‘सवार हो जाओ।’
<br/>मजदूर ट्रक में सवार हो गए , वह भी सवार हो गया क्लीनर एक-एक के पास पैसे वसूल करने लगा-यूँ तो सभी मजदूर पिए हुए थे। एक तो हद से बढकर नशा किए हुए था। वह फिल्मों के गाने काफी जोर से गा रहा था। कोई भी गाना उसे पूरा का पूरा याद न था जितना उसे याद था उतना गाने के बाद दूसरा गाना शुरू कर देता था। इस दरमियान वह मजदूर गाना गाते-गाते अचानक ही एक ऐसा गाना गाने लगा जिस को सुनते ही सच्चिदानंद के कान खडे हो गए। गाने के बोल सुन कर वह जाने कहाँ खो गया । फिर उसे ख्याल आया कि वह गाने वाले मजदूर के पास जाकर कहे कि ये गाना उसी की फिल्म का है। मगर वह ऐसा न कर सका।
<br/>केंगेरी आने पर वह लॉरी से उतर कर घर की तरफ रवाना होते हुए उदास हो गया। दरवाजे पे लगा ताला खोलते हुए उसने सोचा कि दुबारा इस घर आना नसीब नहीं होगा।
<br/>वह पहले ही इस बात का फैसला कर चुका था कि वह खुदकुशी घर के बाहर किसी वीरान जगह पर, किसी पेड की टहनी से अपनी धोती से फांसी लगा लेगा। घर के अंदर दाखिल होकर उस ने दीवार पर टंगी विस्मिता की तस्वीर को ले कर गले लगा लिया। देर तक आँसू बहाने के बाद एक धोती ले कर घर से बाहर निकल पडा।
<br/>वह बेखयाली में आगे बढते हुए रेल स्टेशन पर पहुँचा। स्टेशन पर मैसूर जाने वाली पैसेंजर गाडी रुकी हुई थी। वह ज्यादा सोचने की बजाए पैसेंजर में सवार हो गया। मैसूर से इधर मिलने वाले श्रीरंगा पट्टाणा स्टेशन से पहले और बाद में दो नदियाँ मिलेंगी। उस समय जब की रेल किसी पुल पर से गुजर रही होगी, वह नदी में छलाँग लगा देगा। ये विचार उसे अभी अभी आया था।
<br/>रेल जब बिडदी स्टेशन पर रुकी तो सच्चिदांनद ने देखा कि वहाँ एक नई दुनिया आबाद है। चार चाँद लगे हुए हैं। स्टेशन पर कोई तमिल फिल्म की शूटिंग हो रही थी। कोई और समय होता तो वह गाडी में सवार और लोगों की तरह खुश होता।
<br/>मुसाफिर खिडकियों से सिर बाहर निकाल कर शूटिंग देख रहे थे। कुछ तो स्टेशन पर उतर गए थे। वह उदास था इस लिए रेल से उतरे बिना ही खिडकी से शूटिंग देखता रहा। उस ने रेल से उतरने का इरादा कर लिया। मगर जब रेल आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढने लगी तो वह अपने आप पर काबू न रखते हुए रेल से उतर गया।
<br/>प्लेटफार्म पर भीड नहीं थी। एक तो रात थी दूसरे बारिश अलग हो रही थी। इसलिए शूटिंग देखने लोग टूट नहीं पडे थे। रेलवे डिपार्टमेंट वाले भी अपनी ड्यूटी के साथ शूटिंग देख रहे थे।
<br/>सच्चिदानंद अकेले एक तरफ खडे हो कर यूँ शूटिंग देखने लगा जैसे उसने इस से पहले कभी शूटिंग देखी न हो। फिल्म का निर्देशक अभी जवान था। फिर भी वह काफी अनुभवी लग रहा था और पूरी जिम्मेदारी से काम कर रहा था। जहाँ शूटिंग चल रही थी वहाँ से कुछ दूरी पर एक पागल जो सिर्फ एक ढीली नेकर पहने था। वह ठंड की वजह से बुरी तरह काँप रहा था। पागल की हालत देखकर सच्चिदानंद से रहा नहीं गया। उसने धोती पागल के जिस्म पर डाल दी। पागल खुश हो उठा।
<br/>आज तक किसी पागल ने खुदकुशी क्यों
<br/>नहीं की?
<br/>सच्चिदानंद सोचने लगा।
<br/>वह खडे खडे न जाने क्या क्या सोच रहा था कि उसने देखा कि निर्देशक तेज तेज कदमों से उसकी तरफ चले आ रहा है।
<br/>वह परेशान हो उठा। कहीं ये मुझे पहचान तो नहीं गये हैं? अब क्या होगा?
<br/>निर्देशक उसके पास आया और उस ने पूछा ‘तुम्हें तमिल आती है क्या ?’
<br/>उसे अब तसल्ली हुई।
<br/>‘आती है’ उसने तमिल ही में जवाब दिया तो निर्देशक ने खुशी का इजहार करते हुए कहा-‘मेरी फिल्म में एक छोटा-सा रोल करोगे क्या ?’
<br/>‘रोल क्या है ?’
<br/>‘तुम्हारी उम्र का एक व्यक्ति जिंदगी से उकता कर रेल स्टेशन चला आता है-वहाँ प्लेटफार्म पर सफर पर जाने वाले मुसाफिरों के साथ रुके रहने के बाद जब रेल आ रही होती है तो अचानक ही दौड कर इंजीन के आगे छलाँग लगा देता है।’
<br/>सच्चिदानंद दंग रह गया। उसे निर्देशक एक जादूगर की तरह लगा। जिसने उस के दिल की बात का पता लगा लिया था। वह उसे अपनी सारी कहानी सुनाना चहता था मगर खामोश रहा। वह निर्देशक के मूड को खराब करना नहीं चाहता था।
<br/>उसी समय निर्देशक ने उसे बताया कि अभी कुछ देर में रेल गाडी आयेगी। तब तक उसे दो चार बार रिहर्सल कर लेनी चाहिए। इतना कहकर निर्देशक ने उसे ये बताया कि उसे कहाँ से दौडते हुए आना चाहिए और कहाँ रुक जाना चाहिए।
<br/>निर्देशक की बताई हुई बातों को याद करते हुए प्लेटफार्म पर इधर से उधर दौडते हुए उसने सोचा इंसान अगर जीना चाहे तो उसके आगे कई सारे रास्ते हैं। मरना चाहे तो एक ही रास्ता है, वह है खुदकुशी। सच्चिदानंद ने अपना रोल अदा करने के बाद स्टेशन से बाहर आकर देखा, बूँदा-बाँदी नहीं होने वाली थी। वह स्टेशन से बाहर खडे-खडे जिंदगी को फिर एक नए ढंग से गुजारने के बारे में सोचने लगा। ?
<br/>बन्नूर-५७११०१ मैसूर (कर्नाटक) मो. ९८४५३७१३८३