तीन लघुकथाएँ

गोविंद शर्मा


इन्कार
<br/>था तो वह भी गाँव का, पर शहर में काम करने लगा था। उसकी पत्नी अब भी गाँव में रहती थी। उसने अपने शहरी ज्ञान से उसे पूरी तरह दब्बू बना रखा था। वह उसे अपने साथ बहुत कम ले जाता था। जब भी ले जाता, उससे ही साथ का सामान उठवाता। वह उसका हर हुक्म मानती। वह आश्वस्त था कि यह कभी अवज्ञा नहीं करेगी।
<br/>उसने बाइक खरीद ली। शहर से जिस दिन ज्यादा घरेलू सामान घर पहुँचाना होता, वह अपनी बीवी को साथ ले जाता। शहर से निकलते ही वह हेलमेट सिर से उतारता और पीछे बैठी बीवी को पकडा देता।
<br/>घर चलकर देखूँगा तुम्हें....कहते हुए उसने हेलमेट सिर पर
<br/>रख लिया।
<br/>अभी कुछ ही दूर गये थे कि सडक किनारे पुलिस की जीप खडी दिखी। पुलिस ने हाथ दिखाया तो वह रुक गया। एक पुलिस मैन ने कहा-तुम अच्छे हो जो तुम्हारे सिर पर हेलमेट है। उधर देखो, एक बाइक सडक पर पडी है। इस पर पति पत्नी सवार थे। पति के सिर की बजाय हेलमेट उसकी पत्नी के हाथ में था। उन दोनों को अस्पताल भेजा गया है। हाँ, आगे से पीछे बैठी सवारी को भी हेलमेट पहनाया करो।
<br/>उसने बीवी की ओर देखा। उसे लगा, उसके इन्कार में जिदंगी थी। ?
<br/>पिता
<br/>पिता पुत्र दोनों अपने घर के आगे बैठे थे। घर के सामने ही सार्वजनिक नल था। कोई अपनी बाल्टी और मग नल के नीचे इस तरह लगाकर गया कि पहले पानी मग में गिरता। जब मग भर जाता तब पानी ओवरफलो होकर बाल्टी में गिरता और बाल्टी भरती।
<br/>यह देखकर पिता को हँसी आ गई। बोले-कैसा अजीब आदमी है। पहले उसे बाल्टी को पानी से भरना चाहिए। फिर चलते समय मग को भर कर दोनों को ले जाना चाहिए। यह हजरत पहले मग भरते है, फिर पानी गिरता है बाल्टी म।
<br/>पुत्र बोला-पिताजी, आप भी रोज ऐसा ही करते हैं।
<br/>क्या मतलब है तुम्हारा? मैं भी ऐसा ही बावला हूँ।
<br/>नहीं पिताजी, आप महान् हैं। आप जो कमा कर लाते हैं, पहले उससे हम बच्चों का पेट भरते हैं, हमारी जरूरत पूरी करते हैं। उससे जो बचता है, वह माँ और आफ लिये होता है।
<br/>निरूत्तर पिता की आँखों में चमक आ गई। ?
<br/>अज्ञानी
<br/>कुत्ते ने खरगोश को घेर लिया। इस अप्रत्याशित हमले से खरगोश घबरा गया। बोला-तुम क्या चाहते हो?
<br/>तुम्हे खाना चाहता हूँ। कई दिनों बाद आज मौका मिला है।
<br/>देखो, हम दोनों का मालिक एक ही है।
<br/>उसी के डर से तो तुम्हें अब तक छुआ नहीं। आज वह बाहर है। उसे क्या पता चलेगा कि उसका प्यारा खरगोश किसके पेट में है।
<br/>एक ही घर-खेत में रहने के कारण मैंने तुम्हें अपना दोस्त मान लिया था। तुम विश्वासघात कर रहे हो।
<br/>तुम बचना चाहते हो तो एक रास्ता है। जंगल में बहुत से खरगोश तुम्हारे दोस्त हैं, दुश्मन हैं। तुम उन्हें बहला फुसला कर एक खरगोश रोजाना ले आया करो। मैं तुम्हें जिंदा छोड दूँ। नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगा। तुम मुझे ही खा डालो।
<br/>धत् , इतने दिन हो गए आदमियों के साथ रहते हुए, कुछ नहीं सीखा तुमने उनसे। कुत्ते ने उस अज्ञानी के बोझ से धरती को हल्का कर दिया। ?
<br/>ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, हनुमानगढ-३३५०६३ (राज.)