दो लघुकथाएँ

आचार्य भगवान देव ‘चैतन्य’


रिश्ता
नन्दाजी अपने बेटे अनुभव और पत्नी माधवी के साथ चण्डीगढ में रहते थे। वे भाखडा ब्यास प्रबन्धक बोर्ड के मुख्यालय में अधीक्षक के पद पर कार्य करते थे। उनके बेटे अनुभव ने हाल ही में बंगलौर से एम.बी.ए., लॉ. की थी और वह बंगलौर में ही एक कम्पनी में कार्य करता था। अनुभव की आयु विवाह के योग्य हो गई थी। अतः उसके लिए किसी कन्या की तलाश की जा रही थी। जब आस-पास कोई उपयुक्त कन्या नहीं मिली तथा उनके परिचित भी अनुभव के लिए कोई उपयुक्त कन्या की तलाश नहीं कर पाए तो उन्होंने कुछ पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन दिए। एक दिन नन्दाजी कार्यालय जाने के लिए तैयार थे कि तभी उनके मोबाईल पर किसी का
फोन आया।
‘नमस्तेजी, बोलिए मैं नन्दा बोल रहा हूँ।’
‘जी, नमस्ते। मैं फरीदाबाद से प्रमोद बोल रहा हूँ। विज्ञापन पढा कि आपको अपने बेटे अनुभव के लिए कन्या चाहिए। हम अपनी कन्या के लिए आपसे बातचीत करना चाहते हैं...।’
‘ठीक है मगर क्या आप बताऐंगे कि बेटी की आयु कितनी है तथा उसने क्या कर रखा है?’ नन्दा ने पूछा।
‘जी, हमारी बेटी नैनी ने इसी वर्ष एम.सी.ए. की है। अभी जुलाई में वह पूरे सत्ताईस वर्ष की हुई है।’ प्रमोद ने कहा।
‘ठीक है प्रमोद जी आप लोग आ जाइए...।’
‘क्या इस रविवार को जा जाएँ सर...?’
‘हां, हां क्यों नहीं। आपका स्वागत है जी...।’
रविवार को प्रमोद, उनकी पत्नी सीमा और सीमा का भाई सिद्धार्थ तीनों ही अनुभव और नैनी के विवाह के सम्बन्ध में बातचीत करने के लिए चण्डीगढ आ पहुँचे। नन्दा व उसकी पत्नी मेधा ने बडी ही गर्मजोशी के साथ उनका स्वागत किया। चाय-पान करते-करते प्रारंभिक बात-चीत हुई तो पता चला कि मूलतः उन दोनों ही परिवारों के पितर राजस्थान के चुरू नामक स्थान के रहने वाले थे। फिर बच्चों की ऊँचाई, सेहत तथा रंग-रूप आदि की
चर्चा हुई। अनुभव तथा नैनी के चित्र एक-दूसरे को दिखाए गए। इस पूरी बातचीत से दोनों ओर से ही यह संभावना बन गई कि सम्बन्ध स्थापित होने में कोई कठिनाई नहीं है।
‘अनुभव बेटे की सैलेरी लगभग कितनी है....?’ प्रमोद की पत्नी सीमा ने नन्दा से पूछा।
‘वह एक प्राईवेट कम्पनी में है। ये कम्पनियाँ वेतन भी खूब देती हैं और काम भी उतना ही लेती हैं....। उसे फिलहाल लगभग साठ हजार मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त टी.ए. आदि अलग से मिलता है...।’ नन्दा ने कहा।
‘नन्दाजी, यदि ठीक ढंग से घर-गृहस्थी चलानी आ जाए तो इतना वेतन पर्याप्त है। हम अपने को याद करते हैं तो...’ प्रमोद ने कुछ कहना चाहा मगर सीमा ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘अपने जमाने की बातें आप छोड दीजिए जी....तब वेतन कम था तो खर्चे भी कम थे....आज तो बाजार जाओ तो दो-चार हजार ऐसे ही खर्च हो जाता है।’
‘हाँ वो तो है, मगर हमारे अनुभव को न तो कोई बुरी आदत ही है और न ही उसने कोई अनावश्यक शौक पाल रखे है।’ नन्दा ने कहा।
‘अनुभव बेटे का वेतन साठ हजार महीना है तथा टी.ए. आदि भी मिल जाता है। यह तो ठीक है मगर इसके अतिरिक्त ऊपर की कमाई भी तो होती ही होगी...उसे मिलाकर कुल कितना बन जाता है?’ सीमा बोली।
‘ऊपर की कमाई से मैं आपका मतलब नहीं समझा बहिनजी...’ नन्दा ने कहा।
‘अरे ऊपर की कमाई के बारे में कौन नहीं जानता है भाई-साहब...मेरा मतलब है कि...’
‘यदि आपका मतलब रिश्वत् आदि से है तो हम बता दें कि अनुभव हमारी संस्कारी सन्तान है। ईमानदारी और परिश्रम उसके खून में समाया हुआ है। मुझे विश्वास है कि बडी से बडी रिश्वत को भी वह छूएगा तक नहीं।
वह इसे घोर अपराध मानता है...’ नन्दा ने तनिक भावुक होकर कहा।
‘अरे भाई साहब, आज के युग में सब चलता है। हमारी बेटी उसे सब-कुछ सिखा देगी.....’ सीमा ने हँसते हुए कहा।
कुछ देर तक दोनों ओर से चुप्पी छाई रही। फिर कुछ देर के बाद नन्दा ने कहा, ‘प्रमोदजी! आप हमारे घर आए इसके लिए हम आफ आभारी हैं, मगर जहाँ तक रिश्ते की बात है, वह नहीं हो सकेगा।’
‘नन्दाजी यह आप क्या कह रहे हैं....’ प्रमोद ने नन्दा को आश्चर्य से देखते हुए कहा।
‘ये बिल्कुल ठीक कह रहे हैं भाई साहब। हमें ऐसी बेटी नहीं चाहिए जो हमारे बच्चे को बेईमानी करना सिखाए....’ इस बार मेधा बोली।
‘अरे नन्दाजी आप मेरी बात तो सुनें। सीमा तो यूँ ही मुँह में आए बोल देती है.....।’
‘प्रमोदजी, आप और कुछ भी कहें मगर अब कृपा करके रिश्ते की बात न करें। यह रिश्ता किसी भी हाल में नहीं होगा....।’ नन्दा ने बिल्कुल ही निर्णयात्मक ढंग से जोर देकर कहा। ?
विश्वास
शान्ता और कौशल स्लीपर कोच में सफर कर रहे थे क्योंकि ए.सी. में बुकिंग नहीं हो सकी थी। उन्हें मुम्बई में आयोजित एक समारोह में अनिवार्य रूप से पँहुचना था। गाडी के चलते ही चाय, पीना, कॉफी, बिस्किट व फलादि बेचने वाले आवाजें लगाते हुए कोच से होकर गुजरने लगे। जिसको जिस वस्तु की आवश्यकता होती थी वह ले लेता था। उसी प्रकार सामान बेचता हुए एक अन्धा व्यक्ति भी आया। उसका दाहिना बाजू भी कोहनी पर से कटा हुआ था। उसने कुछ वस्तुएँ तो अपने गले में लटका रखी थीं, कुछ अपने बाएँ बाजू पर और कुछ कन्धे पर लटक रहे बैग में। वह निरन्तर आवाजें देता हुआ गुजर रहा था, जिस व्यक्ति को जो वस्तु चाहिए होती थी।
उससे ले लेता था और जितना दाम वह वस्तु का बताता था उतना पैसा उसकी हथेली पर रख देता था। चक्षुहीन व्यक्ति पैसे चुपचाप अपनी पैंट की जेब में डालकर फिर से आवाजें लगाता हुआ आगे बढ जाता था। शान्ता और कौशल को उसे देखकर यह बात बहुत ही अच्छी लगी कि दोनों आँखों से दिखाई न देने और दाहिना बाजू न होने के बावजूद भी वह भीख नहीं माँग रहा है बल्कि परिश्रम करके धन कमा रहा है। देखा यह गया है कि भले-चंगे स्वस्थ लोग भी भीख माँगते रहते हैं। भारतवर्ष में तो यह रिवा*ा बहुत ही अधिक है। विशेषतः आप किसी भी तीर्थ स्थान पर जाओ, ऐसे लोगों की भरमार रहती है। माँगने वाले ऐसे चिपकते हैं कि व्यक्ति को उनसे पीछा छुडाना ही बहुत कठिन हो जाता है।
शान्ता उस व्यक्ति से बहुत ही अधिक प्रभावित हुई तथा उसे अपने पास बुलाकर उसकी प्रसंशा करते हुए कहा,‘भैया! मैं आपसे बहुत ही अधिक प्रभावित हुई हूँ। ठीक है आपकी दोनों आँखों में रोशनी नहीं हैं तथा दाहिना बाजू भी कटा हुआ मगर आप भीख न माँगकर
परिश्रम कर रहे हैं....यह हम सभी के लिए बहुत ही प्रेरणादायक है....।’
‘मैं भीख माँगना पाप समझता हूँ बहिनजी। मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे भी हैं। उनमें भी मैं, भीख माँगने के नहीं बल्कि परिश्रम करके पेट पालने के संस्कार डाल रहा हूँ। यदि मैं भीख माँगूगा तो कल को वे भी तो यही करेंगे।’ उस व्यक्ति ने कहा।
‘बहुत अच्छा। आपने यह बहुत ही उत्तम विचार किया है।’
‘एक बात और भी है बहिनजी कि परिश्रम करने वाले पर परमात्मा सदा ही अपनी कृपा बनाए रखते हैं और काम करने योग्य होने पर भी भीख माँगने वालों पर परमात्मा कभी भी कृपा नहीं कर सकता है.....’ वह व्यक्ति किसी दार्शनिक की तरह बातें कर रहा था।
शान्ता ने पुनः उस व्यक्ति की प्रसंशा की और उससे बहुत सा सामान ले लिया। कुछ ऐसा सामान भी जिसकी हालाँकि उन्हें इतनी अधिक आवश्यकता नहीं थी। बस उसका उत्साह बढाने के लिए ही शान्ता ने
ऐसा किया।
‘कितने पैसे हुए भैया?’ शान्ता ने सामान समेटते हुए पूछा।
‘क्या-क्या लिया बहिना....? उसने पूछा।
शान्ता ने लिया हुआ सामान बता दिया। उसने उँगलियों पर गिनकर हिसाब लगाया और कहा, ‘कुल दौ सौ पाँच रुपए बनते हैं।’
शान्ता ने उसे पैसे दिए और उसने उन पैसों को चुपचाप अपनी जेब में डाल लिया। वह आवाजें लगाते हुए आगे को बढने लगा। तभी शान्ता ने उसे आवाज देकर फिर से बुलाया, ‘भैया जरा बात सुनना....’
‘हाँ बोलिए। कुछ और नहीं मगर एक बात पूछनी है।’
‘हाँ-हाँ पूछिए....’
‘लोग तुमसे सामान लेते हैं। तुम उनसे ही पूछते हो कि क्या-क्या सामान लिया। यदि वे लिए हुए सामान में से कुछ कम बता दें तो....’ शान्ता ने पूछा।
वह खडा-खडा मात्र हँसता रहा।
‘बोलो ना यदि सामान कम बता दे या फिर पैसे ही कम दे दे तो तुमको तेा बहुत घाटा हो जाएगा न....’ शान्ता ने उसके साथ सहानुभूति व्यक्त करने हुए पुनः कहा।
उसने उन्मुक्त हँसी हँसते हुए कहा, ‘मेरा क्या घाटा होगा बहिनजी। ऐसा व्यक्ति तो अपना ही घाटा करेगा....अपने ईमान-धर्म से वही गिरेगा। मैं तो नहीं। उससे ऊपर वाला भली प्रकार से निपटेगा इतना मुझे
विश्वास है...।’
इतना कहकर वह एक बार फिर से हँसा और आगे बढ गया। ?
महादेव, सुन्दरनगर-१७५०१८ (हि.प्र.)