कदाचित ऐसा हो!

कु.निष्ठा कश्यप


राघवेन्द्र अमीर घर का लडका है। पिता शशिधरकी आलीशान कोठी शहर की पॉश कॉलोनी में महत्त्वपूर्ण जगह पर स्थित है। जहाँ वे अपनी सुन्दर-सलौनी पत्नी रविकांता के साथ निवास करते हैं। डाक्टर साहब हृदयरोग विशेषज्ञ, नामवर कार्डियो सर्जन है। उन्होंने अपनी कोठी के तल (बेसमेंट) में ही सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त एवं उपकरणों से सुसज्जित अपना सर्जिकल क्लिनिक खोल रखा है। डॉ. शशिधर के पास हर वक्त मरीजों को तांता लगा रहता है। वे शहर के सबसे बडे हॉस्पिटल, सिटी हॉस्पिटल में सी.ई.ओ. के पद पर आसीन हैं। उनकी कमाई लाखों में है। दूर-दूर से हार्टपेशेंट इलाज के लिए उनके पास आते रहते हैं। उनके क्लिनिक में भर्ती मरीजों की तीमारदारी के लिए साथ आने वाले लोगों के आवास की भी उत्तम व्यवस्था है। क्लिनिक में ओ.टी.,आई.सी.यू., ऑउटडोर, मेंडिकल स्टोर आदि हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है।
बडे शहरों में जैसा कि देखा जाता है, पॉशकॉलोनी के इर्द-गिर्द कुकरमुत्ते की भाँति स्लम्स उग आते हैं। इनके वाशिंदे यहाँ के बंगलों-कोठियों में काम करने वाले नौकर-नौकरानियाँ होते हैं जो म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की जमीन पर अपने अस्थाई कच्चे-पक्के झोंपडें निर्मित कर अपने परिवार सहित गुजर-बसर करते हैं। म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन अतिक्रमण हटाने की अपनी मौसमी कार्यवाही के अन्तर्गत इन झोंपडों को उखाड कर इन लागों को समय-समय पर विस्थापित भी करता है परन्तु मामला ठंडा होते ही ये यथावत आबाद हो जाते हैं। इन स्लम्स में बिजली-पानी के कनेक्शन्स, उफनती गंदगी से लबरेज सडांध से भभकती नालियाँ सभी कुछ रहता है। वोट की राजनीति के चलते इनके लिए वोटरकार्ड, राशनकार्ड सब बन जाते हैं। हर चुनावी दौर में राजनैतिक पार्टियों की चुनावी सभाएँ यहाँ होती हैं उनके चुनाव कार्यालय खुलते हैं। उस वक्त ये सब मूलभूत सुविधाएँ उन्हें मुहैया करवा दी जाती हैं। हालाँकि चुनाव निपटने के बाद इनकी सुध लेने वाला, दुःख-दर्द की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता।
राघवेन्द्र के यहाँ बहुत-से नौकर-नौकरानियाँ काम करते हैं। वह एक सुसंस्कृत, स्वभाव से बहुत अच्छा, धीर-गंभीर, सहृदय-संवेदनशील युवक
है। वह अपनी कोठी से झोपड-पट्टी के बाशिंदों को चारों ओर फैले-पसरे गंदगी के ढेर, गंदे पानी और बहते मैले से अटी पडी नालियों के बीच हँसते-बतियाते, ठिठोली करते, लडते-झगडते प्रायः देखता है। ये अभावग्रस्त गरीब स्त्री-पुरुष और बच्चे कितने स्वच्छंद कैसे उन्मुक्त हैं देखकर राघवेन्द्र को इन पर रश्क होता है।
राघवेन्द्र ने एक दिन अवसर पाकर अपने पिता से पूछा, ‘‘पापा, इन झोंपड-पट्टी में रहने वालों की दुर्दशा की आखिर क्या वजह हो सकती है?’’
राघवेन्द्र की माँ रविकांता ने बीच में बोलकर अपनी मूल्यवान राय देते कहा, ‘‘शायद इनका काहिलपन और कामचोरी! मैं अक्सर इन्हें सामने के पीपल के गट्टे (चारों ओर बनी सीमेंटेड चौकी) पर ताशपत्ती, चौपड का खेल, शतरंज या फिर चरभर खेलते देखती हूँ।’’
डॉ. शशिधर बोले, ‘‘ये हाडतोड मेहनत-मशक्कत करने वाले लोग हैं। अलबत्ता महीने के पूरे दिन काम पर नहीं जा सकते। महंगे मनोरंजन इनकी पहुँच के बाहर की बात है। इनमें ज्यादातर लोग ट्रक ड्राईविंग- जिसमें हफ्तों-महीनों घर-परिवार से दूर रहने की विवशता रहती है, कमठाणे (भवन निर्माण) का काम, मंडियों-दुकानों में पल्लेदारी, अथवा दिनभर रेहडी-ठेला खींचने का काम करते हैं। कडी मेहनत-मजदूरी के बाद इन्हें इतनी थकान हो जाती है कि मारे थकान के इन्हें नींद नहीं आ पाती है। थकान उतारने के लिए नशे का सेवन शायद इनकी मजबूरी हो! इसके अतिरिक्त पर्याप्त कमाई के अभाव में ये अपने परिवारजनों का ठीक से भरण-पोषण करने में भी असमर्थ रहते हैं। हाडतोड मेहनत पर पौष्टिक खुराक नहीं मिलने से ये टी.बी. जैसी बिमारियों के शिकार हो रहते हैं। हारी-बीमारी, थकान और परिवार नहीं पाल पाने के अपराध-बोध से दबे ये लोग संभवतः नशे-पते के शिकार हो
जाते हैं।’’
कुछ देर वहाँ निस्तब्धता छाई रही।
तब राघवेन्द्र ने खामोशी तोडते कहा- ‘‘पापा, मैं इन गरीब लागों के लिए कुछ करना चाहता हूँ। भगवान ने हमें भाग्यशाली और सामर्थ्यवान बनाया है। इस नाते गरीबी और भूखमरी से जूझते इन अभागे बेबस-बेकल लोगों की भलाई यानी इनका जीवनस्तर सुधारने की दिशा में कुछ ठोस कार्यों का आगाज करके उन्हें अंजाम देना हमारा इन्सानी फ*ार् बनता है।..... और इस सब में मुझे आपका भरपूर मार्गदर्शन और सहयोग चाहिए।’’
‘‘बेटे। तुम्हारी सोच बहुत बेहतर है। तुम्हें ऐसी पे*रणा मिली कहाँ से?’’
‘‘कॉलोनी के बंगलों-कोठियों में होने वाले आयोजनों, उत्सवों और शादियों के अवसरों पर साज-सज्जा और रोशनियों पर बेशुमार खर्चा किया जाता है। अपनी झूठी शान-शौकत, आडम्बर और दिखावे पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। यहाँ होने वाले आयोजनों-उत्सवों के उपलक्ष्य पर भोजों में बेहिसाब जूठन छोडी जाती है।’’
‘‘हमारे देश में जहाँ लोगों को एक वक्त का खाना तक मय्यसर नहीं, अन्नदेवता का ऐसा अपव्यय और अपमान क्षोभ एवं लज्जा जनक है।’’ राघवेन्द्र की मम्मी ने सहमति प्रकट करते कहा।’’
‘‘एक और जहाँ ऐश्वर्य के ऐसे टापू बने हुए हैं, वहीं देश की झोंपड-पट्टी में भूख से बिलबिलाते मासूम बच्चों का क्रंदन गूँजता है। दिनभर मर-खप कर थके-हारे घर लौटे शराबी पतियों से मार खाती बेबस औरतों के रुदन का शोर वातावरण को आच्छादित करता बोझिल बनाता है। एक ओर महंगी विदेशी शराब में डूबे मदमाते अय्याश कहकहे निर्लज्जता से वातारवण में गूँजते हैं, वहीं दूसरी तरफ विलाप करती बेबस भूख और अभावों के बीच टूटती, पिसती-पिटती मेहनतकश औरत की चीत्कार के मर्मभेदी स्वर हैं।’’ राघवेन्द्र का मन-मस्तिष्क गहरे तक आंदोलित, हृदय द्रवित हो उठता है। विचारों का बवंडर मचता है।
‘दुनिया के सबसे बडे हमारे इस महान् लोकतांत्रिक देश में इन दोनों विपरीत छोरों की स्थितियों के बीच इतनी गहरी खाइयाँ; इतनी असमानता, इतने फासले, इस कदर विरोधाभास भरता-छलकता विलासितापूर्ण उल्लास, धन-सम्पदा और साधनों का ऐसा अपव्यय, इतना दिखावा और आडम्बर...दूसरी ओर चीत्कार करती भूख, हर तरफ पसरा अभाव, रोता बिलखता बचपन, क्रंदन करती नारियाँ.... आखिर इतना अन्यायपूर्ण अंतर क्यों, ऐसी निरंकुश लूट-खसोट क्यों?...ये भव्य बंगलों-कोठियों में रहने वाले साधन-सम्पन्न और सुविधाभोगी लोग देश की सम्पदा के निमर्म लुटेरे हैं। इन लोगों ने देश का सर्वस्व लूट कर अपने घर-गोदाम भर लिए हैं। अपनी झूठी शान-शौकत के आडम्बरपूर्ण प्रदर्शन-दिखावे और अय्याशी पर उसे खुले हाथों लुटा रहे हैं। इनके लालच-लोभ का कोई अंत नहीं।’ राघवेन्द्र की सोच दूर तक जाती है।
राघवेन्द्र की तीव्र इच्छाशक्ति से प्रभावित, उससे प्रेरित राघवेन्द्र के माँ-बाप और कॉलोनी के दूसरे धनी-मानी परिवारों के आर्थिक सहयोग; संगी-साथियों के अनथक-अनवरत परिश्रम, गाँव के बडे-बुजुर्ग की आशीषों-आशीर्वादों तथा कारगर सुझावों पर अमल करते हुए झोपड-पट्टी के लडके-लडकियों को शिक्षित करने के लिए एक प्राथमिक विद्यालय का शुभारंभ हुआ। साथ ही, सायंकालीन प्रौढशाला भी शुरू हुई जहाँ उम्रदराज स्त्री-पुरुषों को साक्षर करने के अलावा लडकियों-महिलाओं को सिलाई-बुनाई और कढाई, मिट्टी एवं काठ के खिलौने आदि बनाने के हुनर का प्रशिक्षण दिया जाता है।
कॉलोनी के संचित फंड से झोंपड-पट्टी के बच्चे-बच्चिय, यहाँ तक कि अन्य, शिक्षणार्थियों के लिए उनकी जरूरत का हर सामान, सिलाई मशीनें, खिलौने आदि बनाने की सामग्री, पाठ्य पुस्तके, संदर्भ सामग्री, कॉपियाँ, पेन-पैंसिल, बस्ते (स्कूल बेग्स), उनके घर-बाहर के कपडे, जूते-चप्पल आदि सभी-कुछ देकर उनकी मदद की जाती है। बीमारी की हालत में उनकी सेवा-सुश्रुषा
सुनिश्चित की जाती है। उनमें दवाएँ, भोजन-दूध आदि के निःशुल्क वितरण की व्यवस्था है। उन लोगों को अपने शरीर, घर और अपने आस-पास को स्वच्छ रखने के बारे में बताकर इस दिशा में उन्हें जागरूक बनाया जाता है। अपने नागरिक अधिकारों को लेकर भी सचेत किया जाता है, ताकि वे अच्छे, सभ्य एवं निष्ठावान नागरिक
बन सके।
राघवेन्द्र ने झोपड-पट्टी के भूखे बेबसों को बंगलों-कोठियों से दरवाजे पर फेंकी जूठन को कुत्तों-सूअरों के साथ लडते-झगडते, जूझते हुए, छीनकर खाते देखा है। इन शर्मनाक स्थितियों को बदल पाना अकेले राघवेन्द्र के बूते में नहीं। देश से गरीबी-लाचारी के समूल उन्मूलन के लिए संकल्प के साथ हम सभी को उठ-खडा होना होगा। मंजिल खासा दूर है। हमें एक लम्बा रास्ता तय
करना है। ?
स्वास्तिक फैशन रेडीमेड गारमेंट्स शोरूम, लक्ष्मीनगर, पावटा
‘बी’ रोड, जोधपुर-३४२००६ (राज.)