उसका खत

श्याम जांगिड


कश्मीर के बारामूला के पास एक गाँव का पहाडी क्षेत्र। काठ के बने घर। ऊँचे-ऊँचे दरख्त। टेढे-मेढे पहाडी रास्ते। यह १९९० की बात है।
वह ऊँची टेकडी पर बने उस घर के बगल से गुजर रहा था, कि ऊपर से एक नारीकंठ ने पुकारा- ‘‘हरिकिशन भाई, आज मेरा खत
नहीं आया?
उसने रुककर ऊपर की ओर देखा। फिर मुस्कुराते हुए बोला- ‘आता तो दे न जाता।’
‘कहाँ दे जाते, इन दिनों तुम कोई खत नहीं लाए। दो-महीने हो गये।’ अब हरिकिशन इसका क्या जबवा दे? बडी भोली लडकी है। वह तो डाकिया है! भला बिना डाक आये वह इस लडकी को कहाँ से खत दे। वह हँसने लगा। बोला-जुबेदा जब भी तुम्हारा खत आएगा, तुम्हें जरूर मिलेगा। तुम चिन्ता मत करो।
वह थैला लटकाए आगे बढ गया। वह थोडा ही ऊपर गया होगा, जुबेदा ने फिर आवाज लगाई- हरिकिशन भाई, ऐ हरिकिशन! जरा ऊपर तो आओ। अम्मी बोल रही है।
कोई काम है?
हाँ, काम है तभी तो बुला रही है, जुबेदा ने कहा और ओझल हो गयी।’ वह वापस मुडा और उसके घर तक जाने वाली पगडंडी से चढने लगा। जब वह ऊपर पहुँचा, जुबेदा रोज की तरह अपने घर के फाटक पर खडी थी। हर दोपहर जब वह डाक लेकर बारामूला से आता है, जुबेदा यहीं खडी उसकी राह देखती रहती है- शायद, आज कोई खत आये! लेकिन उसका खत तो कभी-कभार ही आता है, फिर भी वह रोज खत की उम्मीद में खडी रहती है। शायद संडे को भी खडी रहती होगी।.... बेचारी लडकी!
सामने बने चबूतरे पर अम्मीजान जोहर की नमाज पढ रही थी। वह अपना थैला चबूतरे पर रखकर बैठ गया।
‘अम्मी नमाज पढ लेती है। तुम बैठो, मैं चाय बना लाती हूँ।’ वह रसोई की ओर चली गयी। उसने कुछ नहीं कहा। वह जानता है, यदि मैं चाय के लिए मना भी करुँगा तो भी जुबेदा मानेगी नहीं। वह ऊँची टेकडी पर
बने उस घर के दालान को देखने लगा। इस समय
तीन-चार मुर्गियाँ पेडों के नीचे घूम रही थीं।
‘आज अब्बा कहाँ गये?’ उसने पूछा।
‘उनकी तबीयत नासाज है। वे हकीम कुरेशी के यहाँ गये हैं।’ जुबेदा रसोई घर से बोली।
अरे बेटा, हम दोनों तो बीमार ही चलते रहते हैं। अम्मी ने नमाज अदा कर ली थी और उसकी तरफ मुखातिब हुई- ‘बेटा, अल्ला तआल्ला का दिया सब कुछ है। लेकिन हम तो इस महबूब...
‘... अम्मी सारे सुख एक जगह कहाँ मिलते हैं...?’ उसने बात काटते हुए कहा। वह जानता था, अम्मी क्या कहेगी। वह जुबेदा के शौहर महबूब की बदकारी का रोना रोएगी। जब से महबूब जहाद में शामिल हुआ है- बेचारी जुबेदा का जीवन दो-राहे पर खडा है। तीन वर्ष पहले महबूब और जुबेदा का निकाह हुआ था। लेकिन निकाह के कुछ दिन बाद ही महबूब जहाद में शरीक हो गया। पहले पाकिस्तान के फिदायनी कैम्पों में गया। फिर छः महीने बाद वापस आया। आया भी केवल दो-दिन के लिए। उस वक्त अब्बा- अम्मी ने उसे बहुत समझाया। ‘बेटे यह रास्ता छोड दो। यह अच्छा रास्ता नहीं है। तुम जुबेदा को ले जाओ और अपने घर पर सुकून से रहो। इस जहाद में मौत के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।’ लेकिन महबूब नहीं माना। बोला, कौम के लिए मरना सवाब का काम है। तब अम्मी ने गुस्से में आकर कहा था- ‘तो फिर तू ऐसा कर जुबेदा को तलाक दे दे और चला जा, जहाँ तू जाना चाहे। ... हमारा पिण्ड छोड।’ जुबेदा से तलाक की बात पर वह नरम पड गया। बोला- ‘ठीक है, मैं जुबेदा को अपने घर ले जाऊँगा। मैंने इस से निकाह किया है। यह मेरी बीवी है। मैं इसके लिए जहाद छेड दूँगा।’
जुबेदा अपने शौहर की यह बात सुनकर जैसे महकते गुलशन में पहुँच गयी हो। अम्मी-अब्बू भी खुश हुए। लेकिन दो-दिन वह वहाँ रहा। तीसरे दिन रात को वह सभी को सोया छोडकर गायब हो गया और आज तक
नहीं लौटा। हाँ, वह जुबेदा को यह विश्वास दिला गया था कि मैं आऊँगा। तुम मेरा इंतजार करा।
... इंतजार और इंतजार। जुबेदा के लिए केवल इंतजार। अब दो-तीन महीने से उसका बिना पता लिखा कोई खत आ जाता है। बस!
अम्मी! जुबेदा कोई काम बता रही थी। क्या काम था? हरिकिशन ने कहा। ‘यह ले दस रुपये- पाँच रु. के पान और पाँच रु. की नसवार की डिब्बी ले आना।
अम्मी तुम तम्बाकू खाती भी हो और सूँघती
भी हो।
तुम कुछ भी कहो बेटा, बिना जर्दे के मुझ से रहा नहीं जाता। यह जुबेदा तो कहती है, अम्मी तुम्हारे पास बैठा ही नहीं जाता। नाक से तंबाकू की बू आती है।
इससे पहले कि वह हँसता, जुबेदा रसोई से हँसती हुई बाहर आ गयी थी।
उसके हाथ में दो चाय के गिलास थे। उसने एक गिलास हरिकिशन को और दूसरा अम्मी को दे दिया। उनके यहाँ चाय पीने पर अम्मी बहुत खुश होती है। इसलिए कि वह हिन्दू होकर भी उनकी चाय पी लेता है। पहले-पहल जब जुबेदा के भाई का मनी ऑर्डर आया था, तब घर में चाय बनी हुई थी। मनी ऑर्डर का भुगतान करने के बाद जब वह जाने लगा तो जुबेदा ने उसकी ओर चाय का गिलास बढाते हुए कहा था, ‘लो चाय पी लो।’ तब वह जुबेदा को मना नहीं कर सका। बस उसके बाद जब भी वह इस घर में आता है उसे चाय पीनी ही
पडती है।
‘अब मैं चलूँ।... काफी दूर जाना है।’ वह झोला कंधे से लटकाकर खडा हो गया। जुबेदा उसे जाते हुए देखती रही। वह पगडंडी उतर गया। यूँ तो उसे इस छोटे से गाँव में सभी जानते हैं, पर जुबेदा के घर से उसका संफ घरेलू-सा हो गया था। उनके घर का कोई छोटा-मोटा काम करते हुए उसे खुशी होती। सब से ज्यादा खुशी उसे जुबेदा के शौहर का खत देने में होती। जिस दिन जुबेदा का खत उसके थैले में हता, उस दिन उसके पैरों को जैसे
पंख लग जाते। वह दूर से ही लिफाफे को हवा में हिलाता। जुबेदा उसके हाथ में लिफाफा देखकर लग-भग दौडती हुई पगडंडी उतर आती। फिर वह उसे आगे नहीं जाने देती। कहती ऊपर चलो। लेकिन यह मौका काफी इंतजार के बाद नसीब होता।
दूसरे दिन भी उसका खत नहीं आया था। जुबेदा दूर से ही समझ गयी थी, क्योंकि हरिकिशन ने कोई खत हवा में नहीं लहराया। अम्मी ने जो चीजें मंगवाई थी, उन्हें सुपुर्द करने वह ऊपर गया। आज जुबेदा का वह उदास चेहरा दिन भर उसके सामने घूमता रहा। कल भी उसका खत नहीं आयातो वह कितनी निराश होगी, उसने सोचा। दो-महीने हो गये, वह अपने शौहर के खत की प्रतीक्षा में दुःखी है। एक-एक दिन बीतते कई हफ्ते निकल गये। उसका कोई खत नहीं आया। वह रोज दोपहर को अपने घर के फाटक पर खउी उसका इंतजार करती। हरिकिशन से ‘ना’ सुनकर उसका चेहरा बुझ जाता।
गर्मी से सर्दियाँ आ गयीं। कश्मीर में इस मौसम में बर्फ ही बर्फ हो जाती है। सब कुछ ठहर जाता है। लोगों के क्रिया-कलाप सिकुड जाते हैं। ऐसे मौसम में वह कोई १०-१५ दिन से जा पाता। पूरी सर्द ऋतु बीत गयी, उसके शौहर का कोई खत नहीं आया।
जब गर्मियां शुरु हुई, तब एक दिन जुबेदा उसे बाजार में मिल गयी।
‘आज क्या खरीदने आ गई जुबेदा?’
‘अम्मी के लिए सलवार-जंफर का कपडा लेने आई थी।’
‘ले लिया?’
‘हाँ’
‘अब घर जा रही हो?’
‘हाँ’
‘कहो तो घर तक छोड दूँ।’
‘नहीं, मैं चली जाऊँगी।... तुम बहुत दिन हुए हमारे घर नहीं आए!’
‘कैसे आता? तुम्हारा खत जो नहीं आया।’
वह कुछ नहीं बोली। उसके चेहरे पर उदासी
छा गयी।
आखिर एक दिन उसने जुबेदा की उदासी दूर करने के लिए एक कागज पर उर्दू में यह लिखा- ‘जुबेदा तुम्हारे शौहर का खत जरूर आएगा। तसल्ली रक्खो। खुश रहो।’ और लिफाफे में डालकर उसके घर गया। अपने शौहर का खत समझ वह खिल उठी। अम्मी-अब्बू से परे हटकर उसने लिफाफा खोला। कागज निकालकर मजमून पढा। उसकी आँखें भर आईं।
झूठी तसल्ली का वह कागज उसे रुला गया।
अम्मी बोली- ‘क्या लिखा है री’
जुबेदा कुछ नहीं बोली। कमरे में चली गई।
अम्मी बमकने लगी- ‘लिखा होगा, कि तुम्हारी अम्मी से कहना, मैं जल्द ही आ रहा हूँ।... मुंआ आएगा- अम्मी के मरने के बाद...’
‘तुम जुबेदा को इस तरह मत बोला करो’ पास ही बैठे अब्बा ने कहा- ‘इस बेचारी का क्या कसूर है?’
‘न बोलूँ तो क्या करुँ? जो जहाद में चला गया उसका कोई ठिकाना है? कभी खत दिल्ली से आता है, कभी मुंबई से, कभी हैदराबाद से, कभी कानपुर से। अब तुम ही बताओ इस जुबेदा को लिए हम कब तक बैठे रहेंगे। महबूब के माँ-बाप को तो मतलब नहीं अपनी बहू से। उन्होंने तो महबूब को बेच दिया जहादियों को।
कमरे से जुबेदा के रोने की आवाज आने लगी थी। अब अम्मी चुप हो गयी। इस दर्द भरे मंजर को देख, अफसोस हुआ। उसने तो जुबेदा की खुशी के लिए वे हर्फ लिखे थे...
कुछ दिनों बाद जुबेदा के भाई सलीम के दो खत आए। उसने अपने अब्बा जान को लिखा कि जुबेदा का निकाह कहीं ओर कर दो। महबूब के लिए बैठे रहना बेकार है। वह आतंकवादी है। मुल्क में बुरी-बुरी खबरें आ रही हैं। रोज यहाँ दहशतगर्द मारे जा रहे हैं।
लेकिन जुबेदा दूसरे निकाह के लिए राजी नहीं हुई। उसे पक्का यकीन था, कि महबूब जरूर आएगा। उसने वादा किया था।
.... और वाकई वादे के मुताबिक एक दिन महबूब का खत आया। उसने लिखा कि मैं मोहर्रम की २७ तारीख को आ रहा हूँ। यह खत उसने अब्बा के नाम लिखा था। उसने लिखा था कि मैंने जहाद से तौबा कर ली है।
जुबेदा का शौहर २७ तारीख को आया या नहीं, वह नहीं जान सका। क्योंकि इससे पहले ही उसका तबादला श्रीनगर हो गया था। इस बीच क्या हुआ उसे नहीं मालूम। हाँ, इस खबर से वह खुश था, कि महबूब ने जहाद से तौबा कर ली है। यदि महबूब का खत न आया होता तो बारामूला छोडते वक्त उसके दिल पर एक बोझ-सा रहता।
लेकिन श्रीनगर वह एक साल तक ही रह पाया। उसका तबादला वापस बारामूला हो गया। इस तबादले के लिए उसने ही कोशिशें की थीं। उसका घर बारामूला में ही था। यहाँ आते ही वह जुबेदा के बारे में जान लेना चाहता था। उसका शौहर आया होगा। अब वह यहीं है या ससुराल चली गयी। देखूँ? दो दिन बाद वह उस गाँव गया। उसे दूर से ही जुबेदा का वह घर जो ऊँची टेकडी पर बना था, दीख गया। वहाँ उस जगह, फाटक के पास वह खडी रहती थी। खत का इंतजार करती हुई।
वह पगडंडी चढकर उस घर तक पहुँचा। लेकिन यह क्या? वहाँ कोई नहीं था। सामने दोनों कमरों पर ताले लटक रहे थे। ऐसा लगा जैसे एक अर्से से वहाँ कोई नहीं रह रहा। एकदम उजाड और सूना घर। वह वहां खडा सोचता रहा- आखिर ये लोग कहाँ गये? वह भारी मन से पगडंडी उतर आया। वह आगे न जाकर वापस ढलान की ओर गया जहाँ, कमरुद्दीन मलिक का घर था। वहाँ जाकर उसने उन लोगों के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि पिछले मोहर्रम महीने की बात है। जुबेदा का शौहर आया था। दिन में मिट्ठाइयाँ बाँटी गयीं। लेकिन भाई रात को ही उन
पर कहर टूट पडा। पांच-छः दहशतगर्द आ धमके। बंदूक की नोक पर महबूब को अगवा करने आये। बूढे-बुढिया को उन्होंने कमरे में बंद कर दिया। जुबेदा ने उनका विरोध किया, मिन्नतें कीं। बोली, खुदा के लिए इसे छोड दो, मैं तुमसे भीख माँगती हूँ। रहम करो।
लेकिन वे नहीं माने। आखिर जुबेदा ने महबूब को बाँहों में जकड लिया। या खुदा! रहम कर! फिर भी दहशत गर्द नहीं पसीजे। उन्होंने बामशक्कत उसे महबूब से अलग किया और उस बेचारी को गोली मार दी।... और महबूब को अपने साथ लेकर चले गये। शायद वे उसका इस्तेमाल ‘इंसानी बम’ के रूप में करेंगे। जुबेदा के अम्मी-अब्बा आजकल अपने बेटे के पास कटरा में हैं।
जुबेदा का यह अंत सुनकर उसे बडा दुख हुआ। वह वहाँ से चल पडा। आगे वह जुबेदा के उस घर के बगल से गुजर रहा था, तो ऊपर से किसी ने आवाज दी- ‘ऐ हरिकिशन भाई, मेरा कोई खत नहीं आया?’ उसने ऊपर देखा। वहाँ कोई नहीं था। एक कौवा मुंडेर पर बैठा काँव-काँव कर रहा था। ?

‘पाणिनि कुटीर’, डालमिया स्कूल के पास, न्यू कॉलोनी
पो. चिडावा (झुन्झुनू)-३३३०२६ (राज.)