साग और मेथी वाला टोडा

राजेश गुप्ता


‘‘ले भोलू, साग खा ले, मेथी वाले टोडे (मक्की की रोटी) के साथ, अपने हाथ से बना कर लाई हूँ’’ मुडे-तुडे पुराने अखबार के कागज में मक्की से बनी रोटियाँ और स्टील के डिब्बे में सरसों का साग टेबल पर रखते हुए बीबी बोली। उसकी साँस फूल रही थी। चेहरे से वह कुछ परेशान और थकी-थकी सी दिख रही थी।
‘‘पैरी पैणा बीबी’’ बीबी के अचानक सामने आते ही वह कुर्सी से आदर सहित खडा हो गया।
‘‘पैरी पैणा बीबी जी’’ उसके पास बैठे उसके मित्र ने भी बीबी को ना जानते हुए भी बडे सत्कार से कहा।
‘‘जीते रहो, मेरे बच्चो’’ बीबी ने भोलू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा और मातृत्व वाले अंदाज में उसका माथा चूम लिया और फिर प्यार से उसे अपने सीने से लगा लिया। तदुपरान्त उसके समीप बैठे उसके मित्र के सिर पर भी हाथ फेरा। इतने में ऑफिस का पियून बीबी के लिए कुर्सी ले आया। बीबी कुर्सी के अग्र भाग पर ऐसे बैठी जैसे अभी उठने वाली हो।
‘‘बीबी, आराम से बैठ जाओ’’ भोलू ने आग्रहपूर्वक कहा। ऑफिस का वातावरण एकदम ममता-भरी आभा से सराबोर हो उठा। हर चीज जैसे आशीर्वाद के आभामंडल से जगमगा उठी।
‘‘बीबी, और सुनाओ, क्या हाल-चाल है आपका?’’
‘‘बस ठीक है पुत्र, तुम सुनाओ अपना, मेरी बहूरानी और बच्चों का क्या हाल है?’’
‘‘बीबी सब ठीक है, बच्चे और तुम्हारी बहूरानी भी’’
‘‘बडा काका अब क्या करता है बेटा?’’
‘‘बीबी, इंजीनियरिंग कर रहा है’’
‘‘अच्छा है, और छोटा’’ बीबी ने बडी आत्मीयता से पूछा।
‘‘बीबी, वो अभी बारहवीं कर रहा है’’
‘‘भोलू, तुम्हें माँ की तो बहुत याद आती होगी’’ बीबी ने चेहरे पर संवेदना लाते हुए पूछा।
‘‘हाँ बीबी, बहुत याद आती है माँ की, मेरी माँ बहुत अच्छी थी। उसके जैसा कोई नहीं है बीबी, मेरा छोटा बेटा भी मां को बहुत याद करता
है, बहुत स्नेह था उसका माँ से, अब भी वह अक्सर माँ को याद करके आँख भर लेता है’’ भोलू ने भावुकता
से कहा।
‘‘बहुत अच्छी थी तुम्हारी माँ भोलू, बहुत प्यार सत्कार था उसके पास, बन्दे को पहचानने वाली औरत थी, बहुत दूर की नजर रखती थी’’ बीबी ने अंतहीन दृष्टि से ऑफिस की दीवार पर लगी घडी को ताकते हुए कहा।
‘‘हाँ बीबी, यह तो आपने ठीक कहा, जो उन्हें एक बार मिलता, वो उन्हें कभी भी भूल ना पाता’’ भोलू लगातार बीबी से बतियाता रहा। पास बैठा उसका मित्र मुँह से कुछ भी ना बोला। बस उनकी बातें सुनता रहा। उसे ऐसी बातों में बहुत आनन्द आ रहा था। उसने ऐसी बातें शायद पहले कभी नहीं सुनी थी। ऑफिस का वातावरण कमाल का था। किसी का मन भी वहाँ से जाने को
ना था।
‘‘बीबी और सुनाओ, मेहर कैसा है?’’
‘‘ठीक है पुत्र, काम पर जाता है अब’’
‘‘कहाँ जाता है काम पर, बीबी?’’
‘‘एक धार्मिक स्थल पर सेवादार का काम करता है, सुबह आठ बजे जाता है और शाम को छः बजे घर लौटता है।’’
‘‘बीबी, अब तो शराब नहीं पीता होगा मेहर?’’
‘‘नहीं पुत्र, अब नहीं पीता’’ बीबी सकुचाते
हुए बोली।
‘‘चलो अच्छा है, अपना घर सम्भालता है।’’
‘‘हाँ पुत्र’’ बीबी कुछ देर खमोश रही। फिर थोडी देर बाद बात पलटते हुए बोली।
‘‘बहुत दुःख दखे थे तुम्हारी माँ ने बेटा, तुमने भी बहुत मेहनत की थी अपनी माँ के साथ। बच्चे अच्छे हो तो माँ-बाप का जीवन सफल हो जाता है बेटा। जीवन ही नहीं बल्कि उनका मरना भी सार्थक हो जाता है।’’ बीबी भावनाओं के समुद्र में डूबती जा रही थी।
‘‘हाँ बीबी, यह बात तो ठीक है’’
‘‘चलो तेरी माँ इस बात पर सुख की साँस ले कर गई है इस दुनिया से, अशके पुत्र अशके तेरे’’ बीबी ने गर्व से गर्दन उठा कर कहा।
‘‘बीबी, बहुत मुश्किल से छुडवाई थी तुमने मेहर की शराब, कितना इलाज करवाया था तुमने उसका’’
‘‘हाँ पुत्र, बहुत बुरे दिन दिखाये हैं रब ने मुझे, लेकिन क्या करना, उसके आगे तो किसी की भी नहीं चलती है न। उसकी मर्जी के आगे तो सबको सिर झुकाना ही पडता है बेटा। बिना मर्द के इस दुनिया में जीना बहुत कठिन है, उस पर यदि औलाद अच्छी ना निकले तो फिर पूछो मत कि क्या गुजरती है, मैं बता नहीं सकती। मुझे मालूम है कि मैंने कैसे समय बिताया है। अनपढ औरत थी मैं और भर-जवानी में विधवा हो गई, मत पूछो पुत्र।’’
‘‘हाँ यह तो ठीक है, बीबी।’’
‘‘हाँ पुत्र, लेकिन सफेद-लिबासों में समाज में भेडिये फिरते हैं। मैंने देखा है उन दरिंदों को, ये वे लोग हैं जो इन्सानियत के दुश्मन है और समाज को खोखला कर रहे हैं। ये वो लोग हैं जो अपने थोडे से फायदे के लिए लोगों को मौत के मुँह में झोंक देते हैं।’’
‘‘हाँ बीबी, यह तो तुमने ठीक कहा।’’
‘‘यही वे लोग हैं जिन्होंने मेहर को नशे की आदत लगा दी थी, मैम्बर तो थे ये धार्मिक स्थल पर मेहर से काम करवाते थे घर का और थोडी पिला कर देर-रात तक काम करवाते रहते। बस वहाँ लग गई उसको नशे की लत, ‘‘बीबी व्यथित-हृदय से सारी बातें बताती रही और अपना मन हल्का करती रही। उसकी बातों से ऐसा लग रहा था जैसे आज तक किसी ने भी उसका दुःख सुना ना हो। बातें करते-करते बीबी की आँखें भर आयीं। वह ऐसे बातें कर रही थी जैसे किसी अपने हमदर्द से बातें कर रही हो। भोलू भी उसकी बातें बडी आत्मीयता से सुन रहा था। उसे याद है जब वह छोटा-सा था तो बीबी उनके घर दूध लेकर आया करती थी क्योंकि मेहर का बाप कुछ वर्ष पहले मर चुका था। मेहर के अलावा उसकी दो लडकियाँ भी थीं। एक मेहर से बडी और एक छोटी। थोडा बडा होने पर मेहर दूध लेकर आने लगा था। भोलू की माँ और बीबी के बीच बहुत अच्छा रिश्ता बन गया था। दोनों विधवा थीं। दोनों का दुःख एक जैसा ही था। दोनों का परिवार जीवन के बडे संघर्षों से गुजर रहा था। आहिस्ता-आहिस्ता भोलू ने अपने पिता के कारोबार को सम्भाल लिया और मेहर
किसी धार्मिक-स्थल में सेवादार के काम पर लग गया। ऑफिस का वातावरण अभी भी मोह-ममता की सुगंध से महक रहा था।
‘‘बीबी, बहूरानी के बारे में सुनाओ, ठीक है, सेवा करती है आपकी क्या?’’
‘‘बहूरानी तो ठीक है, घर अच्छे से संभालती है, मेरी सेवा भी बहुत करती है पर?’’
‘‘पर क्या.....?’’ भोलू ने बीबी के कंठ से रुकी आधी-अधूरी बात को निकालने का प्रयत्न करना चाहा।
‘‘क्या बताऊँ बेटा......’’ वह कुछ रुकी।
फिर बोली।
‘‘क्या बताऊँ, मेरी लडकियों से नही बनती उसकी,’’ बीबी बोलते-बोलते ही एकदम दुःखी सी
हो गई।
‘‘बीबी, फिर क्या हुआ, दुःखी मत हो, अपना घर तो संभालती है ना, तेरे पोते-पोतियों को तो संभालती है ना, तेरे बेटे से तो ठीक हैं न,’’ भोलू ने बीबी को सांत्वना देते हुए कहा।
‘‘पुत्र, अपने जायों के लिये तो जानवर भी करते हैं, मजा तो तब है जब दूसरों की लिए कुछ किया जाए’’ बीबी कर्कश-स्वर में बोली।
‘‘चलो बीबी, फिक्र ना किया करो’’
‘‘नहीं पुत्र, उसकी मेरी बेटियों से नहीं बनती, यह सोच कर मेरा मन बहुत दुःखी होता है। वह कौन-सा इन से कुछ माँग रही है, भगवान का दिया सब-कुछ तो है उनके पास, दो बोल ही तो बोलने होते हैं मीठे, और क्या चाहिए उनको? सारी जमीन-जायदाद तो दे दी उन्होंने लिख कर इनको, फिर भी ऐसा हो तो किसे बुरा ना लगेगा भला?’’ बीबी प्रश्न-चिन्ह चेहरे पर लाते हुए बोली। उसकी आँखों से जैसे नाराजगी के दो मोती छलकने को ही थे।
‘‘बीबी, तू चिंता मत किया कर, तेरी बेटियाँ अपने घर में सुखी हैं ना, और तुम्हें क्या चाहिए?’’
‘‘हाँ बेटा, छोटा जमाई थोडा गुस्से वाला है पर फिर भी ठीक है, रोटी तो कमा कर खिला रहा है न,
चलो, भगवान आयु लम्बी करे उनकी, तंदुरुस्तियाँ
बख्शे उनको।’’
‘‘चलो बीबी, आहिस्ता-आहिस्ता सब ठीक हो जायेगा, चिंता मत किया करो।’’
पुत्र, घर से अगर बेटियाँ नाराज हो कर जायें तो तुम्हें क्या पता कि माँ के दिल पर क्या बीतती है’’ बीबी की आँखों में अटके आँसू आखिर छलक ही पडे।
‘‘बीबी, वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा’’ भोलू ने बीबी को सांत्वना देते हुए कहा।
‘‘माता जी, चिन्ता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, अच्छा बीबी पैरी-पैणा ‘‘भोलू के पास बैठे उसके दोस्त से भी जैसे रहा ना गया। इतना कह वह वहाँ से चला गया। उसके बोलने से माहौल में कुछ बदलाव आया।’’
‘‘भोलू, चल साग और मेथीवाला टोडा (मक्की की रोटी) खा ले अब, मैं खुद अपने हाथों से बना कर लाई हूँ। बहूरानी तो काम कर रही थी। मैं ही जल्दी-जल्दी बना लाई। सोचा आज भोलू को मिल कर आती हूँ। बहुत मन कर रहा था तुमसे मिलने का’’ बीबी अपनी सारी परेशानियों से बाहर आकर बोली।
‘‘अच्छा पुत्र, चलती हूँ, बहुत देर ही गई, बहूरानी इंतजार करती होगी’’ बीबी दुपट्टे से अपनी आँखें पोंछती हुई बोली।
‘‘साग-टोडा मुझे बहुत स्वाद लगता है,’’ भोलू ने टोडे वाले मुडे-तुडे अखबार वाले पैकेट और साग वाले डिब्बे की सुगंध लेते हुए कहा।
‘‘बेटा, माँ के हाथ का है, स्वाद क्यों नहीं होगा?’’
‘‘रहने दे, पर्दा ही रहने दे बेटा, क्या बताऊँ , अब तुम से क्या छुपाना, पता नहीं कहाँ से गोलियाँ ले कर खाता है नशे की, अब मैं क्या करुं?’’ बाहर खडे मेहर के स्कूटर पर बैठने से पहले बीबी ने भोलू के कान के पास आकर कहा। भोलू दूर तक बीबी को स्कूटर पर जाते हुए देखता रहा। मेहर के स्कूटर से लेकर भोलू के मस्तिष्क तक की दूरी में कुछ चलता रहा जिसे भोलू हल करने का प्रयास करता रहा। ?
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