स्वेटर के फंदे

डॉ. पूनम गुजरानी


सूरज अस्ताचल की ओर धीरे-धीरे सरकते हुए अपनी लालिमा के निशान नीलगगन पर छोड रहा था। ऐसा लग रहा था, मानो किसी सुहागन के हाथ से सिंदूर की भरी डिबिया छूट गई हो। पंछियों के झुंड घरों की ओर लौटने लगे थे। कतारबद्ध उडते हुए पंछी समाज को एकता, भाईचारा और शांतिपूर्ण सहअस्तित्त्व का संदेश दे रहे थे। पर इससे अनभिज्ञ समाज ऑफिस, स्कूलों, दुकानों में अभी भी अपने-अपने कार्यों में पूरी तरह व्यस्त था। बगीचों में बच्चे जिस मस्ती के साथ खेलने, झूला झूलने व फिसलपट्टियों का आनंद लेने में व्यस्त थे वो देखते ही बनता था। शहर से थोडी दूर गाय, बैलों के गले में बजती घंटियाँ वातावरण में मीठास घोल रही थी। बछडे अपनी माँ के साथ-साथ चलते हुए बीच-बीच में रँभाने का स्वर करते तो गाय उन्हें चाट चाटकर अपना ममत्व भाव जताती। दूर कहीं कोई चरवाहा मीठे से गीत की धुन ‘‘आ जा ओ राधा रानी तुझको पुकारे कान्हा की प्रीत’’ गाकर वातावरण को रसीला बना रहा था।
इन सबसे बेखबर सोसायटी के गार्डन में एकाकी बैठी श्यामा के मन में अजीब सी उथल-पुथल मची थी, पर उसके हाथ स्वेटर बुन रहे थे। उल्टे-सीधे फंदे बुनते बुनते उसकी कलाइयाँ दुःखने लगी थी। दिमाग दुःखने लगा था, राधिका के बारे में सोचते-सोचते...।
राधिका तूने ऐसा क्यों किया... श्यामा बुदबुदाई और उसकी आँखों में हल्की सी नमी उतर आई। उसने स्वेटर एक तरफ रखने के लिए सलाइयों की ओर देखा तो पाया कि स्वेटर के बीच से कुछ फंदे गिर गये हैं। उसे खीज सी होने लगी, अब इन फंदों को फिर से उठा कर स्वेटर के साथ
सहेजना होगा।
सहेजना क्या इतना आसान है...? जिन्दगी को सहेजते-सहेजते जिन्दगी ही हाथों से निकल जाती है। बंद मुट्ठियाँ खुल जाती हैं, शरीर शिथिल हो जाता है और आँखें भावशून्य... चिता पर लेटा हुआ इन्सान कहां जानता है कि इसे सहेजने की प्रवृत्ति के बावजूद जीवन के महासंग्राम में उसने क्या खोया... क्या पाया...? भूत... भविष्य... वर्तमान... सब कुछ धराशायी हो जाता है। पर जब तक जीवन है सहेजना भी जरूरी है। कभी रिश्ते-नाते,
कभी स्वास्थ्य, कभी पद, पैसा, नाम, शोहरत तो कभी भोगा हुआ अतीत... और इन सब से अलग भविष्य के नामुराद, शानदार सपनें, ख्वाहिशें।
हालाँकि जिन्दगी की जरूरतों के आगे किसी की नहीं चलती। इसी में घनचक्कर बना इन्सान पूरा जीवन जरूरतों के हवनकुंड में डाल देता है। इच्छाओं की समिधा जलाते-जलाते कब वह स्वयं राख हो जाता है, उसे पता ही नहीं चलता है। जिन्दगी को हँसी-खुशी से जी लेना तो बस अपने अपनों के सहारे ही हो पाता है। इन सबसे बेखबर प्रत्येक व्यक्ति सपने देखता है पर सपने पूरे हो या न हो, एक बंद दरवाजे के खुलने की आस में सदैव सपनों की घंटी बजाता ही रहता है।
सपनों का खयाल आते ही श्यामा ने गरदन झटकी, काश। कोई अपना ही न हो तो जिन्दगी कितनी सपाट स्थिर हो सकती है...। पर इन सपनों के बिना जीवन ही कहाँ रहेगा। सपने हैं तो रस है, साज है, श्रृंगार है, भावनाएं हैं, प्यार है और विश्वास है, जीवन का आधार है, जिजीविषा है, अन्यथा जीवन तपते हुए रेगिस्तान से ज्यादा क्या है...? उसके सोचने का क्रम कुछ और चलता कि तभी
तीन-चार हँसती खिलखिलाती हुई आवाजें उसके पास
आ गई।
श्यामा ने गर्दन उठाकर देखा, सोसायटी की पाँच-छः महिलाओं की आकृतियाँ अब उसे साफ नजर आने लगी थीं। उसने हाथ में पकडी सलाइयों को ऊन के गोले में खोंस कर एक तरफ रख दिया और सहज होने की कोशिश में कुछ और असहज हो गई।
वे महिलाएँ अब उसके आस-पास जमा हो गई थीं। श्यामा ने देखा सबके चेहरे चंचल,स्मित, अर्थपूर्ण अंदाज में चमक रहे थे। उससे पहले कि वो कुछ बोलती एक ने तीर छोडा-क्यों री श्यामा, तुझे तो खबर ही होगी की राधिका घर छोडकर कहाँ भाग गई है? वैसे प्रश्नकर्ता के मुख-मंडल पर कहीं कोई जिज्ञासा का भाव नहीं था, थी तो अर्थपूर्ण, दर्प से चूर एक ऐसी हँसी जो श्यामा को भीतर ही भीतर तिरोहित कर रही थी।
राधिका घर छोडकर चली गई थी....तो इसमें श्यामा का क्या कसूर है?.... क्या जानना व समझना चाहती हैं ये विलक्षण महिलाएँ...? क्या इन्हें राधिका का घर छोडकर चले जाने का अफसोस है? या फिर इनके लिए राधिका का घर छोडकर जाना बातें बनाने का एक नया अनछुआ मुद्दा...। कम से कम कुछ दिनों के लिए तो सास-बाहू, किटी पार्टी, फैशन या बच्चों के बोरिंग टॉपिक से छुटकारा मिलेगा। कैसे चटखारे ले लेकर बातें कर रहीं थीं ये सब।
श्यामा को वितृष्णा सी होने लगी। लगा कि जैसे ऊबकाई आ जाएगी...। कैसी अजीब सोच है इनकी... किसी का घर उजड गया और इन्हें हँसने से ही फुरसत नहीं है।
श्यामा के होंठ कुछ कहने के लिए थरथराए पर कंठ से आवाज ही नहीं निकली, लगा उसका गला प्यास के मारे सूख रहा है। उसने पास ही रखी बोतल खोलकर ठंडे पानी से गला तर किया तो याद आया, उसे ये महंगी बोतल भी तो राधिका ने ही भेंट की थी। हाँ... उन दिनों वह कहीं घूमने गई थी, आते हुए यही उपहार लेकर
आई थी।
राधिका जब भी कहीं जाती उसके लिए कुछ न कुछ अवश्य लेकर आती। श्यामा लाख मना करती पर वह नाराज होकर श्यामा की हथेलियाँ अपनी हथेलियों में कस कर पकड लेती। कहती... ‘‘इस भरी दुनिया में एक तुम ही हो, जिसे मैंने अपनी सहेली माना है। क्या इतना भी हक नहीं है मेरा...।’’ कहते-कहते राधिका की आँखों में नमी उतर आती और श्यामा को न चाहते हुए उसका लाया उपहार स्वीकार करना पडता।
श्यामा और राधिका की दोस्ती का किस्सा भी निराला ही है। हुआ यूँ कि किसी सामाजिक संस्था ने ‘फ्रेन्डशिप-डे’ पर एक विशेष सेमिनार का आयोजन किया था जिसमें श्यामा बतौर वक्ता और राधिका अतिथि विशेष के रूप में आमंत्रित थी। दोनों मंच पर साथ-साथ बैठी थीं। लिहाजा कुछ औपचारिक बातों के दौरान यह पता
चला कि श्यामा जिस साधारण-सी बिल्डिंग के छोटे से फ्लेट में रहती है ठीक उससे थोडा पहले बने हुए बडे से बंगले ‘गुरु-आशीष’ की स्वामिनी है राधिका। जहाँ वो अपने नौकर-चाकरों के लवाजमे के साथ रहती थी।
श्यामा, श्याम वर्ण, साधारण रंग-रूप पर उन्नत कद काठी की महिला थी। जिसे अपने बौद्धिक व्यक्तित्व पर गर्व था। स्वाभिमान की चमक उसके काले रंग के साथ कस्तूरी की तरह थी जिसमें महकते हुए वो अपनी कमियों को एक ही झटके में नजर-अंदाज कर जाती थी। श्यामा के पास न रूप, न सौंदर्य और न ही पैसों से आने वाली सुविधाएँ, हाँ सुंदर सपने अवश्य थे। हालाँकि, वो किसी भ्रमजाल में नही थी। उसे पता था, उसके ज्यादातर सपने बस सपने ही रहने वाले है। पर पता नहीं क्यों
उसे कल्पनाओं के आकाश में विचरण करना अच्छा लगता था।
इसके विपरीत राधिका का चाँदनी-सा सफेद रंग, उस पर तराशा हुआ सुघड बदन, काली-काली बडी-बडी आँखे, ब्यूटी पार्लर से तराशी हुई धनुषाकार भौंहें, पतले खूबसूरत होंठ, लम्बी कद-काठी। भगवान ने शायद उसे फुरसत से बनाया था। कीमती साडियाँ व महंगे हीरे के लोंग पहने वह इतनी आकर्षक व्यक्तित्व की मलिका थी कि जहाँ से गुजरती लोग बस पलके उठा कर देखते रह जाते, पर उसकी आँखें सदैव उदासी से भरी रहती। जब कभी हँसती तो फीकी-सी हँसी उसकी उदासी की ओर गहरा कर जाती।
इन तमाम विरोधाभासों के बावजूद श्यामा व राधिका में गहरी दोस्ती थी।
श्यामा को वह मुलाकात ठीक-ठीक याद हो आई। जिसमें उसे विशेष संबोधन के लिए आमंत्रित किया था, श्यामा ने फ्रेन्डशिप डे पर लगभग पैंतालीस मिनट का भाषण दिया। लिखने व बोलने पर श्यामा का नैसर्गिक अधिकार रहा। इस बात का साक्षात् प्रमाण प्रस्तुत कर रही थी उसके बैठने पर बजने वाली तालियाँ।
उसके बैठते ही राधिका ने उसके आगे पानी की बोतल सरका दी तो वह मानो कृत-कृत्य हो गई। सचमुच लगातार बोलने से कंठ सूख रहा था। उसने पानी पीया व राधिका को धन्यवाद दिया तो राधिका ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा- क्या आप मुझे अपनी सहेली बनाना पसंद करेंगी?
फ्रेन्डशिप डे के मौके पर इतनी भावुकता से पुछे गए सवाल का क्या जवाब देती श्यामा। उसने पूरी गर्मजोशी से कहा, अरे क्यूँ नहीं, मुझे खुशी होगी।
तब से दोनों रोज-रोज मिलने लगीं। श्यामा केपास जहाँ बौद्धिक संपदा थी वहीं राधिका के पास आर्थिक संपदा, पर दोनों ने इसे अपनी दोस्ती पर हावी नहीं
होने दिया।
दोनों में घंटों बातें होतीं, साथ-साथ शॉपिंग करतीं पर अपनी-अपनी सामर्थ्य केअनुसार। श्यामा हमेशा कभी घर के लिए, कभी अपनी बेटी दिव्या, कभी बेटे मोहित के लिए तो कभी पति के लिए कुछ न कुछ खरीदती, उसके बाद ही स्वयं के लिए सोच पाती थी। उसके पति बैंक के ऑफिसर थे पर बँधी बँधाई आय और भविष्य की चिंता में श्यामा बेहद किफायती शॉपिंग करती, जबकि राधिका को किसी की चिंता नहीं थी। उसे सिर्फ खुद के लिए ही खरीदना होता था। उसका पर्स पैसों से ठसाठस भरा होता था। ऊपर से अलग-अलग बैंकों के क्रेडिट, डेबिट कार्ड, कभी राधिका महँगे कपडे या फिर ज्वैलरी खरीदती तो श्यामा उसे टोकती, राधिका हँसकर कहती- श्यामा तुम कहोगी तो नहीं खरीदूँगी पर मैं क्या करुँ, इसके अलावा मेरे पास है ही क्या, पति सदैव अपने व्यापार में उलझे रहते हैं। उन्होंने तो समय, प्यार, अपनापन सबकी कीमत मुझे दौलत से तौलकर पूरी कर दी है। बेटा अभी पाँच साल का है, पर उसे भी कुछ लायक बनाने के चक्कर में हॉस्टल भेज दिया है। अब कहाँ दिल लगाऊँ... तुम्हारे पास वक्त नहीं है और मेरे पास वक्त ही वक्त है...। राधिका की आंखों में एक गहरी उदासी उतर आती, जिसका सामना कर पाना श्यामा के वश में नहीं था।
धीरे-धीरे श्यामा ने उसे टोकना बंद कर दिया था। वह जान गई थी कि राधिका के पास एक अजीब से खोखलेपन के सिवाय कुछ नहीं है। उसे न पति का प्यार मिला न ही बेटा पूरी तरह उसका अपना है। पति में कुछ प्रॉब्लम थे। राधिका की जुबान में वो लगभग नपुंसक है इसलिए दूर भागता है अपनी पत्नी से, बहाने बनाता है व्यापार के, खैर... टेस्ट ट्यूब बेबी की मदद से... राधिका ने बेटे को जन्म दिया, किंतु गर्भावस्था के दौरान भी पति की बेरूखी के कारण उसे संतान से भी कुछ खास प्यार नहीं हुआ। बस कोख में पाला भर उसे। फिर बडे घर, बडी बातें, पैदा होते ही आया के हाथों में और फिर हॉस्टल... राधिका अकेली थी और अकेली ही रह गई।
कभी-कभी जब राधिका अपने मन की बखिया श्यामा के सामने उधेडने लगती तो श्यामा सचमुच डर जाती। उसे लगता जिस रूप, पैसे, पद, नाम को वह हमेशा पाने के लिए लालायित रहती थी, अब दूर से ही तौबा करती है। ना बाबा ना... ऐसी खोखली जन्दगी वह नहीं जी सकती। वह तो अपने छोटे से दडबे में ही बेहद खुश है। छोटा ही सही, पर सुकून देने वाला घर, प्यार करने वाला पति, जिद्द, फरमाइश करते चंचल, प्यारे, नटखट बच्चे।
श्यामा सोचती, उसके पास तो अपने भी हैं और सपने भी हैं। पर राधिका के पास न तो अपने हैं और न ही सपने... कैसे जीती होगी राधिका? श्यामा के मुख से बेचारगी भरी आह निकल जाती।
कभी-कभी राधिका हताशा के क्षणों में कहती, क्या फायदा ऐसे जीवन का श्यामा... मन तो करता है कहीं भाग जाऊँ... सब कुछ छोड छाडकर। कोई तो ऐसा कंधा हो जहाँ सिर रखकर अपने दिल का बोझ हल्का कर सकूँ। कहीं तो कोई होगा मुझे प्यार करने वाला, मेरी तारीफ करने वाला, मेरे बनाए खाने को खाने वाला... वो शून्य में ताकते, बडबडाते हुए कहती... कोई तो होगा जिसके बच्चे की माँ बन सकूँ... सच्ची माँ और वो भावावेश में रो पडती।
श्यामा सांत्वना में कहाँ कुछ कह पाती थी। बस धीरे-धीरे उसे चुप करवाती। ऐसा नहीं कहते पगली.... क्या कमी है तुम्हें... पर ऐसा कहते हुए उसके शब्द उसके ही गले में अटक जाते थे।
पर तब वह भी कहाँ जानती थी कि राधिका इस तरह एक दिन सचमुच चली जाएगी। काश! वह उसे रोक पाती। उसे समझा पाती... उसके पति से बात करके देखती... सोचते-सोचते उसकी आंखे भी गईं।
राधिका ने भी तो किसी से कुछ नहीं कहा।गहने, कपडे, पैसे अपने साथ कुछ नहीं ले गई... एक छोटा सा पत्र लिखा था।
श्याम,
मैं जा रही हूँ। अपना सुख, अपने सपने तलाशने। मुझे मत ढूँढना, मैं प्यार पाना और देना चाहती हूँ इसलिए जा रही हूँ। शादी के दस वर्ष बाद यह कदम उठाया है पर आश्चर्य मत करना, क्योंकि मैं जीना चाहती हूँ। इस सोने के पिंजरे में मेरा दम घुटता है। आप दूसरी शादी कर लेना, बेटे को प्यार। -राधिका
राधिका चली गई, पर बहुत से प्रशन शहर भर में दोहराये जा रहे थे। कोई कहता कोई पुराना प्रेमी होगा, कोई विदेश भागने का अंदेशा करता, कोई इसे श्यामशरण की छूट का नतीजा बताता, तो कोई कहता, खाली दिमाग शैतान का घर, कोई जमाने को दोष दे रहा था। पर सत्य से अनभिज्ञ स्वयं श्यामा ही कहाँ जानती थी कि कहाँ गई होगी राधिका, जिसे अपनी सबसे प्यारी सहेली मानती थी उसे ही कहाँ बताया था उसने। अगर बताया होता तो क्या जाने देती श्यामा...। परिवार, सामाज, रिश्ते और बेटे की दुहाई देकर उसे रोक न लेती... शायद इसीलिए नहीं बताया राधिका ने।
जाने किस हाल में होगी मेरी सखी... श्यामा ने गहरी निःश्वास छोडी।
जो गई है उसके लिए भी जाना क्या इतना आसान रहा होगा, जितना दुनिया समझती है। श्यामा अपने ही प्रश्नों के भँवरजाल में उलझ रही थी। उसे होश ही नहीं था
कि सोसायटी की तमाम औरतें जो इस प्रश्न का उत्तर श्यामा से पूछने आई थी कि राधिका कहाँ भाग गई? उसके आस-पास ही खडी थी। हालाँकि उन्हें ही कहाँ होश था, वे सब भी अपनी-अपनी किस्सागोई करने में मशगूल थीं। उन्हें भी श्यामा की सोच से कहाँ मतलब था। मतलब था तो बस इतना कि इन्हें सारी कहानी पता चल जाए ताकि वे दो की चार, चार की आठ बनाकर इस चटपटे मुद्दे के चटखारे ले सके। खुद उनके भी घर में कई कहानियाँ पलती होगीं, पर अपने से बेखबर, दूसरों की जन्दगी में ताक-झाँक करती इन औरतों को शायद इस बात का अहसास भी नहीं कि जिसे चोट लगती है उसे नमक की नहीं, मरहम की जरूरत होती है।
श्यामा धीरे से उठी और उस हुजूम को छोडकर बगीचे से बाहर आ गई। दूर अस्ताचल में सूरज सागर की बाँहों में समा गया था।
श्यामा को दूर से अपना घर दिखाई दे रहा था। वो जल्दी-जल्दी उस तरफ बढ गई। राधिका का बंगला पीछे छूट रहा था। उसे याद आया, घर जाकर उसे स्वेटर के गिरे हुए फन्दे भी उठाने हैं। उसने अपने हाथ में पकडे हुए स्वेटर और ऊन के गोले को कस कर पकड लिया।
श्यामा की चाल तेज हो गई। वह सब भूलना चाहती है, राधिका को... राधिका के किस्से को। वह अपनी डायरी से राधिका का किस्सा फाडकर अलग कर देना चाहती थी पर ये इतना आसान नहीं था..., वह बुदबुदाने लगी। राधिका तुम कहाँ हो... तुम, तुम मकान छोडकर गई हो, जन्दगी नहीं... जहाँ भी जाओ... अपना घर बनाना... अपने सपनों का घर... और जी लेना पूरी शिद्दत से...।
श्यामा की चाल अब और तेज हो गई थी। घर पहुँचते-पहुँचते वो हाँफ रही थी पर उसे बडी जल्दी थी, उसे स्वेटर के गिरे हुए फन्दे जो उठाने थे। ?
९, ए, मेघ सरमन अपार्टमेंट-१, तेरापंथ भवन रोड, सिटी लाईट
सूरत (गुजरात) मो. ९८२५४७३८५७