प्यार की जीत

डॉ. पंकज साहा


यह रोज की बात थी। मैं प्रातः भ्रमण को निकलता तो कालू चाय वाले को कोयले का चूल्हा सुलगाते देखता। जब लौटता तब-तक उसकी चालू चाय तैयार हो जाती और दुकान में कुछ ग्राहक भी दीखने लगते। कोई सिर्फ चाय की चुस्कियाँ लेता, कोई चाय के साथ बीडी या सिगरेट के कश लेता, कोई बिस्कुट के साथ चाय पीता नजर आता और कोई चाय के साथ गप्पें लडाने में मशगूल दीखता। कालू का बेटा मंटू काँच के गिलास में चाय देता था और साथ-ही ‘चाय गरम, गरम चाय’ उसी अंदाज में बोलता जाता जैसे रेल के डिब्बे में या रेलवे प्लेटफार्म पर चायवाला चाय बेचता हुआ बोलता है।
मैं प्रातः भ्रमण कर लौटता और कालू को बिना बोले काँच के एक मर्तबान से लंबू नामक एक बिस्किट निकालकर एक कोने में बैठ जाता। मुझे देखते ही कालू केवल दूध वाली चाय एक सॉसपैन में बनाने लगता। कालू को मालूम था कि मैं सिर्फ स्पेशल चाय पीता हूँ। लंबू को देखकर मैं अक्सर सोचा करता कि इसका नाम लंबू क्यों पडा? वह गाढे बादामी रंग वाला गोल लेकिन चपटा बिस्किट है। बाहर से वह कचौडी की तरह फूला हुआ एवं खस्ता होता है लेकिन अंदर जेली जैसी चाशनी होती है। जैसे जेली लेमनचूस के अंदर जेली या किसी चॉकलेट के अंदर मेल्ट चॉकलेट होता है। लंबू को मैं अति आनंद के साथ आँखें बंद कर खाता और बीच-बीच में आँखें खोलकर आस-पास देख भी लेता। कोई परिचित दिख जाता तो हल्के-से मुस्करा भी देता। एक बार मैंने कालू से पूछा भी था कि इस बिस्कुट का नाम लंबू क्यों पडा, यह तो किसी ओर से लंबा नहीं है। कालू ने फिक से हँसते हुए कहा था, ‘‘भगवान जाने मास्साब, किसने इसका नाम लंबू रक्खा।’’
लंबू समाप्त होते-होते मेरी चाय तैयार हो जाती थी और मंटू ‘चाय गरम, गरम चाय’ कहता हुआ मेरी स्पेशल चाय का गिलास मुझे पकडा देता।
मंटू को भी देखकर मैं सोच में पड जाता। वह लगभग तेरह-चौदह साल का एक आकर्षक बालक था। ऐसा लगता था जैसे विधाता ने उसे अत्यंत मन से बनाया हो। रंग गोरा-चिट्टा, घुँघराले बाल, हल्की नीली आँखें, नुकीली नाक, पतले-पतले होंठ, छरहरा खुलता हुआ बदन। हालाँकि
उसके कपडे मैले-कुचैले होते परंतु उत्तम नस्ल के घोडे को अगर मैला कपडा पहना दिया जाय तब भी उसकी नस्ल नहीं छिपती। मंटू फिल्मी हीरो के बेटे की तरह दीखता था जबकि कालू अपने नाम के अनुरूप बिल्कुल काला, नाटा, कुछ मोटा, चौडे चेहरे, चिपटी नाक एवं खिचडी बालों वाला साठ की उम्र पार कर चुका आदमी था। उसकी पत्नी भी काली थी और सुंदर तो कतई नहीं। एक दिन मैंने कालू से पूछ ही लिया, ‘‘क्या मंटू तुम्हारा बेटा है?’’ उसने हँसकर कहा, ‘‘सब ऊपर वाले की देन है मास्साब जो उसने हमारे बुढापे के सहारे के रूप
में एक निःसंतान गरीब आदमी को ऐसी सुंदर औलाद
दे दी।’’
शाम के समय मैं पहले चाय पी लेता फिर संध्या-भ्रमण को निकलता। वह ३० सितंबर की शाम थी। मैं लंबू का आनंद लेता हुआ चाय का इंतजार कर रहा था। ‘‘चाय गरम, चाय गरम, चाय नहीं है, मुसलमान का बेटा मर गया पर बाय नहीं है’’- यह सुनते ही मैं चौंक उठा। देखा मंटू मेरी स्पेशल चाय का गिलास लिये खडा है और मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। उसके चेहरे पर आह्लादकता के भाव थे। आज वह ‘चाय गरम, गरम चाय’ नहीं कर रहा था बल्कि ऊपर वाली पंक्ति को लगभग गाते हुए दोहरा रहा था। लोग सुन-सुनकर हँस रहे थे। कालू भी कभी-कभी मुस्कुरा देता। चाय-बिस्किट के पैसे देते हुए मैंने कालू से पूछा, ‘‘आज यह ऐसा क्यों कह रहा है?’’
‘‘मास्साब, आज सारा देश खुश है। भारत की सेना ने पाकिस्तान में घुसकर अनेक पाकिस्तानियों को मारकर अपना बदला ले लिया है।’’
भारतीय सेना द्वारा पाक अधिकृत काश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक कर अनेक आतंकवादियों को मारने से सचमुच सारा देश जश्र मना रहा था। मैं भी खुश था। परंतु मंटू अपनी खुशी का इजहार जिस प्रकार कर रहा था, शायद ही किसी ने किया हो। मैंने कहा, ‘‘कोई मुसलमान सुन लेगा तो बुरा नहीं मान जाएगा?’’
कालू ने कहा, ‘‘यह हिन्दुओं का मोहल्ला है मास्साब, अगर कोई मुसलमान सुन भी लेगा तो क्या।’’ यह कहते हुए उसकी आँखों में एक अनूठी चमक उभरी।
जिस शहरनुमा कस्बे के विद्यालय में मैं सहायक शिक्षक के पद पर नव-नियुक्त हुआ था, वहाँ से मेरा गाँव लगभग २०० कि.मी. की दूरी पर है। गाँव के लिए न तो सीधी रेल-सेवा है, न बस-सेवा। गाँव से रोज विद्यालय आना-जाना संभव न था, अतः कालू की दुकान के पास ही मैंने एक कमरा किराये पर ले लिया था। विद्यालय भी पास में था।
गाँव में थोडी खेती-बाडी है। मैं अपने माता-पिता की एक मात्र संतान हूँ, अतः उनकी सेवा के लिए मैंने अपनी पत्नी को गाँव में ही रहने दिया था। हर शनिवार की शाम मैं गाँव पहुँच जाता और सोमवार को दिन के दस-साढे दस बजे विद्यालय में उपस्थित हो जाता।
कालू चाय बेचने के साथ-साथ कुछ जरूरतमंदों के लिए अपनी पत्नी से भोजन भी बनवाता था। मेरे विद्यालय के कुछ शिक्षक दोपहर एवं रात का भोजन वहीं करते थे। मैं भी उसमें शामिल हो गया था। कालू की पत्नी अच्छा भोजन बनाती थी। घर जैसा स्वाद मिलता था।
दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ आरंभ होने वाली थीं। सभी शिक्षकों में हर्ष एवं उल्लास था, विशेषकर उनमें जो परिवार से दूर थे।
वह छुट्टियों से पहले का अंतिम कार्य-दिवस था। न तो विद्यार्थी क्लास में बैठने के मूड में थे न शिक्षक क्लास लेने के। अतः हम लोगों ने उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर करने की औपचारिकता पूरी की।
सबके लिए कुछ-न-कुछ सौगात खरीदने और सारा सामान पैक करने में मुझे थोडी देर हो गयी। जब मैं भोजन करने कालू की दुकान पहुँचा तो वह बिल्कुल खाली थी। मेरे सहकर्मी अति उत्साह में पहले ही खाकर चले गये थे। चाय का पेमेंट मैं संग-संग कर दिया करता था, परंतु भोजन का सप्ताह में एक दिन शनिवार को। उस
दिन मुझे लगभग एक माह के लिए जाना था, अतः हफ्ता न लगने पर भी मैंने भोजन का बकाया दे दिया। इसके साथ-ही मैंने कालू की पत्नी के लिए एक साडी, कालू के लिए एक धोती और मंटू के लिए एक पैंट-शर्ट भी पूजा-उपहार के रूप में दिये। यह सब देखकर कालू की आँखें खुशी से चमकने लगीं। मंटू जो मेरा जूठा बर्तन उठाकर धोने के लिये बाहर नलके पर बैठा था, उपहार देखने भाग कर आया। अपना शर्ट-पैंट देखकर वह खुशी से झूमने लगा। मैंने उसे सौ का एक नोट बख्शीश देकर उसकी खुशी को दोगुना कर दिया और कहा कि पूजा देखे, मेला घूमे, मिठाई खाय, पर अंट-शंट चीज न खरीदे। मंटू ने रुपया अपने नेकर की जेब में रखा, सहमति से सिर हिलाया तथा लगभग नाचते हुए बर्तन धोने चला गया।
कालू खुशी से भाव- विभोर हो गया था। भावावेश में उसने कहा, ‘‘मास्साब, आपने एक दिन एक सवाल किया था, तब से मेरे मन में खुदबुदी लगी हुई है। आप जैसे भलामानुस से झूठ बोलना महापाप है, लेकिन आप वचन दीजिये कि इस राज को अपने पास ही रखिएगा।’’ मैंने वचन दे दिया।
कालू ने अत्यंत रहस्यमय अंदाज में कहा, ‘‘मंटू मेरा बेटा नहीं है और न ही हिन्दू का बच्चा है। यह काजी मोहल्ला के सबसे धनी एवं रसूख वाले हाजी साहब के पोते हाशिम का नाजायज बेटा है।’’
‘‘क्या?’’ मेरे कान सुन्न हो गये, ‘‘तुम्हें
कैसे मालूम?’’
‘‘मास्साब, हाजी साहब के घर के पास सफरुद्दीन अंसारी का घर है। उसकी एकमात्र बेटी रुखसार बला की खूबसूरत है। हासिम को उससे प्यार हो गया, परंतु हाजी साहब ठहरे बडे आदमी और सैयद जाति के और सफरुद्दीन मामूली तांगेवाला और नीच जाति का। अतः उन्होंने रुखसार को अपने घर की बहू बनाने से इंकार कर दिया। हासिम की इतनी हिम्मती नहीं थी कि हाजी साहब की खिलाफत करता। उधर रुखसार पेट से थी। उसने बच्चा गिराने से इंकार कर दिया।’’
‘‘फिर?’’ मेरी उत्सुकता बढती जा रही थी।
‘‘एक दिन रात में जब मैं दुकान बंद कर सोने जा रहा था, मैंने दुकान के सामने एक गाडी के रुकने की आवाज सुनी। शटर की झिरी से देखा कि एक मारुति वैन से एक लडका बाहर निकला। उसके हाथ में कपडे में लिपटा कोई सामान था। बिजली के खंभे की रोशनी में मैं उसे पहचान गया। वह हाशिम था। वह मेरी दुकान के पीछे गया फिर तुरंत खाली हाथ लौटा और वैन में बैठकर चला गया।’’
मैं साँस रोके उसकी बात सुन रहा था। पूछा, ‘‘फिर?’’
‘‘फिर क्या, मैं तुरंत पिछवाडे की ओर भाग। देखा कपडे में लिपटा एक नवजात बच्चा है। बेटा लडका। वह जिंदा था। मैं खुशी से फूला न समाया। दौडकर घरवाली के पास गया। उसने तो इसे देखते ही छाती से लगा लिया।’’
‘‘किसी ने पूछा नहीं कि बच्चा कहाँ से मिला?’’
‘‘हाँ कइयों ने पूछा, पर मैंने असली बात छिपा ली और कहा कि कोई रात को मेरी दुकान के सामने छोड गया था।
‘‘क्या हाशिम को यह बात मालूम नहीं?’’
‘‘जरूर मालूम होगी, पर वह एक बार झाँकने तक नहीं आया। अच्छा ही हुआ। मेरी कोई औलाद नहीं थी। भगवान से कितनी मन्नतें माँगी। भगवान ने अपनी औलाद नहीं दी, पर दी तो। जब पाँच साल का हुआ तो इसे प्राइमरी स्कूल में भरती कराया। पर इसका मन पढने-लिखने में बिलकुल नहीं बैठता था। किसी तरह खींच-तानकर पाँचवीं पास की। छठी में दो बार फेल हो गया तो मैंने इसे दुकान में हाथ बँटाने के काम में लगा लिया।’’
उसी समय हम दोनों की नजरें मंटू पर पडीं तो हम सन्न रह गये। पता नहीं कब से वह हमारी बातें सुन रहा था। परंतु उसके चेहरे की तमतमाहट बता रही थी कि उसने सारी बातें सुन ली हैं। कालू को काटो तो खून नहीं।
उन चंद वाक्यों ने मानो दोनों को नदी के दो पाटों पर खडा कर दिया था। कालू के चेहरे से जहाँ दीनता टपक रही थी, वहीं मंटू के चेहरे से क्रोध की अग्नि फूट कर सारी तरलता को सुखा डालना चाह रही थी। उसी समय एक बस दुकान के सामने से गुजरी। मंटू अचानक मुडा और दौडकर बस के पीछे वाली सीढी पकडकर लटक गया। कालू मंटू-मंटू पुकारता हुआ दौडा, लेकिन तब-तक बस दूर निकल गयी थी। भीतर से कालू की पत्नी ‘क्या हुआ, क्या हुआ’ कहती हुई दौडी आयी। जब उसे सारी बातें मालूम हुई तो वह ‘हाय, मेरा मंटू कहाँ गया’ कह-कहकर, छाती पीट-पीटकर विलाप करने लगी। कालू भी रो रहा था। अचानक उसने अपने आँसू पौंछे एवं दाँत पीसते हुए कहा, ‘‘अच्छा हुआ चला गया। अच्छा हुआ वह अभी जान गया।’’
मैं समझ रहा था कि उसका यह भाव-परिवर्तन हृदय-परिवर्तन के कारण नहीं बल्कि हृदय में उपजी असीम पीडा का प्रतिफल है। मैं भीगी बिल्ली की तरह चुपचाप वहाँ से रुखसत हो गया।
छुट्टियों के बाद लौटा तो पता चला कि मंटू के भाग जाने का मुद्दा कुछ दिनों तक गरम रहा। लोग तरह-तरह की बातें करते रहे। कुछ ने कालू को आश्वासन दिया कि मंटू लौट आएगा, परंतु मैं जानता था और कालू भी कि अब वह नहीं लौटेगा। कालू ने एक नौकर रख लिया था। अब वह कम बातें करता। मैं भी कालू की दुखती रग को छूने की कोशिश नहीं करता।
दिसंबर के प्रथम सप्ताह में एक दिन मुझे विद्यालय के काम से जिला मुख्यालय जाना पडा। ट्रेन दोपहर के एक बजे गंतव्य स्टेशन पहुँची। मैंने सोचा पहले भोजन कर लूँ। स्टेशन की दूसरी तरफ कुछ होटल एवं कुछ चाय-पान, नाश्ते की दुकानें थीं। दो होटल पास-पास थे। रेलवे लाइन और उधर की दुकानों के बीच लोहे की पट्टियों की लगभग तीन इंच चौडी एवं छह फुट ऊँची चारदीवारी थी। दो पट्टियों के बीच लगभग दस इंच का
गैप था। होटल जाने के लिए दोनों होटलों के बीच एक पट्टी तोड दी गयी थी। प्लेटफार्म से दोनों होटल साफ दिख रहे थे। एक होटल पर ‘गोपाल हिन्दू होटल’ का साइन बोर्ड लगा था। वह छोटा और कुछ बुझा-बुझा सा दिख रहा था। उसमें दो-चार लोग ही भोजन कर रहे थे। दूसरे होटल में ‘हिन्दुस्तान मुस्लिम होटल’ का साइनबोर्ड लगा था। वह बडा, साफ-सुथरा एवं चमकदार दीख रहा था। उसमें भीड भी अधिक थी। स्पष्ट था कि हिन्दुस्तान होटल की अधिक चलती थी और मुझे उसी में जाना चाहिए था। परंतु पिता जी की एक नसीहत मैंने गाँठ में बाँध रखी थी। उन्होंने कहा था, ‘‘होटल में खाने से बचना। अगर होटल में खाना मजबूरी हो तो मुस्लिम होटल में कभी मत खाना।’’ अतः मेरे पाँव गोपाल होटल की ओर बढे। तभी ‘सर’, ‘सर’ की जानी-पहचानी आवाज सुनाई पडी। आवाज की दिशा में मुडा तो चौंक पडा। आवाज देने वाला मंटू था। वह मुझे ‘सर’ कहकर ही संबोधित करता था। वह साफ पतलून एवं कमीज पहने था। बाल भी रूखे नहीं थे और कंघी भी करीने से की गयी थी। आकर्षक तो वह था ही अब और आकर्षक लग रहा था। वह हिन्दुस्तान होटल के सामने खडा था। मेरे निकट पहुँचते ही वह बोला, ‘‘सर, हमारे होटल में मटन-बिरयानी, चिकन-बिरयानी, फिश करी, अंडा करी बहुत अच्छी बनती है। हमारे यहाँ की बिरयानी बहुत फेमस है। दूर-दूर से लोग आते हैं। बहुत लोग तो पार्सल बनवाकर भी ले जाते हैं। यहाँ अनेक हिंदू भी आते हैं।’’
बहुत दिनों से मटन-बिरयानी नहीं खायी थी। मन कर रहा था, परंतु पिताजी की नसीहत दीवार बनकर खडी थी। मेरी दुविधा देखकर उसने कहा, ‘‘सर, यहाँ बीफ नहीं बनता। मेरा मालिक सच्चा मुसलमान है।’’ मैंने उसकी बात अनसुनी करके पूछा, ‘‘मंटू, तुम वहाँ से भाग
क्यों आये? कालू तो तुम्हें अपने सगे बेटे की तरह पाल रहा था?’’
‘‘सर जी, उसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि जब मैं जान गया कि मेरी रगों में मुसलमान का खून है, तब मैं न मुसलमान को गरिया सकता था न किसी को गरियाते सुन सकता था।’’
और दूसरी वजह?’’
‘‘जब मैं जान गया कि मेरे माँ-बाप कौन हैं और मैं उन लोगों की ना*ाायज औलाद हूँ, तो मुझे बहुत दुःख हुआ इसके साथ गुस्सा भी आया कि उन लोगों ने एक बार भी मेरी खबर नहीं ली। इसलिये मैं वहाँ से दूर, बहुत दूर भाग जाना चाहता था। यह तो खुदा का शुक्र है कि इस होटल के रहमदिल मालिक ने मुझे अपने यहाँ काम पर रख लिया।’’
‘‘क्या तुम्हें कालू एवं उसकी पत्नी की जरा भी याद नहीं आती?’’
‘‘आती तो है सर जी, पर जब हकीकत जान गया तो उन्हें भुलाने में ही सब लोगों की भलाई है’’- कहते हुए उसकी आँखों में आँसू आ गये। उसने अपनी कमीज की बाँह से अपने आँसू पोंछे और कहा ‘‘सर जी, आज आप जो भी खायेंगे उसका पैसा आपको नहीं देना पडेगा। यह देखिये’’, उसने अपनी पतलून की जेब से सौ का एक नोट निकालकर दिखाया और कहा, ‘‘सर जी, यह वही नोट है जो आपने मेला देखने एवं मिठाई खाने के लिए दिया था। इसे मैंने बहुत सँभालकर इसलिए रखा है कि चाहता था किसी नेक काम में खर्च करूँ। आपका पैसा आप पर खर्च हो, इससे बढकर नेक काम मेरे लिये और क्या होगा?’’
एक ओर मनुहार का महीन रेशमी रेशा था दूसरी ओर संस्कार की मजबूत जंजीर। रेशे को तोडना मेरे लिए कठिन नहीं था, पर उस वक्त मुझे वही सबसे कठिन लग रहा था। मैं स्वयं को उस भौंरे की तरह पा रहा था जो कमल की कोमल पंखुडियों में बंद हो गया हो और उसे ही अपने जीवन की सार्थकता समझ रहा हो।
मैंने कहा, ‘‘ठीक है, पर इस रुपये को तुम किसी नेक काम में ही खर्च करना।’’ ?

हिंदी विभाग, खडगपुर कॉलेज, खडगपुर-७२१३०५ (प.बं.)