माँ कहती थी

बजरंग लाल जेठू


सुनामी लहरों की विनाश लीला के बाद सहायता एजेंसियाँ इतिहास का सबसे बडा राहत अभियान चलाने के लिए जूझ रही थीं। राहतकर्मी नए-नए इलाकों में पहुँचकर लोगों की जान बचाने में लगे हुए थे। बिखरी पडी लाशों, सामूहिक अंतिम संस्कार और कराहते घायलों के बीच राहत शिविरों में चिकित्सा, भोजन और राहत सामग्री दी जा रही थी। मातरा में हुए ऐसे ही एक सामूहिक अन्त्येष्टि स्थल पर अपने माँ-बाप की अन्त्येष्टि के समय वे तीनों भाई भी अंतिम बार एक साथ थे। अन्त्येष्टि स्थल से लौटते समय अर्द्ध-मूच्र्छित कदमों से चलते-चलते तीनों किधर गए, किसी को पता नहीं चला। वह भी बदहवास भागता रहा, फिरता रहा और न जाने कैसे किस ट्रेन में चढ गया और फिर न जाने क्योंकर एक निर्जन से स्टेशन पर ट्रेन से उतर भी गया। यहाँ पर उतरने के बाद उसके शरीर ने मानो और भागने से मना कर दिया हो। वह इस स्टेशन के आस-पास मँडराता रहा। सुनामी के बेघर लोगों की जमात का बताने पर खाने को भी मिल जाता। रात को स्टेशन की बेंच पर सो जाता। सुनामी के समाचार अब भी मोटे अक्षरों में अखबरों में छपते थे। उस दिन वह भी इस ढाबे की बेंच पर आँखे गडाए सहमा-सहमा खडे-खडे समाचार पढ रहा था कि ढाबे मालिक ने झिडक दिया था-परे हट, यह पढने वालों के लिए है, तू क्या देख रहा है इसमें? उसने न जाने क्या सोचकर कहा था-साब मैं पूरा अखबार पढ सकता हूँ।
‘‘तो सुना फटाफट, देखें। अभी पता चल जायेगा तेरी पढाई का’’ ढाबा मालिक ने कहा था।
मातरा गाँव से बिछुडने के बाद उसने पहली बार धाराप्रवाह अखबार पढा था। ढाबा मालिक की चाय उफन गई। वह उसे हक्का-बक्का देखता का देखता ही रह गया।
‘‘अरे बहुत गजब की बात है। कितनी पढाई करिबो।’’
‘‘सेवेंथ’’
‘‘तो फिर अब फितरत क्यों?’’
‘‘.......’’ वह बोल नहीं सका बल्कि रुलाई का रैला फूट गया। ढाबा मालिक ने उसे बैठा दिया। उसकी रुलाई चलती रही। ढाबा मालिक
ग्राहकों से निपटता रहा। काम निपटाकर ढाबा मालिक उसकी तरफ मुखातिब हुआ था। अंत में अपने ढाबे पर काम करने हेतु रख लिया। मातरा गाँव का होनहार बालकृष्ण अब पढिया बन गया। ढाबा मालिक के यहाँ दिन भर काम। ट्रेन के समय कुछ ज्यादा काम। खाने को मिल जाता। चाय भी मिल जाती। अखबार भी पढने को
मिल जाता।
रात की आखिरी ट्रेन जा चुकी थी। ढाबे के पश्चिमी छोर पर पडी बेंचों पर बैठकर देर तक गपशप करने वाले चार दोस्तों की चौकडी भी उठकर रवाना हो गई। पढिया का इंतजार भी खत्म हुआ। चौकडी की बेंच के कप उठाने के बाद वह भी सो सकेगा। ढाबा मालिक तो सो चुका है। पढिया ने बेंच से कप उठाया। उसके पैर से कुछ टकराया। देखा। बेंच के नीचे कागजो का एक पुलिंदा है। पढिया की समझ में आ गया कि गपशप करने वाली चौकडी के दाढी वाले अंकल का ही है यह पुलिंदा। ढाबे के सारे बर्तन साफ कर पढिया ने वह पुलिंदा ठीक जगह रखने के लिए हाथ में लिया। अनायास ही उसकी नजर पुलिंदे की लिखावट पर चली गई-मानव अधिकार। पढिया का मन वश में नहीं रहा। उसने तय किया-वह इस पुलिंदे को पढेगा। मानव अधिकार पर कुछ बातें स्कूल में सुनी थी। उसने पुलिंदे को बगल में दबाया। अपनी दरी व रजाई ली। स्टेशन की एक बेंच के पास रजाई में दुबककर पुलिंदे को खोला। उसने देखा, घसीटी लिखावट में बडा-सा निबंध लगता है।
पढना शुरू कर दिया। पढते-पढते पढिया को लगा उसकी रजाई कोई खींच रहा है। उसने नजर उठाकर देखा-एक कुत्ता उसकी रजाई पर आ बैठा है। पढिया उसे देख मुस्कुराया और फिर आगे पढना शुरू कर दिया। पढिया को पढने का आनन्द आ रहा था। नींद कोसो दूर थी। चिथडेनुमा रजाई में दुबका पढिया पेट के बल लेटकर दोनों हाथों की हथेलियों पर ठोडी टिकाए पढने में लीन था। उसे पता ही नहीं चला कि कब दाढी वाले अंकल घर
से वापस लौटे हैं और उसके मालिक को साथ लेकर उसे ढूँढते हुए यहाँ पहुँच चुके हैं। उसे नहीं मालूम कि दाढी वाले अंकल ने उसके मालिक को अंगुली के इशारे से चुप रहने का कह रखा है। उसने पन्ना पलटने के लिए हाथ हिलाए तो नजर थोडी फिसली। पास सोए कुत्ते को देखने के लिए नजर उठाई। हटात् दो आकृतियाँ पास
खडी थीं।
‘‘पढिया क्या पढ रहे हो?’’ उसके मालिक की आवाज थी।
‘‘मैं....मैं....तो’’
‘‘कोई बात नहीं, पढो, सुबह मुझे दे देना।’’ दाढी वाले अंकल की आवाज थी।
‘‘लेकिन खान साहब......’’ उसका मालिक बोलने वाला था पर बीच में ही दाढी वाले अंकल बोल उठे-‘‘बच्चे की इच्छा है पढवाल जी, चलो चलें।’’
पढिया उठ बैठा था। दोनों के चले जाने पर धीरे-धीरे फिर पढने लग गया। पूरा पुलिंदा पढने के बाद उसे सिरहाने रख लिया पर इस डर से नींद नहीं आई कि मालिक सुबह क्या गत करेगा। उसकी आशंका निर्मूल हुई। पढवाल ने उसे इतना ही कहा-‘‘पढिया, खान साहब के कागजो को उस अलमारी में रख दे। कुछ समझे क्या? इनकी पढाई से।’’
‘‘जी हाँ! बडी अच्छी बातें थी निबंध में। मैंने कागज अलमारी में रख दिए हैं। अब कभी नहीं करूँगा ऐसा।’’ पढिया डरते-डरते बोला।
कामतापुर के उस छोटे से स्टेशन पर दिन भर लोग आते-जाते रहे। पढवाल ढाबे पर भी दिन सरकता गया। दिन भर आज चटख धूप थी। सायं सर्दी कम थी। ढाबे की पश्चिमी बेंच पर आखिर में झोला उठाए खान साहब आ गए। पढिया दौडकर पैर पड गया।
‘‘मुझे माफ कीजिए। आईन्दा नहीं पढूँगा आफ कागज।’’ पढिया सुबकते-सुबकते बोला।
खान साहब के तीन साथी अचरज में भर गए। खान साहब ने पढिया के सिर पर एक हल्की -सी चपत लगाई और बोले-
‘‘अरे पढिया कोई बात नहीं। कागज वापस तो लाओ। कॉफी भी पिलाओ। उठो। मुआफ किया।’’
पढिया ढाबे की भट्टी की तरफ मुड गया। पढवाल ने कागजो का पुलिंदा खान साहब के सामने ला रखा। पढिया कॉफी के प्याले रखकर मुडा ही था कि खान साहब ने रोक लिया। कंधे पर हाथ लगाकर पूछा- ‘‘क्या समझ में आया रे पढिया, मेरे उन कागजो में?’’
‘‘मानव अधिकार की बातें हैं इसमें सर। भाषा थोडी कठिन है। बालकों के बारे में कुछ भी नहीं था। इसमें।’’ पढिया की बात सुनकर खान साहब के साथी रम*ाान और ईवान्स चौंक गए।
खान साहब के तीनों साथी जाते हुए पढिया को देख रहे थे। खान साहब ने बताया कि इस बालक ने रात भर में मेरे इस पूरे पुलिंदे को पढ लिया है। सुनामी का मारा, बेघर व बेसहारा बच्चा है। कहता है सेवेंथ में पढ रहा था कि बेघर हो गया।
‘‘फिलॉसफर साहब थोडे सावधान रहना, ऐसे बच्चे विश्वास में लेकर बडा गच्चा दे जाते हैं।’’ सारथी ने कॉफी का घूँट भरते हुए कहा।
खान साहब गम्भीर बने रहे। कॉफी का घूँट पीते हुए बोले कि हम यह क्यों भूल जाते हैं कि बच्चे ईश्वरीय दूत माने जाते हैं, जो संसार के लिए भगवान का संदेश लेकर पहुँचते हैं। सभी समाज बच्चे को मानव की अमूल्य धरोहर मानते रहे हैं। समाज में यह भी स्वीकृत है कि बच्चे ही भावी कल के कर्णधार हैं। चूँकि बच्चे समाज के सबसे दुर्बल व कोमल हिस्से हैं; उस नन्हीं बेल के समान हैं जिसे फलने-फूलने हेतु न सिर्फ जल, हवा व उर्वरक जमीन चाहिए वरन् सही दिशा में बढने के लिए मजबूत सहारा भी चाहिए ताकि बेल हरी-भरी रहने के साथ-साथ फलदार भी हो सके।
समाज का यह कर्त्तव्य है कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित करे। किन्तु सर्वांगीण विकास के लिए दिए जाने वाले वातावरण के मामले में हम बहुत पीछे हैं। पिछली सदी तक बच्चों को पृथक रुचियों और दृष्टिकोणों वाली पृथक सत्ता नहीं माना जाता था। बच्चों को परिवार का सदस्य माना जाता था न कि समाज का सदस्य। बच्चे अपने माता-पिता के स्तर व जीवन अनुसार ही अपना जीवन बिताते थे। कुल मिलाकर मानव के रूप में प्रतिस्थापित इस देव-प्रतिमा, बालक के अधिकार न के बराबर रहे हैं।
खान साहब की बात और आगे चलती परन्तु पढवाल ढाबे का समय हो गया। पढिया चौकडी के सदस्यों के लिए कॉफी की आखरी खेप रखने आ गया।
‘‘आज रात को क्या पढोगे पढिया?’’ खान साहब ने पूछा।
‘‘कुछ भी नहीं।’’
‘‘तो फिर कल का पढा हुआ भूल जाओगे।’’
‘‘नहीं सर, मैं खास-खास बातें लिखता रहता हूँ। अखबारों में से उतार लेता हूँ।’’
‘‘तो फिर कल एक लेख हमें लिखकर दिखाओ।’’
‘‘पर....’’
‘‘पर.... क्या? यह लो कागज।’’ खान साहब ने कुछ खाली काग*ा पढिया को दिए और चारो साथी उठ खडे हुए।
उस दिन अचानक पढिया कि नजर अखबार के एक कॉलम पर टिक गई। इस कॉलम में अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस के उपलक्ष में होने वाली एक भाषण प्रतियोगिता का समाचार था। कामतापुर के पास वाले कस्बे में थी। समय दोपहर दो बजे से चार बजे तक का था। खुली प्रतियोगिता थी। दोपहर में एक बजे से चार बजे तक उसकी छुट्टी रहती है। कल ही १० दिसम्बर है। पढिया ने एक बजे की ट्रेन से कस्बे कलमपुरम् जाने का तय कर लिया। कोठरी में पडे रहकर क्या करना। वापसी
ट्रेन भी चार बजे से पहले है। पढिया ने खान अंकल को दिखाने के लिए तैयार किए लेख को उस रात दो-तीन बार फिर पढ लिया। अगले दिन दोपहर की छुट्टी में कोठरी में आराम के बजाय पढिया एक बजे की ट्रेन में सवार
हो गया।
प्रतियोगिता स्थल कलमपुरम् स्टेशन के बिल्कुल नजदीक ही था। विद्यालयी पोशाक में विद्यार्थी बैठे थे। हम उम्र के इस सैलाब को देखकर पढिया कि आँखों में एक बारगी तो आँसू छलक आये। जी करने लगा इनके बीच जाकर बैठ जाऊँ। दूसरे ही क्षण इस सैलाब में अपने दोनों भाईयों के चेहरे तलाशने लगा। फिर इतने सारे चेहरों में वह उन दो चेहरों के न होने का अहसास पलक भर में कर गया। धीरे से जाकर नाम दर्ज कराया। कोड न. मिला-सात। उसने सोचा ५-५ मिनट समय मिलेगा। जल्दी ही फारिग हो ट्रेन पकड लेगा और ढाबे पर समय पर पहुँच जायेगा। प्रतियोगिता में उसे देखकर कानाफूसी होने लग गई। शायद उसके कपडे देखकर या फिर उसकी कोई स्कूल यूनीफार्म नहीं होने को देखकर। प्रतियोगिता शुरू हुई।
‘‘कोड न. सात’’ की आवाज के साथ पढिया खडा हुआ। रेल्वे स्टेशन की रात की निर्जनता से निडर बना आदमी जन-सैलाब से क्या घबराता। पूर्व विद्यालय के अध्यापकों के संस्कारों की बदौलत मस्त हाथी की सी चाल से चलता वह निपट अकेला बालक माइक स्टेण्ड की तरफ बढा तो पूर्व वक्ताओं के पक्ष में उनके साथियों द्वारा बजाई गई वैसी तालियाँ तो नहीं बजी बल्कि
दर्शकों में फु सफुसाहट और कई जगह हँसी के फव्वारे जरूर छलके।
पढिया ने अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, निर्णायकों व दर्शकों को संबोधित करते हुए अपनी बात शुरू की-
‘‘मेरे पूर्व वक्ताओं ने मानव अधिकारों पर अपने विद्वत्तापूर्ण विचार रखे हैं। मानव अधिकारों के बारे में जानकारी देने के इनके प्रयासों के लिए मैं इन्हें बधाई देता
हूँ और आशा करता हूँ कि वे इस प्रतियोगिता में भी श्रेष्ठ सिद्ध हों’’ पढिया के इन शब्द के साथ ही मंच पर बतियाते अतिथि ही नहीं बल्कि श्रोताओं में नीरवता
छा गई।
पढिया ने अपनी बात को आगे बढाया- ‘‘मैं यहाँ यह बताना चाहता हूँ कि क्योंकर हम मानव अधिकारों को आप सबके नजरे इनायत करना चाहते हैं।’’ इसके बाद उसने मानव अधिकारों की वैश्विकता, अन्तर्निहितता, असंक्राम्यता व अविभाज्यता को इंगित करते हुए इनकी पवित्रता, सकारात्मकता, मानवतावादिता, प्रगतिशीलता, लोक-कल्याणोन्मुखता आदि पर ऐसा समा बांधा कि मंत्रमुग्ध मंच और अवाक श्रोता पढिया के लहजे और गम्भीर वाणी से अभीभूत हो, तालियों का रमझोला मचाना शुरू कर चुके थे। पर पढिया निर्धारित समय में अपनी बात पूरी करने के लिए सधे शब्दों में बोलता रहा। मानव अधिकारों की विशिष्टताओं के रूप में अपने भाषण का समापन पढिया को तालियों की घनघोर आवाज के बीच करना पडा। वह बिल्कुल सधे कदमों से वापस अपने स्थान पर आ गया। अगले दिन के अखबारों में पढिया के फोटो के साथ प्रतियोगिता में प्रथम रहने का समाचार छपा। अखबार की खबर पढवाल ढाबे पर पहुँचने के साथ ही खान साहब भी पढवाल ढाबे पर पहुँच गए। पढिया ग्राहकों को चाय पकडा रहा था और पढवाल गल्ला संभाल रहा था।
‘‘पढिया! तुम परिणाम घोषित होने के समय अचानक गायब क्यों हुए?’’ खान साहब पढवाल के सामने पढिया का फोटो करते हुए बडे जोर से बोले। पढिया समझ गया कि खान साहब जरूर कल समारोह में मौजूद थे। वह कुछ नहीं बोला। पढवाल मुँह फाडता-सा रह गया। अचानक वह उठा। उसने पढिया को गोदी में उठाया और अपनी वाली कुर्सी पर बिठा दिया। पढिया तुम ढाबे के मैनेजर भयो।
पढिया की रुलाई फूट पडी। वह सुबकता जा रहा था और कहता जा रहा था- ‘‘मुझे मेरे भाइयों को
ढढने में मदद कीजिए। यही मेरे लिए आपका आशीर्वाद होगा। ढाबा तो सदा ही मेरा अपना ही था तभी तो मेरे पाँव यहाँ ठहरे।’’
पढिया की प्रार्थना पर पढवाल व खान साहब एक-दूसरे का चेहरा देखते रहे। सुनामी के लापताओं का पता लगाना हँसी-खेल नहीं।
‘‘तो तुम्हारे दो भाई और हैं?’’ पढवाल ने पढिया से पूछा।
‘‘जी हाँ।’’
पढवाल और पढिया की नजर तो टी.वी. पर थी पर पढिया अपनी बात कह रहा था और पढवाल सुन रहा था। माँ-बाप की अन्त्येष्टि सामूहिक अन्त्येष्टि में हुई थी। अन्त्येष्टि के बाद वे राहत सामग्री लेने गए थे। पेट की भूख का कोई माप नहीं होता। खाद्य-सामग्री के लिए लोगों में भगदड मच गई और उसमें ही फिर वे बिछुड गए।
टी.वी. पर मानव अधिकार के हनन संबंधी कुछ रिपोर्ट प्रसारित हो रही थी। अचानक पढिया चिल्लाया-
‘‘पढवाल साहब वो रहा मेरा भाई दिव्यकृष्ण।’’
‘‘कहाँ?’’
‘‘पर हे राम! यह तो ऊँँट के पीछे बँधा है।’’
टी.वी. पर ऊँटों के पीछे बच्चों को बाँधकर की जाने वाली ऊँट दौड का दृश्य आ रहा था। ऊँटों की रफ्तार बढती जा रही थी, पीछे बँधे बच्चे भी पुरजोर दौड रहे थे। सारे बच्चे भारत के ‘‘बुधिया’’ नहीं हो सकते। अन्ततः वे ऊँटों के पीछे घिसटने शुरू हो गए। पढिया ने एक आवाज दी- ‘‘दिव्य कृष्ण रस्सी काट दो’’ और ऐसा कहते-कहते वह बेहोश हो एक तरफ लुढक गया। पढवाल ने पढिया को झिंझोडा। पानी के छीटें डालने व काफी मशक्कत के बाद पढिया आँखें खोलते ही- ‘‘दिव्य कृष्ण को बचा लो’’ कहकर पुनः बेहोश हो गया।
पढवाल ने खान साहब को बुलावा भेजा और डाक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने परीक्षण कर आराम करने की दवाएँ दी और किसी गहरे विश्वसनीय व्यक्ति से ही
इसके भाई को ढूँढ लाने की तसल्ली देने की सलाह दी। पढिया रात भर सोता रहा। दो मानस पिता रातभर जागते रहे। कुदरत भी अजीब परिस्थितियाँ पैदा करती है। यह तय किया गया कि खान साहब ‘‘दिव्य कृष्ण’’ को लाने का वादा करेंगें। सवेरे चार बजे पढिया की जैविक घडी ने उसमें हलचल पैदा की। खान साहब पढिया के करीब खिसके। बोले- ‘‘पढिया बाबू! आँखे खोलो। हम वायदा करते हैं आपसे। आफ दोनों भाई दिव्यकृष्ण और सदाकृष्ण को ढूँढकर दम लेंगे।’’
पढिया ने आँखे खोली। खान साहब को देखते ही उसकी आँखों में एक किशोर चमक आई और चेहरे पर एक युवक का सा दर्प भी जागा।
‘‘मुझे उस प्रतियोगिता में भेज दीजिए। मैं दौड लूँगा ऊँटों के साथ। मुझे वहाँ कब भेजेंगे अंकल?’’
‘‘यह काम हम पर छोड दो पढिया।’’ तुम तो बस तीसरे भाई की शक्ल और बता दो।’’
‘‘जरूर, पर कैसे?’’
‘‘अखबार, पत्र-पत्रिकाओं, टी.वी. चैनल आदि पर बालकों संबंधी कवरेज पढो और देखो।’’ कहते हुए खान साहब ने एक पुलिंदा पढिया की तरफ बढाया।
‘‘यह क्या है अंकल?’’
‘‘तुम्हारे सारथी अंकल ने तुम्हारे लिए पढने हेतु लेख भेजा है।’’
‘‘जरूर पढूँगा। वापस कब लौटाना है?’’
‘‘जरूरी नहीं। अपने पास रखो।’’
इस बीच पढवाल के घर से चाय आ गई। खान साहब व पढवाल ने पढिया को घर की चाय के साथ दवा लेने की हिदायत देकर ढाबे की चाय बंद कर दी। चाय के बाद खान साहब विदा हुए और पढवाल ने ढाबे के ग्राहकों को संभाल लिया। पढिया थोडी देर में ही पडा-पडा बोर हो गया। वह भी काम के लिए उठ पडा। ऊँट दौड का बुरा असर समाप्त प्रायः था। रात को पढिया ने सारथी अंकल का पुलिंदा खोला। काफी लम्बी बात लिखी हुई
थी। सारथी अंकल के लेख ने उसे और जिज्ञासु बना दिया। उसने अन्तर्राष्ट्रीय बाल अधिकार से प्रसंविदा की जानकारी हेतु सारथी अंकल से निवेदन किया। सारथी अंकल ने इंटरनेट से प्रसंविदा की प्रति निकलवा लाकर दी। खान अंकल ने बताया कि दिव्यकृष्ण एक छोटे अरब देश में सकुशल है। कुछ ही दिनों में हमारा उससे सम्फ हो जाएगा। उस देश में खान के मित्र हैं, जो जल्द ही दूतावास से सम्फ कर दिव्यकृष्ण की वापसी का मार्ग भी निकाल लेंगे।
पढवाल ने पढिया के लिए घर पर अलग कमरा तय कर दिया परन्तु उसने ढाबे की अपनी कोठरी को सबसे पसंदीदा जगह बता कर उसे नहीं छोडा। कोठरी में लेटकर उसने इंटरनेट प्रति को पढना शुरू किया। सीआरसी की जानकारी पढने के बाद माता-पिता के दायित्वों की बात पढते ही पढिया को अपने माँ-बाप की याद आ गई। उसने बत्ती बंद कर दी। आँसुओं की धारा कब सूखी पता नहीं चला। अभागा रोते-रोते ही सो गया।
डाकिए ने पढवाल को एक लम्बा-सा लिफाफा संभलाया और रवाना हो गया। लिफाफे को देखकर पढवाल समझ गया कि यह बाहर से आया है। पढिया के नाम से लिफाफा आना अचरज व खुशी दोनों लिए हुए था। पढिया को आवाज लगाई। पढिया भागता हुआ आया। पढवाल ने लिफाफा उसकी तरफ किया। लिफाफे के पते की लिखावट देखते ही पढिया किलकारी के साथ फूट पडा- दिव्यकृष्ण की लिखावट।
कँफपाते हाथों की सरसराहट में लिफाफे के भीतर से दिव्यकृष्ण प्रकट हुआ। पढते-पढते पढिया के चेहरे पर खुशी की रौनक लहराती रही। पत्र को पूरा पढते ही पढिया की नजर ऊपर उठी। वह पैरों की ओर झुकता उससे पहले ही पढवाल ने उसे अपने आगोश में ले लिया। खुशी में सुबकते पढिया के बालों में पढवाल की अंगुलियाँ रेंग रही थीं।
‘‘दिव्यकृष्ण वहाँ खान अंकल के दोस्त के घर पहुँच गया है। दूतावासों के कागज बनने में समय लगेगा। आने में समय लगेगा।’’ सुबकते सुबकते पढिया ने बताया।
‘‘कोई बात नहीं। अब अपने को जल्दी नहीं है। वह निरोग व स्वस्थ तो है न?’’ पढवाल ने पूछा।
‘‘हाँ उसकी लिखावट ही बोल रही है।’’
‘‘तो फिर हँस दे पगले।’’ पढवाल ने गुदगुदी करते हुए कहा तो पढिया की निश्छल हँसी फू ट पडी।
यकायक पढिया बोल पडा- ‘‘क्या दुनियाँ में सब जगह बच्चों के साथ ज्यादती होती है बापू?’’
‘‘हाँ! लगभग सभी जगह। हमेशा बालकों का शोषण होता रहा है। ऑलीवर ट्वीस्ट नहीं पढा तुमने।’’
‘‘हाँ।’’
‘‘तो समझो बाल श्रम सर्वत्र है।’’
‘‘मैं तो समझ रहा था केवल हमारे देश में ही ऐसा है। इसलिए हमारे देश संबंधी बातें ही इकट्ठी
की थी।’’
‘‘क्या इकट्ठा किया था?’’ पढवाल ने पूछा।
‘‘ईवान्स अंकल को बताने के लिए यह लेख।’’ कहकर पढिया ने कुछ पन्ने पढवाल की ओर बढा दिए। पढवाल ने पन्ने लिए और पढिया को आराम के लिए भेज दिया। दोपहरी में पढवाल ने उन पन्नों को पढा।
‘‘पढिया कितना अच्छा ज्ञान रखता है। कितना बढिया लिखा है।’’ सोचते-सोचते पढवाल ने कागज सुरक्षित रख दिए। शाम को इवान्स को दे दिए गए।
पिछले एक साल से पढिया और दिव्यकृष्ण के बीच पत्राचार जारी है। दिव्यकृष्ण भी पढिया को इसी नाम पर पत्र लिखता है। बालकृष्ण नाम तो सुनामी में दफन हो गया है। दोनों भाई अपने तीसरे भाई का जिक्र हर पत्र में करते हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि एक बार मिल जाये।
पढिया अब तक उच्च माध्यमिक परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुका है पर दिव्यकृष्ण पिछले तीन साल में कुछ नहीं कर सका। वह अपने भैया से ही बातें सीखने की ललक
रखता है। उसने पढिया को लिखा था कि उसके लिए कुछ अच्छी बातें पत्र में लिखा करे। यहाँ शकीला बेगम उसे पढने व टी.वी. देखने का पूरा अवसर देती है परन्तु अखबार नहीं पढ पाता। दिव्यकृष्ण को आज की डाक का मोटा-सा लिफाफा देते हुए शकीला बेगम ने कहा- ‘‘दिव्या तुम्हारा पत्र तो बहुत भारी आया है रे।’’
रात्रि के भोजन पर अजीज ने पूछा-
‘‘बडा-सा लिफाफा आया है दिव्या?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘क्या लिखा है तुम्हारे भैया ने?’’
‘‘अभी पढा नहीं।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘बहुत सारे पृष्ठ हैं। रात को आराम से पढूँगा।’’
‘‘पढाई की बातें है क्या?’’
‘‘हमारे नसीब में पढाई कहाँ है? हमारे से तो जमीन की रेत भी अच्छी है, जिस पर पैर रखकर लोग चल तो लेते हैं।’’
‘‘ऐसा नहीं कहते। तुम शीघ्र देश पहुँच जाओगे। चलो अब अपने भैया का पत्र पढो।’’ अजीज ने उसके गाल पर थपकी लगाते हुए कहा।
दिव्यकृष्ण ने पत्र की सामग्री को खोला। काफी सारे पृष्ठ थे। मजमून से पता चल गया कि यह भारत में स्थित बालश्रम व बाल अधिकारों पर जानकारी है।
दिव्यकृष्ण ने पढना शुरू किया। पूरी सामग्री पढते ही अजीज कह उठे- ‘‘अरे दिव्य, यह बहुत अच्छी सामग्री है। बाल-अधिकार व बाल-श्रम अधिनियम आदि सब है। इसे बराबर बार-बार पढते रहो। ज्ञान भी बढेगा और बोर भी नहीं होवोगे पर अब सो जाओ।’’
दिव्यकृष्ण को उस रात बहुत गहरी नींद आई।
एक साल बाद पढिया आज फिर कलमपुरम् कस्बे में आया है। मानव अधिकार दिवस पर बडा-सा कार्यक्रम है। इस वर्ष वह प्रतियोगिता में भाग नहीं ले रहा है। प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार निर्धारित समय में अपनी
बात कहनी होती है। पढिया के पास बाल अधिकार व शिक्षा पर कहने के लिए काफी सामग्री है। वह सारी सामग्री बोलना चाहता है। समय भी पूरा चाहता है। खान अंकल के प्रयास और पिछले वर्ष के प्रथम पुरस्कार प्राप्तकर्ता होने के कारण आयोजकों ने प्रतियोगिता से अलग समय देना स्वीकार कर लिया।
प्रतियोगिता का आखिरी प्रतियोगी अपनी बात कह चुका है। मंच संचालक ने माइक पर आवाज दी-
‘‘प्रतियोगिता का परिणाम तैयार हो रहा है। इस दौरान आज के मुख्य बाल वक्ता को आमंत्रित कर रहा हूँ। मास्टर पढिया शिक्षा और बाल अधिकारों पर अपनी बात कहेंगे।’’
पढिया उठा। अपनी मस्तानी चाल से मंच की ओर बढा। इस दौरान मंच संचालक कह चुका था कि इसी बालक ने पिछले वर्ष प्रथम स्थान प्राप्त किया था। सबके सब पढिया को निहारने लगे।
पढिया ने माइक संभाला और बोलना शुरू किया।
‘‘प्रतियोगिता के लिए वक्ता को दिए जाने वाले समय में मैं अपनी बात पूरी नहीं कर पाता। अतः प्रतियोगिता के बाहर रह कर मेरी बात आप तक पहुँचा रहा हूँ। यद्यपि मेरी बात बहुत लम्बी है पर मेरी बात को आप सुन लेंगे यही मेरा इनाम होगा। इसलिए अर्ज सुनिए।’’ इसके पश्चात उसने गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से जोडते हुए ऐसा बोलना शुरू किया कि बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम की बात करके ही अपनी वाणी को विराम दे पाया।
‘‘इस प्रकार भारत में बच्चों के लिए ज्ञापित यह ऐतिहासिक दस्तावेज आफ सामने रखने के बाद मैं यही चाहूँगा कि भारत का हर बालक अपने अधिकार को प्राप्त करे। जय हिन्द।’’
तालियों की गडगडाहट के बीच पढिया अपने स्थान की ओर मुड गया।
XXX XXX XXX
क्या पढ रहे हो पढिया?
बडा अजीब-सा समाचार छपा है बापू, अखबार में।
समाचार क्या अजीब होता है भई?
नहीं। इसमें लिखा है ‘एक डाक्टर और उसके सहयोगी को बालिका भ्रूण-हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया। सोनोग्राफी मशीन भी जब्त।’ पढिया ने अखबार से नजर हटाकर पढवाल की तरफ देखते हुए पूछा-
डॉक्टर भी ऐसा करते हैं बापू?
हाँ पढिया! यह भी होता है। पढवाल ने चाय की पतीली में चाय-पत्ती डालते हुए कहा।
अरे किस बात पर चर्चा है भई? खान साहब अपना झोला उतारते हुए बोले तो दोनों ही चौंक पडे।
‘भूण हत्या’ पर अंकल। हमारे यहाँ भी ऐसा होता है अंकल? पढिया ने अखबार खान अंकल की ओर बढाया और उनके चरण स्पर्श करते हुए बोला।
इसका अर्थ यह हुआ कि अधिकार तो बहुत हैं पर उनकी पालना के लिए सामाजिक स्तर पर जागरूकता जरूरी है। पुनः पढिया ही बोला।
बिल्कुल ठीक कहा। खान साहब ने कॉफी का घूँट भरते हुए कहा।
और इसके लिए तुम्हारे जैसे युवाओं का संकल्पित होना जरूरी है। ईवान्स बोला।
जरूर अंकल। अब सभा सम्पन्न कीजिए। रात के नौ बज रहे हैं।
चौकडी कई दिनों बाद इतनी लम्बी बैठक के बाद उठ गई। पढिया भी पढवाल के साथ टी.वी. देखने लग गया।
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पढिया आज बहुत खुश है। दिव्यकृष्ण आज सुबह की फ्लाईट से मुम्बई पहुँच गया है। शाम तक वह कामतापुर पहुँच जायेगा। पढिया ने अपनी कोठरी ठीक से जमा ली है। आज से इस कोठरी के दो रहवासी होगे। सहसा उदास हो गया। सदाकृष्ण कब मिलेगा। खान अंकल
•केवल दिलासा ही तो नहीं दे रहे। घडी भी बहुत धीमें चल रही है। चार बज गए। वह ढाबे पर पहुँच गया। काम में लगे रहने पर वक्त जल्दी कटेगा। वह चार बजे की ट्रेन के यात्रियों को चाय पकडाने में व्यस्त हो गया। पहले ग्राहक को चाय पकडाकर मुडा ही था कि.....।
‘‘भै.ऽऽ..या.ऽऽ....।’’ की आवाज के साथ एक किशोर उससे लिपट गया। पढिया की बाहों का घेरा घने से घना होता गया। फिर पीठ से खिसककर दोनों हाथ सिर पर पहुँचे। सिर से दोनों हाथ दोनों तरफ की कनपटियों पर सरके और पढिया के बोल फूट पडे- ‘‘दिवू.....तू.... आ गया।’’
पास में खडे खान अजीज और पढवाल की आँखे भर आई। इस अनोखे मिलन पर। नजदीक के दरखत के कुछ पत्ते भी सरसराए। दरखत पर फुदकती गिलहरी के कुतरे कुछ पत्ते दोनों भाइयों पर बरसे। पढवाल की तन्द्रा टूटी तो उसने पाया कि दोनों बच्चे उसकी बाहों में है।
चलो घर। तुम्हारी........।
‘‘हाँ! हमारी माँ हमारा इंतजार कर रही है। हम वहीं चलेंगे।’’ कहकर पढिया ने दिव्यकृष्ण को अपने साथ लिया और पढवाल के घर की ओर रवाना हो गया। जहाँ पढवाल की पत्नी उनका इन्तजार कर रही थी, एक माँ के रूप में।
दोनों भाई हिरण के चकित छौनों की तरह घर में प्रविष्ट हुए। पढिया निश्शंक था पर दिव्यकृष्ण शंकालु-सा भी खुशनुमा भी। पढवाल-घर की गृहणी ने दोनों की बलाइयाँ ली। आँखों में एक चमक के साथ सहसा दोनों भाइयों के चेहरों पर भाव-परिवर्तन हो गया। शायद सदाकृष्ण याद आ गया।
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दिव्यकृष्ण को आये आज तीसरा दिन है। दोनों भाई रात पढिया की कोठरी में ही बिताते हैं। बाकी समय पढवाल ढाबे या पढवाल-घर में। दिव्यकृष्ण सदाकृष्ण की याद कर उदास होता दिखता तो पढिया उसे अपनी कहानी
बताना शुरू कर देता। आज न जाने क्यों खाना खाते समय पढवाल ने पूछ ही लिया-
‘‘दिव्या तुम अरब देश कैसे पहुँचे, कुछ याद है?’’
‘‘सब का सब याद है।’’
‘‘अच्छा।’’
‘‘हाँ, बहुत दर्दनाक था। भैया से बिछुडने के बाद मैं कई दिनों तक भिखमंगो की तरह फिरता रहा। एक दिन एक लडका मेरी रोटी छीनकर भागा। मैं उसके पीछे भागा था। उसे पकड लिया था। वह मेरे से बडा था। रोटी वापस नहीं ले सका। हमें भागते देख रहा एक व्यक्ति मेरे पास आया और मुझे दौडाक बताकर प्रशंसा की। मैंने उससे कहा था- भूख बहादुर भी बनाती है। उस व्यक्ति ने मुझे एक दौड में भाग लेने का झाँसा देकर अपने साथ कर लिया। तीन दिन बाद हम सात-आठ हमउम्र लडको को हवाई जहाज में बिठा कर बाहर भेज दिया। वहाँ दौड नहीं बल्कि ऊँट दौड के लिए ले गए थे हमें...।’’
‘‘बस करो। अब रहने दो।’’ पढिया काँपता-सा बोला और फिर पढवाल की तरफ मुखातिब होकर
पूछने लगा-
‘‘कहीं सदाकृष्ण भी तो....।’’
‘‘नहीं ऐसा नहीं है।’’
‘‘तो फिर वह कहाँ है?’’
‘‘तुम्हारी बात सही है बेटा। वह ऐसे ही अन्य व्यापार की चपेट में आ गया होगा।’’ पढवाल ने कहा।
‘‘इस तरह के अन्य व्यापर का क्या मतलब है?’’
‘‘हाँ पढिया बच्चों के शोषण के कई रूप हैं।’’
‘‘बच्चों के साथ ऐसा क्यों कर होता है?’’
‘‘कई कारण है बेटा। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि बच्चों की असुरक्षा और कोमलता में भी एक विशिष्टता रहती है। बच्चे की कोमलता इस रूप में विशिष्ट है कि बच्चा किसी प्रकार की वंचना के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होता है। यही कारण कि बच्चों का सर्वाधिक शोषण होता है। यह शोषण बाल-श्रम, बाल-दुरुपयोग, बाल-दुराचार,
बाल दासता, बाल दुर्व्यापार, बाल-भिखमंगी आदि के रूप में नजर आता है।’’
‘‘कहीं हमारा सदाकृष्ण भी दुर्व्यापार की चपेट में तो नहीं है?’’ पढिया व दिव्यकृष्ण एक साथ बोले। उनकी आशंका निर्मूल न थी।
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पढिया को अपने बी.ए. प्रथम वर्ष के प्रोजेक्ट के रूप में ‘‘बाल स्वास्थ्य एवं पोषण’’ विषय मिला। यह संयोग की ही बात है। पढिया ने प्रोजेक्ट की सामग्री तैयार कर ली। प्रोजेक्टर का प्रतिवेदन पढिया के सामने पडा है। आज रात को इसको पूरी तरह से पढ लेना है।
रात भोजन के बाद दोनों भाई अपनी कोठरी में हैं। दिव्यकृष्ण स्कूल जाने लग गया है। उसने अपना होमवर्क पूरा कर लिया है। पढिया ने उसे सो जाने का कह दिया। खुद पढिया ने अपने प्रतिवेदन का आधा भाग ही पढा है। टाइपिस्ट ने कोई त्रुटि नहीं की है।
ग्यारह बजे की टंकार हो गई। प्रतिवेदन पूरा पढ लिया। प्रतिवेदन के परिशिष्ट के रूप में बच्चों के नाम की सूची थी। पढिया ने उसे छोड दिया। परन्तु सहसा विचार आया। सूची भी पढी जानी चाहिए। पढिया ने एक-एक नाम-पता पढना शुरू किया। हटात् नजर रुक गई-सदाकृष्ण, पता-बालगृह, अलीपुर....।
पढिया ने दोबारा पढा सदाकृष्ण, पता- बालगृह अलीपुर। उसकी किलकारी निकलने ही वाली थी कि अपने आप को थाम लिया। खुशी का ठिकाना नहीं था पर आशंका थी-कोई और सदाकृष्ण हुआ तो। उसने दिव्यकृष्ण के मासूम चेहरे पर नजर डाली। गहरी निद्रा में कितने सकून से सो रहा था। उसने दिव्य के बालों में हाथ फिराया और बत्ती बझा दी।
सुबह-सुबह ही पढवाल और पढिया तैयार हो गए। दिव्यकृष्ण को भी तैयार कर लिया। एक टिफिन में दोपहरी ले ली थी। कुछ टॉफियाँ व गुड की डली भी। दिव्यकृष्ण उनके साथ था पर उसे नहीं मालूम था कहाँ
जा रहे हैं। बस का सफर था। सडक के दोनों ओर हरे-भरे पेड। चहचहाते पक्षी। कुलांचे भरते हिरण। लगातार पीछे छूटते जा रहे थे।
पढिया को अपना अतीत याद आ गया। तीन भाई व माँ-बापू। सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार। तीनों भाई पढने में अव्वल। माँ-बाप अपनी जिम्मेदारी में सतर्क । अपार ममत्व लुटाते थे। तीनों भाइयों में अपार स्नेह।
‘‘चलो चाय पी लेते हैं।’’ पढवाल की आवाज पर पढिया की तन्द्रा टूटी। उसने देखा बस किसी छोटे स्थान पर रुकी है। उन तीनों ने भी चाय पी। बस रवाना हुई। बस में चढते-चढते एक व्यक्ति ने पढिया के पास आकर सम्मान के साथ कहा-
‘‘नमस्ते पढियाजी।’’
‘‘नमस्ते, पर मैं आपको....’’
‘‘अरे आप भले ही न जानते हों पर पढिया को कौन नहीं जानता। ऐसे मानव अधिकार कार्यकर्ता युवक को जानना फक्र की बात है।’’ उस व्यक्ति ने कहा और पडोस की सीट पर बैठ गया।
बातचीत से पता चला वह सज्जन भी अलीपुर ही जा रहे हैं। पढिया ने बताया की वहाँ के बालगृह से एक बालक को घर लेने जा रहे हैं। बाल-गृह की औपचारिकता पूरी करने के लिए उनके पास कोई दस्तावेज नहीं हैं। सज्जन ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा की आप जैसा कार्यकर्ता तो स्वयं दस्तावेज है। थोडी देर बाद बातचीत का सिलसिला रुक गया।
पढिया बाहर के दृश्य देखता-देखता पुनः अतीत में खो गया। मातरा गाँव के खेत-खलिहान। साथियों के साथ धमाचौकडी। बेरियों के बेर। आमों की अमिया। पिता की डाँट और मम्मी की मुहब्बत। तुम तीनों मेरी
त्रिलोकी हो- माँ कहती थी। उसके मुँह से अनायास ही निकल गया।
‘‘क्या कहती थी माँ?’’ पास बैठे पढवाल ने पूछा तो वह चौंक गया। पर कुछ नहीं बोला। बस गन्तव्य की ओर बढ रही थी।
अलीपुर के बस अड्डे से बालगृह ज्यादा दूर नहीं था। वे बालगृह की ओर पैदल ही चल पडे। पढवाल व उसके बीच में दिव्यकृष्ण चल रहा था। उसका दिल मानों उछलकर बाहर आ जायेगा। पैर मानो क्षण भर में दूरी नापना चाह रहे थे। तीनों मौन थे। साथ वाले सज्जन भी साथ ही चल रहे थे और बोले जा रहे थे।
बालगृह के फाटक के सामने थे। फाटक खटखटाया। एक प्रौढ और एक बच्चे के साथ एक मानव आधिकार कार्यकर्ता युवक धडकते दिल से अपनी आत्मा की आवाज के साकार होने के इंतजार में था। फाटक खुला। हटात! फाटक खोलने वाला चिर प्रतीक्षित ही था। पढिया की बाह फैली वह बोला-माँ कहती थी। दिव्य भी भौंचक्का-सा भुजा पसार बोला था- माँ कहती थी। विस्मित चेहरे और दो भाइयों की बाहों में सुकून प्राप्त करते हुए तीसरे की आँखों में आँसू थे। वह भी कह रहा था- माँ कहती थी।
पढवाल के हाथ तीनों के सिर पर थे। ?
आदर्श राज. उच्च माध्यमिक विद्यालय, सुनारी, जिला नागौर (राज.)