दो गीत

उमेश अपराधी



मेरे घर मौसम बदला है
अपने हो तो इसे बाँट लो
वरना मुर्दाघर है आगे
चाहो तो तुम उसे छाँट लो।
मैं ऋतुओं का राज कुँवर हूँ
मैं खुद का फागुन लाया हूँ
जो कुछ भी है नकद माल है
तप तप कर इसको पाया हूँ,
धोबी घाट नहीं है अपना
ना उधार का रंग रोगन है
अगर प्रदर्शन प्रिय हो तो तुम
आगे जा कपडे पछाँट लो।
सारी विधाएँ पारंगत
छन्दों, गंधों, अनुबंधों की
अपने पैरों के बल निकला
नहीं जरुरत है कंधों की,
मैंने जो व्याकरण पढी है
संघर्षों में गई गढी है
जिनको विज्ञापन बनना हो
वह लोगों की झूठ चाट लो। ?

जीवन भर को लिख दी है जो
कथा किसी ने
उनको ही दोहराना होगा।
लाख जतन कर लिए कबीरा
नहीं हुआ माया का चेला
मीरा हारी नहीं जगत का
नहीं चला था खोटा धेला,
सातों स्वर मिल गये
तार-सप्तक में जाकर
पर आखिर में गीता को ही गाना होगा।
हर युग के संग बदली हैं परिभाषाएँ
ताकि सुसंगति बनी रहे मर्यादाओं की,
लेकिन पट्टी बाँध रखी जो गांधारी ने
खुली नहीं आँखें चिल्लाती बाधाओं की,
सबसे पीछे छूट गया जो
पंक्ति में से
उस अन्त्यज को सबसे आगे लाना होगा। ?
आदर्श कॉलोनी, मोहन नगर, हिण्डौन सिटी,करौली (राज.)
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