दो गजलें

बाबू खान शेख



खोजता फिरता है जिसको दर-ब-दर।
बसता तेरे दिल में, ना जा दर-ब-दर।।
रूह की आँखें तू अपनी खोलकर।
कर उसे महसूस, ना जा दर-ब-दर।।
ये फलक ये माहताब औ’ आफातब।
उसका ही है नूर फैला दर-ब-दर।।
ये हवा, पर्वत, ये सागर, घाटियाँ।
सब उसी का जलवा है ये दर-ब-दर
वो तो वाहीद है, वो आला नूर है।
उसके ना तू घर बना यूँ दर-ब-दर।।
कर भलाई और हासिल नेकियाँ।
राह तू पा लेगा, ना जा दर-ब-दर।।
‘शेख’ की है ये सभी से इल्तिजा।
गाएँ उसकी हम्द सब मिल दर-ब-दर।। ?

ताजादम तेरे सब अफसाने हैं।
सब तेरी याद के खजाने हैं।।
तेरे लिखे वो खत-औ-खुतूत।
सारे महफूज मेरे सिरहाने हैं।।
बज्म से उठ कर तुम हुए ओझल।
हम तो अब भी तेरे दीवाने हैं।।
होगी तौहीन गर कहूँ मयखाना।
तेरी आँखें तो कत्लखाने हैं।।
यूँ लरजना वो तेरे होठों का।
याद मंजर वो अब पुराने हैं।।
गाये जा ‘शेख’ इश्क-ऐ-हकीकी को।
बाकी फीके सभी तराने हैं।। ?