दो गजलें

डॉ. अशरफ अली बेग


1
दिन की फुरसत काम आ गयी सोने में,
अपनी ही थी, रात गुजर गयी रोने में।
प्रीत परखते सदियाँ यू ही बीत गयीं,
मुझे यकीं फिर भी है करिश्मा बोने में।
कठिन बहुत है भोली सूरत वाले सुन,
यकीं करूँ, पर यकीं तो है कुछ खोने में।
एक सलीका ऐसा भी है जीने का,
जम हो जाऊँ तेरी आहट होने में।
इतना अफसुर्दा न कभी था यूँ अशरफ,
इतना खुश भी कभी न था गुम होने में । ?

टूटे तीर कमाँ भी टूटी, दूर दूर तक फैला रन,
बाहर भीतर सब यकजा हैं और सभी में है अनबन।
दूकाँ ही अब ठौर ठिकाना, घर में दूकाँ दूकाँ घर,
किस दिन भाव चढे कब लुढके सोच-सोच ये काँपे मन।
निहुरे-निहुरे ऊँट चुराया सोचा हमने किया तो कुछ,
सारी बस्ती ही गुम पायी कहाँ धरें अब हम छाजन।
मन की जाने कौन यहाँ तो लेन-देन में है दुनिया,
चमकाते ही रहे रात-दिन घिस डाला तन का बासन।
हाँडी चढी काठ की फिर बोले बैन मधुर फिर फिर,
वक्त का जादू जाने कैसा उजला दिखता मैला तन।
कारोबारी इस मेले में नहीं तंज का कोई ठाँव,
धूम धडाका शोर शराबा घुटी सिसकियाँ टूटे मन।
नाम भी जिसका डूब गया था फिर से उभरा वो अशरफ,
चोट पुरानी फिर उभरी है, चलो करें कुछ और जतन । ?
बी-८, पत्रकार कॉलोनी, अशोक नगर, इलाहाबाद-२११००१,मो. ९४५०६३५६८८