दो गजलें

जहीर कुरेशी


एक
कुछ सुपरिचित और कुछ अनजान-से,
अपने घर में ही रहे मेहमान - से।
बात करते ही कठिन लगने लगे,
दिख रहे थे जो बहुत आसान-से।
व्यक्त करने के लिए झूठी खुशी,
होंठ चिफ हैं मधुर मुस्कान से।
जोहरी के हाथ तक पहुँचे नहीं,
सैंकडों हीरे निकल कर खान से!
धीरे-धीरे चुक गया उल्लास भी,
पंख लगते हैं बहुत बेजान से।
रोज पशुता व्यक्त होती है कहीं,
लोग दिखते भर रहे इन्सान-से।
आस्था को तर्क से नफरत रही,
धर्म को नफरत रही विज्ञान से। ?
दो
जो पाँव-पाँव चले, उनको वेगवान किया,
फिर उसके बाद, विमानों का प्रावधान किया।
अब आ गया है सही वक्त सिद्ध करने का,
स्वयं की प्रतिभा का तुमने बहुत बखान किया।
उन्हें पता था कि हम चुन रहे हैं जोखिम को,
इसीलिए हमें लोगों ने सावधान किया।
वो अपने मूल्य को खुद ही बताने लगती है,
स्वयं के रूप को जिसने खुली दुकान किया।
कलम के पास कमी पड गई है शब्दों की,
दुःखों ने लोगों को इतनी तरह बयान किया।
हमेशा प्यास कुए या नदी के जल से बुझी,
समंदरों ने कहाँ प्यास का निदान किया?
विरासतों को बचा कर पुरानी पीढी ने,
खुशी के साथ नई पीढियों को दान किया। ?
१०८, त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने, गुरुबक्श की तलैया, पो.ऑ. जीपीओ, भोपाल-४६२००१ (म.प्र.)
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डॉ. अशरफ अली बेग