तीन कविताएँ

जगदीश पंकज


हो रहे हैं अब असह आघात
हो रहे हैं
अब असह आघात
आँगन में, हवा के
मैं जहाँ पर हूँ
वहाँ से देखिये
पूरे फलक पर
है कहाँ पर तम,
कहाँ तक रोशनी
पहुँची छलक कर
पिन नुकीले
चुभ रहे बेबात
आँगन में, हवा के
क्यों नहीं
सम्भव हमारी
संस्कृतियों का समञ्जन
तेज पछुआ
दे रही है
नींव को जब रोज कम्पन
बन रहे
छलना भरे अनुपात
आँगन में, हवा के
दर्द उभरे,
देह के, मन के
पुराने या नये अब
खोजते उपचार
पछुवा के विकल्पों में
अभी सब
मूल्य कैसे
हो रहे आयात
आँगन में, हवा के
पीढियों से
दंश मिलते, तोडते
हर काल-क्रम में
एक होकर कब रहे
जीते रहे हर
बार भ्रम में
हो रहे
षडयंत्र ही अज्ञात
आँगन में, हवा के ?
कुछ अधूरापन छिपाने को
कुछ अधूरापन छिपाने को
सज रहे हैं
भित्ति-चित्रों से
वस्तुओं में
कब बदल जाए
आदमी युग का हताशा में
कौन कितना
कहाँ उपयोगी
खोजते हैं अर्थ भाषा में
भरभरा कर ढह रहे रिश्ते
पटकथा के
मृत चरित्रों से
अनगिनत
प्रतियोगिताओं में
आकलित होने लगे हैं हम
जोडकर
मानक परीक्षा के
अंक प्रतिदिन हो रहे हैं कम
है नहीं
अपने लिए क्षण भर
घिर गए अनजान मित्रों से
वैश्विक
बाजार में आकर
हम खडे उपभोक्ता बनकर
कीमतों ने
रीढ तोडी है
फिर चलें अब किस तरह तनकर
व्यर्थ पुलकित हो रहे हैं सब
पा विषैली
गन्ध इत्रों से ?
चलो कबीरा अब मगहर को
देख लिये काशी के करतब
चलो कबीरा अब मगहर को
कटुता और कुटिलता देखी
देखी घाट-घाट की गंगा
सार्वजनिक घाटों पर आकर
कौन नहाता होकर नंगा
कहाँ बिक रहा पुण्य, कहाँ पर
भक्त बेचते हैं शंकर को
तुमने ओढी बडे जतन से
चादर जस की तस धर दीनी
ऐसे मिलते लोग जिन्होंने
औरों की चादर भी छीनी
टोपी उछल रही नगरी में
लोग बचाते अपने सर को
कौन सुनेगा यहाँ तुम्हारी
उलटबासियाँ बाँच रहे हैं
धारा उलट नहीं पाए जो
वे धारा के साथ बहे हैं
मन का मैल नहीं धो पाये
पीट रहे तन के पत्थर को ?
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