पाँच कविताएँ

कृष्ण सुकुमार



ठीक वहीं
जहाँ छोड गए थे
अचानक अकेला,
स्थिर खडा हूँ तुम्हारी परछाई थामें।
वापसी के तमाम रास्ते
समेट ले गए थे अपने साथ
लौटता कैसे ?
तुम्हारी परछाई छोड
नामुमकिन था आगे बढ पाना।
एक दिन रह जाऊँगा
ऐतिहासिक अवशेषों की तरह
खँडहर और वीरान।
फिर एक दिन
कोई आएगा और ले जाएगा नमूने
परखेगा मेरे टुकडों से काल
तुम्हारे रास्ते की मिट्टी का मिलान करेगा
बार बार... कई तरह से...
अनेक चरणों में पूरा होगा उस का यह प्रयोग।
आगे न सही,
वापस तब
तुम्हारे साथ पीछे लौट पाऊँगा मैं भी। ?

हवाओं के साथ
लिपटा हुआ था उसका नाम
नदी के जल में काँप रहा था
उस का नाम
घनघोर बादलों के बीच
कौंध रहा था उस का नाम।
मैं छू कर महसूस करना चाहता था उसे।
मुझे हवाओं के बीच बिखरना नहीं आया
जल के साथ पिघलना नहीं आया
बादलों तरह उठ कर छा जाना नहीं आया।
देख लेना एक दिन
मेरे ही शून्य में विलीन हो जाना है
उस का वही नाम...
ऐ हवा,
ऐ नदी,
ओ बादलों! ?

तुम्हारे लिए रचे थे प्राण
तुम्हारे लिए थाम रखी थीं साँसें
तुम्हारे लिए किया था सपनों के साथ नृत्य
अपने भीतर मौन में उतरते हुए।
अकेला हूँ यहाँ।
कहाँ छूट गये?
आने का रास्ता था
वापसी का नहीं!
ओह! कहाँ रखूँ प्राण
कहाँ रखूँ सपन?
अकेले नहीं उठा सकता
इतना बोझ।
दफ्न रह जाऊँगा मौन में।?

भरोसे की हथेली फैलाये
खडा था।
हवा में बादलों के फाहों जैसी
तिर रही थी
आलोकित आत्मा।
भीतर गहनतम अंतरगुहा म
टूट-टूट कर छिटक रहे थे
ग्लेशियर
अनिर्वचनीय सुगंधों के!
किस की प्रतीक्षा कर रहा था मैं ?
राह में आते जाते
कौन रख गया
मेरी जीवंत हथेली पर
निष्प्राण, निष्प्रभ, निष्ठुर
प्रवंचना।
सामने आओ
छलिया
छू...
हथेली के पावन रोमकूपों में
समाधिस्थ तरल उर्जा
अपनी ध्वस्त साँसों से।
जी उठेगा! ?

झरता रहा प्रकाश
उन आँखों से तमाम रात
और बिखरता रहा वुजुद मेरा।
भरता रहा मैं अपने अँधेरे
और सहेजता रहा अपना एकांत।
बहुत दिनों बाद हुआ हूँ
मैं इकट्ठा अपने ही आसपास। ?
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