तीन कविताएँ

डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया


इस तरह, जीवन....
इस तरह
गुलाबी नर्म कोंपलों को
देखना बदलते
हरे मैदानों में,
सूरज का उगना अलसाते हुए
और फिर
यकायक हो जाना प्रचण्ड।
शाम ढले लौटना
थके पैरों की धूल झाडते,
तुम्हारी हँसी में/मोबाइल पर
बढता निरन्तर
चिन्ताओं का प्रच्छन्त स्वर
‘‘कैसे हो’’ से आगे
न बढ पाना संवाद
सरल से जटिल और फिर
विरल होते देखना
इस तरह, जीवन! ?
धुंध में अकेले
बहुत गहरा जाती हो जब धुंध
तेा साथ होकर भी
साथ नहीं होता कोई।
ऊनी टोपी सिर पर ओढे
गले में लपेटे मफलर
जर्सी का कॉलर ऊपर उठाए
दोनों जेबों में पतलून की
ठूँसे बन्द मुठ्ठियाँ
चुपचाप तेजी से कदम बढाते
साथ होकर भी
साथ नहीं होते दोस्त।
बर्फ सी ठंडी हो चुकी नाक से
निकलती है भाप
जब फैली हो हर तरफ धुंध
तब कहाँ पहचान में आता है
मित्र/शत्रु ?
समय प्रेत की तरह आता है
और विश्वास
लौट जाता है उल्टे पैर
आँखों में उतर आती है
दूधिया सफेदी
और कान ही रह जाते हैं बस
जानने-समझने के लिए।
तेज गति से आती रोशनी
छितरा जाती है सडक पर
बेमन से दिए आश्वासनों की तरह।
तुम्हारा हाथ थामकर
पार करना चाहता था मैं
यह रेगिस्तान,
न जाने कैसे छूट गए तुम
मैं अपनी अंगुलियों के पोरों को
देखता हूँ महसूसते
तुम्हारा स्पर्श अविश्वनीय!
आसमान से चले गए हैं तारे सब
और क्षितिज तक तो
जाती ही नहीं नजर
इस तरह धुंध में
अकेले गुजरते हुए
होता है आभास एक पल में
कई युगों का। ?
स्मृति, सागर और आकाश
मैं तुम्हारी गहराई से ही
था विस्मित,
जब कभी सोचता
तुम्हारी गहराई में डूबकर
स्वयं सीप हो जाने की
कल्पना किया करता।
तुम्हारे स्वरुप को जान कर
दो गुना हो गया है आश्चर्य
आकाश को छूते
दिख रही है तुम्हारी
उत्तुंग लहरें
तुम्हारी ऊँ चाई ने
कर दिया है मुझे चकित।
सागर की गहराई से
आकाश की ऊँचाई तक
कैसा अद्भुत है तुम्हारा व्यक्तित्व!
मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ
महासागर,
स्मृति सागर भी है, आकाश भी। ?
अंग्रेजी विभाग, मा.ला. वर्मा श्रमजीवी कॉलेज, राज. विद्यापीठ, उदयपुर
मो. ९४१३५७५३८२