दो कविताएँ

डॉ. मीरा रामनिवास वर्मा


गिरते पत्तों की व्यथा
मौसम बदला
प्रकृति का रूप बदला
बसंत की विदाई
पतझड की अगुवाई
आम बौराने लगे
धान पकने लगे
पत्ते पक कर
शाखों से गिरने लगे
शाख से जैसे ही
कोई पत्ता गिरता है
दूसरे पत्तों को
गिरने का भय
सालने लगता है
पत्तों में हलचल है
पतझड को कोस रहे हैं
पत्ते सोच रहे हैं
डाल से गिरते ही
खाक हो जायेंगे
पैरों तले रौंदे जायेंगे
डाल पर हवा संग
अठखेलियाँ करते थे
एक दूजे को धकियाते थे
हँसते थे खिलखिलाते थे
चिडियाओं संग बतियाते थे
गिरते ही जीवन थम जायेगा
अब नया बसंत न आयेगा
पत्तों की व्यथा
कोई सुन नहीं पाता
वृक्ष सब जानता है
किंतु चुप रहता है
शाखों पर फिर से
नई कोंपले उगेगीं
फिर कलियाँ खिलेगीं
पत्तों का आना जाना
लगा रहता है
वृक्ष निर्विकार
योगी सा खडा रहता है ?
इच्छाओं को जगायें
सुषुप्त हो चली हैं
समय के साथ कुछ इच्छाएँ
उन्हें फिर से जगायें
आज फिर से जिंदादिल हो जायें
अरसा हुआ घर से
निकले ही नहीं सुबह के सूरज का
दीदार किये ही नहीं
सुबह को सैर करें तरोताजा हो आयें
रहने लगा है दिल
इन दिनों गुमसुम छुपाये बैठा हो
किसी कोने में
जैसे कोई गम कुछ गुनगुनायें
दिल को बहलायें
बहुत दिन हुए न कुछ कहा
न कुछ सुना
आज किसी परिचित के
घर हो आयें
खूब बतियायें कातर नजरों से
देख रही है टेबल से डायरी
उसे उलटें-पलटें पुराने पन्ने पढें
नया लिखने का मन बनाएँ
पतझड के आते ही
बेनूर है उदास है आँगन में
खडा दरख्त
पंछियों बिन अकेला है
उसके पास बैठे उसका अकेलापन
दूर भगायें ?
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