पाँच कविताएँ

किरण राजपुरोहित ‘नितिला’


होना चाहती हूँ...
माँ पत्नी बहिन बेटी -
पुरुष से होकर जाने वाले
हर सम्बंध से इतर
कुछ और केवल
ब्रह्मा की एक रचना
होकर रहती हूँ,
सहनशील ममतामयी धैर्यवान्-
ओढे गये लबादों से इतर
सृष्टि का रूप
बनकर अबोध इवा सी झूमती हूँ,
थोपी गई उपमाओं
महान् जीवनधार
से निकल
धरती नदी सभ्यता सी
असीमित अथाह अछोर
संभावनायें जताती हूँ
मैं बस
मैं होकर जीती हूँ!! ?
अकेला
अपनी व्यस्तताओं के जंगल में
विचरता
कितना अकेला है आदमी
रास्ते पर रास्ते खुलते
चौराहे छुप जाते चौराहे पर छोडकर
पगडंडियों का अपनापन
नहीं सुनने देता
मृगतृष्णाओं का नीरव ?
फुलवारी
बात बेबात पसरते किस्से
हवाओं से होड लेती अफवाहें
बिना धड के सिर उगते
नाराजगियों की
घनघोर घटायें
मनाने के प्रयास विफल
और अकडते ठनते
तब सम्बंधों की फुलवारी
सुबह-सवेरे ही झुलसे ?
अनंता
टटोल कर सिरे आसमान के
धरती ने छुपाली
अपनी गहराई
विस्तृतता की आवाजाही
भरपूर है छाई
पर साथी का मान
ऊँ चा ही रहे
यही प्रयास रहता दोनों का
धरती उसे अनंत कहती
आसमाँ उसे अनंता ?
पहली बूँद
बारिश की पहली बूँद से
महक उठती है मिट्टी
हवा से गलबहियाँ करती
रेतीली खुशबू
उच्छ्वास है उसके खुश होने की
प्राण से निकला अद्भुत् वाह!
जिसकी सृष्टि को चाह ?
सी-१३९, शास्त्री नगर, जोधपुर (राज.)