मणिपुर के हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय तत्त्व

श्रीमती मनोहरमयुम यमुना देवी


भौगोलिक दृष्टि से मणिपुर प्रदेश दो भागों में विभाजित है। पर्वतीय भू-भाग जिसमें लगभग २० जनजातियाँ निवास करती हैं, उस क्षेत्र को ‘चिड्लैबाक’ नाम से जाना जाता है। मणिपुर के पहाडी अंचल में रहने वाली जनजातियाँ ‘चिड्म’ या ‘हाओ’ कहलाती हैं। इन दिनों पहाडी जातियों को नागा नाम से संबोधित किया जाता है। मणिपुर का मैदानी क्षेत्र नौ पर्वत शखलाओं से घिरा हुआ है। उसे प्राचीन काल में ‘मैत्राबाक’ तथा ‘कड्लैपाक’ नाम से जाना जाता था। मणिपुर के मैदानी अंचल में मैतै (मणिपुर) तथा मैतै पाड्ल (मणिपुर मुस्लिम) समाज के लोग मुख्य रूप से निवास करते हैं। गत कुछ दशकों से पहाडी जनजातियाँ भी मैदानी क्षेत्र में बस चुकी हैं और उनकी संफ भाषा मणिपुरी तथा हिन्दी हो गई है। इंफाल और उसके चारों ओर नेपाली तथा हिन्दी भाषी समाज भी निवास करता है।
मणिपुर प्रदेश पूर्वोत्तर भारत का सीमांत राज्य है जो अपने नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। इसके मनोरम दृश्य के कारण इसे भारत की ‘मणि’ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्राचीन मणिपुरी पुराण गंथों में मणिपुर को पृथ्वी का कमल भी कहा गया है। मणिपुर प्रदेश की महान भूमि ने स्वतंत्रता संग्राम की पूर्वोत्तर भारत की महान नायिका रानी गाइदिन्ल्यू और उनके गुरु जादोनांड् को जन्म दिया है। इन पूर्वोत्तर भारत के गौरवशाली लोगों में मणिपुर की पवित्र वीर भूमि के युवराज वीर टीकेंद्रजीत सिंह, पाओना ब्रजवासी, थांगाल जनरल तथा जननेता हिजम इराबोत का नाम हमारे मन में राष्ट्रपेम के भाव को नई स्फूर्ति से भर देता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयासों में मणिपुर का अप्रतिम योगदान रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भी आजाद हिंद फौज का मुख्यालय मणिपुर के ‘मोइराड्’ में स्थापित किया था। मोइराड् निवासी हेमाम नीलमणि सिंह नेताजी के एक प्रमुख सहयोगी थे, जिन्हें स्वयं नेताजी ने हिंदी सिखाई थी। मणिपुर की साहित्यिक चेतना पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस और राष्ट्रभक्तों की राष्ट्रप्रेम की भावना की झलक भी तत्कालीन लोककाव्य और सृजनात्मक रचनाओं में मिलती है। यही मातृभूमि और देशप्रेम की भावधारा मणिपुर के हिंदी साहित्य में अंतर्निहित है। मणिपुर
की राजधानी इंफाल और इसके चारों ओर निवास करने वाला मणिपुरी समाज तथा जनजातीय समुदायों के हिंदी अनुरागी लोग हिंदी भाषा और साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय भावधारा से जुडने के लिए प्रयत्नयशील रहे हैं। वीर भूमि मणिपुर की लोककाव्य शैली में वर्णित मातृभूमि वंदना, देशपेम की भावना का चित्रण रोमांचित करने वाले हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद रचित मणिपुर की हिंदी कविता और हिंदी रचनाओं में राष्ट्रीय तत्त्व भारतीयता की आभा से प्रभावित होकर व्यापक फलक पर दिखलाई पडता है। समकालीन मणिपुर के हिंदी के सृजनात्मक साहित्य में राष्ट्रीयता और भारतीयता की अवधारणा का स्वरूप व्यापक रूप में व्यक्त हो रहा है।
मणिपुर के हिंदी साहित्य की संवेदना और मणिपुर प्रदेश की भाषाओं के साहित्य की संवेदना एक सांस्कृतिक सेतु निर्मित करने में सक्षम है। राष्ट्रीयता की भावना सुदृढ और व्यापक बने, इसके लिए भाषा साहित्य और संस्कृति संगम का मार्ग ही एक मात्र निदान है। साहित्य नष्ट होती मानवता को बचाने में सक्षम है। संकुचित वैचारिक सोच को भाषा और साहित्य ही रोक पाने में सक्षम है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में मणिपुर ऐसा राज्य है, जिसने हिंदी भाषा और उसके साहित्य का स्वागत राष्ट्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय आवश्यकता के संदर्भ में किया है। हिंदी एक भाषा ही नहीं है बल्कि वह भावात्मक एकता को प्रवाहित करने वाली धारा है। इसी भावना के फलस्वरूप मणिपुर में आज ऐसे सैंकडों छोटे-बडे हिंदी लेखक-लेखिकाएँ हैं जो पूरे अधिकार के साथ हिंदी भाषा में मातृभाषा की तरह साहित्य रचना करते हैं। मणिपुरी भाषी हिंदी लेखक अपने सृजनात्मक साहित्य द्वारा हिंदी साहित्य की परंपरा के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाते जा रहे हैं। वहाँ पर हिंदी में मौलिक सृजन भी हो रहा है तथा अनुवाद कार्य भी चल रहा है। साथ ही हिंदी की कई पत्रिकाएँ जैसे महीप, कुंदोपरेड्, युमशकैश, लटचम आदि प्रकाशित हो रही हैं।
मणिपुर पिछले आठ सौ वर्षों से भारतीय सांस्कृतिक-परंपरा से जुडा रहा है और १२-१३ वीं शताब्दी से हिंदू सांस्कृतिक परंपरा ने भी यहाँ के निवासियों को संस्कृत और हिंदी भाषा से जोडा। ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का संस्कारित रूप यहाँ के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन पर सर्वाधिक पडा है। मणिपुर की साहित्यिक पंरपरा ढाई हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी है और ललित कलाओं के क्षेत्र में मणिपुर आज भी अग्रणी प्रदेश है।
मणिपुर में हिंदी में लेखन का कार्य हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार से जुडा हुआ है। दूसरे विश्वयुद्ध के पूर्व यहाँ हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य आरंभ हो गया था और इस महायुद्ध के पश्चात हिंदी के प्रचार में तेजी या गतिशीलता आती गई। उस समय पठन-पाठन से संबंधित सामग्री मणिपुर के बाहर कार्यरत हिंदी प्रचार-प्रसार से संबंधित संस्थाओं की ओर से आती थी। कालांतर में हिंदी प्रचारकों को यह महसूस हुआ कि सुचारू रूप से हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने के लिए यहाँ की स्थानीय भाषा मणिपुरी और इसकी संस्कृति से संबंधित हिंदी पुस्तकों की आवश्यकता है। इसी सोच के आधार पर मणिपुरी भाषी हिंदी प्रचारकों ने समय की माँग और पठन-पाठन संबंधी अभाव को दूर करने के उद्देश्य से शब्दानुवाद, वाक्यानुवाद और हिंदी सीखने के लिए सरल हिंदी व्याकरण की छोटी-छोटी पुस्तकों की रचना प्रारंभ की। धीरे-धीरे पाठ्यपुस्तकों और शब्द कोशों के निर्माण की ओर भी ध्यान दिया जाने लगा।
यहाँ हिंदी भाषा में भी पत्रकारिता का कार्य प्रारंभ हुआ। मणिपुर के हिंंदी प्रेमी धीरे-धीरे मौलिक रचनात्मक लेखन की ओर भी रुचि प्रकट करने लगे तथा सृजनात्मक हिंदी रचनाओं का सृजन करने लगे। कुछ मणिपुरी भाषी लेखकों ने हिंदी में मौलिक लेखन और कुछ लेखकों ने हिंदी भाषा में पाठ्य-पुस्तक निर्माण, मौलिक रचनात्मक लेखन, अनुवाद का कार्य शुरू किया है।
कुछ मणिपुरी लेखकों ने मणिपुर के वाचिक साहित्य को भाषांतरित कर हिंदी में प्रस्तुत किया।
अब तक उपलब्ध मणिपुरी भाषी हिंदी लेखकों द्वारा रचित और तैयार की गयी हिंदी भाषा में रचित लेखन सामग्री को निमानुसार छह वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
(क)पठन-पाठन से संबंधित हिंदी रचनाएँ।
(ख)सृजनात्मक हिंदी साहित्य।
(ग)अनुसंधान परक व्यतिरेकी तुलनात्मक और समीक्षात्मक साहित्य।
(घ)पत्रकारिता विषयक साहित्य।
(ड)संपादित, संग्रहीत अनुवादित साहित्य।
(च)लोक-साहित्य, वाचिक-साहित्य तथा कोश-साहित्य।
मणिपुर में मणिपुरी हिंदी सेवियों और प्रचारकों की संख्या ठीक है किंतु आधुनिक मणिपुरी भाषी हिंदी लेखकों में से निमाकित लेखकों का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है- श्री कालाचाँद शास्त्री, हिंदड्मयुम द्विजमणि देव शर्मा, पं. छत्रध्वज, पं. नारायण शर्मा, पं. अरिबम राधामोहन शर्मा, हजारिमयुम गोकुलाचंद शर्मा, फुराईलात्पम गोकुलानन्द शर्मा, हिजम विजय सिंह, ए. गुणाधर शर्मा, पं. गोपीनाथ शर्मा, अरिबम घनश्याम शर्मा, पं. नीलवीर शास्त्री, आचार्य राधागोविंद, थोडाम, निशान निडतम्बा, राजकुमार खिदिर चाँद सिंह, श्री नवचंद्र, एम. यमुना देवी, श्री याइमा शर्मा, श्री नवीनचाँद सिंह, डॉ. टी. कुंजकिशोर सिंह, डॉ. अचौबी सिंह, डॉ. इबेयाइमा देवी, डॉ. विक्टोरिया देवी, डॉ. इबेम्हल देवी, डॉ. ई. विजयलक्ष्मी देवी, डॉ. कमला, सिद्धनाथ प्रसाद पारंग, डॉ. हीरालाल गुप्त, डॉ. सुबदनी देवी, प्रोफेसर दीनमणि सिंह, प्रोफेसर अरिबम कुमार शर्मा, प्रोफेसर सापम तोम्बा सिंह, प्रोफेसर इबोहल सिंह काडजम, डॉ. अरिबम कृष्ण मोहन शर्मा, डॉ. लनचेनबा मैतै, डॉ. ब्रजेश्वर शर्मा आदि लेखकों ने मणिपुर के हिंदी वांड्मय में श्रीवृद्धि की है। वह दिन दूर नहीं है, जब मणिपुरी भाषी हिंदी लेखक
अपनी राष्ट्रीय पहचान बना सकेंगे और हिंदी की साहित्यिक धारा में अपना प्रमुख स्थान बनायेंगे। ?
नागामपाल पाओनम लैकाई, रिम्स रोड, इंफाल-७९५००१ (मणिपुर)