हिन्दी का बढता संसार

डॉ. सीमा शर्मा


‘‘भारत जननी एक हृदय हो
भारत जननी एक हृदय हो
एक राष्ट्र हिन्दी में
कोटि कोटि जनता की जय हो
जाति, धर्म, भाषा, विभिन्न स्वर
एक राग हिन्दी में सजकर
झंकृत करे हृदय तंत्री को
स्नेह भाव प्राणों में लय हो
भारत जननी एक हृदय हो’’१
हिन्दी कहने को मात्र एक भाषा है, पर वास्तव में गुजरात से लेकर आसाम तक और कश्मीर से लेकर केरल तक फैले हुए भारत के जनमानस में राष्ट्र के प्रति भावात्मक एकता, राष्ट्रीय व्यवहार का एक ऐसा साधन है जो सब का मेल मिलाप कराती है तथा समस्त भारतवासियों के हृदय में एक्य का भाव जाग्रत कराती है।
पुराणों में लिखा है कि सब देवों ने मिलकर जब अपना अपना तेज एकत्रित किया तो उस संचित तेज ने दुर्गा का रूपधारण करके महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज जैसे राक्षसों का संहार किया।
भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी, ब्रज आदि के सुमेल से बनी हिन्दी भी उस दुर्गा को भांति ही है। जो लोक सुलभ, सर्वमान्य, सर्वसमन्वयकारी और समृद्ध भाषा है।
पहले तो इसका संसार केवल भारतीयों के भीतर था लेकिन समय के प्रवाह ने इसकी सीमाओं को चरण बद्ध रूप में परिवर्तित कर विस्तृत कर दिया। जिसके प्रारंभिक चरण में विदेशियों ने अहम् भूमिका निभाई। जिसमें प्रमुख रूप से जार्ज ग्रियर्सन का नाम आता है। जिन्होंने पराधीन भारत में विदेशी प्रशासक के पद पर कार्यरत होते हुए भी सर्वप्रथम सबसे बडा भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण किया, जो तेरह खंडो में लिपिबद्ध है। फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष डॉ. जान बिलक्राइस्ट ने सर्वप्रथम हिन्दी की पाठ्य पुस्तक लिखी। फ्रेंच विद्वान ‘‘गार्सा द तासी’’ ने
सर्वप्रथम हिंदी भाषा के साहित्यिक इतिहास को ‘‘इस्तवार द लॉ लितूरेत्यूर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी’’ शीर्षक से लिखा। यहाँ तक कि हिंदी की सबसे पहले डी. लिट् चालीस के दशक में यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में जे.ई. कारपेंटर ने ‘तुलसीदास का धर्म दर्शन’ विषय पर की। पादरी सैमुअल कैलाग ने हिंदी पर बहुत बडा व्याकरण लिखा।
तत्पश्चात् समूचे विश्व के देशों में भारतीय व्यापार, नौकरी, अन्य उद्योग धन्धों आदि के कारण स्थायी रूप से बस गए। इन प्रवासी भारतीयों ने हिन्दी के संसार की सीमाएँ विस्तृत करते हुए इसे अन्तर्राष्ट्रीय मुकाम दिलाया। इतनी ऊँचाइयों को छूने वाली हिन्दी किसी राजसी छत्रछाया में भारत व्यापी नहीं बनी बल्कि राष्ट्रवादी आन्दोलनों, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों ने इसे सर्वप्रथम भारतीय मानस के हृदय की कुंजी बनाया और प्रवासी भारतीयों ने विदेशी धरती पर अपने लेखन व सतत् प्रयासों से इसे विश्वव्यापी बनाया। जिसमें प्रमुख रूप से मारीशस में अभिमन्यु अनंत, रामदेव घुरन्दर, फिजी में गुरुदयाल शंकर, जोगिंदर सिंह कंवल, प्रो. सुब्रमणी, खाडी देश में कृष्ण बिहारी, ब्रिटेन में ऊषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर, कैनेडा में सुमन कुमार घई, शैलजा सक्सेना इत्यादि। इनमें कोई दो राय नहीं है कि यह अपने आप में एक सुखद अनुभूति है कि आज हिंदी पूरे विश्व में अपने अस्तित्व को आकार दे रही है।
परिणामतः विश्व के छोटे बडे देशों को लगने लगा है कि भारत के साथ संवाद स्थापित करने के लिए व्यापार, आर्थिक, सांस्कृतिक संबंध स्थापित करने के लिए हिन्दी से परिचित होना भी आवश्यक है। भारतीय मंडियों और बाजारों को हिंदी के बिना जीता नहीं जा सकता। इसलिए कई देशों में हिन्दी का अध्ययन अध्यापन विश्वविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों में विदेशी भाषा के रूप में हो रहा है। मोटे तौर पर भी अनुमान लगाए जाए तो लगभग १७६ विश्वविद्यालयों में शिक्षण का कार्य चल रहा है।
अमेरिका की मशहूर यूनिवर्सिटी पेनसिल्वेनिया ने एम.बी.ए. के छात्रों को हिंदी का दो वर्षीय कोर्स अनिवार्य कर दिया है। ताकि अमेरिका को हिंदुस्तान में बिजनेस बढाने में भाषा संबंधी दिक्कतें न आएँ। अमेरिका के लगभग चौदह विश्वविद्यालयों में हिन्दी अध्यापन की व्यवस्था है। यह प्रक्रिया यथावत् जारी है। निवर्तमान् ओबामा सरकार ने तो इसके लिए ठोस कार्य किये जैसे- ‘‘ओबामा सरकार अमेरीकी स्कूलों में हिंदी पढाए जाने के लिए जी खोल कर धन मुहैया करा रही है। उसका मानना है कि अर्थ व्यवस्था व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से वह भाषा खासी महत्त्वपूर्ण है। अमेरीकी सेना में इस समय हिंदी व उर्दू भाषा के संदेशो के अनुवाद के लिए तमाम नौकरियाँ निकल रही है। इसके लिए ७५००० डॉलर प्रति वर्ष तक भुगतान किया जा रहा है। कुछ वर्ष पहले न्यूयार्क से सटे एडीसन नामक शहर के एक स्कूल ने पहली बार सरकारी धन के प्रयोग से हिंदी भाषा सिखाने का काम शुरु किया था। जिसके लिए ८.९७ लाख डॉलर का तीन वर्षीय अनुदान दिया गया था। वर्तमान में डलास व ह्यूस्टन में भी हिंदी को विदेशी भाषा के रूप में पढाया जाता है।’’२
‘‘अमरीका में बहुत पहले से हिन्दी का प्रचार है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में लिखा है कि मध्यकाल में आसी नाम का एक ईसाई पादरी अमरीका में हिन्दी काव्य रचना करता था। अमरीकी उद्योगपतियों में हिन्दी हितैषी के रूप में सर्वोपरि हैं- बिल गेट्स। उन्होंने हिन्दी माइक्रोसॉफ्ट का आविष्कार करके इस भाषा को विश्व भाषा बना दिया है। यहाँ ब्रिटिश, कोलम्बिया, इण्डियाना, अवार्द, बोस्टन, कैलीफोर्निया, शिकागो, न्यूयार्क, मिशिगन, टेक्सास, वाशिंगटन, मिनसोटा, वर्जीनिया आदि विश्वविद्यालयों में शोध स्तर तक हिन्दी का प्रचलन है। सम्प्रति अमरीका में लगभग २५० स्कूलों और कॉलेजों में ५५० छात्र हिन्दी पढ रहे हैं।’’३
हिंदी के बढते संसार में जापान भी अछूता नहीं रहा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का वहाँ रहकर हिन्दी में
संवाद तथा वैवाहिक संबंध स्थापित करना, विश्व व्यापार के प्रसार की दृष्टि से तथा भाषाई शिक्षण को ध्यानस्थ कर हिन्दी यहाँ के अध्ययन की भाषा बनी और उच्च शिक्षण संस्थानों में इस का प्रवेश १९०८ ई. में हुआ। १९०८ ई. से ही तोक्यो स्कूल ऑफ फारेन लेंग्विजेज में हिंदोस्तानी भाषा की पढाई शुरु हुई और तब से निरंतर चल रही है। ‘‘कालांतर में उसका नाम तोक्यो कॉलेज ऑफ फॉरेन अफेयर्स और फिर १९४९ ई. में ‘‘टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फारेन स्टडीज’’ हो गया। तब से अब तक इस संस्थान का यही नाम प्रचलन में है। इसी संस्थान के पैटर्न पर पश्चिमी जापान में ‘‘ओसाका स्कूल ऑफ फॉरेन लेंग्विजेज’’ की स्थापना १९२१ ई. में हुई, जहाँ १९२२ ई. में हिंदोस्तानी भाषा के शिक्षण की व्यवस्था की गई। कालांतर में इस स्कूल का नाम परिवर्तित करके इसे ‘‘ओसाका एकेडमी ऑफ फॉरेन लेंग्विजेज का रूप दिया गया। अंततः १९४९ ई. में इसे ‘‘ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फारेन स्टडीज’’ कहा जाने लगा। इसके अलावा रेडियो जापान की हिंदी सेवा भी अपने ढंग से जापान में हिंदी के प्रचार प्रसार में अपनी भूमिका निभा रही है। यह सेवा जून १९४० ई. से सक्रिय है।’’४ हिन्दी के वरिष्ठ कवि अज्ञेय ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास करते हुए जापानी हाइकु सम्पदा का हिन्दी में अनुवाद किया।
भारत का पडोसी चीन भी हिन्दी प्रेम के रंग में काफी हद तक रंगा है। पेकिंग विश्वविद्यालय हिन्दी शिक्षण का प्रमुख केन्द्र रहा है। ‘‘यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई अध्ययन केन्द्र के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जियांग जिगकंई ने कहा कि चीन के नौ विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढाई जा रही है’’।५
रूस में हिन्दी के प्रति पर्याप्त अभिरुचि है, यहाँ के प्रसिद्ध विद्वान् वारान्निकौव ने तुलसी रामायण का अनुवाद किया। उनकी पत्नी ने कामता प्रसाद गुरु के हिन्दी व्याकरण का अनुवाद किया। इनके अलावा अलेक्सान्द्र सेन्केविच, साजनोवा, एवगेनी, पेत्रोविच प्रसिद्ध हिन्दी विद्वान् है। रूस
ने अनेक हिन्दी विद्वानों को पुरस्कृत भी किया। हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार ‘‘राहुल सांकृत्यायन’’ ने यहाँ दीर्घकाल तक प्रवास किया था। उन्होंने ‘‘बोल्गा और गंगा’’ में घनिष्ठ संबंध स्थापित किया है।
आस्ट्रेलिया में भी हिंदी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग करते हुए, ‘‘विक्टोरिया सरकार ने संघीय अधिकारियोंसे हिंदी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने को कहा है। विक्टोरिया सरकार ने यह भी कहा है कि दोनो देशों के बीच व्यापारिक और आपसी रिश्तों को मजबूती प्रदान करने और व्यापार जगत में संचार के लिए हिंदी की अहम् भूमिका है।’’६
‘‘इजरायल में हिंदी को बढावा देने की दिशा में भारतीय व्यापारियों ने कदम बढाया है। उन्होंने हिंदी सीख रहे छात्रों के लिए ३५ हजार डालर (करीब २० लाख रुपये) के अनुदान की घोषणा की है। इसकी घोषणा तेल अबीव यूनिवर्सिटी में आयोजित विश्व हिंदी दिवस समारोह के दौरान की गई। इस अनुदान से यूनिवर्सिटी में हिंदी भाषा सीख रहे छात्रों को आगामी पाँच सालों के दौरान मदद मिलेगी। वे भारत जाकर हिंदी भाषा को बेहतर तरीके से सीख सकेंगे। इसके लिए छात्रों का चयन लोकप्रिय टेलीविजन शो ‘‘कौन बनेगा करोडपति’’ की तर्ज पर ‘‘कौन भारत जाएगा’’ के माध्यम से किया जाएगा।’’७ इतनी ही नहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब इजरायल दौरे पर गये तो वहाँ के राष्ट्र अध्यक्ष श्री नेतन्याहू ने अपने स्वागतीय भाषण में हिंदी के वाक्य बोलकर उनका स्वागत किया ‘‘आपका स्वागत है मेरे दोस्त’’।
भारत के पडोसी देश पाकिस्तान भी इस तथ्य से भली भाँति परिचित हैं कि भारत को जानना पहचानना है तो हिन्दी का ज्ञान होना आवश्यक है।
‘‘हिन्दी में सर्टीफिकेट, डिप्लोमा, मास्टर्स और पीएच.डी. डिग्री प्रदान कराने वाली पाकिस्तान की यह पहली यूनिवर्सिटी थी। एम.यू.एम.एल. में अलग अलग कोर्स शुरू किये। यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब और
एम.यू.एम.एल. दोनों के हिन्दी विभागों का भारत के साथ गहरा संबंध है। वहाँ पढाने वाली ज्यादातर महिलाएँ शादी के बाद ही पाकिस्तान में गईं। इन महिलाओं ने पटना विश्वविद्यालय, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ जैसे भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा हासिल की। कुछ पाकिस्तानी तो हिन्दी का ज्ञान हिन्दी मीडिया को फोलो करके लेते हैं।’’८
मॉरीशस में हिन्दी प्रचार का इतिहास १८३४ ई. में श्रमिक रूप में गये भारतीयों के साथ आरम्भ होता है। यहाँ दो बार विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन हो चुके हैं। पहली बार १९७६ ई. में जिसकी अध्यक्षता वहाँ के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने की थी, दूसरी बार १९९५ ई. में। इस समय विश्व हिन्दी सम्मेलन का केन्द्रीय सचिवालय मॉरीशस में स्थापित है। इस देश में ७० प्रतिशत भारतवंशी है। उनकी राजनीतिक प्रभुता का मूलाधार
है हिन्दी।
कई विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में हिन्दी में एम.ए. और डॉक्टरेट आदि की उपाधि प्राप्त करने की व्यवस्था है रेडियो, टी.वी. में हिन्दी का काफी प्रचार-प्रसार है। हिन्दी फिल्में वहाँ पूरी तरह छायी हुई हैं। इस देश में ‘‘महात्मा गांधी संस्थान’’ हिन्दी का बहुत बडा केन्द्र है। आर्य पत्रिका मारीशस मित्र, आर्यवीर, वसन्त, जमाना, स्वदेश, सनातन धर्म, नवजीवन सुमन आदि हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिकाएँ हैं, जो मारीशस से प्रकाशित होती हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद के कई केन्द्र मॉरीशस में चल रहे हैं। अभिमन्यु अनंत, रामदेव धुरन्धर, जागासिंह, वासुदेव विष्णुदयाल, ब्रजेन्द्र अगत, मधुकर, अजामिल माताबदल, सुचिता रामधनी, पूजानन्द आदि यहाँ के प्रमुख हिन्दी रचनाकार हैं।
फीजी प्रशांत महासागर में आस्ट्रेलिया के निकट स्थित है। यहाँ १९१६ ई. से कई हिन्दी पाठशालाएँ चल रही हैं। शान्तिदूत, फीजी समाचार, जागृति, राजदूत इत्यादि हिन्दी की लोकप्रिय पत्रिकाएँ हैं। भारतीय उच्चायोग ने
सांस्कृतिक संबंध परिषद् के माध्यम से पत्राचार पाठ्यक्रम, छात्रवृत्ति और हिन्दी शिक्षकों को सुविधा प्रदान की है। हिन्दी के बढते वर्चस्व का ही सुखद परिणाम था कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी को भी राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई।
सूरीनाम में हिन्दी का आगमन गिरमिटियों के साथ हुआ। इस देश में १९७७ ई. में ‘हिन्दी परिषद्’ की स्थापना हुई। राष्ट्र भाषाप्रचार समिति वर्धा की परीक्षाएँ वहाँ १९६२ ई. से हो रही है। यहाँ हिन्दी बोलने वालों की संख्या भी अत्यधिक है।
हिन्दी की बढती लोकप्रियता के चलते अंग्रेजी भाषा में प्रसारित होने वाला डिजनी चैनल हिंदी में प्रसारित होना प्रारंभ हो गया, कारण हिन्दी में आने से दर्शकों की संख्या में पाँच गुना अभिवृद्धि। हिंदी का लोहा इस बात से भी माना जा सकता है कि मिंकी और डोनाल्ड को भी हिंदी सीखनी पडी इतना ही नहीं स्पाइडर मैन, आयरन मैन बैटमैन और कूंगफू पांडा जैसे हॉलीवुड किरदार भाषायी बाधाओं को तोडकर हिंदी भाषी दर्शकों के दिलो दिमाग पर छा चुके हैं। हिंदी में डब की गई हॉलीवुड की फिल्मों ने भारतीय बाजार में कमाई के मोर्चे पर भी अच्छी सफलता हासिल की है। स्टार स्पोर्ट्स ने भी अब खेल की कमेंट्री हिन्दी भाषा में शुरु की।
अब हिन्दी का संबंध सिर्फ आकाश और मौसम के विवरण तक नहीं है बल्कि यह दिग्गज खिलाडियों के अनुभवों से निकल तकनीकी शब्दों से समृद्ध हो रही है। इंटरनेट के आने पर लगा था कि हिन्दी टिक नहीं पाएगी। अंग्रेजी और बढेगी लेकिन आज जिस तरह हिन्दी ने वापसी की है। उसकी दाद तो देनी पडेगी।
समय समय पर जिन विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन वैश्विक स्तर पर किया गया, उस से यह संदेश गया कि आज हिन्दी एक समर्थ भाषा है, जिसका संसार तीव्र गति से बढ रहा है।
हमारे संविधान में हिंदी को अचानक राजभाषा का स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। यह सदियों से अखिल भारतीय स्तर पर अघोषित राष्ट्रभाषा या संफ भाषा रही है। देश की चारों दिशाओं में स्थित चार धामों एवं कुंभ पर्व पर आने वाले करोडों तीर्थ यात्री एवं संत महात्मा हिंदी में ही अपने भाव संप्रेषित करते रहे। हिंदी भारत के स्वाधीनता संग्राम में देश की वाणी बनी। इसकी अखिल भारतीय उपस्थिति थी। केशवचंद्र सेन, स्वामी दयानंद, तिलक, महात्मा गांधी, काका कालेलकर, सुभाष चंद्र बोस और मालवीय जी जैसे विभिन्न भाषा भाषी दिग्गजों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही इसे भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता प्रदान कर दी थी। इसी गरिमापूर्ण इतिहास के कारण ही १४ सितंबर १९४९ ई. को हमारी संविधान सभा ने अनुच्छेद संख्या ३४३(१) में हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा घोषित किया। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता पूर्व समस्त देशवासियों में राष्ट्रीय एकता, स्वराज, स्वदेश प्रेम, स्वभाषा की जो उत्कट भावना थी, स्वतंत्रता के पश्चात् सत्ता की राजनीति के आगे इस कदर क्षीण हो गई कि देशवासी भाषा और क्षेत्रवाद में बँट कर रह गये। सत्ता की लिप्सा ने इस तथ्य को धूमिल कर दिया कि भाषा राजनीति से परे भावनाओं और उनकी अभिव्यक्ति से संबंध रखती है। भाषा तो प्रेम का, सेवा का और संवाद का जरिया होती है। इसका संस्कृति से सम्बन्ध होता है। सीधे जन जीवन के साथ एकाकार होती है। शायद भाषा के इसी गुण ने समय-समय पर हिन्दी विरोध को कम करके इसके संसार को बढाया है जैसे, ‘‘तिहाड जेल में बंद द्रमुक सांसद कनीमोरी को भाषाई परेशानी हो रही है। इस लिए उन्होंने हिंदी सीखने का फैसला किया। उन्होंने हिंदी वर्णमाला की किताब मंगाई है और फिलहाल अक्षरों की पहचान कर रही हैं।’’९ इतना ही नहीं २०१४ में हुए लोकसभा चुनाव में, ‘‘द्रमुक प्रमुख करुणानिधि ने हिंदी वाक्यों का प्रयोग करके सभी को हैरान कर दिया। हालांकि वह हिन्दी के धुर विरोधी रहे हैं। करुणानिधि के हिंदी वाक्यों ने सैंट्रल
चैन्नई में बडी संख्या में बसे उत्तर भारतीयों और उर्दू भाषी मुस्लिम वोटरों को काफी प्रभावित किया। इसके साथ ही चैन्नई में अन्य स्थानों पर हिंदी भाषी प्रवासी श्रमिकों की वजह से ही हिंदी के प्रति चैन्नई-वासियों की सहनशीलता बढी है। द्रमुक पर एम. के. स्टालिन के प्रभुत्व के चलते हिंदी पर पार्टी के कडे स्टैंड को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है क्योंकि वह अन्य वर्गों को भी पार्टी के साथ जोडना चाहते थे।’’१०
‘‘संसद के चालू सत्र में मिजोरम में राज्यसभा सांसद रोनाल्ड सापा तलाऊ ने जब अपने राज्य में हिंदी शिक्षकों की बदहाली का सवाल उठाया तो कई लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ, क्योंकि आम धारण यह है कि मिजोरम में हिंदी को पसंद नहीं किया जाता। पूर्वोत्तर के लोगों के बीच हिंदी की स्वीकार्यता बढाने और उनको हिंदी सिखाने के लिए इन शिक्षकों का होना आवश्यक है। मिजो विद्रोही लगातार हिंदी के खिलाफ न केवल दुश्प्रचार करते रहे हैं बल्कि इसको भी अपनी समस्याओं की जड मानते रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि हिन्दी को देश को जोडने वाली भाषा के तौर पर मिल रही मान्यता को और मजबूत किया जाए और मिजोरम जैसे गैर-हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी की स्वीकार्यता को और गाढा करने का काम किया जाए। इसलिए और भी क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से गैर-हिन्दी प्रदेशों की यह गलतफहमी दूर होती दिख रही है कि हिन्दी उन पर जबरन थोपी जा रही है। पूरे देश में हिन्दी एक संफ भाषा के तौर पर धीरे-धीरे अंगेजी को विस्थापित करने लगी है। सुदूर दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भी हिन्दी को लेकर एक खास किस्म का अपनापन दिखाई देने लगा है।’’११ यही शाश्वत सत्य है कि विभिन्नताओं से सम्पन्न भारत के लिए हिन्दी ही बन्धुत्व का उत्कृष्ट साधन है।
कितना अद्भुत संयोग है कि अतीत में फारस और अरब से आये लोगों की भाषा में ‘‘स’’ के स्थान पर ‘‘ह’’ का उच्चारण था। इस लिए सिंधु का रूप ‘‘हिन्दू’’
हो गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत के लिए प्रयुक्त होने लगा और यहाँ प्रयुक्त होने वाली भाषा के लिए हिन्दवी, हिन्दुस्तानी भाखा शब्द का प्रयोग किया। तत्पश्चात् अंगेजों ने इस पर शोध कार्य किये और इसे विश्व पटल पर पहुँचाया। वर्तमान में विदेशों में बसे देशी विदेशी हिन्दी प्रेमियों ने अपनी सतत् साधना के बल पर हिन्दी को विश्व पटल पर गरिमापूर्ण स्थान पर पहुँचाया।
यह सर्वविदित सच है कि हमेशा ही विजेता विजितों पर अपने विजय चिह्न छोडते हैं पर सत्य यह भी है कि जानदार कौमें विदेशी आक्रांताओं से अपने देश को मुक्त करवाने के एकदम बाद विदेशियों द्वारा छोडे गए निशान मिटा कर स्वदेशी गौरव से अभिभूत होकर शासन करती हैं। चाहे भाषा के संदर्भ में ही क्यों ना हो।
हिन्दी एक मात्र साधन है जो बहुभाषी भारत के अलगाव और विघटन को समाप्त कर आंतरिक एकता को मजबूती प्रदान करती है। इसके बढते संसार का अर्थ है पूरे विश्व के समक्ष, मजबूत, समृद्ध, सम्पन्न विकसित राष्ट्र के रूप में भारत का स्थापित होना
मिटे विषमता सरसे समता
रहे मूल में मीठी ममता
तमस कालिमा को विदीर्ण कर
जन जन का पथ ज्योतिर्मय हो
भारत जननी एक हृदय हो।’’१२ ?
संदर्भ :
१.मधुमती (मासिक हिन्दी पत्रिका, सितम्बर अंक २०१०) - ओकांर श्री का लेख ‘‘जो गूँजा लाखों कंठो में, भारत जननी एक हृदय हो’’ हिन्दी जनगीत: बीजकथा मूल रूप से इस गीत की रचना पंडित रामेश्वर दयाल दूबे ने १९५० में की। (उदयपुर : राजस्थान साहित्य अकादमी) पृष्ठ-१५
२.दैनिक भास्कर (समाचार पत्र) - १४ जुलाई २००९ ई. मुख्य पृष्ठ से।
३.सूर्यप्रसाद दीक्षित - विश्व पटल पर हिन्दी (इलाहाबाद ः लोक भारती प्रकाशन, २०१३) पृष्ठ ५५, ५६, ५७
४.दैनिक जागरण (समाचार पत्र) - ४ फरवरी २००९ ई. विविध जगत् पृष्ठ से।
५.दैनिक भास्कर (समाचार पत्र) - २५ मार्च २०११।
६.दैनिक जागरण (समाचार पत्र) - १५ जुलाई २०११ ‘देश विदेश’ पृष्ठ से।
७.दैनिक जागरण (समाचार पत्र) - ३ जून २०१४ ‘देश विदेश’ पृष्ठ से।
८.जगवाणी (समाचार पत्र) - लेख- ‘‘पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी में पढाई जा रही है हिन्दी’’ लेखक- आर.के. सिन्हा १९.९.२०१६। (मूल रूप में यह पंजाबी समाचार पत्र है।)
९. दैनिक जागरण (समाचार पत्र) - ११ नवम्बर २०११।
१०. ३१ मार्च २०१४, पृष्ठ-७।
११.दैनिक जागरण (समाचार पत्र) - ८ अप्रैल २०१७, लेख- ‘हिन्दी की बढती स्वीकार्यता’ लेखक- अनंत विजय।
१२.मधुमती (हिन्दी पत्रिका) - ओंकार श्री का लेख मूल रूप से इस गीत की रचना पंडित रामेश्वर दयाल दूबे ने १९५० ई. में की। ‘‘हिन्दी जनगीत : बीजकथा’’ (उदयपुर : राजस्थान साहित्य अकादमी) पृष्ठ-१५
१८५०, गली न. १, महाकाली मंदिर के पास, शास्त्री कॉलोनी, गोपाल नगर, मजीठा रोड, अमृतसर-१४३००१ (पंजाब)