डॉ. कमल किशोर गोयन का से संवाद

इष्ट देव सांकृत्यायन


इष्ट देव सांकृत्यायन : आम तौर पर होता यह है कि जब कोई साहित्यकार कुछ बडा काम कर देता है तो उस बडे काम के भार से ही उसका ही बहुत सारा महत्त्वपूर्ण काम, जो लोगों की नजर में शायद कम महत्त्वपूर्ण हो लेकिन कम महत्त्वपूर्ण होता नहीं है, कहीं दब जाता है। आफ दो काम बहुत बडे रहे हैं, एक तो मुंशी प्रेमचंद विश्वकोश और दूसरा प्रवासी साहित्य पर। मुझे लगता है कि इन दो बडे कार्यों के नीचे आपका अपना सृजनात्मक लेखन शायद दब सा गया है। क्योंकि आप साहित्य की ओर प्रवृत्त हुए तो निश्चित रूप से आप कविताएँ, कहानियाँ आदि लिखते रहे होगें। पर उसके बारे में लोग जानते नहीं हैं। क्या मैं ठीक समझ रहा हूँ।
डॉ. कमल किशोर गोयनका : आप ठीक समझ रहे हैं। मैंने जब एम.ए. किया था, १९६१ में दिल्ली विश्वविद्यालय से, तब मैं कहानी और कविता लिखता था। कुछ कहानियाँ और कविताएँ छपी भी थीं। लेकिन उसके बाद क्या हुआ कि एम.ए. करने के बाद तुरंत पी-एच.डी. करना मेरे लिए अनिवार्य हो गया। तो पी-एच.डी. करने में क्या था कि एक रिसर्च की डिसिप्लिन में अपने आपको बाँधना था। जब रिसर्च की डिसिप्लिन में आप बँधते हैं तो आप बहुत ज्यादा लॉजिकल और टेक्निकल हो जाते हैं फिर भावुकता और इमोशंस का दबाव धीरे-धीरे कम हो जाता है। ऐसा मैंने महसूस किया। उसके बाद क्या हुआ कि जैसे ही रिसर्च का टॉपिक मुझे मिला... और रिसर्च का टॉपिक मुझको ६२ में मिल गया था, तो उसके बाद मस्तिष्क बिलकुल उसी तरह से सोचने की लय में आ गया। तो वो जो मेरा लेखन था क्रिएटिव राइटिंग वो वहीं से समाप्त हो गई। लेकिन अगर आप सामान्य लेखों की चर्चा करें वो मेरा चलता रहा। अभी भी लिखता रहा हूँ। लेकिन वो जो कहानी, उपन्यास और कविता वाला प्रसंग था वो उस रिसर्च के साथ ही धीरे-धीरे समाप्त हो गया। उसके बाद मैंने सोचा कि अगर मैं इस रिसर्च में नहीं जाता तो क्या करता। तो मैंने सोचा कि इतिहास में मेरी रुचि रही। जब मैंने गेजुएशन किया था तो मेरा डिस्टिंग्शन था हिस्ट्री में। तो अगर मैंने साहित्य में रिसर्च नहीं की होती तो मैं इतिहास में करता।
इष्ट देव सांकृत्यायन : इतिहास की खोज को लेकर एक बडी विचित्र विडंबना रही है हमारे देश में। कि हम अपनी जरूरत के हिसाब से या अपने राजनीतिक स्वार्थ के हिसाब से इतिहास को रंग देने की कोशिश करते रहे हैं। एक लंबे समय तक भारतीय इतिहास के मूल तत्त्वों की ही उपेक्षा करने की कोशिश की गई। इस संदर्भ में आप क्या कहेंगे?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : देखिए क्या है कि ब्रिटिश लोगों ने जो इतिहास लिखा हमारा, उसे हमारे अंग्रेजी पढे-लिखे लोगों ने स्वीकार कर लिया है। उनका मूल दर्शन यह था कि इस देश में वो अंग्रेजी शासन के साथ-साथ अंग्रेजी सभ्यता को भी स्थापित करना चाहते थे। प्रकट में व्यापार था लेकिन व्यापार के साथ-साथ शासन और गुलाम बनाना और मानसिक रूप से भी गुलाम बनाना उनका लक्ष्य था। इसी के तहत लॉर्ड मैकाले वाला पूरा दर्शन आपको मालूम है। उसके तहत इस देश का जो इतिहास उन्होंने लिखा, वही हमने स्वीकार कर लिया। जैसे हमें ये बताया गया कि साहब आर्यंस जो हैं वो मध्य एसिया से आए और यहाँ जो द्रविड थे मूल, उनको मार करके दक्षिण भगा दिया और आर्यंस ने शासन अपने कब्जे में ले लिया। अब ये थियरी उनकी गलत सिद्ध हो गई।
इष्ट देव सांकृत्यायन : हम जब इतिहासलेखन की बात करते हैं तो बार-बार ये आरोप चस्पा किया जाता है कि हमारे यहाँ इतिहासलेखन की परंपरा रही ही नहीं है। या तो पुराण हैं जो बहुत ज्यादा अतिरंजित हैं या फिर साहित्य है, जिसका साहित्य से सीधे कोई लेना-देना नहीं है। कुल मिलाकर कल्हण की राजतरंगिणी का एक हवाला दिया जाता है और उस पर भी....
डॉ. कमल किशोर गोयनका : जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ, पश्चिम में या इस्लाम में इतिहास लिखने की परम्परा नहीं है। क्योंकि जितने मुगल बादशाह रहे हैं सबने शाहनामा लिखा, अकबरनामा, जहाँगीरनामा लिखवाए। तो वो अपनी प्रशस्ति के लिए उन्होंने काम कराए। हमारे यहाँ आप जरा सोच के देखिए, जो ऋषियों के मंत्र हैं,
उनमें कोई ऋषियों के नाम जानता है? कोई नहीं जानता। अर्थ क्या था हमारे ज्ञान का, अपने आपको विस्मृत करना। केवल ज्ञान को लाने की परंपरा थी हमारे यहाँ। इसलिए हमारे यहाँ इतिहासलेखन की वह परंपरा नहीं रही। ज्ञान व्यक्ति के लिए होता है। हमारे यहाँ इतिहास ज्ञान के लिए था, यह धर्म के लिए था और इसीलिए हमारे यहाँ पश्चिम की तरह से इतिहास नहीं लिखा गया। हमें इसका अफसोस नहीं है। लेकिन पुराणों के अंदर इतिहास उपलब्ध है। जिन लोगों ने पुराणों की सही व्याख्या की है, माने खुद भगवान राम का, इक्ष्वाकु वंश का पूरा इतिहास आपको पुराणों में मिलेगा। पूरा वंशानुक्रम लिखा हुआ है। तो ऐसा नहीं है कि हमारा इतिहास नहीं लिपिबद्ध किया गया है लेकिन वो इतिहासलेखन यहाँ नहीं था जो पश्चिम का इतिहासलेखन था या इस्लाम का इतिहासलेखन था। क्योंकि हमारे यहाँ व्यक्ति प्रधान था।
इष्ट देव सांकृत्यायन : और ये जो इतिहासदर्शन को राजनीतिक दर्शन, या कहें हेतु बना देने की प्रवृत्ति है, ये इतिहास को और इतिहासदृष्टि को कितना दूषित करता है, कितना प्रभावित करता है, इस पर आप क्या कहेगें?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : देखिए क्या होता है, जब सत्य का सत्य की तरह ग्रहण नहीं करेंगे और सत्य का उपयोग करेगें तो सत्य तो अपने आपमें भ*ष्ट हो जाएगा। स्वरूप बदल जाएगा और आप उसका बार-बार रूप बदलते रहेंगे। सत्य तो सत्य ही रहेगा। इसलिए मुझे लगता है कि जब कोई राजनीतिक दर्शन इतिहास का अपने लिए उपयोग करता है तो वह केवल अपने आपको सत्ता में बनाए रखने के लिए करता है। प्रसाद के एक नाटक की स्कंदगुप्त की एक पंक्ति याद आती है कि जब सत्ता जाती है तो राजनीतिक छल-छन्द की धूल उडती है।
इष्ट देव सांकृत्यायन : अब साहित्य की ओर लौटते हैं। आप को कभी ये लगता नहीं कि ये जो सृजन या कहें रचनात्मक लेखन का क्रम आपसे छूटता गया, इसे लेकर कभी आफ मन में कोई बात उठी नहीं कि मुझे फिर से शुरू करना चाहिए?
नहीं, मुझे इसका कोई अफसोस नहीं हुआ। इसलिए नहीं हुआ कि जो मैंने रास्ता चुना वो इससे पहले किसी ने चुना नहीं था। एक तो ये- जब आप कोई काम करते हैं और आप ये महसूस करते हैं कि आप उसमें अकेले हैं और आपका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है तो आपको फिर स्वेच्छा से काम करने का अवसर मिलता है। असल में क्या हुआ कि जब प्रेमचंद पर मैंने रिसर्च की, दिल्ली यूनिवर्सिटी से किया और ७२ में मेरी पीएच.डी. मिली, उसके बाद मेरे मन में ये आया कि मुझे क्या करना चाहिए। मैंने ये तय किया कि पीएच.डी. करके मुझे अपने जीवन को खत्म नहीं करना। फिर मेरे मन में प्रेमचंद को लेकर और भी बातें चल रही थीं। कुछ और बातें भी आने लगी दिमाग में। तो उनको मैंने एक प्रारूप दिया और प्रेमचंद विश्वकोश, जो एक बहुत बडी योजना मैंने सोची और उस पर काम किया और उसके दो खंड एक ही वर्ष (१९८१) में प्रकाशित किये। इस बीच में मेरे काफी लेख छपते रहे। हुआ क्या कि १९७५ में मैं इलाहबाद गया। सामग्री एकत्र करने के लिए। तो प्रेमचंद के दोनों पुत्र जीवित थे उस समय-श्रीपत राय और अमृत राय। श्रीपत राय उस जमाने में दिल्ली में रहते थे और छोटे बेटे अमृत राय इलाहबाद में रहते थे। मैं उनसे जाकर मिला। मैंने उनसे कहा की भाई मैं ये काम कर रहा हूँ और प्रेमचंद जी की जो सामग्री है आफ पास वो अगर आप मुझे दिखा दें तो बडी कृपा होगी। उन्होंने एक बक्सा लाकर के मेरे सामने रख दिया। मैंने उसको देखा तो मैंने ये कहा कि ये मेरे लिए बडा हीरे जैसा है। तो मैंने उनसे कहा कि अगर आपकी अनुमति हो तो मैं कुछ सामग्री इनमें से ले लूँ। तो उन्होंने कहा कि हाँ ले लो। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैंने बहुत ज्यादा काम कर लिया प्रेमचंद पर। इससे पहले १९६२ में उनकी नौ किताबें प्रेमचंद पर छप चुकी थीं और उन्होंने एक जीवनी भी लिखी थी पे*मचंद की ‘कलम का सिपाही’। अब वो सामग्री इतनी थी कि मैं आपको बता नहीं सकता। अधिकांश सामग्री उनमें से ऐसी थी जिसका उन्होंने उपयोग नहीं
किया था। पत्र, उनके डॉक्यूमेंट्स, उनके फोटोग्राफ्स, उनके संबंधियों से पत्र-व्यवहार, पूरा बैंक अकाउंट्स, उनकी चैक बुक.... बडी चीजे उनमें इकट्ठा रखी हुई थी। काफी सामग्री मैं ले आया, लेकिन बहुत सी छोड आया। इसलिए कि कहीं उन्हें ऐसा न लगे कि ये तो मेरी सारी सामग्री उठा कर ले जा रहा है। उसके बाद धीरे-धीरे उसी सामग्री का अध्ययन मैंने शुरू किया। उन पर मैंने लिखना शुरू किया। १९८० में कादंबरी में मेरा लेख छपा था। उसमें मैंने उनके बैंक अकाउंट्स के फोटो छाप दिए। उनका अंतिम बैलेंस था पाँच हजार रुपये। सन् ३६ में पाँच हजार रुपये होना एक बडी बात थी।
लेकिन एक ऐसा वर्ग भी पैदा हुआ जिसने मेरी उपयोगिता बताई और उसमें हर बडे लेखक थे। जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, धर्मवीर, बनारसी दास चतुर्वेदी, शिव प्रसाद आदि। कोई ऐसा बडा लेखक नहीं था जिसने मेरा समर्थन न किया हो और लोगों ने मेरे बारे में इतना लिखा कि मैं कल्पना नहीं कर सकता था। यहाँ तक कि नामवर सिंह विरोधी थे लेकिन आलोचना में उन्होंने पे*मचंद विश्वकोश जो ८१ में छपी थी, उसमें उन्होंने डॉ. गोपाल राय की करीब ३० पेज की समीक्षा पब्लिश की।
मैंने बहुत (१४०० पेज का) नया लिट्रेचर डिस्कवर किया। जो हिन्दुस्तान में किसी ने नहीं किया था। आधुनिक काल का कोई लेखक हो और डेढ हजार पेज उसका कभी नहीं आया, किसी संकलन में नहीं आया और सारा संसार उसको जानता हो। ये छोटा काम तो नहीं था। वो भारतीय ज्ञानपीठ ने १९८८ में छपा पे*मचंद को अप्राप्त साहित्य करके। आप सोचिए ये कितनी बडी बात थी। सैकडों खत.... उनकी तीस तो कहानियाँ थीं, जो दबी पडी थीं पत्रिकाओं में। इसको कोई चुनौती नहीं दे पाया और यहाँ तक कि राजेन्द्र यादव ने लिखा हंस में कि ये काम गोयनका ने ऐसा किया है जो योरोप के देशों में भी युनिवर्सिटिज करती हैं। किसी एक व्यक्ति द्वारा ये पहली बार हुआ है। अभी भी करीब सौ पेज की मुझे नई सामग्री
मिली है। मतलब मिलने की प्रक्रिया अभी बंद नहीं हुई है। अब रही उनके विचार की बात। विचार के बारे में ये स्थापना थी कि वे माक्र्सिस्ट थे और प्रगतिशील लेखक संघ की उन्होंने स्थापना की थी। सच्चाई ये है कि प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना नहीं कि थी। चूँकि उसकी स्थापना तो १९३५ में लंदन में हो चुकी थी और लंदन से उन्होंने संफ किया प्रेमचंद से। पे*मचंद ने जनवरी ३६ में उनका मैनिफेस्टो पब्लिश किया। उसके बाद जब अपैल में १९३६ में उनका अधिवेशन हुआ लखनऊ में.... प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन १० अप्रैल १९३६ को लखनऊ में हुआ था।
प्रेमचंद ने जो भाषण दिया प्रगतिशील लेखक संघ में, जिसकी ये बडी चर्चा करते हैं, एक शब्द भी माक्र्सिज्म का नहीं है उसमें। प्रेमचंद क्या कहते हैं कि साहित्य क्या होता है? मन का संस्कार करने वाला साहित्य होता है। ये कहीं माक्र्सिज्म में आता है? प्रेमचंद ग्यारह जगह उसमें आध्यात्मिक आनंद की बात करते हैं, आध्यात्मिक संतोष की बात करते हैं, ये माक्र्सिज्म में कहाँ आता है भाई? तो वो भला माक्र्सिस्ट का मैनिफेस्टो कैसे हो गया। लेकिन क्या हुआ, उन्होंने उसको खूब प्रचारित किया। किसी ने उसको पढने की कोशिश ही नहीं की। कहीं कुछ दो-चार पंक्ति उसकी कोट कर दी और बस मान लिया कि यही प्रेमचंद का भाषण है। तो इसका नतीजा क्या हुआ कि मैंने वैचारिक रूप से जो प्रेमचंद को माक्र्सिस्ट बनाने का षड्यंत्र था, उसको उद्घाटित किया।
मुझे १९२५ का एक आर्टिकिल मिला। जिसमें प्रेमंचद ने माक्र्स का उल्लेख किया है। प्रगतिशील लेखक संघ के ११ साल पहले और बोल्शेविक क्रांति के १९१९ में होने के छह साल बाद भारतवर्ष में लिट्रेचर आ रहा था और ये भी आपको बात बताऊँ, उसमें उन्होंने माक्र्स का उल्लेख कि भाई जो दुनिया में इक्वेलिटि बैठी है वो माक्र्सियन नहीं है, वो तो हजरत मुहम्मद ने की थी। वो हजरत मुहम्मद को श्रेय दे रहे हैं। लेकिन उल्लेख माक्र्स
का भी कर रहे हैं कि माक्र्स के कारण से देश में इक्वेलिटि नहीं आई और भाईचारा तो सबसे पहले हजरत मुहम्मद ने स्थापित किया। उसके बाद मैंने पूरा उनके लिट्रेचर से ये निकाला कि कहाँ-कहाँ वो समर्थन करते हैं १९१९ में वो कहते हैं मैं करीब-करीब बोल्शेविक...का कायल हो गया हूँ। ये उन्होंने लिखा १९१९ में। लेकिन ठीक इसके बाद जो उपन्यास वो लिखते हैं उसमें वो गाँधीवाद दिखाते हैं। उसके बाद रंगभूमि लिखते हैं, वहाँ भी गाँधीवाद दिखाते हैं। तो उनका जो समर्थन था वो धीरे-धीरे समाप्त हो गया। और उन्होंने कहा १९२५-२६ के बाद में कि रूस क्या चाहता है? रूस अपने विचार का साम्राज्य चाहता है। गोदान तक में उन्होंने लिखा, वेा जो है मेहता, मेहता कहता है कि भाई ठीक है, तुम धन को तो बराबर कर दोगे। लेकिन प्रतिभा को, सौन्दर्य को, गुण को कैसे बराबर करोगे? एक बात। दूसरी बात वो कहता है कि भाई रूस में क्या हुआ? तुम कहोगे कि वहाँ काश्तकारों का शासन हो गया। लेकिन जो मिल मालिक थे, वही काश्तकार बनके वहाँ शासन कर रहे थे और ये आप कह रहे हैं कि बिना सूचना के हो रही है? उनके १२-१४ आर्टिकल्स तो रूस के बारे में हैं। आप कैसे कहते हैं कि वो अज्ञानी हैं? वो अज्ञानी बता करके ये कहना चाह रहे हैं, जो अधूरापन है वो उनके अज्ञानता के कारण है। मैं ये कह रहा हूँ, ज्ञानी थे वो और जानकर के ही उन्होंने उसका समर्थन नहीं किया और उन्होंने ये लिखा एक जगह ३४-३५ में, हाँ मैं कम्युनिस्ट तो हूँ, लेकिन मेरा कम्युनिज्म रूसी नहीं है। मेरा कम्युनिज्म न तो गाँधी का है और न किसी और का है। मेरा कम्युनिज्म यह है कि किसान शोषण से मुक्त हो जाएगा, यही मेरा कम्युनिज्म है अर्थात् वो, गाँधी भी तो यही कर रहे थे किसानोंको मुक्त करने के लिए और उसके बाद उन्होंने कई जगह कहा कि मैं कम्युनिस्ट नहीं हूँ। उन्होंने कहा कि मैं खूनी क्रांति नहीं चाहता और उन्होंने कहा कि अगर इस देश में परिवर्तन लाना है तो व्यक्ति का चरित्र बदलना होगा।
कई जगह उन्होंने ये लिखा कि पश्चिम से सारी चीजे आ रही हैं लेकिन मैं चाहता हूँ कि उनमें भारतीयता की महक हो। ये कहने वाले प्रेमचंद थे। ये सबसे पहले मैंने स्थापित किया कि पे*मचंद भारतीय परंपरा के लेखक थे। प्रेमचंद ने राष्ट्र-संस्कृति के बारे में जो बातें की हैं, उसकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते। उसी धारा के अंतर्गत।
जब माक्र्सवाद की इस संदर्भ में बात होती है तो राहुल जी भी माक्र्सवाद का बुद्धिज्म से मेल करते हैं। तो माक्र्सवाद और बुद्धिज्म को लेकर आपका नजरिया क्या है? देखिए मुझे लगता है कि अगर मैं प्रेमचंद के संबंध में बात करूँ , तो प्रेमचंद समानता के समर्थक तो हैं लेकिन वो समानता माक्र्सिज्म की समानता नहीं है। बिलकुल स्पष्ट है वो सहकारिता की भी है। उनके एक उपन्यास में सहकारिता के कारण से जमींदार अपना सारा मालिकाना हक छोड देता है अपनी जमीन पर अपने काश्तकारों के लिए, प्रेमाश्रम उपन्यास में और सहकारिता के आधार पर खेती होती है। सबको उसके परिश्रम के आधार पर उसका हिस्सा बाँटा जाता है। एक कंसेप्ट ये था। एक कंसेप्ट था उनका ट्रस्टीशिप का। जो गाँधी लेकर के आए थे। उनको उनके साथ चलना है। लेकिन समानता के प्रति उनकी दृष्टि है। एक उनकी दृष्टि है कि जहाँ धर्म ने मनुष्य को पतित किया है। उसकी वो आलोचना करते हैं और मैं समझता हूँ कि उस जमाने में हर अच्छे व्यक्ति ने इस चीज की आलोचना की थी और स्वामी विवेकानंद ने यहाँ तक कहा कि हिंदू धर्म से श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं है लेकिन हिंदू धर्म से घटिया धर्म भी कोई नहीं है। घटिया इस अर्थ में कि जो उसकी बुराईयाँ आ गई हैं उन बुराईयों को हम दूर करने को तैयार नहीं हैं। अर्थ ये कि वो भारतीय मूल्यों को अस्वीकार नहीं करते। आप समझिए कि उनका सारा साहित्य भारतीय मूल्यों की स्थापना के लिए ही किया गया है। मैंने पहली बार स्थापित किया इस बात को। कोई कहानी ले लीजिए आप। बडे घर की बेटी ले लीजिए आप। प्रेमचंद परिवार की रक्षा करते हैं।
इष्ट देव सांकृत्यायन : प्रेमचंद के प्रति आपका रुझान कैसे हुआ?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : वो वही थीसिस के विषय, वो रिसर्च में मुझे जो टॉपिक मिला, डॉ. नगेन्द्रने मुझे दिया। हालाँकि मैं प्रसाद पर करना चाहता था। क्योंकि वो उम्र ऐसी थी कि आदमी बडा रोमांटिक रहता है और प्रसाद बडे रोमांटिक कवि थे। लेकिन डॉ. नगेन्द्र ने अगर नहीं दिया होता तो शायद ये काम नहीं होता। ये ईश्वर की संयोजना ऐसी थी कि उन्होंने मुझे कहा कि तुम यही करो।
इष्ट देव सांकृत्यायन : आप प्रसाद पर पहले काम करना चाहते थे, फिर आपने पेमचंद पर काम किया तो प्रसाद पर जो काम करना चाह रहे थे, फिर आपने इस दिशा में नहीं कुछ सोचा?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : नहीं मैंने फिर एक किताब तैयार करने की कोशिश की। कामायनी में इला पर में कुछ करना चाहता था लेकिन फिर मुझे इतना समय नहीं मिल पाया। हालाँकि मेरा मन अभी भी कभी-कभी करता है लेकिन समय नहीं मिल पाता। मुझे लगा कि पेमचंद में तो काफी गुंजाइश थी। माने जितनी गुंजाइश प्रसाद में नहीं थी, उतनी गुंजाइश पेमचंद में थी।
इष्ट देव सांकृत्यायन : अगर में ये निष्कर्ष निकालूँ कि प्रवासी साहित्य में भी जो आपकी रुचि जगी उसके एक कारण पे*मचंद भी थे?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : उसका एक कारण यह भी था लेकिन एक कारण और भी था। १९८० में मैं मॉरिशस गया था, पहली बार। तो पे*मचंद शताब्दी चल रही थी उस समय। तो भारत सरकार ने मेरे प्रस्ताव पर मुझे और जैनेन्द्र जी को मॉरीशस भेजा था। वहाँ मैंने पेमचंद की बहुत बडी एग्जिबिशन लगाई। वहाँ के प्राइम मिनिस्टर इनोग्रशन सर शिवसागर रामगुलाम ने उसका इनॉग्रेशन किया। तब मुझे बडा सम्मान मिला। जब मैं लौटने लगा, हवाई जहाज में बैठा था तो मेरे मन में ये आया कि नहीं यार कुछ काम मॉरीशस के लिए भी करना चाहिए। आइ
डिसाइडेड इट। फिर ६ वर्ष के बाद १९८६ में मेरी पहली किताब अभिमन्यु अनत पर आई। २०० पेज की मैंने बातचीत की अनत जी से और केवल पत्र व्यवहार से हुआ। ऐसी किताब मैंने बच्चन पर तैयार की। जिज्ञासाएँ मेरी और समाधान बच्चन के। वो भी केवल पत्र व्यवहार से हुआ और बच्चन जी ने मेरे हर प्रश्न का उत्तर लिख कर भेजा। मैंने ऐसे कई तरह के एक्सपेरीमेंट किए हैं।
इष्ट देव सांकृत्यायन : इंटरव्यू विद्या में यह भी एक नया प्रयोग है एक तरह से....
डॉ. कमल किशोर गोयनका : मेरी इस तरह की तीन किताबें आई। एक दिनेश नंदिनी डालमियाँ पर भी है। इसी तरह के ये तीनों एक्सपेरीमेंट है। मैंने उनके पूरे साहित्य को पढा पहले। ऐसा नहीं है कि ऐसे ही बिना पढे साहित्य को पढने के बाद मैंने ये काम किए। इसी तरह का चौथा एक्सपेरीमेंट करना चाहा था श्री नरेश मेहता पर। तो उनके साठ प्रश्नों के उत्तर तो आ गए लेकिन बाद में वो मामला खत्म हो गया, मुझे मालूम नहीं।
इष्ट देव सांकृत्यायन : हिन्दी के जिन लेखकों की बडी उपेक्षा हुई, उनमें एक नरेश मेहता भी हैं?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : नरेश मेहता ने जो काम किया है, वो शुद्ध भारतीयता का है। जो उसकी भाषा है न, कोई नहीं लिख सकता।
इष्ट देव सांकृत्यायन : पर्टिकुलर्ली उनका जो उपन्यास है यह पथ बंधु था...?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : मैं आपको बता रहा हूँ, मेरे मन में उनके प्रति बडी आस्था रही है। मैं बहुत चाहता था उनकी रचनावली एडिट करना लेकिन वो क्यों नहीं हो पाया, मैं नहीं जानता। कई चीजें इधर-उधर हो जाती हैं। हालाँकि एक दिन मैं फाईल देख रहा था तो बहुत सारी चीजें उनकी मिल गईं। उनके कुछ पत्र थे। उनके मेरे कुछ लिए हुए छोटे-छोटे इंटरव्यू थे और ये सात पेज का इंटरव्यू था। मेरा मानना है कि उनकी रचनावली छपनी चाहिए। देखिए मैंने दो व्यक्ति ऐसे देखे जैनेंद्र
कुमार और नरेश मेहता जिनमें जयशंकर प्रसाद वाली प्रतिभा थी। भाषा का अद्भुत अधिकार। जब वो बोलते थे तो लगता था कवि बोल रहा है।
इष्ट देव सांकृत्यायन : एक बात इसको भी लेकर बहुत होती है कि प्रवासी साहित्य को प्रवासी साहित्य क्यों कहा जाता है? कुछ लोगों का ये मानना है कि ये उसको साहित्य की मुख्य धारा से अलग करने की कोशिश है?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : हाँ, कुछ लोगों ने एतराज तो किया है लेकिन जिन लोगों ने एतराज किया है वो इससे पहले भी प्रवासी साहित्यकार के रूप मे ही छपना चाहते थे। पहले तो वे प्रवासी लेखक के रूप में ही प्रकाशित होते थे। पत्रिकाओं में और कैसे छपेंगे आप? अब वे जब थोडा कुछ प्रतिष्ठत हो गए तो उन्हें लगा कि हमें आप प्रवासी कह कर के अलग-थलग कर रहे हैं। लेकिन मेरा ये कहना है कि प्रवासी कह कर के हम आपका सम्मान कर रहे हैं। एक आपको विशिष्ट पहचान दे रहे हैं। आपका हम अपमान नहीं कर रहे हैं न आपको हाशिये में रख रहे हैं। न आपका रिजर्वेशन कर रहे हैं। लेकिन चूँकि आप जिस संवेदना को लिख रहे हैं वो आप भारत में रह कर नहीं लिख सकते। आफ जो अनुभव हैं वो नितांत भिन्न हैं, भारतवर्ष के अनुभवों से। जैसे इसी क्रम में स्त्री विमर्श चलाया या हमने आदिवासी विमर्श चलाया। मैं समझता हूँ कि इसी तरह से अगर प्रवासी विमर्श चलता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। मैंने कहा कि आप उसी तरह से मुख्य धारा के अंग हैं जैसे और कोई भी हैं।
इष्ट देव सांकृत्यायन : एक बात और जो थोडी अटपटी लगती है, हम बार-बार कहते हैं मुख्य धारा और मुख्य धारा से अलग करना और मुख्य धारा से जोडना। सवाल ये है कि ये मुख्यधारा है क्या?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : जो मैं समझता हूँ ये वो धारा है जो भारतेंदु हरिश्चंद्र से चलती है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिली शरण गुप्त,
सोहनलाल द्विवेदी, ये जो धारा है हमारी ये राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा है। जो इस देश की मूल चेतना है। उसी चेतना से जुडा हुआ साहित्य भी मूल रूप से माना जाएगा। समग्र समाज की चेतना यानी देश की जो चेतना है, वो देश और संस्कृति से जुडी हुई चेतना है। उनके जो सवाल हैं अगर आप उन्हें उठाते हैं तो आप मुख्य धारा के हिस्से हैं। लेकिन आपको तो केवल मनुष्य के तनाव को और द्वंद्व को और वर्ग संघर्ष को दिखाकर के आगे बढना है तो केवल वर्ग संघर्ष तो जीवन का सत्य नहीं है। जीवन का सत्य तो कुछ और भी है।
इष्ट देव सांकृत्यायन : ये कौन सी मुख्य धारा है जिसमें साहित्य की और कोई विधा ही न हो। साहित्य की कुल मिलाकर केवल एक विधा रह गई और वो है कविता, उसमें भी नई कविता, जिसमें कविता जैसी कोई चीज है ही नहीं।
डॉ. कमल किशोर गोयनका : असल में कविता की जो मूल आत्मा थी संगीत, उसे लोगों ने नष्ट कर दिया। कविता को उन्होंने शुद्ध रूप से बौद्धिक बना दिया। वो तो पे*मचंद ने कई जगह लिखा है कि भावुकता और बौद्धिकता का जब तक सम्मिश्रण नहीं होगा, साहित्य नहीं हो सकता। अगर आप उसको शुद्ध बौद्धिक बनाएंगे तो कौन पढेगा उसे। जो पढेगा, छोड देगा। जब तक उसको आनंद की अनुभूति नहीं होगी, तब तक वो साहित्य को नहीं पढेगा।
इष्ट देव सांकृत्यायन : जैसा कि आपने बताया, पे*मचंद जी पर आपने कुल १६ विषय तलाशे थे और उनमें से केवल १ विषय पर काम किया। तो बाकी के पंद्रह विषयों पर कभी कुछ किया या नहीं?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : नहीं देखिए एक तो जो बडा काम मैंने किया वो ये कि पे*मचंद के मूल साहित्य को सुरक्षित किया। आप समझिए कि जो उनके फर्स्ट एडिशंस थे, मूल पाठ है, उसमें बहुत परिवर्तन आ गया। तो उनके मूल काम को सुरक्षित करने के लिए उनके जो फर्स्ट एडिशंस थे, अभी गोदान का फर्स्ट एडीशंस मैंने
पब्लिश कराया। जो बहुत बडा काम है और सारे उपन्यासों के फर्स्ट एडीशंस अब छप रहे हैं। उनकी तीन सौ कहानियों के मूल पाठ मैंने पत्रिकाओं से निकाले और उनमें से डेढ सौ कहानियों का जो पत्रिकाओं में छपी थीं, उनकी फोटोकॉपी कराने के बाद उनका जो पहला पेज है उस कहानी का, उनके साथ छापा। जैसे कफन कहानी है, कफन कहानी चाँद में अपैल ३६ में छपी। तो चाँद पत्रिका से वह फोटो निकाला गया। चाँद में छपा जो पहला पेज था, जब मानसरोवर के खंड में वो शामिल की गई, तब जहाँ से वो कफन कहानी शुरू होती है, उससे पहला पेज वो लगाया है। जिससे आपको पता चले कि विजुअली वह कहानी कैसी छपी है। गोदान में ये फर्स्ट एडीशन है, अब जो गोदान छप रहा है, उसमें तीस प्रतिशत भाषा बदल गई। एक तो पे*मचंद के मूल पाठ को सुरक्षित करना और दूसरा उनके नए साहित्य की खोज। तीसरा उनकी नई व्याख्या और एक मैंने जीवनी लिखी है उनकी डेट वाइज। १९८० में। आज से ३७ साल पहले लिखी थी मैंने। ये जो सारे डाक्यूमेंट्स थे उनके लाइफ के वो जोड दिए। किस डेट को उन्होंने क्या किया।
इष्ट देव सांकृत्यायन : पेमचंद पर ये जो काम आफ हैं उनकी विदेशों में भी कई विद्वानों ने बडी प्रशंसा की है। लेकिन हमारे देश के प्रगतिशील लोगों ने या तो इसकी तर्कहीन आलोचना की है या फिर इसे खारिज करने की कोशिश की है। इसे आप किस रूप में देखते हैं?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : वो तो राजनीति है। शुद्ध राजनीति है। शतरंज के खिलाडी का देखिए, इसके तीन पाठ हैं और वो तीनों पाठ मैंने किताब में दिए हुए हैं। आपको गद्य में कोई काम ही नहीं मिलेगा ऐसा। मुझे डाउट है कि मेरे बाद कोई आदमी इस काम को आगे बढाएगा कि नहीं क्योंकि इसमें जीवन लगाना पडता है। जब तक आप पूरा जीवन नहीं देंगे, तब तक आप कोई बडा काम नहीं कर सकते।
इष्ट देव सांकृत्यायन : हिंदी का साहित्य जो एक वर्ग विशेष तक सीमित होकर रह गया, उसमें क्या आप इसे एक कारण के रूप में नहीं देखते हैं?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : देखिए वो तो एक बडा कारण है कि सही चीजो है वो प्रकाशित नहीं होती और प्रकाशित भी अगर होती है तो वो जनता तक पहुँचती नहीं है। एक तो हमारे यहाँ पुस्तकालयों की व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं है। जो अच्छी किताबें हैं वो दब जाती है। अब ये देखिए डायमंड जो पेपरबैक है, वो खूब बिकते हैं। वो क्यों बिकते हैं भाई? वो रेलवे बुकस्टाल पर, सब पर बिकते हैं और खूब लोग पढते हैं। तो ऐसा क्यों नहीं बनाते आप? आप सस्ते पेपरबैक बनाइए, अच्छी किताबें दीजिए और उनका प्रचार-प्रसार कीजिए तो खूब बिकेंगी। पाठक है, लेकिन आप पाठक को कैच ही करना नहीं चाहते।
इष्ट देव सांकृत्यायन : हिंदी में एक और चीज मैं देखता हूँ कि प्रेमचंद, रेणु, शिवपूजन सहाय, या राही मासूम रजा हैं... इन्होंने तो गाँवों पर काम किया, लेकिन बाद में हिंदी का साहित्य गाँव से दूर होता चला गया। जो लिखा भी जा रहा है, वह यथार्थ कहा जरूर जा रहा है, लेकिन है यथार्थ से बहुत दूर। इसके पीछे आपको क्या कारण दिखाई देता है?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : देखिए सत्य तो यह है कि जो आजादी के पहले का गाँव था, वो जो गाँव के स्ट्रक्चर में परिवर्तन हो गया। गाँव पर शहर ने जिस तरह से आक्रमण किया है, अधिकांश गाँव धीरे-धीरे शहरीकरण की चपेट में आ रहे हैं। वो जब शहरीकरण की चपेट में आएगें तो शहर की संस्कृति भी वहाँ पहुँचेगी और जो पुरानी पीढी के लोग हैं वो तो बहुत परेशान होंगे, लेकिन नई पीढी के लोग तो वहाँ से भाग कर शहर आ रहे हैं। तो ये जो परिवर्तन हो रहा है, इसी कारण से अब गाँव भी वो गाँव नहीं रहे जो पहले गाँव थे।
इष्ट देव सांकृत्यायन : लेकिन यह परिवर्तन अपने वास्तविक रूप में हिंदी के साहित्य में नहीं आ पा रहा है?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : उसका कारण यह है कि जो मेरी पीढी के लोग थे, जैसे रामदरश मिश्र इन लोगों ने गाँव को टेक अप किया लेकिन जो नई पीढी के लोग हैं, उनमें से कितने लोग हैं जो गाँव से आकर के हिंदी लेखक बन गए हैं। क्योंकि पहले की जो पीढी आती थी गाँव से और शहर में हिंदी पढती-पढाती थी, वो गाँव के बारे में लिखती थी और वहाँ से आने वाली जेनरेशन जो है, नई जेनरेशन, वो लेखक नहीं बन रही है। ये संकट तो रहेगा। क्योंकि गाँव के परिवर्तित रूप को तो नहीं बदल सकते आप।
इष्ट देव सांकृत्यायन : एक तरफ तो एक बात यह आती है हिंदी लेखक की-वो वहाँ रहा भी है थोडे दिन, या पला-बढा है, पर अब निकल आया तो अब नहीं लिख पा रहा है और दूसरी तरफ अभी जिनको नोबल पुरस्कार मिला है साहित्य का कैजूओ इशिगुरो को, वो चार-पाँच साल की उम्र में ही जापान से निकल आए। जब आदमी होश संभालने की स्थिति में भी शायद नहीं रहता है। बस उतना ही उन्होंने जापान को जाना। उसके बाद उनका पूरा जीवन इंग्लैण्ड में बीता और फिर उन्होंने जो लिखा उसमें उनके पहले जो दो उपन्यास हैं, वो जापानी पृष्ठभूमि को लेकर ही हैं। तो अब यह तो एक तरह से जो भोगा हुआ यथार्थ की बात की जाती है, उसे चुनौती है। जिसे लेकर आज हमारे यहाँ कई तरह के खेमे आ रहे हैं।
डॉ. कमल किशोर गोयनका : नहीं जो भोगा हुआ यथार्थ के वाद की बात की जाती है मेरी दृष्टि से वो तो खाली एक नारेबाजी के अलावा कुछ नहीं है। अगर आप भोगे हुए यथार्थ को ही रचना में लाएंगे तो आप कभी बडा लेखक बन ही नहीं सकते। अब राम चरित मानस की कल्पना करिए आप, कितने करेक्टर्स हैं उसमें। तो क्या तुलसीदास ने सब को भोगा था क्या? महाभारत देख लीजिए। वेद व्यास अगर लिख रहे हैं तो कितने लोगों के यथार्थ को भोगा था उन्होंने? या पेमचंद को ले लीजिए।
पेमचंद ने दो बैलों की कथा लिखी तो क्या बैल बन कर के उन्होंने हल चलाया था? ये सारी मिथ्या बात हैं। ये नारेबाजी के अलावा और कुछ नहीं है। लेखक की जो कल्पनाशीलता है वही सबसे प्रबल होती है। उसकी इमेजिनेशन जो है, वो जीवन के यथार्थ तत्त्व बिलकुल उसके सामने प्रकट कर देती है। अब जो स्त्री कैरेक्टर है, वो पुरुष जब लिखेगा तो स्त्री कैरेक्टर को वो अपने भीतर कैसे पैदा करेगा? क्योंकि उसके जीवन को तो जिया ही नहीं। चूँकि वो समाज में स्त्री के बिहेवियर को देखता है। फिर उसकी इमेजिनेशन उस कैरेक्टर में उसके स्त्रीत्व को आरोपित करती है। फिर वो कैरेक्टर वहाँ जीवंत कर देता है। तो भोगा हुआ यथार्थ वाला जो स्लोगन था, वो तो बहुत पुरान हो गया अब। अब उसकी कोई चर्चा भी नहीं करता। अब तो ये है कि भाई रिवीजन की चर्चा तो होती है। लेकिन भोगा हुआ सत्य जो है, वो और बडे सत्य के सामने बहुत छोटा है। भोगा हुआ सत्य के अलावा और जो चीजो का सत्य है, वो बहुत बडा है।
इष्ट देव सांकृत्यायन : आपने कई और लोगों पर भी काम किया है। पंद्रह-बीस किताबें और भी आपने दूसरे लोगों पर भी लिखी हैं। वो कौन-कौन से लोग हैं?
डॉ. कमल किशोर गोयनका : देखिए तो हजारी प्रसाद द्विवेदी। एक तो एक्सपेरिमेंट कुछ संस्मरण पर किया। एक तो यशपाल कुछ संस्मरण, पेमचंद कुछ संस्मरण और हजारी प्रसाद द्विवेदी कुछ संस्मरण। हजारी प्रसाद द्विवेदी के कुछ ऐसे संस्मरण हैं जो मैंने लिखवाए उनके परिवार से और डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने जो उनकी जीवनी लिखी हजारी प्रसाद द्विवेदी की, उसमें उन्होंने मेरी किताब का बडा उपयोग किया। उन्होंने खुद मुझसे कहा कि मैंने आपकी किताब का बडा उपयोग किया। हालाँकि उन्होंने एक्नॉलेज नहीं किया। एक तो मैंने वो इंटरव्यू वाला किया। एक मैंने एक्सपेरीमेंट किया कुछ प्रतिनिधि संकलन तैयार किए। प्रभाकर माचवे का, रवींद्र नाथ त्यागी का और विष्णु प्रभाकर का। ये भी किताबें बडी चर्चा में रहीं।
अच्छा रवींद्र नाथ त्यागी पर जो किया उसके आधार पर लोगों ने रवींद्र नाथ त्यागी को जाना। कुछ मैंने रचनावलियाँ एडिट की। मंजुल भगत की, सारा कथा साहित्य मैंने दो वॉल्यूम्स में एडिट किया। रामकुमार वर्मा के सारे नाटकों का मैंने तीन वॉल्यूम में संकलन किया, जो छपा। उसके बाद अभी रवींद्र नाथ त्यागी की पूरी रचनावली नौ वॉल्यूम्स में एडिट की। अभी मेरी एक किताब सामयिक से आ रही है पे*मचंद की कहानी यात्रा और भारतीयता। वो भी साढे चार सौ पेज की है। ऐसी करीब मेरी बारह किताबें हैं पे*मचंद पर। पे*मचंद विश्वकोश के दो खंड हैं और तीन खंड अभी तैयार हो रहे हैं।
इष्ट देव सांकृत्यायन : हिंदी के प्रसार के लिए भी बडा काम किया है, विदशों में भी और अभी भी आप इस दिशा में लगे हुए हैं। तो आने वाले दिनों में आप हिंदी की क्या स्थिति देखते हैं? माने भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा इस पूरी स्थिति की बात मैं कर रहा हूँ।
डॉ. कमल किशोर गोयनका : देखिए मैं ये महसूस करता हूँ कि हिंदी को रोकना तो अब संभव ही नहीं होगा। जो वर्तमान संचार व्यवस्था है, उसने हिंदी को अडॉप्ट कर लिया है। दूसरी बात है कि व्यापार के साथ हिंदी जुड गई है। जितने विज्ञापन हैं, अधिकांश अगर आप देखें तो वो बहुमत में हिंदी भाषा में आ रहे हैं। इसका अर्थ ये है कि जब हिंदी भाषा व्यापार से जुड गई तो उसके विस्तार को कोई रोक नहीं सकता। हिंदी के जितने चैनल्स चल रहे हैं और सारी दुनियाँ में देखे जाते हैं उसका अर्थ है कि जहाँ-जहाँ जिन-जिन देशों में हिंदीभाषी लोग हैं वो हिंदी के उन चैनल्स को देखते हैं। तो एक हिंदी विश्व बन गया है। ?
१/६९६, प्रथम तल, वसुंधरा, गाजियाबाद (उ.प्र.)-२०१०१२
मो. ७८३५०६८२५९