कालिदास ! सच सच बतलाना

अम्बिका दत्त


पिछले दिनों परिवार में छोटे भाई की बिटिया की शादी थी। शादी में वधू की विदाई एक करुण प्रसंग होता ही है। ऐसे अवसर पर मुझे प्रायः कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल के बहुचर्चित श्रोक के बारे में कही गई उक्तियाँ स्मरण हो आती हैं।
<br/>इन प्रशस्तियों में कहा गया है कि काव्य में श्रेष्ठ नाटक है और नाटक में श्रेष्ठ अभिज्ञानशाकुन्तल है। अभिज्ञानशाकुन्तल में भी उसका चौथा अंक और चौथे अंक का भी चौथा श्रोक । जो शकुंतला के कण्व ऋषि के आश्रम से अपने पति गृह जाते समय विदाई का है। सुना था कि इस श्रोक में कण्व ऋषि अपने करुण भाव प्रकट करते हैं और कहते हैं कि बेटी की विदा के अवसर पर मुझ तपस्वी की ही, शकुन्तला जिसकी जाया नहीं है, जब इतनी कारुणिक स्थिति है तो सांसारिक मनुष्यों की क्या अवस्था होती होगी?
<br/>अभिज्ञानशाकुन्तल के चौथे अंक का यह चौथा श्रोक जिसका मूल कभी पढा या सुना नहीं था। हालांकि इस श्रोक की प्रशस्ति में कहे गये श्रोक कई बार सुने थे। इनके कई पाठ हैं यथाः
<br/>काव्येषु नाटकं श्रेष्ठम् तत्रापि च शकुंतलम्।
<br/>तत्र रम्यश्चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्।।
<br/>इसी का एक पाठ और हैः
<br/>काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
<br/>तत्रापि च चतुर्थोऽङ्क यत्र याति शकुन्तला।।
<br/>इसी से थोडा सा भिन्न एक और पाठ हैः
<br/>कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशकुंतला।
<br/>तत्रापि चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्रोक चतुष्टयम्।।
<br/>यास्यत्यध्ये ति तत्रापि श्रोक सर्वमनोहरः ‘‘इति’’।।
<br/>इन उद्धरणों के साथ जो टिप्पणी मिलती है तदनुसार ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ के सातों अंकों में से चतुर्थ अंक सर्वश्रेष्ठ है। ऐसी विद्वानों की सम्मति है। इस अंक में महर्षि कण्व की आश्रमललामभूता शकुंतला अपने पति गृह को जा रही है। इस अंक का यही भाग प्रधान है, शेष कथावस्तु गौण है। यहीं पर यास्यत्यद्य आदि श्रोक अत्यंत मनोहर हैं। इस अंक में प्रायः करुण रस विद्यमान है।
<br/>अभिज्ञानशाकुन्तल के इस कई बार सुने चतुर्थ अंक के चार श्रोक और उनकी प्रशस्ति के कारण मन में उत्कंठा थी कि इस श्रोक का वास्तविक पाठ क्या है। इसमें कालिदास कण्व ऋषि से क्या कहलवाते हैं? काव्य एवं भाषा की दृष्टि से यह जानने की जिज्ञासा मन में काफी समय से स्थान बनाये हुए थी। अंततः सुयोगात् एक दिन अभिज्ञानशाकुन्तल उठाया। उसका चतुर्थ अंक खोला; चतुर्थ अंक का प्रारंभ पुष्प चुनने का अभिनय करती दो सखियों के प्रवेश से होता है। इन्ही के संवाद के मध्य नेपथ्य से अतिथि का स्वर सुनाई देता है वही
<br/>पहला श्रोक हैः
<br/>आः कथमतिथिं मां परिभवसि?
<br/>विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा
<br/>तपोनिधिं वेत्सि न मामुपस्तिथम्।
<br/>स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्
<br/>कथां प्रमतः प्रथमं कृतामिव ।।१।।
<br/>इसे सुनकर सखी प्रियम्वदा ऋषि दुर्वासा के प्रति हो जाने वाले अपराध से कृत शाप का शोक करती है। अनसूया के अनुरोध पर दुर्वासा इस शाप के शमन का समाधान बताते हैं। दोनों सखियाँ इसे अपने मन में ही गोपन रखने का विनिश्चय करती हैं।
<br/>विष्कम्भक के उपरांत सोकर उठे हुए कण्व के शिष्य का प्रवेश होता है वह दूसरे श्रोक में रात के बीतने, चन्द्रमा के अस्त होने, सूर्य के उदय होने, इस उदयास्त से दिशाओं के नियंत्रित होने का भाव प्रकट करता है।
<br/>तीसरे श्रोक में कुमुदनी और स्त्रियों के प्रियतम प्रवास का दृष्टान्त है, तो चतुर्थ श्रोक में बेर की पत्तियों पर पडी ओस की बूंदों की अरुणाभा, मयूर और हरिण के कलापों का वर्णन हैं:
<br/>यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीना-
<br/>माविष्कृतोऽरुणपुरःसर एकतोऽर्कः।
<br/>तेजोद्वयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्यां
<br/>लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु।।२।।
<br/>अपि च
<br/>अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वतीमे
<br/>दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा।
<br/>इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य
<br/>दुःखानि नूनमतिमात्रसुदुःसहानि।।३।।
<br/>अपि च
<br/>कर्कन्धूनामुपरि तुहिनं रंजयत्यग्रयसन्ध्या
<br/>दार्भं मुंचत्युटजपटलं वीतनिद्रो मयूरः।
<br/>वेदिप्रांतात् खुरविलिखितादुत्थितश्चैष सद्यः
<br/>पश्र्चादुच्चैर्भवति हरिणः स्वांगमायच्छमानः।।४।।
<br/>चतुर्थ श्रोक में तो कहीं भी उस सुनी हुई बात का उल्लेख नहीं है जिसकी महत्ता, काव्योपमा, करुण प्रासंगिकता, सर्वोत्कृष्टता गिनाई गई है। तो क्या चतुर्थ अंक के चतुर्थ श्रोक की सन्दर्भ व्याख्या अन्यथा ही है।
<br/>इतना ही नहीं पंचम श्रोक में भी कण्व ऋषि का शिष्य चन्द्रमा के आरोहण और आकाश से पतन की बात ही करता है और कहता है बडों का भी ऊँचे स्थान पर चढना पतन में ही परिवर्तित हो जाता हैः
<br/>पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूघिर् कृत्वा सुमेरोः
<br/>क्रान्तं येन क्षतिततमसा मध्यमं धाम विष्णोः।
<br/>सोऽयं चन्द्रः पतति गगनादल्पशेषैर्मयूखै-
<br/>रत्यारूढिर्भवति महतामप्यपभ्रंशनिष्ठा।।५।।
<br/>क्या करें छोडें। किसी विज्ञ से विमर्श करें या अधीर होने के बजाया थोडा और आगे चलें। आगे
<br/>चलते हैं।
<br/>इसी समय अनसूया का बिना पर्दा हटाये प्रवेश होता है। चलो, गुरु से निवेदन कर दूँ कि हवन का समय हो गया। ऐसा कहकर चन्द्रमा के अस्त होने और सूर्योदय का वर्णन करने वाला शिष्य चला जाता है। अनसूया का चिन्तन स्वगत कथन चलता रहता है ‘अब कामदेव की इच्छा पूर्ण हो, जिसने सरल हृदय वाली मेरी प्रिय सखी को एक झूठ बोलने वाले राजा के प्रति समर्पित कर दिया अथवा यह दुर्वासा के शाप का प्रभाव है। उसे इस पूरे प्रकरण यानि दुष्यंत शकुंतला के विवाह और शकुंतला के गर्भवती होने की कण्व को भिज्ञता न होने की भी चिंता है। आदि आदि।
<br/>प्रियवंदा से उसे सूचना मिलती है कि कण्व को सब ज्ञात हो चुका है। अनसूया पूछती है कि कण्व को कैसे पता चला उन्हें किसने बताया? इसके जवाब में प्रियवंदा जो कहती है वह छठा श्रोक हैः
<br/>दुष्यन्तेनाहितं तेजो दधानां भूतये भुवः।
<br/>अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्निगर्भां शमीमिव।।६।।
<br/>जिसका अर्थ है- ब्रह्मन् (राजा) दुष्यंत के द्वारा स्थापित तेज (वीर्य) को धारण करने वाली अपनी पुत्री को शमी लता के समान जानो।
<br/>अनसूया यह जानकर प्रसन्न होती है और दोनों सखियाँ शकुंतला को अपने पति गृह भेजने की तैयारी में लग जाती हैं। नेपथ्य में स्वर सुनाई देता है कि गौतमी! (कण्वस्य धर्मभगिनी) शार्ङ्गरव एवं शारद्वत आदि मुनियों को आदेश दे दो कि बेटी शकुंतला को पतिगृह ले जाने के लिए तैयार हो जाएँ। इसी समय शकुंतला का सपरिवार प्रवेश होता है। गौतमी, तपस्विनियाँ उसे आशीर्वाद प्रदान करती हैं। दोनों सखियाँ शकुंतला को अलंकृत करने का उपक्रम करती हैं। इसी समय हाथ में आभूषण लिए ऋषि कुमार हारीत का प्रवेश होता है। गौतमी के जिज्ञासा करने पर कि उन्हें ये आभूषण कहाँ से प्राप्त हुए हारीत सप्तम श्रोक में कहते हैंः
<br/>क्षौमं केनचिदिन्दुपाण्डु तरुणा माङ्गल्यमाविष्कृतं
<br/>निष्ठ्यूंतश्चणोपरागसुभगो लाक्षारसः केनचित्।
<br/>अन्येभ्यो वनदेवताकरतलैरापर्वभागोत्थितै-
<br/>र्दत्तान्याभरणानि तत्कि सलयच्छायापरिस्पध्र्दभिः।।७।।
<br/>इसका अर्थ है कि महर्षि कण्व की आज्ञा से हम वृक्षों से फूल चुनने गये तो वृक्षों में से हमको किसी वृक्ष ने चन्द्र के समान धवल एवं मांगलिक रेशमी वस्त्र प्रकट करके दिया। किसी ने चरणों के रंगने के योग्य महावर (लाक्षा रस) प्रकट किया। इन्हीं वृक्षों ने कलाई तक उठे हुए सुन्दर नूतन किसलयों की कान्ति से प्रतिस्पर्धा करने वाले वनदेवता के करतलों से आभूषण दिए।
<br/>अहो! सातवें श्रोक तक आ जाने पर भी अभी तक हमें अपने मन्तव्य को पूरा करने वाला, अर्थ देने वाला श्रोक नहीं मिला। किन्तु हमें अपना धैर्य नहीं खोना
<br/>चाहिए। सम्भवतः यहीं कहीं। शायद थोडा आगे जाने पर अपना अभीष्ट आशय देने वाला श्रोक मिल जायें। कम से कम एक कदम तो आगे चलना चाहिए। हारीत के लाये हुए आभूषण देख कर गौतमी कहती हैं- बेटी इस अनुग्रह से सूचित होता है कि तुम पति के घर में राजलक्ष्मी का भोग करोगी। हारीत मालिनी नदी में स्नान करने गये हुए कण्व को वनस्पतियों कि सेवा के बारे में बताने के लिए चले जाते हैं। अनुभव से शून्य दोनों सखियों चित्रों के परिचय के आधार पर शकुंतला को आभूषण पहनाने लगती हैं कि इतने में स्नान से लौटे कण्व प्रवेश करते हैं। कण्व (विचिन्त्य) सोचते हुएः
<br/>यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
<br/>कण्ठः स्तम्भितवाष्पवृत्तिकलुश्चिन्ताजंड दर्शनम्।
<br/>वैक्लव्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकसः
<br/>पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाविश्लेषदुः खैर्नवैः।।७।।
<br/>आज शकुन्तला जाएगी- इस कारण मेरा हृदय अन्यमनस्कता (दुःख) से परिपूर्ण हो रहा है। अश्रुओं को बहने से रोकने के कारण गला रुंध गया है। दृष्टि (विरह्जन्य) चिंता के कारण जड (निश्चेष्ट) हो गई है। जब वन में रहने वाले मुझ (जैसे तपस्वी) को (शकुन्तला के प्रति) स्नेह के कारण इस प्रकार दुःख हो रहा है तो भला गृहस्थ जन (प्रथमोत्पन्न) नवीन पुत्री के वियोग से कितना अधिक दुःखित होते होंगे?
<br/>हाँ यही तो है वह श्रोक जो हमें अभीष्ट था। किन्तु यह तो चतुर्थ नहीं अष्टम श्रोक है। कहने में कोई भेद है या हमारे ही समझने में कोई कसर रही। रुढी चल पडी या अन्य कोई तकनीकी कारण है। क्या पता यह आठवां श्रोक ही किसी पाठ की तकनीक की वजह से या विधा से चतुष्टयम् शब्द के आशय को पूरा करता हो। यह तो संस्कृत भाषा विज्ञ ही बता सकते हैं। संस्कृत-विज्ञों से विमर्श हुआ तो उन्होंने बताया कि चतुष्टय का अर्थ चौथा नहीं अपितु चार श्रोकों का समूह है और यह उनमें से एक श्रोक है जिसमें शकुंतला के आश्रम से विदा होने का वर्णन है। सही-सही भिज्ञता न होने से इतने श्रोकों से गुजरना हुआ। एक तरह से देखो तो यह अच्छा ही हुआ।
<br/>मुझ साधारण पाठक को तो इस एक श्ा*ोक को पाकर ही बडी संतुष्टि हो गयी है। अहो भाव की अनुभूति हुई है। मन में एक करुण भाव जाग गया है। कृतज्ञ भाव। महर्षि कण्व के प्रति। महाकवि कालिदास के प्रति।
<br/>यूँ तो दुष्यंत और शकुंतला की कथा कालिदास की मौलिक कथा नहीं है। मूल रूप से वेदव्यास के महाकाव्य महाभारत के आदिपर्व में यह आख्यान वर्णित है। किन्तु वहाँ यह आख्यान कोई श्रृंगार अथवा करुणा के काव्य के रूप में नहीं है वहाँ तो यह भरत वंश के इतिहास का वर्णन है।
<br/>क्या अनुभव किया? यह कालिदास को क्या पता? कालिदास ने कल्पना की। उसकी अनुभूति की। एक कवि एक रचनाकार यही तो करता है। सृजन में वह तदाकार हो जाता है।
<br/>तो शकुन्तला के पतिगृह जाते समय अश्रुओं को बहने से रोकने के कारण गला किसका रुंध गया है। कण्व का या कालिदास का? दृष्टि (विरह्जन्य) चिंता के कारण जड निश्चेष्ट किसकी हो गई है? नागार्जुन कालिदास से यही पूछते हैंः
<br/>कालिदास सच सच बतलाना/इंदुमती के मृत्यु के शोक में अज रोया या तुम रोये थे?/कामदेव जब भस्म हुआ तब रति रोई या तुम रोये थे?/विधुर यक्ष का जब मन उचटा था तब रोया यक्ष या तुम रोये थे?
<br/>मन में तो हमारे भी आता है कि कालिदास से पूछें :
<br/>विदा हो रही थी जब शकुन्तला ऋषि
<br/>आश्रम से
<br/>तब नयन कण्व के भीगे थे?
<br/>गला रुंधा था दृष्टि थमी थी सिर्फ कण्व की
<br/>या साथ साथ तुम भी रोये थे?
<br/>कालिदास सच सच बतलाना।
<br/>लेकिन कलिकाल का एक अकिंचन अज्ञात कवि कालिदास से किस हैसियत से, किस बल, किस साहस से, किस पुरुषार्थ से पूछ सकता है कि ‘कालिदास सच सच बतलाना यह तुम पर गुजरी थी या कण्व पर।
<br/>हम साधारण कवि। साधारण लोगों जैसे ही होते हैं। अपनी बेटियों को विदा करते समय अपने अश्रुओं को बहने से रोकते नहीं। उन्हें विदा करते समय रोते हैं। रो लेते हैं और आंसू पोंछ कर फिर से अपने काम में लग
<br/>जाते हैं। अपने नित्य कर्म में रत हो जाते हैं। ‘काल चक्र निरंतर चलता रहता है’ कालिदास यह भी तो तुम्हीं ने कहा है। ?
<br/>२ बी ।। न्यू कॉलोनी, गुमानपुरा, कोटा (राज.) ३२४००७