सांस्कृतिक ध्वंस की मानसिकता पर विचार करते हुए

डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’


बात कुछ वर्ष पूर्व की है। मैं किसी काम से बाहर गया था और अपने एक मित्र के घर पर ठहरा हुआ था। अगले दिन लौटते समय मैंने मित्र की बेटी से कहा कि, बेटा ! जरा कमरे में से मेरा थैला ले आना। बिटिया कमरे में गई और कुछ ही पल में वापस आ कर बोली, अंकल जी ! वहां तो कोई थैला नहीं है। मैंने थैले का रंग और आकार बताते हुए उसे फिर से कमरे में थैला लेने भेजा। अब उसने पहले से कुछ ज्यादा समय लगाया, पर उसका उत्तर पूर्ववत् था कि वहां तो कोई थैला नहीं मिल रहा है। तीसरी बार मैंने उसे जगह भी बता दी, पलंग के पास वाली मेज, जिस पर पानी का ग्लास, रिमोट वगैरह रखे हैं। अब की बार बिटिया आत्मविश्वास भरी मुद्रा में आयी और किंचित् अधिकारपूर्ण स्वर में बोली, अंकल जी ! थैला-थैला कर रहे हो, वहां तो ये बैग रखा हुआ था। मैं अपनी इस तथाकथित भाषापरक मूर्खता (जिसमें अब पता नहीं प्रयोगधर्मी मानसिकता भी शामिल थी या नहीं ) पर लज्जित हुआ और झेंपते हुए कहा
हाँ-हाँ, यहीं काला बैग। उसने मुस्कराते हुए मेरे हाथों में बैग थमा दिया। उसकी मुस्कुराहट में कुछ विनोद, कुछ व्यंग्य, कुछ आत्मीयता और कुछ आत्मगौरव तो था पर झुंझलाहट बिल्कुल नहीं थी। वह बहुत फुर्तीली और समझदार लडकी थी जो दसवीं कक्षा में पढती थी और अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण कक्षा में श्रेष्ठ स्थान पाती रही थी। मैंने भी मुस्कुराकर अपनी झेंप मिटा ली। मित्र, जो मेरे स्वभाव से परिचित थे, जोर से हँस रहे थे। चलते-चलते मैंने बिटिया से पूछा, अच्छा बताओ, बैग को हिन्दी में क्या कहते हैं? बच्ची ने रटा रटाया उत्तर, जो हम सभी ने भी दशकों पहले रटा होगा, बी. ए. जी. - बैग - बैग माने थैला, सुना दिया। मैंने फिर विनोदभाव से पूछा थैले को अंग्रेजी में क्या कहेंगे ? बैग; उसने बेहिचक मेरी ओर देखते हुए बता दिया। मैंने पूछा कि जब मैंने तुमसे थैला लाने के लिए कहा तो तुम बैग क्यों नहीं लाई ? बच्ची कुछ उलझन में भरी, कुछ सकुचाई और घबराई भी पर जो कुछ उसने बताया उसका तात्पर्य यह था कि मजबूत कपडे की घर पर सिली हुई झोले जैसी वस्तु जिसे अकसर पुराने कपडों को कांट-छांट कर बनाया जाता है, उसे थैला कहते हैं और जो बाजार में मिलने वाले कैनवास, रेग्जीन, तिरपाल आदि से बने हुए चैन, हुक, बटन, बैल्ट, हैण्डल आदि से युक्त झोला होता है उसे बैग कहते हैं। बच्ची तो बच्ची, उसके पापा को भी लगता था कि उसने सटीक उत्तर दिया है। यहीं नहीं हर कोई समझदार व्यक्ति इसे ठीक ही उत्तर बताएगा।
यह एक सामान्य-सी भूल जाने लायक घटना थी, पर जाने क्यों मुझे भुलाए नहीं भूलती। अपनी भाषा और समाज-संस्कृति के संबंधों पर जब भी कुछ सोचता हूं, मुझे यह घटना बरबस याद आ जाती है और यह सवाल मन को कुरेदता रहता है कि भाषा बदलते ही वस्तु के स्वरूप की अवधारणा क्यों बदल जाती है। आधुनिक तरीके से बने थैले को थैला कहना हमको असंगत और अटपटा क्यों लगता है ? पारम्परिक - पुराने तरीके से बने बैग को बैग कहना हमारा मन क्यों स्वीकार नही कर पाता। यह बात केवल उस बच्ची की नहीं, हम सब की है जो अधिकतर भाषा के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं। हम कम्प्यूटर को कम्प्यूटर, ई-मेल को ई-मेल, रेलवे को रेलवे, टैक्सी को टैक्सी कह लें यह तो सहज स्वाभाविक है किन्तु बैग को थैला और अंकल को काका कहने में हम स्वयं को पिछडा हुआ, गँवार और लज्जित क्यों महसूस करते हैं ? वस्तुतः नई और आधुनिक वस्तुओं को अपनी पारम्परिक भाषा में प्रचलित कोई सटीक शब्द न दे कर विदेशी भाषा में ही उसका संज्ञाबोध करना हमारे दैन्यभाव और आत्महीनता को दर्शाता है। इसी मानसिक गुलामी के चलते कलेवा और ब्यालू जैसे अगणित अर्थवान शब्द हमारी शब्दावली में से लुप्त हो चुके हैं बर्ती जैसा प्यारा शब्द कृत्रिम प्रकाश की चकाचौंध में पता नहीं किन अंधेरों में खो गया। हजारों वर्षों से हम जिन शब्दों को बरतते आए हैं उन्हे´ अकारण अताक्रिक ढंग से निर्वासित कर देना बहुत कष्टप्रद है। हमारे लोक जीवन से ऐसे सहज, सुगम और सार्थक शब्दों को खदेड दिया जाना एक अपूरणीय सांस्कृतिक क्षति है। भाषा के क्षेत्र में यह किसी हिंसाचार से कम नहीं। युगों-युगों से हमारे जीवन के बहुत आत्मीय रहे मासूम, निरीह और निरपराध शब्दों का ऐसा ऐतिहासिक भाषावध इस आधुनिक भोगवादी वैश्वीकृत सभ्यता की देन है। यह एक तरह का सांस्कृतिक ध्वंस है।
एक और संदर्भ, जो मुझे अकसर परेशान करता है और हास्यास्पद भी है, का उल्लेख यहां प्रासंगिक होगा। प्रश्नपत्रों में बहुविकल्पात्मक-वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर के लिए प्रायः चार विकल्प दिए जाते हैं जो 1,2,3,4 अथवा अ,ब,स,द के द्वारा वर्णित होते हैं। अब यह अ,ब,स,द
क्या है ? इन वर्णों के इस विचित्र ऋम का हमारी नकलची बुद्धि के अलावा कोई और आधार भी है क्या ? कहां तो पहला अक्षर ‘अ’ फिर कहां चौथे वर्ग का दूसरा वर्ण ‘ब’। कहां ‘स’ और फिर वापस वर्णमाला में ऊपर की ओर चलते हुए पंचम वर्ग का ‘द’। भला किसने निर्धारित किया यह अतिविचित्र ऋम ? ए,बी,सी,डी की अंधी नकल के अलावा क्या कोई और भी आधार है इसका ? ऐसी कौनी सी विवशता है कि हम अ, आ, इ, ई अथवा क, ख, ग, घ नहीं लिख कर अ,ब,स,द लिखते हैं। भाषिक गुलामी की इससे अधिक और क्या बात होगी ? विचारमूढता का इससे बडा और क्या उदाहरण होगा ?
यह आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी और सभ्यता की भाषा अंग्रेजी के प्रति विद्वेष या विरोध की बात न हो कर अंग्रेजियत की दासता के प्रति संघर्ष का मुद्दा है। यह उस मनोवृत्ति का प्रखर प्रतिरोध है जो अपने साहबों के महलों की जूठन-चाटन को प्रसाद समझ कर ग्रहण करने में गर्व का अनुभव करती है। यह इसलिए भी दुर्भाग्यजनक है कि बांग्ला, तमिल, तेलगु, कन्नड, उडिया आदि भारतीय भाषाओं के लोग अपनी भाषिक जडों से उतने दूर नहीं हुए हैं, जितने हम हिन्दी-पट्टी के लोग दूर होते जा रहे हैं। हिन्दी के लेखकों और साहित्यकारों के लिए ही नहीं यह उस प्रत्येक नागरिक के लिए चिन्ताजनक है जो अपने राष्ट्र, समाज, सभ्यता और संस्कृति के लिए चिन्तारत है।
भाषा का प्रत्येक शब्द मानवीय बोध की ऐसी जीवित कोशिका के समान होता है जिसमें ज्ञान और अनुभव के गुणसूत्र संपुंजित रहते हैं। नवीन ज्ञान और नवीन अनुभव के साथ नवीन शब्दों को अपनाना भाषिक समृद्धि का सूचक तो है परन्तु उन्हीं ज्ञान और अनुभवों के लिए भाषा में पहले से मौजूद शब्दसम्पदा क केवल अंधानुकरण के कारण छिटका देना सांस्कृतिक विपन्नता का भी सूचक है। इस सांस्कृतिक दरिद्रता के प्रति समाज को जागरूक करने और दूर करने का प्रयास हिन्दी के सभी साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, अध्यापकों, पाठकों और संस्कृतिकर्मियों को मिल कर करना होगा। इति शुभम्