साहित्यिक परिदृश्य



१४वाँ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन
जयपुर। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा और हिंदी संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए मूर्धन्य समीक्षक खगेन्द्र ठाकुर की अध्यक्षता व वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री रंजना अरगडे की उपाध्यक्षता में गठित सृजन गाथा डॉट.कॉम. रायपुर (छत्तीसगढ) संयोजक जयप्रकाश मानस देश और दुनिया में १३ सफल आयोजन कर चुके हैं। इसी क्रम में १ अक्टूबर २०१७ से ११ अक्टूबर २०१७ तक १४वाँ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन राजस्थान में हुआ। जिसके अन्तर्गत कविता-सत्र जयपुर में, ग*ाल-गीत-दोहा विधा अजमेर में लघु-कथा सत्र बीकानेर में, माउंट साहित्य की विरासत सत्र माउंट आबू में, खुला-सत्र जोधपुर में, तथा धर्म और राष्ट्रीयता से सम्बंधित सत्र उदयपुर में सम्पन्न हुए। देश-विदेश से आए हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं के विद्वानों ने इसमें शिरकत की।
कार्यक्रम का उद्घाटन १ अक्टूबर २०१७ को रविवार शाम ५ बजे सूचना केन्द्र-जयपुर में हुआ। मुख्य अतिथि परिचित समीक्षक जीवन सिंह थे जबकि अध्यक्षता इंदुशेखर ‘तत्पुरुष’, अध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी ने की। अन्य सत्रों में इस अवसर पर ‘कविता की विरासत’ विषय पर संगोष्ठी तथा ‘समकालीन कविताओं का पाठ’ हुआ। समापन में ‘संगीत यामिनी’ में डॉ. अनुराधा दुबे द्वारा कत्थक की प्रस्तुति दी गयी। इस अवसर पर राजस्थान से कहानी, कविता, आलोचना, शिक्षाशास्त्र, शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत एवं संस्कृति कर्म से जुडी विभिन्न विभूतियों को ‘सृजन-श्री’ से सम्मानित किया गया। इस अवसर के लिए विशेष रूप से प्रकाशित साझा कविता संकलन ‘रेत में उमगते पाँव’ के साथ अन्य ८ संकलनों के भी विमोचन हुए।
कार्यक्रम का समापन १२ अक्टूबर २०१७, उदयपुर स्थित साहित्य अकादमी सभागार में हुआ। इस अवसर पर विभिन्न विधाओं में कवि, लेखक, समीक्षकों और सम्पादकों को पुरस्कृत भी किया गया। ?
गांधी के सिद्धांतों की प्रासंगिकता आज भी हैं
जोधपुर। भावुक जी सही अर्थों में गांधी व विनोबा के अनुयायी थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इन्हीं आदर्शों पर चलते हुए समाज के लिए लगा दिया। गांधी के सिद्धांतों की पालना करना बहुत कठिन है लेकिन भावुक जी ने इसे हृदय से अपनाया। उक्त विचार न्यायाधीश पी के लोहरा ने शनिवार को गांधी भवन में नेमिचन्द्र जैन ‘भावुक’ की सातवीं पुण्यतिथि के अवसर पर गांधी भवन तथा अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद द्वारा आयोजित सूतांजली एवं पुष्पांजली कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि गांधी के सिद्धांतों की प्रासंगिकता आज भी है। लेकिन आधुनिकता की दौड में हमने इन सिद्धांतों को भुला दिया है। आज हमें गांधी और विनोबा के साथ ही भावुक जी के आदर्शों की अक्षरश ः पालना करनी चाहिए। इसी से हम अपना जीवन सफल बना सकते हैं।
चिंतक शाइर शीन काफ निजाम ने कहा कि हम गांधी के साथ चल भी नहीं सकते और गांधी के बिना रह भी नहीं सकते। भावुक साहब ऐसे आदमी थे जिन्होंने गांधी का अनुसरण किया। तथाकथित गांधीवादियों ने गांधीवाद को तो अपना लिया पर गांधी को भुला दिया। उन्होंने आगे कहा कि भावुक जी का गांधी से ही नहीं साहित्य से भी नाता था। गांधी का सत्याग्रह से सरोकार था। समिति से जुडे आप सभी कार्यकर्ताओं ने जो मिशन चला रखा है वह भावुक जी के माध्यम से गांधी तक पहुंचता है। डॉ. सी.के. लोहरा ने कहा कि बचपन में भावुक जी से जुडने की उत्सुकता बनी रहती थी। भावुक जी को हर विषय की जानकारी रहती थी। इसीलिए विद्यार्थी उनके पास अनेक प्रतियोगिताओं की तैयारियों के लिए आते रहते थे।
परिषद् के अध्यक्ष तथा आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने कहा कि भावुक जी का व्यक्तित्व चुम्बकीय था। जो युवा पीढी को अपनी ओर खींच लेता था। कोई भी संस्था तब तक खडी नहीं हो सकती जब तक कि उस संस्था के पीछे ‘घर फूँक तमाशा देखने वाला’ भावुक जी जैसा कार्यकर्ता न हो। बकौल सर्वोदयी कार्यकर्ता आशा बोथरा खादी मात्र वस्त्र नहीं विचार है। भावुकजी हमेशा विनय, करुणा, प्रेममय व उदारमना थे। और वे जीवनपर्यंत इन भावों के अनुरूप आचरण करते रहे। डॉ. पद्मजा शर्मा ने कहा कि गांधी के समय खादी आजादी, समानता, स्वतन्त्रता और एकता की प्रतीक थी। खादी पहनने का प्रारम्भ एक तरह से सम्पूर्ण स्वराज्य की तरफ बढने वाला कदम था और यहां तक कि नेहरू ने खादी को ‘आजादी की पोशाक’ कहा था।
इससे पूर्व भट्टाचार्य ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। डॉ. हरप्रसाद राय ने भावुक पर भावुक करने वाली कविता सुनाई। इस अवसर पर कार्यकर्ता प्रियंका सिंघवी, इंसाफ खान जुनेजा, डॉ. शैला माहेश्वरी, डॉ. सुनील कुमार पारीक, आशोक चौधरी, नवीन चितारा, करणसिंह परिहार, मनोहरसिंह चौहान को खादी वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। ? प्रस्तुति- डॉ. पद्मजा शर्मा
बाल साहित्यकार सम्मेलन आयोजित
सलूम्बर। सलिला संस्था द्वारा आयोजित आठवें राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन का दो दिवसीय आयोजन हुआ। समारोह की संयोजक एवं सलिला संस्था की विमला भण्डारी ने बाल साहित्य को संस्कार निर्माण में संजीवनी स्वरूप बताया। उन्होंने बाल साहित्य को बालकों तक पहुँचाने की जरूरत पर बल दिया।
कविता की साख कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवियों की उपस्थिति में उनकी रचनाओं की विद्यार्थीयों ने प्रस्तुति दी। इसमें डॉ. प्रीता भार्गव, डॉ. शील कोशिक, भरतचन्द्र शर्मा, जीतेन्द्र निर्मोही, डॉ. ज्योतिपुंज कुमार सिंह, नन्द किशोर, निर्झर एवं तेजसिंह तरूण की कविताएँ शामिल की गयीं।
प्रथम सत्र का विशेष आकर्षण कवि माधव दरक का एकल काव्यपाठ रहा। संस्था द्वारा इस वर्ष का उत्कृष्ट सम्मान ‘मेवाड गौरव’ प्रदान किया गया। द्वितीय सत्र में स्वतंत्रता सेनानी औंकारलाल शास्त्री स्मृति पुरस्कार २०१७ की श्रृंखला में जोधपुर के रमाकांत शर्मा एवं सिरसा हरियाणा की डॉ. शील कोशिक को सलिला विशिष्ट साहित्यकार सम्मान प्रदान किया गया। कोटा के जितेन्द्र निर्मोही, बीकानेर से सुनील गज्जाणी, उदयपुर के लालदास पर्जन्य एवं प्रमिला शरद को सम्मानित किया गया। ‘हमारे समय की श्रेष्ठ बालकथाएँ’ बाल कहानी संग्रह लोकार्पण के साथ ही विजेता १३ प्रतिभागियों को औंकारलाल शास्त्री सम्मान से नवाजा गया। इस सत्र के मुख्य अतिथि राजस्थानी भाषा साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. देव कोठारी ने सलूम्बर के इतिहास सृजन से जुडी यादों को ताजा किया। अध्यक्षता करते हुए युगधारा उदयपुर के संस्थापक डॉ. पड्या ज्योतिपुंज ने सलिला के सम्मेलन व प्रतियोगिता जैस राष्ट्रीय आयोजनों की उपादेयता को रेखांकित किया।
नई दिल्ली के साहित्यकार डॉ. रवि शर्मा ‘मधुप’ ने इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि संबोधित किया। समारोह को बतौर अतिथि अलका प्रमोद (लखनऊ), पाठक (मथुरा), राज कुमार राजन (आकोला), अंजीव अंजुम (दौसा), मोहम्मद साजिद खान (शाहजंहापुर), डॉ. आदि ने अपने विचार रखते हुए बाल साहित्य के विकास, सृजन, चुनौतियाँ व सामाजिक सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. शील कौशिक, नंद किशोर निर्झर, प्रकाश तांतेड, डॉ. सारिका कालस, डॉ. देशबंधु शाहजंहापुरी की बाल साहित्य की नवीन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। डॉ. कुंजन आचार्य, गौरीकांत शर्मा औदित्य आदि मौजूद थे।
इस दौरान किशोर श्रीवास्तव की ‘खरी-खरी’ पोस्टर की प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें करीब ५० पोस्टर लगाए गए थे। जिसमें कार्टून व सुक्तियों के रोचक व चुटीले अंदाज में समाज की विसंगतियों को दर्शाया गया।?
नाटक का मंचन
जोधपुर। गत १२ अक्टूबर २०१७ की संध्या जयनारायण व्यास स्मृति भवन, जोधपुर में २६वां ओम शिवपुरी स्मृति नाट्य समारोह की शुरुआत हुई। समारोह के पहले नाटक के रूप में जयवंत दलवी लिखित और डॉ. एस.पी. रंगा द्वारा निर्देशित नाटक ‘संध्या छाया’, का मंचन हुआ। पूरे मंचन के दौरान ऐसे कई दृश्य थे जिनको देखकर मन भावुकता और आत्मग्लानि से भर उठा था। एक विचार मन को रह-रह कर उद्दवेलित कर रहा था कि ये किस असहिष्णु, असंवेदनशील और कुसमय में हम जी रहे हैं जिसमें भावनाएँ और रिश्ते बेमतलब हो गए हैं। सांध्यबेला में आकर बुजूर्गों को उन्हें पता चलता है कि सब कुछ तो बंद मुट्ठियों से रेत की मानिंद फिसल चुका है। इस एकाकीपन में आपस के संवाद, पुरानी यादें और भविष्य को लेकर संजोये सपने संबल होते हैं। लेकिन वे भी अकेलेपन को हरा पाने के असफल प्रसास ही तो हैं। नाटक में वृद्ध माता-पिता को एकाकीपन के संत्रास से उबरने के लिए रांग नम्बर पर बात करने वाली शर्मीला, पेईंग गेस्ट और म्हादू के सहारे की जरूरत पडती है। लेकिन यही बात वो अपने बेटे को समझा नहीं पाते कि उन्हें उसकी जरूरत क्यों है? शायद वह जानबूझ कर समझना नहीं चाहता। ‘स्व’ की पराकाष्ठा जब अपना जन्मा आफ लिए तनिक भी नहीं सोचता। उनके खालीपन में बीतता प्रत्येक क्षण ऐसा लगता है मानों शिराओं में बहता रक्त बूँद-बूँद करके शरीर से बाहर बह रहा हो। हर बूँद के साथ उनका जीवन जीने की लालसा मद्धम पडती जाती है। शायद यही वर्तमान का प्रावधान, नियम और नियति बन चुका है। ऐसा लगता है कि दीर्घ जीवन और दीर्घ अभिशाप पर्याय बन चुके हैं।
जीवन के अंतिम समय तक संतान का मोह और नयी पीढी से सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाना एकाकीपन के लिए अभिशप्त करता है। संयुक्त परिवार का बिखराव, परिवार के होने के बावजूद परिवार का नहीं होना और सामाजिक विकास से जुडे परिवर्तनों के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाना जिस त्रासदी को जन्म देता है उसी की त्रासदी की बानगी है नाटक ‘संध्या छाया’।
ओम शिवपुरी स्मृति नाट्य समारोह के अंतर्गत पहले नाटक के रूप में इस नाटक की प्रस्तुति अच्छी रही। मुख्य पात्र श्री और श्रीमति बोहरा (दीनू के माता-पिता) को रमेश बोहरा और लीला नागर ने जीवंत कर दिया। दोनों वरिष्ठ रंगकर्मियों के बीच का मंच पर संवाद, अभिनय और हाव भाव को लेकर सामंजस्य और ताल-मेल दर्शनीय था। बडे ही सूक्ष्म तरीके से दोनों कलाकारों ने अपने-अपने अभिनय का निर्वहन किया। ये हर दृश्य में प्रभावी रहे। हास-परिहास, गंभीरता और भावुक कर देने जैसे हर दृश्य में इनकी सहजता दर्शकों को नाटक के अन्दर समाहित करने में सक्षम रही।
अन्य पात्रों में म्हादू के रूप में अजय करण जोशी सीमित संवाद और रोल के बावजूद असरदार रहे। शर्मीला दीक्षित के रूप में वैभवी जोशी के स्पष्ट संवाद अदायगी ने ध्यान आकृष्ट किया। विनय और एम.एस.जई भी ठीक-ठाक रहे। बाकि कलाकरों को और खुद को मांजने की जरूरत लगी। क्योंकि उनके अभिनय में सहजता थोडी कम लगी।
यह नाटक एकल परिवार की प्रासंगिकता और प्रतिभा पलायन के विमर्श को खडा करता है। साथ ही अकेलेपन की मार्मिकता की प्रस्तुति भी। नाटक का सबसे आखिरी अंतिम दृश्य ने व्याकुलता को जैसे एकदम से बढा दिया। सबसे टूटन भरा दृश्य जो अमूमन कम नाटकों में ही सध पाता है।
निर्देशक एस.पी.रंगा के अनुसार ‘संध्या छाया’ हकीकत में जीवन के रंगों का एक ‘ब्रोड स्पेक्ट्रम’ है और हर रंग अपने ढंग से एक रस की उत्पत्ति करता है।
मंच के पार्श्व में रूप सज्जा के लिए कैलाश गहलोत, मंच परिकल्पना और रंग दीपन के लिए रमेश भाटी नामदेव, मंच सज्जा के लिए हरिप्रसाद वैष्णव, आलाप लक्ष्मी नारायण जोशी और नाटक के हिंदी अनुवाद के लिए कुसुम कुमार को तथा एक अच्छी और सफल प्रस्तुति के लिए राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर और मयुर नाटृय संस्था, जोधपुर को बधाई। ? प्रस्तुति- नवनीत नीरव
हिन्दी दिवस का आयोजन
जयपुर। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में कानोडिया पी जी महिला महाविद्यालय, जयपुर में ११ से १४ सितम्बर २०१७ तक ‘हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया गया। इसके अन्तर्गत ११ सितम्बर को ‘वैश्विक परिपे*क्ष्य में हिन्दी’ अथवा ‘रोजगारोन्मुखी हिन्दी’ विषय पर आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में तीस छात्राओं ने भाग लिया। इस की सह संयोजक डॉ. धर्मा यादव, निर्णायक डॉ. रेखा गुप्ता एवं डॉ. शीताभ शर्मा रही। निबन्ध प्रतियोगिता में छात्राओं ने वैश्विक स्तर पर हिन्दी के अध्ययन केन्द्रों, विश्वविद्यालयों का उल्लेख करते हुए, विभिन्न कार्य क्षेत्रों में हिन्दी भाषा के बढते वर्चस्व को बताया और भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी भाषा के साथ रोजगार के नित नये अवसरों की जानकारी दी। इसमें अंजलि कौर, दिलराज कँवर प्रथम, आकांशा, प्राची सोनी ने द्वितीय और नवधा शर्मा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
१२ सितम्बर, २०१७ को पोस्टर प्रतियोगिता के अन्तर्गत महाविद्यालस के सभी संकायों से छात्राओं ने भाग लिया। इसमें हिन्दी भाषा का महत्व या किसी भी साहित्यकार की पंक्तियों का सुन्दर कलात्मक चित्रण करना था। पोस्टर प्रतियोगिता की संयोजक डॉ. शीताभ शर्मा थी। प्राणीशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉ. रत्ना सक्सेना और हिन्दी विभाग की डॉ. धर्मा यादव निर्णायक थीं। इस प्रतियोगिता में अंजलि कौर, अनुभा उपाध्याय प्रथम, नेहा कुण्डारा द्वितीय एवं नेहा यादव ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। १३ सितम्बर को ‘हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके अन्तर्गत महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. मिनी टी.सी. ने अतिथियों का स्वागत किया और हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ दी। कार्यक्रम का शुभारम्भ संगीत विभाग की छात्राओं ने ‘हिन्दी भाषा, अपनी भाषा, यह हम सबकी है पहचान’ हिन्दी गीत के साथ किया। डॉ. रेखा गुप्ता द्वारा रचित इस गीत को संगीत विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रभा बजाज व प्राध्यपक श्री राजेश शर्मा ने संगीतबद्ध किया।
संगोष्ठी समन्वयक डॉ. रेखा गुप्ता ने ११ से १४ सितम्बर तक के सभी कार्यक्रमों की जानकारी देते हुऐ कि इस प्रकार के आयोजन के माध्यम से अन्य विषयों की छात्राओं को भी हिन्दी भाषा से जोडने का प्रयत्न करते हैं। यही इस आयोजन का उद्देश्य है।
‘हिन्दी दिवस’ के सन्दर्भ में आयोजित इस वैचारिक आयोजन में राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के अध्यक्ष डॉ. इन्दु शेखर ‘तत्पुरुष’ ने अपने उध्यक्षीय उद्बोधन में हिन्दी भाषा के प्रति आज युवाओं की मानसिकता पर दुख व्यक्त किया और कहा कि, आज भी हम हिन्दी भाषा के मान सम्मान के लिए संघर्षरत हैं जबकी हिन्दी सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, राजस्थान हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुदेश बत्रा ने कहा कि हम एक भ*ामक युग में जी रहे हैं। हिन्दी और अंगे*जी भाषा के मिश्रित प्रयोग से बचने की आवश्यकता है। हिन्दी भाषा के स्वरूप के संरक्षण हेतु हमें उसकी लिपि को बचाना होगा।
विशिष्ट अतिथि आलोचक श्री राजाराम भादू अपने विचार व्यक्ति करते हुए कहा कि चिन्तन सदैव अपनी भाषा में ही होता है। आज भाषा और बोलियों का लुप्त होना, संस्कृति के लुप्त होने के समान है। लेकिन बाजारीकरण से हिन्दी के बढते वर्चस्व की बात भी
उन्होंने की।
संगोष्ठी में अंजलि कौर, दिलराज कँवर एवं पल्लवी माथुर ने पत्र वाचन किया। सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग डॉ. शीताभ शर्मा ने छात्राओं को रोचक ढंग से हिन्दी भाषा की वैज्ञानिकता से परिचित करवाया और भाषा प्रयोग के प्रति सचेत करते हुए शुद्ध रुप में भाषा प्रयोग की
बात कही।
विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली छात्राओं को पुरस्कृत किया गया। डॉ. इन्दुशेखर शर्मा ‘तत्पुरुष’ ने छात्राओं की सहभागिता की प्रशंसा की और अनेक छात्राओं को उत्साहवर्द्धन हेतु सान्तवना पुरस्कार प्रदान किए। सहायक आचाय्र (हिन्दी) डॉ. धर्मा यादव ने कार्यक्रम का संचालन किया।
इसी क्रम में १४ सितम्बर को ‘सोशल मिडिया में हिन्दी’ विषय पर चर्चा एवं आयोजित काव्य पाठ में लगभग ४० छात्राओं ने भाग लिया। आकांक्षा महावर, जयप्रथा मीणा, निशा शर्मा, खुशबू मंडावरिया तथा ज्योति मीणा को उत्कृष्ट पुरस्कृत किया गया। ?
प्रस्तुति- डॉ. धर्मा यादव
लोकार्पण समारोह
जोधपुर। सृजना द्वारा २४ दिसम्बर २०१७ सुषमा चौहान के तीसरे कहानी संग्रह ‘‘रौंदे हुए इन्द्रधनुष’’ और सुनीता गोदारा के प्रथम काव्य संग्रह ‘‘प्रेम, अवनि और वातायन’’ के लोकार्पण समारोह का आयोजन जोधपुर में किया गया। मुख्य अतिथि कवि-प्रकाशन मायामृग ने कहा कि विश्वासों का बंटवारा तो सुविधाओं के लिए होता है लेकिन अनुभुतियों का कभी विभाजन नहीं होता। भावनाओं की नमी से रचना प्राणवान बनती है। पर हमने भावुकता छोडने के नाम पर यह नमी ही त्याग दी। उन्होंने कहा कि सुनीता गोदारा की कविता जहाँ समाप्त होती है, वहीं सुषमा चौहान की कहानी प्रारम्भ होती है। और जहाँ चौहान की कहानी समाप्त होती है वहीं से सुनीता की कविता प्रारम्भ होती है। यह एक कविता में से कहानी और एक कहानी में से कविता बाहर निकल जाती है तो रचना निष्प्राण हो जाती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. सत्यनारायण ने कहा कि सुनीता के काव्य संग्रह की भूमिका का गद्य अपने आप में एक कविता है। पुस्तक के तीनों खण्ड पे*म, अवनि और वातायन में एक अद्धृत अंतः धारा बहती है। अपने पहले ही काव्य संग्रह में इतना वैविध्य कवयित्री के संभावनाशील भविष्य का प्रमाण है तथा सुषमा चौहान छोटे-छोटे बिम्बों के चित्र बांध कर प्रभावोत्पादकता का परिचय देती है। उनकी कहानियाँ ‘बेनाम रिश्त’ और ‘प्रतीक्षा’ अनूठे पे*म की कहानियाँ है।
विशिष्ट अतिथि नीलिमा टिक्कू ने सुषमा चौहान की कहानियों की बारीक पडताल करते हुए कहा कि ये कहानियाँ अपने समय के सवालों से टकराने वाली ऐसी कहानियाँ हैं जो पाठकों के अनुभवों पर खरी उतरती है। ये कहानियाँ स्त्री के दर्द की सच्ची तस्वीरें हैं तो सुनीता की कवितायें बनावट से दूर सरल बुनावट की प्रभावी
कवितायें हैं।
गीतकार डॉ. रमासिंह ने कहा कि प्रेम का उदात्त रूप की अध्यात्म तक पहूँचता है। सरलता ही उदात्त स्वरूप ग्रहण करती है। सुनीता की देशज सादगी कविता को छद्मों से दूर आत्मीयता तक ले जाती है तो सुषमा चौहान की कहानियाँ सदियों से दर्द झेलती नारी के अधुनिक युग तक पहुँचने पर भी उपस्थित दर्द को उकेरती है। दोनों ही रचनाकारों की रचनाओं में आज का समाज पुरअसर अभिव्यक्त हुआ है। कार्यक्रम के अंत में अतिथि कवि मायामृग और डॉ. रमासिंह ने अपनी कवितायें प्रस्तुत कीं। स्थानीय कवियों में हबीब कैफी, मधुर परिहार, भानुमित्र, महावीर राठी, सुषमा चौहान, भीनमाल से आई कवयित्री प्रतिभा शर्मा, डॉ. पद्मजा शर्मा, मीठेश निर्मोही आदि ने भी अपनी काव्य रचनाएँ प्रस्तुत कीं। कमलेश तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया जबकि संचालन डॉ. हरीदास व्यास ने एवं धन्यवाद ज्ञापन मुरलीधर वैष्णव ने किया। ?
प्रस्तुति- हरीदास व्यास
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