हवा में ठहरा सवाल/अब क्या करूं ?

डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’


हवा में ठहरा सवाल
कहानियां जीवन का अंश होती हुई हमें अपने आसपास रखती हैं और अनुभूतियों की सघनता से गुजारती हैं। कहानीकार गोपाल सहर का नवीन कहानी संग्रह ‘हवा में ठहरा सवाल’ ऐसी कई कहानियों की धडकन को सुनने-समझने का प्रयास है।
हेतु भारद्वाज ठीक ही कहते हैं ः उनकी कहानियों में सूक्ष्म विवरणता का प्राधान्य रहता है। पाठक जब उनकी कहानियों को पढता है तो जैसे ब्यौरे उसकी आंखों के सामने सजीव होते दिखते हैं। पाठक स्वयं को इन ब्यौरों का हिस्सा मानने लगता हैं (आमुख प्रथम पृष्ठ)। कई कहानियों के वर्ण्य को अंतिम फ्लैप पर कहानीकार माधव नागदा ने भी स्पष्ट किया और माना है कि कहानीकार प्रत्येक कहानी में यह कोशिश करते हुए दिखाई देता है कि आधुनिकता के अंधकार में डूबे मनुष्य की जडता टूटे, वह फिर से जिंदगी की रेलमपेल में सम्मिलित हो, रिश्तों से जुडाव
महसूस करे।
इस कृति में संवेदनाओं का स्फुरण सम्बन्धों से तो है ही, चिट्ठी और शुक्रतारे जैसे माध्यमों से भी होता लगता है। शीर्षक कहानी ‘हवा में ठहरा सवाल’ उस अहसास से उपजा सवाल है जो आईने में उभरे मेघ के अक्स को देखकर उठता है ः किससें मिलता है उसका चेहरा ? मम्मी से या पापा से ? हो सकता है कि उसका चेहरा किसी से भी न मिलता हो। चेहरा सिर्फ उसके जैसा ही हो (पृष्ठ ६)। ये सवाल अक्सर मनोभूमि के बिम्ब होते हैं और प्रतीक होकर हमें अपने आदर्श का अनुसंधान करने को प्रेरित करते हैं। कृतिकार ने कहानी में कहानी के पुटपाक के रूप में यह मनोभूमि रची है।
कहानी ‘बिट्वीन’ के अंगे*जी भाषा के शब्द का मतलब बीच में होता है और इस मध्यवर्ती रिश्ते को कृतिकार ने अनेक अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग के साथ अर्थवत्ता देनेका प्रयास किया है। इसी तरह ‘शुक्रतारा’, ‘सरकार’, ‘फांस’, ‘कुछ काम था यहाँ’, ‘शहर, गुठली और आंख’, ‘सब कनिंग करते हैं’, ‘टूटते-बनते पुल’ और ‘आप पापा क्यों हैं’ शीर्षक ग्राम्य और अभिजात संस्कृति के स्पंदनों को रेखांकित करने वाले चरित्र प्रधान बिंबों को बुनती हुई कहानियां है। इनतें मुहावरों के समानान्तर कथनमूलक रेखाएं हैं जो कि कहानीकार को प्रयोगों के क्षेत्र में लाकर खडा करती हैं। ये अपनेपन के अहसासों को जीवंत करने वाले प्रतीकों की कहानियां हैं। इनमें संवादों का रूपायन भी है जो पाठक के सामने भी मुखर होने का अवसर उपस्थित करती हैं।
‘छिपकली की पूंछ’ देशज शब्दों की सत्ता को स्थापित करने वाली कहानी है ः अबै बैर-जेर मत राखज्यो दोई। उठो अरर काम रे हल्ले लागो। इसमें कई वाक्यों में लेखक की राजस्थानी भाषा पर पकड सामने आती है। टींडकी, मोट्यार, भाबा होकम, डींगले, गढ-ड्यौढी, जीमण वगैरह-वगैरह अनेक राजस्थानी शब्द इस कहानी में आए हैं और वे अंग्रेजी के प्रयोगों की ओर उन्मुख रचनाकार के मन को देशज भाषा के मोह से मुक्त नहीं करते हैं बल्कि ‘अपना देश, अपनी भाषा ः अपनी कहानी, अपनी आशा’ की परंपर को जीवंत करती हैं। यहीं नहीं, इसमें गंगाजली उठाकर सौगन्ध उठाने की देशज परम्परा भी अनायास उपस्थित हो जाती है।
अन्य कहानियों में ‘तपती रेत में’, ‘असमंजस’, ‘मरी नहीं है सोलह दिसंबर’ शीर्षक कहानियां सम्बन्धों को नया उजास देती हैं और संवादों की अनुकूलता लिए विवरण की वीथियों को भेदती जाती हैं। बस में सवार राक्षस (पृष्ठ ९४) जैसा किसी का हाथ पकड कर चल रही हैं। तुम उन हाथों को मजबूत बनाओ और उनकी जिंदगी को बचाओं कि उन्हें इस तरह सडकों पर चलते वाहनों में कोई राक्षस नोच-नोचकर न खा जायें। उस दिन बस में उन गिद्धों से मुकाबला तो बहुत किया था हमने भी मिलकर। वे गिद्ध नहीं, राक्षस थे। बस में सवार राक्षस। दांत और नाखून सलियों के थे उनके (पृष्ठ ९३-९४)। कथाकार बहुचर्चित दामिनी प्रकरण का संकेत ही नहीं देता बल्कि इबारतों से अपनी संवेदनाओं को प्रकट भी करता है ः मुझे फिर सोलह दिसंबर की सुबह याद आ गयी। मैंने देखा विधि मेरी गोदमें सोयी हुई है निश्चिंत।
‘एक चिट्टी चिट्ठियों की ओर से’ कहानी से कृतिकार ने अपने संग्रह का समापन किया है और फास्टफूड संस्कृति में भावनाओं की अभिव्यक्ति के लुप्त होने की बात को वर्चस्व देता है-‘‘हां, हम चिट्ठियां हैं बची-खुची। कागज पर कलम से लिखी हुईं। हार्डकॉपी। सोफ्ट नहीं। यह सोफ्ट शब्द हमारे समय में था ही नहीं। हम भी हैं एकदम नाजुक। आंसू भीने शब्दों में लिखी गई। छिपकर छिपाकर।’’
गोपाल सहर ने नए युग के नवभाषागत व्यवहारोचित मुहावरों की तरह अपनी अभिव्यक्ति दी है। यह लाजिमी भी है। हालांकि वे समर्पण में सिद्ध करते हैं कि यह उस पलाश को समर्पित है, जिसके नन्हें से सवालों ने कहानियों को जन्म दिया और उस मीरा को जिसने मेरे अंदर की तपती रेत को कभी ठंडा नहीं होने दिया। साफ-सुथरी छपाई और आकर्षक मुखपृष्ठ, पाठकों के मन पर सकारात्मक, सुखद असर डालता है। ?
अब क्या करूं
सावित्री चौधरी कृत ‘अब क्या करूं ?’ कहानी संग्रह कुल सत्रह कहानियां का संग्रह है। जिन विषयों को लेकर उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति दी है, वे वर्तमान समाज से अलग नहीं। इसलिए कहानियां काल्पनिक न होकर घटनाओं का परिप्रेक्ष्य उपस्थित करती हैं। उनकी कहानियां प्रांजल प्रवाह वाली और सांप्रत है और ये अतीत
नहीं होंगी।
इस कृति पर देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने उचित ही लिखा है कि यह संग्रह पाठकों को सही जीवन मूल्यों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देगा, ऐसी आशा है। आज के तनाव भरे नागरिक परिवेश में समाज के लिए हितकर और देश के लिए के वांछनीय आचार अपनाने का विवेक धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। मीडिया ने ऐसे परिवेश का चित्रण करना शुरू कर दिया है जिसमें षडयंत्र, आतंक, भ्रष्टाचार आदि के दृश्य छाए रहते हैं। इस सबसे अलग हटकर क्या वांछित है और क्या परित्याज है, इसका सकारात्मक संदेश प्रेरित करने वाला साहित्य आज की आवश्यकता है और उसका स्वागत होना चाहिए।
यही बात लेखिका ने भी पाठकों से कही है कि इस संग्रह की कई कहानियां तो समाज में व्याप्त कुरीतियों, बेईमानी, अन्याय और भ्रष्टाचार पर आघात करती हैं तो कोई कहानी इंसानियत को जगाती हैं, त्याग और सेवा की, ईमानदारी की नसीहत देती हैं।
कुल १११ पृष्ठों के इस संग्रह में सम्मिलित नया रंगरूट, आखिर क्यों, खोट, काल कोठरी, कब खिलेंगे, दुखदायी अनोखा प्रकाश, सैल्यूट, जानी दुश्मन, नए जमाने की उपज, अब क्या करूं, जहां चाह वहां राह, एक नई रीत ः नया रिवाज, इंसानियत को नमन, खुशी के आंसू, असली मनहूस, ढीठ औरत और विकास की ज्योति-इन सभी कहानियों के शीर्षक लेखिका के कथ्य को प्रकट करते हैं। सीधे-सीधे तौर पर लेखिका कहानी का समापन नसीहत से करती है।
नारी की आत्मनिर्भरता के लिए प्रयासों की ओर लेखिका की इंगिती है ः वह मां के पास पहुंची तो उसका हाल बेहाल देखकर वह समझ गई। कुछ भी नहीं पूछा बेटी से। बस, उसे गले लगाते हुए उसके सिर और पीठ पर मोह-ममता भरा हाथ फेरने लगी, सहलाने लगी, तो आभा के तन-मन में हिम्मत और हौसले की जैसे बाढ आ गई। (आखिर क्यों, पृष्ठ २३)।
समग्रतः इस कृति में सामान्य तौर पर कथ्य प्रधान कहानियां है और चरित्रों के व्यक्तित्व को किसी घटना से प्रसंगवश उभारने की अपेक्षा शब्दों से ही संकेतित किया गया है। भाषा में कहीं प्रवाह ठहर सा जाता है। मुद्रण साफ-सुथरा और कवरपेज आकर्षक है। ?
विश्वाधाम्, ४० राजश्री कॉलोनी, विनायक नगर, उदयपुर-३१३००१
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