सीता लौट आओ / बोल मेरी मछली

सुशील कुमार पुरोहित


सीता लौट आओ
<br/>कर्मयोगी के चौथी कहानी संग्रह ‘सीता लौट आओ’ की सीता कोई पौराणिक पात्र नहीं है। वह एक गरीब परिवार के चरित्र चंदर की पतिव्रता नायिका है। गंभीर बीमारी ग्रस्त होने के कारण उसके ईलाज में बहुत सा पैसा खर्च हो जाता है ऐसे में उसके बंधु-बांधव भी किनारा कर जाते हैं।
<br/>सीता चंदर को सरकारी अस्पताल में ले जाती है, यहाँ उसे कुछ दवाईयाँ तो वर्तमान व्यवस्था के अनुसार निःशुल्क मिल जाती है फिर भी सम्फ के लिये कुछ रुपये की आवश्यकता है। वह इसी उधेड-बुन में पास के एक मरीज के नजदीकी लोगों का वार्तालाप सुनती है। उन निःसंतान लोगों को अपने लिए एक संतान की आवश्यकता है। सीता निश्चय कर अपनी छोटी लडकी उन्हें गोद देती है। प्राप्त रुपये से वह चंदर का समुचित उपचार ही नहीं करवाती बल्कि एक मोबाईल भी खरीद लेती है जिससे वह अपने परिचितों के साथ सम्फ कर सके।
<br/>‘परिकल्पना’ में लेखक ने डॉ. रसानियाँ की संवेदनाशीलता व उनकी अपने कार्य के प्रति निष्ठा को दर्शाया है, डॉ. रसानिया अपने कर्म या कार्य के प्रति निष्ठा तो रखते ही हैं साथ ही एक नये रसायन का अविष्कार भी जो कर देते हैं जो नेत्रहीन व्यक्ति के आँखों की रोशनी लौटा सके। वर्तमान में यही रसायन या कि द्रव लेन्स कहलाने लगा है। केवल डॉ. रसानियां ही नहीं उनके टीम के अन्य सदस्य भी उनकी इस सफलता से अभिभूत है। अपने एक चित्रकार पर अपने रसायन का प्रयोग किया, यह भी सफल रहा और अपनी सफलता को डॉक्टर अन्त तक परीक्षण करते रहे और सफल रहे।
<br/>इसके आगे की कहानी ‘माँगेगे कश्मीर तो देंगे चीर’ ने भारत और पाकिस्तान के १९९९ से २००२ के अन्त तक कदम-दर-कदम भारतीय से और सेनानायकों की वीरता, रणनीति और विजय का भाव-भरा वर्णन किया है। पथहारा कहानी में लेखक ने गरीब व दलित वर्ग के युवकों को आज भी घोडे पर बैठ कर बारात निकालते को उच्च वर्ग के लोग अपना समझते हैं।
<br/>‘मैं पतर नहीं’ कहानी उस समय की है जब देश में कई स्थानों पर राजाओं-महाराजाओं का राज्य था। राव मुकन्दरसिंह के दर्रा के जंगलों में शिकार के लिये यहाँ के जंगल में गए जहाँ वे शेर के शिकार के साथ अवली मीणा के रूप व गुणों से प्रभावित हो गए। उन्होंने येन-केन प्रकारेण अवली को अपने राज्य में न केवल रानी बना कर बसाया बल्कि उस जंगल में एक बावडी का नाम अवली के नाम कर दिया।
<br/>अवली के पूर्व पति को यह अधिकार भी दे दिया की दर्रा मार्ग से गुजरने वाले व्यापारियों से टैक्स वसूल कर सके। राजपूताना के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ देखने को मिलती हैं।
<br/>‘सौगंध’ व त्रिवाचा प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। पत्नी की मृत्यु के बाद डॉ. गोपालन २० डॉलर प्रतिमाह की पेंशन अपनी माँ के कहने पर वृद्धाश्रम को चलाने के लिए दान में दे देते हैं। ‘त्रिवाचा’ मंगत और अमरा के मित्रता और उनके युवास्था के लिए गये त्रिवाचा को प्रकट करती है। कहानी में बाल-विवाह जैसी कुरीतियों और उससे होने वाली बुराईयों को प्रकट करती है।
<br/>‘माथे का कलंक’ वर्तमान में होने वाले गैंग रेप की कथा है। एक टॉकीज में फिल्म देखने आई महिला संतोष को सामुहिक बलात्कार का सामना करना पडा। टॉकीज के कर्मचारियों की वासना ने उसके सिर पर कलंक लगा दिया। सारा केस अदालत तक पहुँचा, कर्मचारियों को सजा मिली लेकिन संतोष को आत्मसंतोष नहीं हुआ। ‘पदचाप’ कहानी का नायक विजय बहूत गरीबी में जीवन यापन करते हुए पीर साहब की मजार के सामने पहुँच जाता है, मजार पर अपने लिये रोजगार सन्तुष्ट नहीं है। वह इसी जद्दो-जहद में बजरंगबली हनुमान की प्रतिमा की शरण में जा पहुँचता है जहाँ से उसे वाँछिल फल मिल जाता है।
<br/>‘नाच लक्ष्मी नाच’ कालबेलिया समुदाय के उस परिवार की कहानी है जो विदेशी पर्यटकों का मनोरंजन कर जीवन यापन कर रहा है। अन्ततः वह भारत-जर्मन महोत्सव में योगदान देकर प्रतिष्ठा व पैसा दोनों कमाता है। ‘‘साक्षात्कार’’ दे कर ईश्वर से साक्षात्कार करना चाहता है। इसके लिये वो सभी तैयारियाँ करता है। यहाँ तक कि साक्षात्कार के समय विडियोग्राफी का प्रबन्ध भी करता है। ईश्वर उस परिवार का साक्षात्कार नहीं होता,अपने पर्व निर्णय के अनुसार पूरा परिवार जहरीले लड्डू खा कर प्राण उत्सर्ग कर देता है ‘दर्द का समंदर’मध्यम परिवार की कहानी है। कहानी की नायिका कल्लो की आँखों में संक्रमण हो जाता है, उसे दिखाई देना बन्द हो जाता है। कल्लो का पति सौदान सिंह स्थानीय डॉक्टर की सलाह पर उसे एम्स अस्पताल नई दिल्ली ले जाता है। दिल्ली एम्स के डॉक्टर उसका उपचार करते हैं, कल्लो की आँखों की रोशनी लौट आती है। यही पर सौदान सिंह का संकट समाप्त नहीं होता, हृदयाघात में उसकी मृत्यु हो जाती है।
<br/>अधिकांश कहानियाँ सत्य घटनाओं के आस-पास बुनी गई प्रतीत होती हैं, कहानियां का शिल्प भी सामान्य है और भाषा भी। ?
<br/>बोल मेरी मछली
<br/>नेरन्द्र बाबू का वर्षों बाद अपने शहर लौटना केवल शहर तक वापस आना मात्र नहीं है एक युगों का बदल जाना है किशोरवय के नरेन्द्र के बाल पक चुके हैं आँखों पर मोटे काँच का चश्मा चढ चुका है अतीत को पीछे छोड चुके नरेन्द्र बाबू वर्तमान में लौट आए है। ढाणी छोड कर गये नरेन्द्र वापस लौटे तो ढाणी क्रमशः गाँव, कस्बे, नगर व महानगर मे बदलने तक का दम भर रहा था। इसी दरम्यान कुँए से जोहड बना और जोहड से पक्की डिग्गी।
<br/>नई पीढी को जोहड के पक्की डिग्गी और फिर गार्डन में बदल जाने की जानकारी नहीं थी फिर इसके आगे कब बाजार बन गया, साइबर कैफे खोलने के लिए युवक पिता से जिद कर रहे हैं। पीढी दर पीढी अकाल ने किसानों की कमर तोड दी है, कैसे डिग्गी वाले स्थान पर अन्ततः देवस्थान उभर आया है। धीरे-धीरे मंदिर-मस्जिद बने फिर क्या था महानगर बनाने को आतुर वोट बैंक जातियों में बंट गए और जातियाँ वोट बैंक में अब चाहे चिडिया की आँख हो या मछली की, मकसद सिर्फ जातिगत वोट बटोरना था।
<br/>नरेन्द्र बाबू अभी तक चुप है। अचानक वे फूट-फूट कर रोने लगे उन्होंने एक पत्थर उठाया और चिडिया पर निशाना साध लिया मगर चिडिया तो फूर्र-फूर्र से उड गई। इसी कहानी में चिडिया की आँख एक प्रतीक है।
<br/>बठिण्डे वाली गली में बूढे माँ-बाप का दर्द इस तरह उकेरा गया है कि सहज ही वर्तमान पीढी की बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा के भाव उभर आते हैं। टूट चुकी आस के बीच जब माँ-बाप को बेटे का पत्र मिलता है तो सहज भाव से पूछ लेता है कि वह कब आएगा? तो ‘बठिण्डे वाली गाडी’ का मन्तव्य समझ में आ जाता है।
<br/>‘क्योंकि वह आदमी’ कहानी पुरुष प्रधान समाज में आदमी होने के घमंड से भरपूर आदमी पृथ्वी, आकाश, पाताल, सागर के बाद संपूर्ण प्रकृति को चुनौती देता है लेकिन अंत में उसका हश्र इन सबसे अलग धीरे-धीरे उठने का प्रयास कर रहा है, उसके अहंकार को एक परिन्दा टूटते हुए देख रहा है। ‘सदियों पुरानी औरत’, औरत के शोषण की कहानी है लेकिन ‘और नहीं बस...’ में यही औरत सीता माता के रूप में वर्षों से एक लडके धीरू का प्यार भरा शोषण करते दिखाई दे रही है लेकिन उसका आक्रोश मालिक के अत्याचार का विरोध करते दिखाई देता है।
<br/>‘कहीं वह’ और ‘व्यवसाय’ कहानियाँ मानव मनोविज्ञान से भरी हुई कहानियाँ है ‘कहीं वह’ उस युवती की कहानी है जो यात्रा करते हुए हर कदम पर घबरा जाती है। बुआ के रिश्ते वाली वह युवती जब अपने घर पहुँचती है तो उसे अपनी जन्मदात्री से उलझना पडता है। उसकी यात्रा के साथ चल चलने वाली अन्य महिला को लगता है कि जो कुछ बुआ के साथ हुआ है वह स्वयं उसी के साथ तो नहीं हुआ है? ‘व्यवसाय’ उन तीन मित्रों की मनोवृति का बखान करती है जो एक नया व्यवसाय साथ करना चाहते हैं उनका ध्येय आखिरकार उससे प्राप्त आय के बँटवारे पर लगा रहता है।
<br/>‘अश्वमेघ के घोडे’ संकेतात्मक रूप में कहानी है तो ‘सुराग साहब’ के ‘सुराग साहब’ लोगों के घरों में ढूंढते सुराख साहब हैं जिन्हें लोगों ने उनकी प्रवृत्ति के अनुरूप नाम दिया है परन्तु वह सुराख से सुराग हो गया है। सुराग साहब के खुद की घर-गृहस्थी में इतने सुराख हैं कि वह प्रकृति के अन्त तक आते-आते स्वयं का इन्ट्रोस्पेक्शन कर वैसे ही सुराख अपने में होने का सत्य जान लेते हैं।
<br/>जिस कहानी को आधार बना कर इस कहानी संग्रह का नामकरण किया गया है, यह कहानी पढ दुःख और पीडा से भर जाता है। ‘चन्दरू’ नाम के युवक की हालत और प्रति असीम सहानुभूति रखने वाली पाँच भाईयों की सबसे छोटी बहन ‘दुलारी’ का अन्त तक दिखाई देने वाला पे*म। यह कहानी का अन्त नहीं शुरूआत है। बचपन में खेले जाने वाले खेल-
<br/>भरा समुन्द्र, गोपी चन्दर
<br/>बोल मेरी मछली कितना पानी?
<br/>-इतना पानी
<br/>को संवेदनशील रूप लेखिका ने दिया है। चन्दरू घावों भरे शरीर रेंगते कीडे और दुलारी के वक्र दिव्यांग शरीर का वर्णन भावुक बना देता है। ‘जागे हुए लोग’ पनपती जा रही नाबालिग लडकियों के प्रति बलात्कारी प्रवृत्ति पर चोट करती है।
<br/>महागरीय सभ्यता में सर्द हवा के साथ सर्द होते जा रहे रिश्तों को प्रकट करता है। सर्द मौसम और ऐसी ही मनःस्थिति को प्रकट करती है कचरा बीनने वाली स्त्रियों की मानसिकता को प्रकट करने वाली कहानी ‘कचरा’। संग्रह की अन्तिम दो कहानियाँ ‘मणि’ और ‘बन्द दरवाजा’ इक्कीसवीं सदी की मानसिकता को प्रकट करती है, राम, अल्लाह, गुरु, खुदा की सीमाओं को पार करती कहानी ‘मणि’ यह सन्देश देती है कि अलग-अलग लिबास छोडो इन्सान बनो, जबकि अंतिम कहानी ‘बन्द दरवाजा’ सहज ही स्त्री मानसिकता को दर्शाती है।
<br/>३९४, गाँधीचौक, जोधपुर-३४२००१
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