सांस्कृतिक कथाओं में राजस्थान के रंग

डॉ. महेन्द्र भानावत


सांस्कृतिक कथाओं में राजस्थान के रंग
<br/>जीवन-व्यवहार में ही नहीं अपितु साहित्य, संस्कृति, कला, स्थापत्य तथा प्रकृति-कृति में भी राजस्थान के अनेकानेक रंग रूपायित हैं। इन रंगों की अनेक चासनियां विविध कथा-किस्सों, बात-बोलों, कहावत-मुहावरों, ख्याल-तमाशों तथा शिल्पगत संस्कारों द्वारा इन्द्रधनुषी लय-जयकारों में देखने को मिलते हैं। सर्वाधिक सांस्कृतिक रंगों की मोहक मधुरिम छटाओं का सौंदर्य देखना हो तो अनगिनत कथाएँ अपने श्रवण, चक्षुण एवं पठन के पायदान पर मुलकाती मिलती हैं।
<br/>ऐसी ही ३९ कथाओं का मूल्यवान लेखन आईदानसिंह भाटी ने राजस्थान की सांस्कृतिक कथाएँ नामक पुस्तक में किया है। ये कथाएँ तीन भागों में विभाजित हैं। इनमें ७ प्रेम कथाएँ, १८ इतिहास कथाएँ तथा १४ चरित्र कथाएँ हैं। इनमें से कुछ कथाएँ तो राजस्थान में ही नहीं, बाहरी प्रांतों के जनजीवन को भी प्रभावित किये हुए हैं। कुछ कथाएँ संपूर्ण राजस्थान में प्रचलित हैं तथा कुछ का क्षेत्र मारवाड जैसे अंचल विशेष की कंठासीन धरोहर लिए हैं।
<br/>अपने मंतव्य को स्पष्ट करते हुए लेखक ने पुरोवाक के प्रारंम्भ में लिखा है- राजस्थान की सांस्कृतिक कथाओं में इतिहास, लोकाख्यान और किंवदंतियों में मानवीय मूल्य और नैतिकता की कौंध जहां भी दिखाई दी, मैंने उनको आज के इस विकसित कहे जाने वाले समाज के सामने रखने की चेष्टा की है। आंचलिक मानवीय इकाईयों के केन्द्र में सभी जगह ऐसे चरित्र पाये जाते हैं जिन्होंने पे*म, करुणा, संघर्ष और प्रतिरोध के स्वरों पर प्राणों तक को होमा है। राजस्थान की आंचलिकता तो इन प्रतिरोधी और संघर्षशील चरित्रों से भरी पडी है जिन्होंने कराहती मानवता का रक्षण किया है। एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में प्रेम और करूणा की धवल पताकाएँ फहराते राजस्थानी वीरों ने पग-पग पर प्राण न्यौछावर किय है। गांव-गांव और खैडे-खैडे में खडी छतरियाँ, देवलियाँ, थान-थाडे और स्मारक आज भी इसकी गवाही दे रहे हैं। इन सांस्कृतिक कथाओं के नारी-चरित्रों का स्वाभाविक और उनका देवत्व भी जीवन-संघर्षों में ही विकसित हुआ है। देवीय चरित्रों के चमत्कारों से परे उनका जीवन-संघर्ष और जीवन-दर्शन शुद्ध मानवीय है (पृ. ५-६)।
<br/> पे*मकथाओं में ढोला-मारू, मूमल-महेन्द्र, निहालदे-सुलतान, गींदोली-जगमाल से तो लोकजन परिचित हैं किन्तु कोडमदे-शार्दूल अपेक्षाकृत बहुत कम चर्चित है। लेखक ने इन कथाओं को जिस वर्णन शैली में लिखा है। लगता है जैसे हमारे समक्ष ही वह कथा कही जा रही है और आँखों के समक्ष उसके पात्र अपने असली रंग में रूपायित हो रहे हैं। उदाहरणार्थ कोडमदे-शार्दूल कथा का यह अंश-
<br/>राजकुमार शार्दूल की मृत्यु से राठौडों के लिए युद्ध का उद्देश्य पूर्ण हो गया और भाटियों के लिए अब युद्ध करने के लिए कुछ शेष नहीं रहा। राजकुमारी कोडमदे ने दाहिना बाजू काटकर एक अंगरक्षक, सेढे भाटी को बुलाकर कहा कि वह इस वह इस गहनों से सजे हुए हाथ को लेकर शीघ्रताशीघ्र पूगल पहुँचे और गढ के द्वार पर खडे बहू का उत्सुकता से इन्तजार कर रहे उसके बूढे सास-ससुर के पांवों से लगा दे, ताकि उन्हें लगे कि उसकी बहू ऐसी वीरांगना थी। दूसरे परिचारक को कहा कि वह उसका बायां हाथ अपने पीहर के एक मोहिल को दे दे जो जाकर माँ-बाप को दिखाए कि कोडमदे ने उसके घर में जन्म लेकर उन्हें लज्जित नहीं किया है। उन्हें कहना कि जिस बेटी के जन्म पर उन्होंने थाली तब नहीं बजाई थी, अब उसके मरण उत्सव पर नगाडे अवश्य बजवायें उसने सास-ससुर और माता-पिता से यह भी कहा कि उसके हाथ का दाह संस्कार करने से पहले हाथ के गहने चारणों को विधिवता दान में दे दें, ताकि वे पीढी-दर-पीढी उसके और शार्दूल के प्रणय और बलिदान की यश गाथा आने वाली पीढियों को सुनाते रहें (पृ. ३९-४०)।
<br/>इतिहास कथाओं में उन ख्यातनाम वीरों की कथाओं का परिचय मिलता है जो श्रुत साहित्य की धरोहर से अधिक इतिहास को आलोकित किए है। इसमें संत, भक्त ईसरदास, केल्हण, सुजाण, नथमल, देपालदे, बल्लू चम्पावत, बाबा देवबन, चानण खिडिया, राव केल्हण, कीकावती जैसे चरित्रों ने अपने वीरोचित कार्यों के जरिये नैतिक आदर्शों की स्थापना की और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हेतु सर्वस्व त्याग दिया।
<br/>जैसलमेर रियासत के दीवान नथमल ने अपने पुत्र के पालने के लिए पेड काटने का आदेश दिया जो अवैध कार्य था। राजा को जब पता लगा तो नथमल को फटकारते हुए देवी को सोने का पेड चढाने का आदेश दिया। नथमल राजाज्ञा शिरोधार्य कर पेड काटने पहुँचा। बोरडी पर कुल्हाडी का वार करने पर पेड नन्हें बालक की तरह विलाप करने लगा। मोर की तरह कुरलाते उसने श्राप दिया- हे नथमल! तेरी घरवाली मर जाय। पालने में अठखेलियाँ करता बच्चा मर जाय। अपने स्थान पर बैठा तेरा ऊँट मर जाय। पांवों में सांकल डाली तेरी भैंस मर जाय। मुँह में घास डाल दीवान माफीनामा लेकर भादरिये में देवालय पहुँचा और जुर्म कबूल कर देवी को सने का पेड चढाया तब जाकर उसके घर में सारी स्थितियाँ सामान्य हुई। जैसलमेर में पटवों की हवेली के साथ नथमल की हवेली भी दर्शनीय बनी हुई है।
<br/>चरित्र कथाओं में संत पीपाजी, गोगाजी, पाबूजी, तेजाजी, रामदेवजी, करणीजी, जीणमाता, हडबूजी, जांभोजी, मेहा मांगलिया जैसे पहुंचे संत-भक्त-वीरों से सभी परिचित हैं। इन कथाओं में व्यक्त आदर्श चरित्र कई दृष्टियों से हमारा मार्गदर्शन करते हैं। डॉ. पन्ना ने ठीक ही लिखा- ‘राजस्थानी सामंती परिवेश में ऐसी नैतिकताओं और मूल्यों का विकास आश्चर्यजनक तो है ही, प्रेरणास्पद भी है। ऐसे सामाजिक बदलाव के मानवीय प्रयत्न सदियों तक लोक को प्रभावित करते हैं।’
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