तीन कविताएँ

प्रियंका खेराडिया


आखिरी सच तो ये नहीं
जो हमेशा हँसता रहता हो,
जरूरी तो नहीं कि उसे कोई गम न हो,
जो कुछ भी माँगता नहीं,
जरूरी तो नहीं कि उसे कोई चाह नहीं है।
क्यूँ वक्त-बेवक्त रूलाती है किस्मत
आखरी सच तो ये नहीं कि उसे हँसना नहीं है।
अकेला है वो कोई हमवार नहीं मिलता
पर क्या कोई पनाह नहीं हैं?
जीना तो उसे भी है मगर ऐसा कोई शानदार अंत नहीं
मरना चाहता है वो मगर, उसे तो किसी से प्यार भी नहीं है।
रूठ के बैठा है वो, क्यूँ जग से उसकी बनती नहीं है
मालूम है उसे, कहाँ और किसके दर पे है
खुश वो अपने जन्मदाता में है
लगता है बहुत खास है क्या करे शायद वो
खुद को जानता नहीं है।
रीत तो सब निभानी है उसे मगर बस दर्द
सहना नहीं है
आखरी सच तो ये नहीं कि उसे हँसना नहीं है। ?
रब को मनाऊँ कैसे
जीना मुझे है इस जमाने में
मगर बुरी न*ार से खुद को बचाऊँ कैसे?
नाम पाना है मुझे मगर ऐसे हालात में कमाऊँ कैसे?
दोस्तों! उम्मीद तो इतनी है कि सितारे
खुद सुलाने आए निशा में
ऐसी पहचान बनाऊँ कैसे?
कोई गम नहीं है मरने का
अरे! सब कुछ जो मेरे पास है,
और कुछ भी मांगू कैसे?
रब वो देता है जो अपने लिए अच्छा है
फिर सवार को अनचाहा सफर मिलता क्यूँ है
मुझे महफूज करदे और बखूबी दिली-सुकून दे,
सोचती हूँ ऐसे प्यार के वास्ते, रब को मनाऊँ कैसे?
मन को बहुत यकीं है अपनी पवित्रता पर
जानने लगी हूँ
मैं खुद को मगर इसे और
मजबूत बनाऊँ कैसे?
ऐ मेहरबान! मुझे रहमत दे अपनी कि मैं
फिर से खुश रहूँ
वरना मैं खुद को सम्भालूं कैसे? ?
चाँद की निशानी
आज आसमाँ में हूँ, मुझे गिरने न देना।
शिखर पे ले चलो और मुझे ढलने न देना।
अपने दम पे वजूद बना सकते हैं
लेकिन अकेले चलने न देना
यूँ तू प्यार का खजाना है, जिद पे आ जाए तो
बला भी है
मौसम बदलते रहते हैं वैसे,
इस खिली बहार को, पतझड से मिलने न देना।
हर जंग में जीतना है हमेशा
बस तू मुझे मरने न देना
चाँद की निशानी ह मैं,
आखिर राख होना ही है,
देख! इस दिव्यता को जलने न देना। ?