मैं क्यों लिखता हूँ

महावीर सिंहल


‘मैं क्यों लिखता हूँ’ यह पूछने की बात है भी और नहीं भी। लेकिन आप पूछते हैं तो बताता हूँ। इसका एक उत्तर तो यह है कि मैं बस लिखता हूँ। बचपन से ही। पाँच साल की उमर से ही जब मैं पठशाला में पढने गया था सन् १९३८ में। मुझे लिखना सिखाया गया था मरे माता-पिता द्वारा। और तभी से मैं आज तक लिख रहा हूँ। और जब तक हाथ में कलम है लिखता रहूँगा। मैं ही क्या आप भी तो बचपन से लिखते-पढते रहे हैं।
अब प्रश्न आता है कि मैं किसके लिए लिखता हूँ। मैं अपने लिए, अपनों के लिए, आप सभी के लिए लिखता हूँ। आप पढे या नहीं पढे पर मैं तो लिखता हूँ और लिखता रहूँगा।
अब तो यह जैसे मेरी आदत बन गई है। पूजा बन गई है, इबादत बन गई है।
लिखता कोई बुरी बात नहीं है। लिखने का कोई समय नहीं होता। किसी भी समय रात-दिन कहीं भी लिखा जा सकता है।
आपने ‘क्यों’ कहा है सो इस ‘क्यों’ का कोई उत्तर नहीं होता। यह मैं आपसे पूछता हूँ कि आप ‘क्यों’ पढते हैं। बताओ क्यों पढते हो और अपना समय काट रहे हो। इतने समय में तो आप और भी बहुत से काम कर सकते हो। इन्हें आप अच्छी तरह जानते हो।
मुझसे सभी कहते है कि मैं हर समय कभी भी लिखता रहता हूँ। लिखने के अलावा और कोई काम करो। और कोई काम नहीं है क्या आफ पास। वे सोचते है कि लिखना कोई काम नहीं है। लिखना तो बहुत बडा काम है। लिखकर ही तो अपनी बात कही जाती है, और मैं यही तो कर रहा हूँ।
क्या लिखने के शब्द होते हैं। होते हैं और नहीं भी होते। बोलना भी एक शब्द है। आप मौन रहकर भी कुछ कहते हैं। कुछ पढते हैं। बोलना भी एक लेखन है।
लिखना कला है या विज्ञान। आप ही सोचिये। यह कला और विज्ञान के साथ वाणिज्य भी है, ज्ञान भी है। अगर आप ज्ञानी नहीं है तो कुछ भी नहीं लिख सकते। अच्छा नहीं लिख सकते।
वैसे लेखन बुरा नहीं होता। आप किसी को गाली भी लिखते हैं तो वह भी उसकी भलाई के लिए होती है। अगर कोई आपको बुरा कहे तो यह भी आपकी भलाई के लिए ही होता है।
मैं जो भी लिखता हूँ उसे पढता भी हूँ। पढ-पढकर फिर लिखता भी हूँ।
अब मैं आपसे पूछता हूँ कि आप मेरा लिखा यह क्यों पढ रहे हैं। साफ कहने के लिए था और कुछ। समय तो कटेगा ही। वह कटता नहीं, काटता है। हम सबको काटता है। उसका काम ही चलता है वह लिखता है और नहीं भी लिखता। वह चक्कर लगाता है। वह समय-
चक्र है।
मैं जानता हूँ कि आप भी समय के चक्कर में आ गये। समय हम सबको छोडने वाला नहीं है। एक-एक पल से दिन और रात बनते हैं, वर्ष बनते हैं। यहाँ तक कि सारा जीवन बनता है। और रिनंतर बनता रहता है। बस।
मैं लिखता हूँ इसलिए कि आप पढते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि अगर आप नहीं पढें तो भी मैं लिखता रहूँगा। निरंतर। समय की तरह अबाध बिना रुके। मेरी लेखिनी कभी बन्द नहीं होती।
मेरा लेखन कभी पुराना नहीं होगा। आप जब भी मेरे लेखन पढेंगे तब-तब वह आपको नया लगेगा। नव लेखन लगेगा। यही मेरे लेखन की पहचान है और रहेगी।
मैं आपसे विदा नहीं लूँगा। मेरा लेखन शाश्वत है, हमेशा-हमेशा रहेगा। यह सत्यं शिवं सुंदरम है। चिर-शाश्वत है। ?
अधिस्वीकृत पत्रकार, राजमल साकार ४८, नीलगिरी अपार्टमेंट
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