पावस और प्रेम : ललित निबन्ध

नीता चौबीसा


‘‘सुरपंचम को नाद भलो है, मेघो को मृदुमास भलो है’’, गगन के चंदोवे पर सजी मेघमाला किसे भली नहीं लगती पर सोचती हूं इतना आसान कहां होता है पावस का उतरना?? समय चक्र के प्रवाह में धरती के लहराते कुंतल शुष्क हो जराजीर्ण होते है, उन्मादित यौवन ढलान पर आ जाता है, जब उसका दग्ध-तप्त हृदय आकुल-व्याकुल हो उठता है। प्रियतम का विछोह दीर्घ हो तो हृदय का दाह भी कब सह्य होता है ? और जब यह झुलसन समष्टिगत हो जाए तब दायित्व बोध से कर्तव्य का रूप ले लेता है और धरिणी के आप्तकाम हृदय की ज्वाला काम-कामिनी सी हो सपदलक्ष हुए रचिय रति सुख की कामना में रत हो जाती है। उसी दाहताप का घनीभूत हुआ स्वरूप है मेघ माला जो चहु दिसी डोलती फिरती है, अपने गर्जन-तर्जन में धरती का रुदन छुपाये ये मेघ पृथा के उस वर को ढूंढते फिरते हैं जो भांवरे लेकर दूरस्थ परदेस में जा बसा है।
मेघों के अनुनासिक में अवनी की चीर तितिक्षा का आलाप भी समाहित है और सृष्टिपालना की निर्जरा का अनुरागी राग भी घुला है। वस्तुतः राग जब अनुराग में बदलता है तभी सच्चे वैरग का आरम्भ होता है। मेघो के केहरी-नाद में घुली पृथ्वी की आतुर पुकार जब समाधिस्थ गगन तक पहुंचती है तो उसकी समाधि भंग होती हैं, वीतरागी हुए उसके हृदय का थिर हुआ श्रोन बहने लगता है। जब-जब भी वीतराग द्रवित होता है तो वह प्रेम के शाश्वत रूप करुणा को सहजता से उपलब्ध होता है। फिर चाहे वह धरती का हो या आसमान का। पृथा की प्रेम पाति लेकर बावरी हवाओं की अहीर बस्ती म भटकते मेघ या आसमान का। पृथा की प्रेम पाति लेकर बावरी हवाओं की अहीर बस्ती में भटकते मेघ अपने आर्य पथ पर बढते जाते हैं। इसी अविगत की यात्रा में कभी उनमें अरगजे की गंध घुलती है तो कभी गोधुली की वास। परालम्बी हुए मेघ धरा-अम्बर का स्वस्त्यतन मिलन करवाने अर्निदिष्ट परंतु अपने आरज पथ निरन्तर बढते रहते हैं। थकन से चूर कभी शिथिल कदमों से निस्पन्द से हो जाते हैं तो कभी विक्षिप्त सी कोलाहल में निमग्न हो निष्ठुर हुए अम्बर से याचना करते हैं। जब पृथ्वी के संतप्त हृदय की विरह वेदना का ताप प्रतिहारी हुए मेघों का हृदय भी बेंधने लगता है तो उससे उपजी आतताई पीडा से वे उल्काधारी हो तडीत को धारण करते हैं। मेघो के विचलित मन में मधुरता टिक नहीं पाती और सहसा वे दारुण-क्रंदन करने लगते है। वास्तव में बादल कहां गरजते हैं साहब वे तो धरती के रुदन को ही न केवल स्वयं में धारण करते हैं अपितु अभिव्यक्त भी करते हैं। वयस से वयस्क होने तक पृथ्वी के विरह दंश को झेलते हैं। जब पर-पीडा उनकी अपनी पीडा हो जाती है तब समाधिस्थ हुए वीतरागी अम्बर की निष्ठुर मौन समाधि टूटती है और उनकी करुण पुकार सुन कर उसकी सुधियों में पृथ्वी झांकने लगती है जैसे भूले हुए दुष्यन्त को शकुन्तला स्मरण हो आती है। तब वीतरागी हुए अम्बर का अन्तर द्रवित हो पिघलने लगता है और यही अन्तरद्रवण उसके द्रगों से होता हुआ बादलों में उतर जाता है। शाश्वत प्रेम के करुण-रस से आप्लावित हो बादल बरस जाते हैं। योगियों का प्रेम, करुणा है, शाश्वत है कामियों के अनियन्त्रित उपभोग की भांति नहीं इसलिए दायित्व बोध को जन्म देता है, वहन करता है और उससे उपजे जीवन जीवनदायी होते हैं, नव अभ्युदय को धारण करते हैं और धरिणी हुलसित हो हरित पर्णी हो कर मंगलगान करती है। सृष्टि का अवगान करने परिमार्जित प्रेम की फूल्लौरी धारण करती पृथा मधूलिका हुई हर्षित रुपगर्विता सी नर्तन करती है। प्रेम के शाश्वत नाद पर थिरकती पृथ्वी और सामगान गाता गगन सृष्टि में पावस को उतारता है। रोदन से नर्तन तक की इस अविरल अनागत यात्रा में जीवन के पावस में रुपांतरित करने का सार्मथ्य है।
धरती अम्बर की ऐकांतिक प्रणय-यात्रा ही वह आत्मतत्व का मूल है क्योंकि आत्मतत्व का स्वभाव ही प्रेम है अतः इस स्वाभाविक प्रेम संबंध में आनंद है, व्युत्पत्तिजनक पावस है, अटूट विश्वास है जो उन्मादजनित भोग पर नहीं वरन् तपोनिष्ठ पे*म पर टिका है और उसी पर फलता-फूलता है। पुरुषार्थ चतुष्ठय का प्रेरक है, सृष्टि का संचालक भी। व्यष्टि से समष्टि तक, दिगन्त तक प्रेम ही वह बीज-मंत्र है जो आर्कषण की पगडण्डियों पर भ्रमण नहीं करता अपितु पुलक भरे राजमार्ग पर यायावरी करता है और नवोन्मेष पथ का सृजन करता है। प्रेम नवीन अन्जान पगडण्डियों की भटकन नहीं वरन् एक तपोनिष्ठ यायावरी है प्रेम जिसके अक्ष पर पावस पलता है। प्रेम आल्हाद है पर उन्माद नहीं, ध*ुव से ध*ुव का संतुलन है प्रेम जिसमें स्वाभाविक स्पन्दन है, गति है, विराम नहीं इसलिए काल के वार्षिक प्रवास-चक्र में, अबाधित पावस हर बार उतरता है। प्रेम के ध*ुवों पर धरा अम्बर टिके हैं। प्रेम के राजमार्ग पर ही मेघ, पवन, नदियां, समन्दर चलते हैं। ब्रह्माड की गति के इस चालक को शाश्वत रुप में समझने हेतु हमें व्यष्टि से समष्टि तक की यायावरी नितान्त अकेले करनी होगी। आत्मनिष्ठ होकर स्वयं में उतरना होगा और जब इस अविरल यात्रा में स्वानुभूति और परानुभूति रिलमिल कर एक हो जाएं तभी रोदन और क्रंदन हास्य और नर्तन में बदलेगे। यही पावस का जन्म है। मन का मावस जब पावस का यह अन्योन्याश्रित संबंध चिरन्तर है। पे*म से उपजा पावस पुन पे*म को जन्म को देता है। प्राणी जगत से वनस्पति जगत तक सचराचर प्रेमजनित उत्पाद में नमग्न हो जाते हैं।
यही कारण है कि प्रत्येक भावुक संवेदनशील हृदय को पावस सुहाता है और प्रेम के परिणाम के रुप में पावस का उद्भव होता है। पृथ्वी की अटूट आस्था, प्रेमिल तितिक्षा, प्रतिक्षा का आलोडन करते मेघ जब उसके आकुल अंतर और द्रवित दृगों का पानी भूले बिसरे निष्ठुर नभ के हृदय में बो आते है, तब दोनों ओर पलते प्रेम का नाद, आस्था के मंजीरे और विश्वास के खडताल पर ताकधिना-धिन कर थिरक उठते हैं और बौराया पावस समूची सृष्टि को शिवमय कर श्ाृंगारित करता है। प्रेम का तार सप्तक गाते घन आनंद का वर्षण कर सृष्टि गेह को वंदनवार और हरित अल्पनाओं से सजा देते हैं। पावस का आगाज प्रेम का मधुमय सिंचन भी है धरा पर और प्रेम का परिणाम भी। प्रेम के हिंडोले पर झूलता पावस जीवन का मल्हार है जिसे गाना सृष्टि का सत्य है। संवेदना के उच्चतम शिखर पर प्रेम रहता है और प्रेम के गर्भ में पावस पलता है। पर इसके लिए प्रथम प्रत्येक को जेठ की तप्त गर्मअगन को सहना पडता है। यही सृष्टि का नियम है। पावस पाना है तो जेठ से गुजरना ही होगा हरेक को। तपोनिष्ठ प्रेमजनित पावस अवनी अम्बर की प्रेम अनुभावों का संचार करता सम्पूर्ण जगत में प्रेम के अहो भाव को स्थाई भाव में बदलने का यत्न करता रहता है। प्रमुदित प्रेम का उपहार ‘पावस’ जगती में प्रेम की प्याप्ति और पुनर्स्थापन है। इसलिए पावस और प्रेम दोनों पावस हैं, उर्जस्वित रस से सराबोर हैं और कल्याणमय भी। पावस तपोनिष्ठ प्रेम का प्रमाण-उत्पाद भी है और समान रुप से आत्मनिष्ठ अद्वैतवादिय एवं मैथूनी-सृष्टि का प्रिय प्रवास भी है। ?
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